सनातन धर्म और शाक्त परंपरा में धन, ऐश्वर्य, सौभाग्य और सुरक्षा की प्राप्ति के लिए आदि काल से ही अनेक स्तोत्रों, कवचों और मंत्रों की रचना की गई है। जब कोई मनुष्य आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट जाता है, चारों ओर से कर्ज से घिर जाता है, या उसके घर में दरिद्रता का स्थायी वास हो जाता है, तब साधारण पूजा-पाठ के स्थान पर विशिष्ट और तीव्र साधनाओं का आश्रय लिया जाता है।
ऐसी ही एक अत्यंत दुर्लभ, गुप्त और महाप्रभावशाली तांत्रिक रचना है— महालक्ष्मी पञ्जर स्तोत्रम्। इस दिव्य स्तोत्र को माता लक्ष्मी का एक अभेद्य रक्षा कवच और धन-आकर्षक यंत्र माना जाता है। इस लेख में हम Lakshmi Panjar Stotra (महालक्ष्मी पञ्जर स्तोत्रम्): साधना विधि, नियम, लाभ और संपूर्ण जानकारी के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे ताकि साधक इसके सही प्रयोग से अपने जीवन के सभी दुखों और अभावों का अंत कर सकें।
पञ्जर (Panjar) क्या है और इसका आध्यात्मिक महत्व क्या है?
मंत्र और तंत्र शास्त्र में ‘कवच’ और ‘पञ्जर’ दो ऐसे शब्द हैं जिनका प्रयोग सुरक्षा और शक्ति संचय के लिए किया जाता है। सामान्य भाषा में ‘पञ्जर’ का अर्थ होता है— पिंजरा या ढांचा। परंतु तांत्रिक संदर्भ में, पञ्जर का अर्थ “एक ऐसा अभेद्य ईश्वरीय ऊर्जा का पिंजरा या सुरक्षा घेरा” होता है, जिसके भीतर साधक पूरी तरह सुरक्षित हो जाता है।
जब आप महालक्ष्मी पञ्जर स्तोत्र का पाठ या साधना करते हैं, तो आपके चारों ओर माता लक्ष्मी की अष्ट शक्तियों का एक ऐसा चक्रव्यूह निर्मित होता है, जिसे कोई भी नकारात्मक शक्ति, दरिद्रता, तंत्र बाधा या दुर्भाग्य भेद नहीं पाता। यह स्तोत्र साधक को अंदर से पूरी तरह शुद्ध करता है और बाहर से उसके वातावरण को चुंबकीय बनाता है, जिससे धन और समृद्धि स्वतः ही उसकी ओर आकर्षित होने लगती है।
Lakshmi Panjar Stotra (महालक्ष्मी पञ्जर स्तोत्रम्)
विनियोगः ॐ अस्य श्री लक्ष्मी पञ्जर महामन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः ।पङ्क्तिश्छन्दः ।श्रीमहालक्ष्मीर्देवता ।श्रीँ बीजं ।स्वाहा शक्तिः ।श्रियै इति कीलकं । मम सर्वभीष्ट सिद्ध्यर्थे लक्ष्मी पञ्जर स्तोत्र जपे विनियोगः ॥
करन्यासः
ॐ श्रीँ ह्रीँ विष्णुवल्लभायै अङ्गुष्ठभ्यां नमः ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ जगज्जनन्यै तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ सिद्धिसेवितायै मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ सिद्धिदात्र्यै अनमिकाभ्यां नमः ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ वाञ्छितपूरितायै कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ श्रीँ श्रियै नमः स्वाहेति करतलकर पृष्ठभ्यां नमः ॥
षडङ्गन्यासः
ॐ श्रीँ ह्रीँ विष्णुवल्लभयै हृदयाय नमः ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ जगज्जनन्यै शिरसे स्वाहा ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ सिद्धिसेवितयै शिखायै वषट् ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ सिद्धिदात्र्यै कवचाय हुँ ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ वाञ्छितपूरितायै नेत्रभ्यां वौषट् ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ श्रीँ श्रियै नमः स्वाहेत्यस्त्राय फट् ।
