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Janeu Sanskar Muhurat 2026: जानें साल 2026 के सभी उपनयन मुहूर्तIt takes 13 minutes... to read this article !

सनातन हिंदू धर्म में मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक कुल 16 प्रमुख संस्कारों (16 Sanskars) का उल्लेख किया गया है। इन 16 संस्कारों में दसवां और सबसे महत्वपूर्ण संस्कार ‘उपनयन संस्कार’ है, जिसे आम बोलचाल की भाषा में ‘जनेऊ संस्कार’ (Janeu Sanskar) या ‘यज्ञोपवीत संस्कार’ कहा जाता है।

‘उपनयन’ का शाब्दिक अर्थ है— ‘पास ले जाना’ (उप = पास, नयन = ले जाना)। प्राचीन काल में जब बालक को शिक्षा ग्रहण करने के लिए गुरु के पास गुरुकुल भेजा जाता था, तब यह संस्कार संपन्न किया जाता था। जनेऊ धारण करने के बाद ही बालक को वेदों का अध्ययन करने, गायत्री मंत्र का जाप करने और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने का अधिकार प्राप्त होता है। जनेऊ धारण करना केवल एक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह बालक को ब्रह्मचर्य, अनुशासन, ज्ञान और पवित्रता के मार्ग पर ले जाने की एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है।

यदि आपके घर में भी कोई बालक उस उम्र में प्रवेश कर चुका है जहाँ उसका जनेऊ संस्कार होना चाहिए और आप वर्ष 2026 में इस पवित्र अनुष्ठान को करने की योजना बना रहे हैं, तो इसके लिए एक शुभ मुहूर्त (Shubh Muhurat) का चुनाव करना अत्यंत आवश्यक है।

इस अत्यंत विस्तृत, शोधपरक और प्रामाणिक लेख “Janeu Sanskar Muhurat 2026” में हम आपको साल 2026 के सभी शुभ उपनयन मुहूर्तों की महीनेवार (Month-wise) सूची, सही उम्र के नियम, जनेऊ के वैज्ञानिक लाभ, पूजा विधि और इसे धारण करने के कड़े नियमों के बारे में गहराई से बताएंगे।

1. उपनयन मुहूर्त निकालने के ज्योतिषीय नियम (Astrological Rules for Janeu)

जनेऊ संस्कार बच्चे के बौद्धिक और आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत है। इसलिए वैदिक ज्योतिष में इसके मुहूर्त (Janeu Sanskar Muhurat 2026) का निर्धारण बहुत सावधानी से किया जाता है। इसके लिए पंचांग के निम्नलिखित अंगों पर विचार किया जाता है:

शुभ अयन और महीने (Auspicious Months)

  • उत्तरायण (Uttarayana): जनेऊ संस्कार हमेशा सूर्य के उत्तरायण होने पर (मकर संक्रांति के बाद) ही किया जाता है। दक्षिणायन में यह संस्कार वर्जित है।

  • शुभ मास: हिंदू पंचांग के अनुसार माघ, फाल्गुन, चैत्र, वैशाख और ज्येष्ठ के महीने उपनयन संस्कार के लिए सबसे उत्तम माने जाते हैं।

शुभ वार (Auspicious Days)

  • रविवार, सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार को जनेऊ संस्कार के लिए सबसे शुभ दिन माना गया है।

  • वर्जित दिन: मंगलवार (उग्र दिन) और शनिवार (क्रूर दिन) को उपनयन संस्कार नहीं किया जाता है।

शुभ तिथियां (Auspicious Tithis)

हिंदू पंचांग की द्वितीया, तृतीया, पंचमी, दशमी, एकादशी और त्रयोदशी तिथियां जनेऊ संस्कार के लिए सर्वोत्तम हैं। चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या और पूर्णिमा के दिन यह संस्कार टाल देना चाहिए।

शुभ नक्षत्र (Auspicious Nakshatras)

अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाती, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा और रेवती नक्षत्रों में उपनयन संस्कार करना बालक की बुद्धि, ज्ञान और आयु में अपार वृद्धि करता है।

2. Janeu Sanskar Muhurat 2026: महीनेवार शुभ मुहूर्तों की सूची

यहाँ वर्ष 2026 के लिए जनेऊ (उपनयन) संस्कार के शुभ मुहूर्तों की एक विस्तृत महीनेवार तालिका (Table) दी गई है। आप अपने बच्चे की कुंडली और अपनी सुविधा के अनुसार इनमें से कोई भी उत्तम तिथि चुन सकते हैं।

