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Nirjala Ekadashi 2026: किन लोगों को नहीं रखना चाहिए यह कठिन व्रत? जानें शास्त्रों के नियमIt takes 10 minutes... to read this article !

सनातन धर्म में ‘एकादशी’ (Ekadashi) के व्रतों को सबसे पवित्र और मोक्षदायी माना गया है। वर्ष भर की 24 एकादशियां में से जिस एकादशी का सबसे अधिक महत्व है, वह है ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली ‘निर्जला एकादशी’ (Nirjala Ekadashi)। इसे पांडव या ‘भीमसेनी एकादशी’ भी कहा जाता है।

मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति साल भर एकादशी का व्रत नहीं रख पाता है, तो केवल इस एक निर्जला एकादशी का व्रत करने से उसे सभी 24 एकादशियां का पुण्य एक साथ प्राप्त हो जाता है। लेकिन, यह व्रत जितना अधिक फलदायी है, उतना ही अधिक कठिन भी है। Nirjala Ekadashi 2026 का पर्व ज्येष्ठ महीने की प्रचंड गर्मी में आता है। इस व्रत में सूर्योदय से लेकर अगले दिन के सूर्योदय तक (लगभग 24 घंटे से अधिक समय तक) अन्न ही नहीं, बल्कि जल (पानी) का भी पूर्ण रूप से त्याग किया जाता है।

अक्सर भक्ति और श्रद्धा के आवेग में आकर कई लोग बिना अपनी शारीरिक क्षमता को समझे इस व्रत का संकल्प ले लेते हैं, जिससे बाद में उनके स्वास्थ्य को गंभीर खतरा पैदा हो जाता है। 

हमारे हिंदू शास्त्रों में भी स्पष्ट लिखा है— “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्” (अर्थात: शरीर ही सभी धर्मों और कर्तव्यों को पूरा करने का प्रथम साधन है)। यदि आपका शरीर ही स्वस्थ नहीं रहेगा, तो आप ईश्वर की भक्ति कैसे करेंगे?

इस विस्तृत लेख में हम आपको बताएंगे कि किन लोगों को यह कठिन व्रत बिल्कुल नहीं रखना चाहिए, इसके पीछे के वैज्ञानिक और धार्मिक कारण क्या हैं, और यदि आप निर्जल नहीं रह सकते, तो पुण्य कमाने के अन्य विकल्प क्या हैं।

1. गर्भवती महिलाएं (Pregnant Women)

गर्भावस्था एक अत्यंत संवेदनशील अवस्था होती है। शास्त्रों और मेडिकल साइंस, दोनों के ही अनुसार गर्भवती महिलाओं को ‘निर्जला’ (बिना पानी का) व्रत भूलकर भी नहीं रखना चाहिए।

  • वैज्ञानिक कारण: गर्भ में पल रहे शिशु का विकास ‘एमनियोटिक द्रव’ (Amniotic fluid) में होता है, जो पानी से बनता है। मई-जून की गर्मी में 24 घंटे पानी न पीने से शरीर में ‘डिहाइड्रेशन’ (Dehydration) हो सकता है। इससे गर्भ में पानी की कमी हो सकती है, जो शिशु के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए बेहद खतरनाक है। इसके अलावा, गर्भवती महिला का ब्लड प्रेशर अचानक गिर सकता है।

  • शास्त्रों का मत: शास्त्रों के अनुसार, जो जीव माता के गर्भ में पल रहा है, उसे भूखा-प्यासा रखना पाप की श्रेणी में आता है। माता का कर्तव्य पहले अपने शिशु की रक्षा करना है।

2. स्तनपान कराने वाली माताएं (Nursing/Breastfeeding Mothers)

जो माताएं अपने नवजात शिशु को दूध पिलाती हैं, उनके लिए भी यह व्रत वर्जित माना गया है।

  • वैज्ञानिक कारण: महिलाओं के शरीर में ब्रेस्ट मिल्क (Breast Milk) का निर्माण मुख्य रूप से तरल पदार्थों और पानी से होता है। यदि मां पूरे दिन पानी नहीं पिएगी, तो दूध का उत्पादन कम हो जाएगा, जिससे शिशु भूखा रह सकता है।