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥
ध्यानम्
ॐ वन्देलक्ष्मीं परमशिवमयीं शुद्धजाम्बूनदाभां ।
तेजोरूपां कनकवसनां सर्वभूषोज्ज्वलाङ्गीम् ॥ १ ॥
बीजापूरं कनककलशं हेमपद्मं दधानाम् ।
शक्तिं भुक्तिं सकलजननीं विष्णुवामाङ्कसंस्थाम् ॥ २ ॥
शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि महालक्ष्मि हरिप्रिये ।
प्रसादं कुरु देवेशि मयि दुष्टेऽपराधिनि ॥ ३ ॥
कोटिकन्दर्पलावण्यां सौन्दर्य्यैकस्वरूपताम् ।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यां श्रीरमां शरणं ब्रजे ॥ ४ ॥
मूलमन्त्र षट्कम्
ॐ श्रीँ ह्रीँ ऐँ क्लीँ नमो विष्णुवल्लभायै
महामायायै कँ खँ गँ घँ ङँ नमस्ते
नमस्ते मां पाहि पाहि रक्ष रक्ष धनं धान्यं
श्रियं समृद्धिं देहि देहि श्रीँ श्रियै नमः स्वाहा ॥ १ ॥
ॐ श्रीँ ह्रीँ ऐँ क्लीँ नमो जगज्जनन्यै
वात्सल्यनिधये चँ छँ जँ झँ ञँ नमस्ते
नमस्ते मां पाहि पाहि रक्ष रक्ष श्रियं प्रतिष्ठां
वाक्सिद्धिं मे देहि देहि श्रीँ श्रियै नमः स्वाहा ॥ २ ॥
ॐ श्रीँ ह्रीँ ऐँ क्लीँ नमः सिद्धिसेवितायै
सकलाभीष्टदानदीक्षितायै टँ ठँ डँ ढँ णँ
नमस्ते नमस्ते मां पाहि पाहि रक्ष रक्ष
सर्वतोऽभयं देहि देहि श्रीँ श्रियै नमः स्वाहा ॥ ३ ॥
ॐ श्रीँ ह्रीँ ऐँ क्लीँ नमः सिद्धिदात्र्यै महाऽचिन्त्यशक्तिकायै
तँ थँ दँ धँ नँ नमस्ते नमस्ते
मां पाहि पाहि रक्ष रक्ष मे सर्वभीष्टसिद्धिं देहि देहि
श्रीँ श्रियै नमः स्वाहा ॥ ४ ॥
ॐ श्रीँ ह्रीँ ऐँ क्लीँ नमो वाञ्छितपूरितायै
सर्वसिद्धिमूलभूतायै पँ फँ बँ भँ मँ
नमस्ते नमस्ते मां पाहि पाहि रक्ष रक्ष मे
मनोवाञ्छितां सर्वार्थभूतां सिद्धिं देहि देहि
श्रीँ श्रियै नमः स्वाहा ॥ ५ ॥
ॐ श्रीँ ह्रीँ ऐँ क्लीँ कमले कमलालये मह्यं
प्रसीद प्रसीद महालक्ष्मि तुभ्यं नमो नमस्ते
जगद्धितायै यँ रँ लँ वँ शँ षँ सँ हँ क्षँ
नमस्ते नमस्ते मां पाहि पाहि रक्ष मे
वश्याकर्षणमोहनस्तम्भनोच्चाटनताडनाचिन्त्यशक्तिवैभवं
देहि देहि श्रीँ श्रियै नमः स्वाहा ॥ ६ ॥
ॐ श्रीँ ह्रीँ ऐँ क्लीँ धात्र्यै नमः स्वाहा ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ ऐँ क्लीँ श्रीँ बीजरूपायै नमः स्वाहा ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ ऐँ क्लीँ विष्णुवल्लभायै नमः स्वाहा ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ ऐँ क्लीँ सिद्धयै नमः स्वाहा ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ ऐँ क्लीँ बुद्ध्यै नमः स्वाहा ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ ऐँ क्लीँ धृत्यै नमः स्वाहा ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ ऐँ क्लीँ मत्यै नमः स्वाहा ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ ऐँ क्लीँ कान्त्यै नमः स्वाहा ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ ऐँ क्लीँ शान्त्यै नमः स्वाहा ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ ऐँ क्लीँ सर्वतोभद्ररूपायै नमः स्वाहा ।
ॐ श्रीँ ह्रीँ ऐँ क्लीँ श्रीँ श्रियै नमः स्वाहा ।
ॐ नमो भगवति ब्रह्मादिवेदमातर्वेदोद्भवे
वेदगर्भे सर्वशक्ति शिरोमणे श्रीँ हरिवल्लभे ।
ममाभीष्टं पूरय पूरय मां सिद्धिभाजनं
कुरु कुरु अमृतं कुरु कुरु अभयं कुरु कुरु ।
सर्वं कार्येषु ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल मे
सुतशक्तिं दीपय दीपय ममाहितान् नाशय नाशय ।