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(ध्यान दें: 14 जनवरी 2026 तक ‘खरमास’ रहेगा, इसलिए शुभ मुहूर्त मकर संक्रांति के बाद से आरंभ होंगे।)

जनवरी 2026 में जनेऊ संस्कार मुहूर्त

तारीख (Date) दिन (Day) शुभ नक्षत्र पंचांग तिथि
22 जनवरी 2026 गुरुवार रेवती माघ शुक्ल तृतीया
24 जनवरी 2026 शनिवार अश्विनी वसंत पंचमी (अबूझ मुहूर्त)
28 जनवरी 2026 बुधवार रोहिणी माघ शुक्ल नवमी/दशमी
30 जनवरी 2026 शुक्रवार मृगशिरा माघ शुक्ल एकादशी

फरवरी 2026 में जनेऊ संस्कार मुहूर्त

तारीख (Date) दिन (Day) शुभ नक्षत्र पंचांग तिथि
4 फरवरी 2026 बुधवार उत्तरा फाल्गुनी फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी/पञ्चमी
5 फरवरी 2026 गुरुवार हस्त फाल्गुन कृष्ण पञ्चमी
12 फरवरी 2026 गुरुवार अनुराधा फाल्गुन कृष्ण द्वादशी
19 फरवरी 2026 गुरुवार उत्तरा भाद्रपद फुलेरा दूज (अबूझ मुहूर्त)
25 फरवरी 2026 बुधवार रोहिणी फाल्गुन शुक्ल अष्टमी
26 फरवरी 2026 गुरुवार मृगशिरा फाल्गुन शुक्ल नवमी

मार्च 2026 में जनेऊ संस्कार मुहूर्त

तारीख (Date) दिन (Day) शुभ नक्षत्र पंचांग तिथि
2 मार्च 2026 सोमवार मघा / पूर्वा फाल्गुनी फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी
12 मार्च 2026 गुरुवार उत्तराषाढ़ा चैत्र कृष्ण नवमी
23 मार्च 2026 सोमवार रेवती चैत्र शुक्ल पञ्चमी

अप्रैल 2026 में जनेऊ संस्कार मुहूर्त

तारीख (Date) दिन (Day) शुभ नक्षत्र पंचांग तिथि
6 अप्रैल 2026 सोमवार स्वाती वैशाख कृष्ण तृतीया
8 अप्रैल 2026 बुधवार अनुराधा वैशाख कृष्ण पञ्चमी
15 अप्रैल 2026 बुधवार उत्तरा भाद्रपद वैशाख कृष्ण द्वादशी
20 अप्रैल 2026 सोमवार रोहिणी अक्षय तृतीया (महा-मुहूर्त)

मई 2026 में जनेऊ संस्कार मुहूर्त

तारीख (Date) दिन (Day) शुभ नक्षत्र पंचांग तिथि
1 मई 2026 शुक्रवार स्वाती ज्येष्ठ कृष्ण प्रतिपदा
6 मई 2026 बुधवार उत्तराषाढ़ा ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी
13 मई 2026 बुधवार उत्तरा भाद्रपद ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी
20 मई 2026 बुधवार रोहिणी ज्येष्ठ शुक्ल पञ्चमी

जून 2026 में जनेऊ संस्कार मुहूर्त

तारीख (Date) दिन (Day) शुभ नक्षत्र पंचांग तिथि
4 जून 2026 गुरुवार अनुराधा आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी
10 जून 2026 बुधवार उत्तरा भाद्रपद आषाढ़ कृष्ण दशमी
19 जून 2026 शुक्रवार मघा आषाढ़ शुक्ल पञ्चमी

(नोट: आषाढ़ मास के बाद जुलाई में देवशयनी एकादशी से चातुर्मास और दक्षिणायन आरंभ हो जाएगा। दक्षिणायन में जनेऊ संस्कार वर्जित माना जाता है, इसलिए वर्ष 2026 के उत्तरार्ध (जुलाई से दिसंबर) में उपनयन के शुभ मुहूर्त नहीं होते हैं। अतः जून 2026 तक ही यह संस्कार संपन्न करा लें।)

3. जनेऊ (यज्ञोपवीत) संस्कार की सही उम्र क्या है? (Ideal Age for Janeu)

शास्त्रों और वर्ण व्यवस्था के अनुसार, बालक के बौद्धिक विकास और उसके वर्ण के आधार पर उपनयन संस्कार की अलग-अलग आयु निर्धारित की गई है। मनुस्मृति के अनुसार:

  1. ब्राह्मण बालकों के लिए: ब्राह्मण बालक का जनेऊ संस्कार गर्भ से आठवें वर्ष या जन्म के बाद 7वें से 8वें वर्ष में हो जाना चाहिए। ब्राह्मण का मुख्य कर्म ज्ञान अर्जन और धर्म का पालन करना है, इसलिए उनका उपनयन वसंत ऋतु में करना उत्तम माना जाता है।

  2. क्षत्रिय बालकों के लिए: क्षत्रिय बालक का उपनयन संस्कार गर्भ से ग्यारहवें वर्ष या जन्म के बाद 10वें से 11वें वर्ष में होना चाहिए। बल और पराक्रम की वृद्धि के लिए ग्रीष्म ऋतु क्षत्रियों के लिए शुभ है।

  3. वैश्य बालकों के लिए: वैश्य बालक का जनेऊ संस्कार गर्भ से बारहवें वर्ष या जन्म के बाद 11वें से 12वें वर्ष में किया जाना चाहिए। व्यापार और कृषि में वृद्धि के लिए शरद् ऋतु इनके लिए उत्तम मानी गई है।

(नोट: यदि किसी कारणवश बचपन में यह संस्कार न हो पाए, तो विवाह से ठीक पहले भी जनेऊ संस्कार करने की परंपरा है, क्योंकि बिना जनेऊ धारण किए कोई भी हिंदू पुरुष विवाह वेदी पर नहीं बैठ सकता।)

4. जनेऊ का आध्यात्मिक और दार्शनिक रहस्य (Meaning of the Threads)

जनेऊ कोई साधारण धागा नहीं है। यह सूत (Cotton) का बना एक अत्यंत पवित्र धागा होता है जिसे बाएं कंधे (Left shoulder) से लेकर दाईं कमर (Right waist) तक पहना जाता है।

तीन धागे (Three Threads): एक जनेऊ में मुख्य रूप से तीन धागे होते हैं, जो हिंदू धर्म के सबसे गहरे दार्शनिक सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करते हैं:

  • त्रिदेव: ये तीन धागे साक्षात ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक हैं।

  • तीन ऋण: यह मनुष्य को उसके तीन प्रमुख ऋणों की याद दिलाता है— देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण।

  • तीन गुण: यह सत्व, रज और तम— तीनों गुणों को संतुलित करने का मार्ग है।

  • तीन काल: यह भूत, वर्तमान और भविष्य का ज्ञान कराता है।

नौ लड़ियां (Nine Strands): इन तीन धागों में से प्रत्येक धागा तीन-तीन सूक्ष्म धागों (लड़ियों) से मिलकर बनता है। इस प्रकार कुल 9 लड़ियां होती हैं। ये 9 लड़ियां शरीर के 9 द्वारों (2 आंखें, 2 कान, 2 नाक के छिद्र, 1 मुंह, और 2 मल-मूत्र द्वार) पर नियंत्रण और 9 देवताओं (ओंकार, अग्नि, नाग, सोम, पितृ, प्रजापति, वायु, सूर्य, और विश्वेदेव) के आशीर्वाद का प्रतीक हैं।

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ब्रह्मग्रंथि (The Knot): जनेऊ में एक गांठ लगाई जाती है जिसे ‘ब्रह्मग्रंथि’ कहते हैं। यह गांठ इस बात का प्रतीक है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक ही परमसत्ता के रूप हैं। यह गांठ बालक के मन को एकाग्र करती है।

5. जनेऊ पहनने के वैज्ञानिक और स्वास्थ्य लाभ (Scientific Health Benefits)

प्राचीन ऋषियों ने धर्म को विज्ञान के साथ बहुत गहराई से जोड़ा था। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान (Medical Science) और एक्यूप्रेशर (Acupressure) भी जनेऊ धारण करने के कई लाभों की पुष्टि करते हैं:

  1. पाचन तंत्र और कब्ज से बचाव: जनेऊ के नियमों के अनुसार मल-मूत्र त्यागते समय इसे दाहिने कान पर दो बार लपेटा जाता है। विज्ञान के अनुसार दाहिने कान की नसें सीधे आंतों (Intestines) से जुड़ी होती हैं। कान पर जनेऊ लपेटने से इन नसों पर दबाव (Acupressure) पड़ता है, जिससे पाचन तंत्र सक्रिय होता है और कब्ज, गैस जैसी बीमारियां दूर होती हैं।

  2. रक्तचाप (Blood Pressure) पर नियंत्रण: दाहिने कान के पास से गुज़रने वाली नसें हृदय (Heart) और रक्तचाप से भी संबंधित होती हैं। मल-मूत्र त्यागते समय कान पर दबाव पड़ने से ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा कम होता है।