  • क्या करें: ऐसी माताओं को पानी, जूस, दूध और फलाहार के साथ एकादशी का व्रत करना चाहिए।

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3. मधुमेह (Diabetes) के मरीज

डायबिटीज आज के समय में एक आम लेकिन गंभीर बीमारी है। ऐसे मरीजों को अपनी दिनचर्या और खान-पान का विशेष ध्यान रखना होता है।

  • खतरा: डायबिटीज के मरीजों को नियमित समय पर भोजन और पानी की आवश्यकता होती है। यदि वे बिना पानी और खाने के रहते हैं, तो उनका ब्लड शुगर लेवल अचानक बहुत नीचे गिर सकता है, जिसे ‘हाइपोग्लाइसीमिया’ (Hypoglycemia) कहते हैं। यह स्थिति जानलेवा भी हो सकती है। इसके अलावा, शुगर की दवाइयां या इंसुलिन बिना खाए-पिए नहीं लिया जा सकता।

4. हृदय और रक्तचाप के रोगी (Heart and BP Patients)

जिन लोगों को हाई ब्लड प्रेशर (High BP) या दिल से जुड़ी कोई भी बीमारी है, उनके लिए निर्जला एकादशी का व्रत जोखिम भरा हो सकता है।

  • खतरा: भयंकर गर्मी में पानी न पीने से खून गाढ़ा होने लगता है। खून गाढ़ा होने से हृदय को पंप करने में अधिक मेहनत करनी पड़ती है, जिससे हार्ट अटैक या स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। ब्लड प्रेशर के मरीजों को समय पर अपनी दवाइयां खानी होती हैं, जिसके लिए पानी की आवश्यकता होती है।

5. किडनी के मरीज (Kidney Patients)

किडनी हमारे शरीर का फिल्टर है, जिसे सुचारू रूप से काम करने के लिए लगातार पानी की आवश्यकता होती है।

  • खतरा: जिन लोगों को किडनी स्टोन (पथरी), यूरिन इन्फेक्शन (UTI) या किडनी से जुड़ी कोई अन्य क्रोनिक बीमारी है, उन्हें डिहाइड्रेशन से बचना चाहिए। पानी न पीने से पथरी का दर्द उठ सकता है और किडनी डैमेज का खतरा बढ़ जाता है।

6. वृद्ध और बुजुर्ग व्यक्ति (Elderly People – 60+ Years)

उम्र बढ़ने के साथ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और गर्मी सहने की ताकत कम हो जाती है।

  • खतरा: बुजुर्गों के शरीर में पानी का संचय (Water retention capacity) युवाओं की तुलना में कम होता है। भीषण गर्मी में उन्हें लू (Heatstroke) बहुत जल्दी लग सकती है। चक्कर आना, कमजोरी और बेहोशी की स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए 60 वर्ष से अधिक उम्र के कमजोर बुजुर्गों को निर्जल उपवास नहीं करना चाहिए।

7. छोटे बच्चे (Young Children)

बच्चों का शरीर विकास के चरण में होता है और उनका मेटाबॉलिज्म (Metabolism) बहुत तेज होता है।

  • खतरा: उन्हें बार-बार ऊर्जा और हाइड्रेशन की आवश्यकता होती है। शास्त्रों में भी 8 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए एकादशी या कोई भी कठोर उपवास अनिवार्य नहीं बताया गया है। बच्चों को भगवान की पूजा में शामिल करें, लेकिन उन्हें भूखा-प्यासा न रखें।

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8. जो लोग हाल ही में सर्जरी या लंबी बीमारी से उठे हों

यदि आपका हाल ही में कोई ऑपरेशन हुआ है, या आप पीलिया, टाइफाइड, डेंगू जैसी किसी गंभीर बीमारी से रिकवर हो रहे हैं, तो आपको निर्जला व्रत नहीं रखना चाहिए।

  • खतरा: रिकवरी (Healing) के लिए शरीर को भारी मात्रा में एंटी-ऑक्सीडेंट्स, विटामिन्स और पानी की आवश्यकता होती है। इस समय शरीर को कष्ट देने से बीमारी वापस आ सकती है।