असाध्यकार्यं साधय साधय ह्रीँ ह्रीँ ह्रीँ
ग्लौँ ग्लीँ ग्लौँ श्रीँ श्रिये नमः स्वाहा ॥
इति लक्ष्मीमालामन्त्रः । १०८ जपं कुर्यात् ॥
लक्ष्मी पञ्जर स्तोत्र के चमत्कारिक लाभ (Benefits of Lakshmi Panjar Stotra)
महालक्ष्मी पञ्जर स्तोत्र का पाठ केवल धन प्राप्ति के लिए ही नहीं, बल्कि जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए किया जाता है। इसके मुख्य लाभों को नीचे दी गई तालिका में वर्गीकृत किया गया है:
| लाभ का क्षेत्र (Domain) | मिलने वाले परिणाम (Results & Impact) |
| अखंड लक्ष्मी की प्राप्ति | इस स्तोत्र के नियमित पाठ से घर में धन की आवक बढ़ती है। स्थिर लक्ष्मी का वास होता है, जिससे फिजूलखर्ची रुकती है। |
| ऋण और कंगाली से मुक्ति | सालों पुराने कर्ज के दलदल से बाहर निकलने के नए रास्ते खुलते हैं। अचानक धन लाभ (Unexpected Wealth) के योग बनते हैं। |
| व्यापार और उद्योग में वृद्धि | यदि आपका व्यवसाय ठप हो गया है या नौकरी में रुकावट आ रही है, तो इसके प्रभाव से मंदी दूर होती है और नए अवसर मिलते हैं। |
| अभेद्य सुरक्षा कवच | यह साधक को बुरी नजर, ईर्ष्या, शत्रुओं के गुप्त षड्यंत्रों और किसी भी प्रकार के काले जादू (Negative Energy) से बचाता है। |
| वास्तु दोष और गृह क्लेश का नाश | घर के भीतर मौजूद नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, जिससे परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और शांति का माहौल बनता है। |
| आकर्षण और मान-सम्मान | साधक के आभा मंडल (Aura) में अत्यधिक वृद्धि होती है, जिससे समाज और कार्यक्षेत्र में उसकी प्रतिष्ठा और साख बढ़ती है। |
साधना के कड़े नियम और अनुशासन (Rules and Regulations)
तंत्र शास्त्र के अनुसार, किसी भी पञ्जर या कवच साधना की सफलता उसके कड़े नियमों के पालन पर टिकी होती है। यदि नियमों में ढिलाई बरती जाए, तो साधना का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
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शारीरिक और मानसिक पवित्रता: साधना काल के दौरान साधक को दिन में दो बार स्नान करना चाहिए और अपने विचारों को पूरी तरह शुद्ध रखना चाहिए। मन में किसी के प्रति द्वेष या वासना नहीं होनी चाहिए।
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पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन: जितने भी दिनों का संकल्प (जैसे 11, 21 या 41 दिन) लिया गया हो, उतने दिनों तक तन और मन से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है।
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निश्चित समय और स्थान: इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन एक ही निश्चित समय पर होना चाहिए। इसके लिए सर्वोत्तम समय सुबह ब्रह्म मुहूर्त (4:00 से 6:00 बजे) या रात्रि काल (9:00 बजे के बाद) माना गया है।
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दिशा और आसन: साधना के दौरान साधक का मुख उत्तर (North) या पूर्व (East) दिशा की ओर होना चाहिए। बैठने के लिए लाल रंग के ऊनी आसन का प्रयोग करें।
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वाणी का संयम (मौन): साधना की अवधि के दौरान अनावश्यक बातें करने से बचें। कम से कम बोलें ताकि आपकी वाक्-शक्ति संचित हो सके और स्तोत्र के उच्चारण में तीव्रता आए।