  3. स्मरण शक्ति का विकास: कान पर दबाव पड़ने से मस्तिष्क की सुप्त कोशिकाएं जाग्रत होती हैं, जिससे बालक की एकाग्रता और स्मरण शक्ति (Memory power) में वृद्धि होती है।

  4. पवित्रता का मनोवैज्ञानिक प्रभाव: जब कोई बालक या पुरुष छाती पर इस पवित्र धागे को महसूस करता है, तो उसके भीतर अनैतिक कार्यों (क्रोध, काम, वासना) को लेकर एक मनोवैज्ञानिक रोक (Psychological barrier) पैदा होती है।

6. उपनयन संस्कार की संपूर्ण पूजा विधि (Step-by-Step Vidhi)

“Janeu Sanskar Muhurat 2026” का शुभ दिन तय करने के बाद यह संस्कार पूरी शुद्धता और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ किया जाना चाहिए। इसकी सामान्य विधि इस प्रकार है:

  1. मुंडन संस्कार (Shaving the Head): उपनयन के दिन सबसे पहले बालक का सिर मुंडवाया जाता है (केवल एक छोटी शिखा या चोटी छोड़ दी जाती है)। मुंडन इस बात का प्रतीक है कि बालक अब अपने पिछले जीवन के अहंकार को त्याग रहा है।

  2. स्नान और नवीन वस्त्र: मुंडन के बाद बालक को औषधीय जल या गंगाजल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद उसे बिना सिले हुए पीले या सफेद वस्त्र (धोती-कुर्ता) पहनाए जाते हैं।

  3. हवन और देव आवाहन: घर के आंगन या मंदिर में यज्ञ (हवन) वेदी तैयार की जाती है। गणेश जी, नवग्रह और कुलदेवता की पूजा की जाती है।

  4. गायत्री मंत्र की दीक्षा: यह इस संस्कार का सबसे महत्वपूर्ण चरण है। बालक के पिता या गुरु उसे अपने पास बिठाकर, एक कपड़े से दोनों के सिर को ढककर, बालक के कान में ‘गायत्री मंत्र’ का उपदेश देते हैं। इसके बाद ही बालक को गायत्री मंत्र जपने का अधिकार मिलता है।

  5. यज्ञोपवीत धारण (Wearing the Thread): गुरु या पिता मंत्रोच्चार के साथ बालक को सूत का बना पवित्र जनेऊ बाएं कंधे से दाईं ओर तिरछा पहनाते हैं।

  6. भिक्षाटन (Begging for Alms): जनेऊ धारण करने के बाद बालक एक झोली लेकर अपनी माता, पिता, बहन और परिवार के अन्य सदस्यों से “भवति भिक्षां देहि” (मुझे भिक्षा दें) कहकर भिक्षा मांगता है। यह प्रक्रिया बालक के भीतर से अहंकार (Ego) को पूरी तरह नष्ट कर देती है और उसे विनम्र बनाती है।

  7. दंडा धारण और सूर्य दर्शन: बालक को एक पलाश का डंडा (Staff) दिया जाता है, जो जीवन में अनुशासन का प्रतीक है। अंत में बालक सूर्य देव के दर्शन करता है और उनका तेज प्राप्त करने की प्रार्थना करता है।

7. जनेऊ धारण करने के कड़े नियम (Strict Rules for Janeu Dhari)

जनेऊ पहनना आसान है, लेकिन इसके नियमों का जीवन भर पालन करना एक तपस्या है। यदि इन नियमों का पालन न किया जाए, तो जनेऊ खंडित मान लिया जाता है:

  • शौच के समय नियम: मल-मूत्र त्याग करने से पहले जनेऊ को हमेशा दाहिने कान पर दो बार लपेटना चाहिए। हाथ-पैर धोकर और कुल्ला करने के बाद ही जनेऊ को कान से उतारना चाहिए। यदि भूलवश जनेऊ कमर से नीचे (अशुद्ध स्थान पर) गिर जाए, तो वह खंडित हो जाता है।

  • खंडित जनेऊ: यदि जनेऊ का कोई धागा टूट जाए, या वह पुराना और मैला हो जाए, तो उसे तुरंत बदल लेना चाहिए। खंडित जनेऊ शरीर पर धारण करना अशुभ माना जाता है।

  • सूतक काल: परिवार में किसी के जन्म (Sutak) या मृत्यु (Patak) के बाद जब सूतक काल समाप्त हो जाता है, तो पुराना जनेऊ उतारकर नया जनेऊ धारण करना अनिवार्य है।