शास्त्रों का दृष्टिकोण: ‘आपद्धर्म’ का नियम (Sanatan Dharma’s Mercy)

हिंदू धर्म कोई कठोर या यातना देने वाला धर्म नहीं है। हमारे ऋषियों ने मानव शरीर की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए नियमों में लचीलापन रखा है। शास्त्रों में ‘आपद्धर्म’ (Apad Dharma) का वर्णन है, जिसका अर्थ है कि विपत्ति, बीमारी या शारीरिक अक्षमता के समय कठोर नियमों में छूट दी जाती है।

महर्षि वेदव्यास जी ने भी महाभारत में कहा है कि भगवान भाव के भूखे हैं। यदि कोई बीमार व्यक्ति श्रद्धा पूर्वक भगवान विष्णु का स्मरण करता है और अपनी दवाइयां व पानी ग्रहण करता है, तो भगवान उसे भी निर्जला एकादशी का ही पुण्य प्रदान करते हैं। शारीरिक कष्ट देकर भगवान को प्रसन्न नहीं किया जा सकता।

यदि निर्जला व्रत न रख पाएं, तो क्या करें? (Alternative Ways to Fast)

यदि आप ऊपर दी गई किसी भी श्रेणी में आते हैं, या केवल यह महसूस करते हैं कि आपके लिए 24 घंटे बिना पानी के रहना संभव नहीं है, तो आपको निराश होने की आवश्यकता नहीं है। आप निम्नलिखित सात्विक विकल्पों को अपनाकर Nirjala Ekadashi 2026 का पूरा पुण्य प्राप्त कर सकते हैं:

व्रत का प्रकार (Type of Fast) विवरण (Details) किनके लिए उपयुक्त है? (Suitable for)
सजल एकादशी (Sajal Vrat) इसमें अन्न का त्याग किया जाता है, लेकिन आप आवश्यकता अनुसार सादा जल, नींबू पानी या नारियल पानी पी सकते हैं। स्वस्थ व्यक्ति जो केवल प्यास बर्दाश्त नहीं कर सकते।
क्षीराहार व्रत (Milk/Juice Fast) जल के अलावा आप दूध, छाछ (बिना नमक), और ताजे फलों का रस ग्रहण कर सकते हैं। कमजोर व्यक्ति, स्तनपान कराने वाली माताएं।
फलाहारी व्रत (Phalahari Vrat) जल, दूध और रस के साथ-साथ आप दिन में एक बार सात्विक फल (केला, पपीता, सेब) या सिंघाड़े/कुट्टू का आहार ले सकते हैं। गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग और शुगर/बीपी के मरीज।

नोट: आप इनमें से कोई भी विकल्प चुनें, बस यह ध्यान रखें कि एकादशी के दिन घर में अन्न (जैसे चावल, गेहूं, दाल) भूलकर भी नहीं पकाना चाहिए और न ही खाना चाहिए।

बिना व्रत रखे निर्जला एकादशी का पुण्य कैसे कमाएं?

यदि आप दवाइयों के कारण फलाहारी व्रत भी नहीं रख सकते हैं, तो भी आप इस पवित्र दिन का लाभ उठा सकते हैं। शास्त्रों के अनुसार, एकादशी के दिन किए गए पुण्य कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाते:

  1. महादान करें (Donate Water): निर्जला एकादशी पर जल दान सबसे बड़ा दान है। प्यासों को पानी पिलाएं। किसी गरीब को मिट्टी का नया घड़ा (कलश), सत्तू, रसदार फल (तरबूज, खरबूजा), हाथ का पंखा और छाता (Umbrella) दान करें।

  2. नाम जाप (Mantra Chanting): व्रत शरीर से नहीं होता तो मन से करें। पूरे दिन ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ या ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ का पाठ करें। किसी की निंदा न करें, क्रोध न करें और मन को शांत रखें।

  3. गौ सेवा (Cow Service): गर्मी के मौसम में गायों और आवारा पशु-पक्षियों के लिए घर की छत या बाहर मिट्टी के बर्तन में पीने का साफ पानी और सत्तू/चारा रखें।

  4. ब्रह्मचर्य और सात्विकता: घर में पूर्ण सात्विक माहौल रखें। लहसुन, प्याज, मांस या मदिरा का सेवन बिल्कुल न करें।

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यदि व्रत के बीच में प्यास बर्दाश्त न हो तो क्या करें?