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तामसिक पदार्थों का त्याग: साधना काल में लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा, अंडा और किसी भी प्रकार के धूम्रपान या नशे का सेवन पूरी तरह वर्जित है।
आवश्यक साधना सामग्री (Sadhana Materials Required)
महालक्ष्मी पञ्जर साधना शुरू करने से पहले सभी आवश्यक सामग्रियां लाकर रख लेनी चाहिए। सभी वस्तुएं शुद्ध और प्राण-प्रतिष्ठित होनी चाहिए।
| सामग्री का नाम | उपयोग और तांत्रिक महत्व (Significance) |
| महालक्ष्मी यंत्र या चित्र | पूजा की वेदी पर स्थापित करने के लिए (यह पारद या अष्टधातु का हो तो सर्वोत्तम)। |
| शुद्ध गाय के घी का दीपक | साधना के दौरान अखंड या निरंतर जलने वाला दीपक। |
| कमलगट्टे की माला | संकल्प के अनुसार मंत्र जाप या स्तोत्र की संख्या गिनने के लिए। |
| लाल चंदन और कुमकुम | माता और यंत्र को तिलक लगाने तथा स्वयं के आज्ञा चक्र पर लगाने के लिए। |
| केवड़ा या गुलाब का इत्र | वातावरण को दिव्य और उच्च ऊर्जा तरंगों से भरने के लिए। |
| लाल रंग का रेशमी कपड़ा | लकड़ी की चौकी (बाजोट) पर बिछाने के लिए। |
| ताजे लाल फूल (गुलाब या कमल) | माता लक्ष्मी को प्रतिदिन अर्पित करने के लिए। |
| नैवेद्य (प्रसाद) | मखाने की खीर, सफेद बर्फी, या मिश्री-मावा। |
महालक्ष्मी पञ्जर स्तोत्र साधना विधि (Step-by-Step Sadhana Vidhi)
इस साधना को किसी भी शुक्रवार, पूर्णिमा, दीपावली, धनतेरस, या नवरात्रि के शुभ दिनों से प्रारंभ किया जा सकता है। यह सामान्यतः 21 दिनों का अनुष्ठान होता है।
चरण 1: पूर्व तैयारी और आसन ग्रहण
नियत समय पर स्नान करके लाल या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। अपने साधना कक्ष में उत्तर दिशा की ओर मुख करके लाल आसन पर बैठ जाएं।
चरण 2: वेदी और यंत्र स्थापना
अपने सामने एक लकड़ी की चौकी रखें। उस पर लाल रेशमी कपड़ा बिछाएं। उस पर अक्षत (बिना टूटे चावल) का एक अष्टदल कमल बनाएं और उसके ऊपर महालक्ष्मी यंत्र या माता लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित करें। यंत्र के दाहिनी ओर शुद्ध घी का दीपक जलाएं और धूप बत्ती सुलगाएं।
चरण 3: पवित्रीकरण और आचमन
अपने हाथ में थोड़ा जल लेकर स्वयं पर और पूजा सामग्री पर छिड़कें:
“ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥”
इसके बाद तीन बार जल का आचमन करें (ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः) और हाथ धो लें।
चरण 4: संकल्प (The Resolution)
दाहिने हाथ में जल, फूल, अक्षत और एक सिक्का लेकर संकल्प लें:
“मैं (अपना नाम बोलें), गोत्र (अपना गोत्र), निवासी (अपने शहर/स्थान का नाम), आज इस शुभ दिन से अपने जीवन की समस्त दरिद्रता, आर्थिक बाधाओं और ऋणों के समूल नाश हेतु तथा सुख-समृद्धि की स्थायी प्राप्ति के लिए ‘महालक्ष्मी पञ्जर स्तोत्र’ की 21 दिवसीय साधना का संकल्प लेता हूँ। मैं प्रतिदिन इस स्तोत्र के 11 पाठ (या 3 पाठ) पूरी श्रद्धा से करूँगा। हे माता महालक्ष्मी, मेरे इस संकल्प को पूर्ण करने की शक्ति दें।”
संकल्प का जल चौकी के सामने भूमि पर छोड़ दें।
चरण 5: गुरु और गणेश पूजन
किसी भी साधना की निर्विघ्न पूर्णता के लिए गणेश जी और गुरु का आशीर्वाद अनिवार्य है।