  • जनेऊ बदलने का दिन: हर साल ‘श्रावणी पूर्णिमा’ (रक्षाबंधन) के दिन पुराना जनेऊ उतारकर नया जनेऊ धारण करने की प्राचीन वैदिक परंपरा है, जिसे ‘उपाकर्म’ कहा जाता है।

उपनयन संस्कार केवल सूत का धागा गले में डालने की रस्म नहीं है; यह एक बालक के भीतर सोई हुई चेतना को जगाकर उसे एक जिम्मेदार, ज्ञानी और संस्कारी पुरुष बनाने का महान वैदिक अनुष्ठान है।

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इस विस्तृत लेख “Janeu Sanskar Muhurat 2026” के माध्यम से हमने आपको वर्ष 2026 के सभी शुभ मुहूर्तों, तिथियों, उम्र के नियमों और इस पवित्र धागे से जुड़े वैज्ञानिक रहस्यों की संपूर्ण जानकारी प्रदान की है। यदि आप भी अपने बच्चे को एक उज्ज्वल भविष्य और अनुशासन से भरा जीवन देना चाहते हैं, तो ऊपर दी गई तालिकाओं में से किसी उत्तम मुहूर्त का चयन करें और किसी योग्य वैदिक ब्राह्मण द्वारा यह संस्कार संपन्न कराएं।

ईश्वर और गायत्री माता की कृपा से आपके बच्चे का बौद्धिक विकास होगा और वह धर्म, सत्य तथा ज्ञान के मार्ग पर चलकर समाज का नाम रोशन करेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: वर्ष 2026 में जनेऊ संस्कार के लिए सबसे बड़ा मुहूर्त कौन सा है?

उत्तर: वर्ष 2026 में जनेऊ संस्कार के लिए वसंत पंचमी (24 जनवरी), राम नवमी (27 मार्च के आस-पास का समय), और अक्षय तृतीया (20 अप्रैल) के दिन सबसे बड़े और ‘स्वयंसिद्ध’ मुहूर्त माने जाते हैं। इन तिथियों पर पंचांग में किसी विशेष दोष के न होने पर भी उपनयन संस्कार संपन्न किया जा सकता है।

प्रश्न 2: क्या विवाह से पहले जनेऊ संस्कार करना अनिवार्य है?

उत्तर: जी हाँ। सनातन हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, बिना जनेऊ धारण किए कोई भी पुरुष धार्मिक अनुष्ठानों या विवाह वेदी पर बैठने का अधिकारी नहीं होता। यदि किसी कारणवश बचपन में उपनयन संस्कार नहीं हो पाया है, तो विवाह से कुछ दिन पूर्व या विवाह वाले दिन ही हल्दी से रंगा हुआ जनेऊ पहनाकर यह रस्म पूरी की जाती है।

प्रश्न 3: जनेऊ को दाहिने कान पर क्यों लपेटा जाता है?

उत्तर: इसके पीछे आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दोनों कारण हैं। आध्यात्मिक रूप से माना जाता है कि दाहिने कान में गंगा, यमुना जैसी पवित्र नदियों और सभी तीर्थों का वास होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, दाहिने कान की नसें पेट और आंतों से जुड़ी होती हैं। मल-मूत्र त्यागते समय कान पर जनेऊ लपेटने से एक्यूप्रेशर (Acupressure) होता है, जो पाचन क्रिया को सुगम बनाता है और कब्ज जैसी बीमारियों से बचाता है।

प्रश्न 4: क्या लड़कियां (महिलाएं) भी जनेऊ धारण कर सकती हैं?

उत्तर: प्राचीन वैदिक काल (गार्गी, मैत्रेयी के समय) में लड़कियों का भी उपनयन संस्कार होता था और वे जनेऊ धारण करके वेदों का अध्ययन करती थीं। मध्यकाल में यह परंपरा लुप्त हो गई। हालांकि, आज के आधुनिक समय में आर्य समाज और कई अन्य वैदिक संस्थाएं महिलाओं का उपनयन संस्कार पुनः करा रही हैं और उन्हें जनेऊ धारण करने का पूर्ण अधिकार देती हैं।

प्रश्न 5: यदि जनेऊ टूट जाए तो क्या करना चाहिए?

उत्तर: जनेऊ का कोई भी धागा टूट जाने पर वह ‘खंडित’ माना जाता है। खंडित जनेऊ को तुरंत उतार देना चाहिए और उसे किसी पवित्र नदी या बहते जल में विसर्जित कर देना चाहिए। इसके बाद गायत्री मंत्र का जाप करते हुए एक नया और शुद्ध जनेऊ धारण कर लेना चाहिए।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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