कई बार स्वस्थ लोग जोश में आकर निर्जला व्रत का संकल्प तो ले लेते हैं, लेकिन दोपहर होते-होते गर्मी के कारण उन्हें चक्कर आने लगते हैं और प्यास बर्दाश्त नहीं होती।

ऐसी स्थिति में शास्त्रों का नियम कहता है कि प्राणों को संकट में डालना पाप है। यदि ऐसी नौबत आ जाए, तो:

  • भगवान श्री हरि विष्णु से हाथ जोड़कर क्षमा मांगें।

  • उन्हें अपनी शारीरिक अक्षमता बताएं।

  • आचमन (पूजा के दौरान हथेली से ली जाने वाली एक बूंद जल) करें। यदि उससे भी काम न चले, तो सूर्य देव को अर्घ्य देकर तुलसी मिश्रित जल ग्रहण कर लें और अपना व्रत ‘सजल’ (पानी के साथ) पूरा करें।

  • पारण के दिन अपनी क्षमता अनुसार किसी ब्राह्मण को जल और अन्न का अतिरिक्त दान कर दें। भगवान क्षमाशील हैं, वे आपकी भावना को स्वीकार करेंगे।

निर्जला एकादशी 2026 भगवान विष्णु की कृपा और 24 एकादशियों का पुण्य प्राप्त करने का एक महा-अवसर है। लेकिन आस्था और अंधभक्ति के बीच के अंतर को समझना आवश्यक है।

“किन लोगों को नहीं रखना चाहिए यह कठिन व्रत?” इस प्रश्न का सीधा उत्तर यही है कि जो बीमार हैं, बुजुर्ग हैं, बच्चे हैं या गर्भवती हैं, उन्हें यह व्रत जल और फलाहार के साथ ही करना चाहिए। भगवान श्री हरि कभी नहीं चाहते कि उनका भक्त अपने शरीर को यातना देकर उनकी पूजा करे। आप चाहे जल पीकर व्रत करें या फल खाकर, यदि आपके मन में छल-कपट नहीं है और आपके हृदय में सच्ची श्रद्धा है, तो आपका वह व्रत भी निर्जला एकादशी के समान ही फलदायी होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. क्या दवाई खाने के लिए निर्जला एकादशी में पानी पी सकते हैं?

हाँ, बिल्कुल। यदि आपको कोई गंभीर बीमारी है (जैसे शुगर या बीपी) और नियमित दवाई लेनी है, तो आप दवाई के साथ जल ग्रहण कर सकते हैं। शास्त्रों में औषधि (दवाई) और जल को बीमारी की अवस्था में दोष मुक्त माना गया है।

2. गर्भवती महिला को निर्जला एकादशी कैसे करनी चाहिए?

गर्भवती महिला को पूर्णत: सजल (जल के साथ) और फलाहारी (फलों के साथ) व्रत करना चाहिए। वे दिन में दूध, नारियल पानी और सात्विक फल खाकर भगवान विष्णु का ध्यान करें। शिशु के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ न करें।

3. क्या पीरियड्स (मासिक धर्म) में महिलाएं निर्जला एकादशी का व्रत रख सकती हैं?

हाँ, पीरियड्स के दौरान भी व्रत रखा जा सकता है। आप व्रत का शारीरिक नियम (निर्जल या फलाहारी) निभा सकती हैं। हालांकि, इन दिनों में आपको भगवान की मूर्ति को छूना या पूजा का सामान स्पर्श नहीं करना चाहिए। आप दूर बैठकर या मानसिक रूप से मंत्रों का जाप कर सकती हैं।

4. क्या निर्जला एकादशी पर स्नान करने से व्रत टूट जाता है?

नहीं। मई-जून की गर्मी में शरीर का तापमान नियंत्रित रखने के लिए आप दिन में दो बार स्नान कर सकते हैं। बस इस बात का विशेष ध्यान रखें कि स्नान करते समय पानी मुंह या गले के अंदर न जाए।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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