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भगवान गणेश का स्मरण करें और “ॐ गं गणपतये नमः” की 1 माला जपें।
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अपने गुरु या भगवान शिव का ध्यान करके 1 माला गुरु मंत्र या “ॐ नमः शिवाय” का जाप करें।
चरण 6: मुख्य महालक्ष्मी पञ्जर स्तोत्र पाठ
अब माता लक्ष्मी का ध्यान करते हुए अपने हाथ में कमलगट्टे की माला लें (पाठ की संख्या गिनने के लिए) और अत्यंत शुद्ध उच्चारण के साथ महालक्ष्मी पञ्जर स्तोत्रम् का पाठ प्रारंभ करें।
(यदि आपको संस्कृत उच्चारण में कठिनाई हो, तो शुरुआत में धीरे-धीरे और संभलकर पढ़ें। गलत उच्चारण से बचें। स्तोत्र का पाठ करते समय अपना पूरा ध्यान माता के स्वरूप या यंत्र के केंद्र बिंदु पर रखें।)
चरण 7: आरती और भोग
पाठ पूर्ण होने के बाद माता को मखाने की खीर या सफेद मिठाई का भोग लगाएं। कर्पूर से माता की आरती करें।
चरण 8: क्षमा प्रार्थना (Kshama Prarthana)
साधना के अंत में हाथ जोड़कर माता से प्रार्थना करें:
“हे महालक्ष्मी, मैं मंत्र, तंत्र, विधि और क्रिया से अनजान हूँ। मुझसे पाठ के उच्चारण में या पूजा की विधि में जो भी ज्ञात-अज्ञात भूल हुई हो, उसे अपनी संतान समझकर क्षमा करें और मुझे अपनी स्थिर भक्ति व समृद्धि प्रदान करें।”
स्तोत्र पाठ के दौरान होने वाले अनुभव
जब साधक पूरी निष्ठा से महालक्ष्मी पञ्जर स्तोत्र का पाठ करता है, तो कुछ दिनों के भीतर ही उसके आस-पास की ऊर्जा बदलने लगती है। उसे निम्नलिखित अनुभव हो सकते हैं:
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दिव्य सुगंध का अहसास: कमरे में अचानक बिना किसी बाहरी कारण के कमल, गुलाब या चंदन की तीव्र और मनमोहक सुगंध आने लगती है।
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आंतरिक शांति और उत्साह: मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद पूरी तरह गायब हो जाते हैं और साधक के भीतर एक अद्भुत सकारात्मक ऊर्जा और उत्साह का संचार होता है।
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कार्यों में अचानक सफलता: जो काम महीनों या सालों से अटके हुए थे, वे अचानक बिना किसी बड़ी बाधा के पूरे होने लगते हैं।
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स्वप्न संकेत: सपने में खुद को किसी बड़ी नदी, समुद्र, मंदिर या माता लक्ष्मी के वाहन (उल्लू या हाथी) को देखना अत्यंत शुभ संकेत माना जाता है।
अत्यंत महत्वपूर्ण सावधानियां (Crucial Precautions)
महालक्ष्मी पञ्जर स्तोत्र एक अत्यंत शक्तिशाली और जाग्रत विधा है। इसलिए साधना के दौरान कुछ गलतियों से बचना बेहद जरूरी है:
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लालच और अधैर्य से बचें: साधना के दौरान हर दिन यह न सोचें कि “मुझे आज कितना धन मिला”। यह कोई लॉटरी नहीं है, बल्कि आपकी पात्रता (Eligibility) बढ़ाने की प्रक्रिया है। फल सही समय पर निश्चित रूप से मिलता है।
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स्त्रियों का अपमान न करें: माता लक्ष्मी साक्षात स्त्री तत्व का प्रतिनिधित्व करती हैं। जिस घर में महिलाओं, बेटियों या माता का अपमान होता है, वहां पञ्जर स्तोत्र का कोई प्रभाव नहीं होता।
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अनुष्ठान के बीच में अंतर न करें: यदि आपने 21 दिन का संकल्प लिया है, तो किसी भी दिन पाठ नहीं छूटना चाहिए। समय भी रोज एक ही होना चाहिए।
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गोपनीयता बनाए रखें: अपनी साधना, संकल्प और साधना के दौरान होने वाले दिव्य अनुभवों को पूरी तरह गुप्त रखें। किसी मित्र या बाहरी व्यक्ति के सामने इसका बखान न करें।
Lakshmi Panjar Stotra (महालक्ष्मी पञ्जर स्तोत्रम्): साधना विधि, नियम, लाभ और संपूर्ण जानकारी के इस संपूर्ण अध्ययन से स्पष्ट होता है कि यह स्तोत्र कलयुग के आर्थिक संकटों से उबरने का एक अचूक और दिव्य मार्ग है। यह केवल एक धार्मिक पाठ नहीं है, बल्कि यह ध्वनि विज्ञान (Sound Vibrations) और ब्रह्मांडीय ऊर्जा को अपने पक्ष में करने का एक अचूक तांत्रिक तंत्र है।
जब एक साधक कड़े अनुशासन, पवित्रता और अटूट विश्वास के साथ इस पञ्जर कवच के घेरे में आता है, तो ब्रह्मांड की समस्त दरिद्रता भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। यदि आप भी अपने जीवन में धन का अभाव महसूस कर रहे हैं या शत्रुओं और ऋणों से परेशान हैं, तो पूरे नियम और श्रद्धा के साथ इस महालक्ष्मी पञ्जर स्तोत्र की साधना अवश्य करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. क्या इस स्तोत्र का पाठ महिलाएं भी कर सकती हैं?
हाँ, महिलाएं इस स्तोत्र का पाठ और साधना पूरी श्रद्धा से कर सकती हैं। बस उन्हें अपने मासिक धर्म (Periods) के ५ से ७ दिनों के दौरान इस साधना को रोक देना चाहिए। शुद्ध होने के बाद वे दिनों की गिनती को आगे बढ़ाते हुए अपनी साधना को पूरा कर सकती हैं।
2. यदि कमलगट्टे की माला न हो, तो क्या किसी अन्य माला का उपयोग किया जा सकता है?
महालक्ष्मी की साधनाओं के लिए ‘कमलगट्टे की माला’ को ही सर्वश्रेष्ठ और शास्त्रों द्वारा अनुमोदित माना गया है। यदि यह उपलब्ध न हो, तो आप ‘स्फटिक की माला’ का उपयोग कर सकते हैं। इस साधना में तुलसी या रुद्राक्ष की माला का उपयोग वर्जित माना गया है।
3. साधना के २१ दिन पूरे होने के बाद यंत्र और सामग्री का क्या करना चाहिए?
साधना पूर्ण होने के अगले दिन (२२वें दिन), सिद्ध लक्ष्मी यंत्र को सम्मानपूर्वक अपने घर की तिजोरी, गल्ले या मुख्य पूजा स्थान पर स्थापित कर दें। यह यंत्र आपके घर में धन को आकर्षित करने वाले केंद्र के रूप में काम करेगा। बाकी बची पूजा सामग्री (जैसे फूल, अक्षत) को किसी पवित्र नदी या पेड़ की जड़ में विसर्जित कर दें।
4. क्या बिना गुरु दीक्षा के महालक्ष्मी पञ्जर स्तोत्र का पाठ किया जा सकता है?
यह एक स्तोत्र और कवच विधा है, इसलिए इसे बिना गुरु दीक्षा के भी सामान्य साधक कर सकते हैं। यदि आपके पास गुरु नहीं हैं, तो आप भगवान शिव को आदिगुरु मानकर उनसे आज्ञा लेकर यह साधना शुरू कर सकते हैं। हालांकि, किसी योग्य गुरु के सानिध्य में करने से इसके परिणाम कई गुना तीव्र हो जाते हैं।
5. इस स्तोत्र का प्रभाव कितने दिनों में दिखाई देने लगता है?
स्तोत्र की ऊर्जा पाठ के पहले दिन से ही आपके आभा मंडल (Aura) को शुद्ध करना शुरू कर देती है। सामान्यतः साधना के ११वें से १५वें दिन के भीतर साधक को अपने मानसिक तनाव में कमी और रुके हुए कार्यों में गति आने के रूप में इसके सकारात्मक प्रभाव दिखाई देने लगते हैं। पूर्ण अनुष्ठान के बाद इसके परिणाम स्थायी हो जाते हैं।