Home Blog

Shravan Purnima 2026 Date & Time: श्रावण पूर्णिमा कब है? जानें रक्षाबंधन मुहूर्त, पूजा विधि और कथाIt takes 14 minutes... to read this article !

सनातन हिंदू धर्म में ‘श्रावण’ (सावन) महीने को सभी महीनों में सबसे पवित्र और पुण्यदायी माना गया है। यह पूरा महीना भगवान शिव की आराधना, कांवड़ यात्रा और प्रकृति के नव-सृजन को समर्पित होता है। इसी पावन महीने का समापन जिस दिन होता है, उसे ‘श्रावण पूर्णिमा’ (Shravan Purnima) या सावन पूर्णिमा कहा जाता है।

श्रावण पूर्णिमा केवल एक तिथि नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े उत्सवों में से एक है। इसी दिन भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक ‘रक्षाबंधन’ (Raksha Bandhan) मनाया जाता है। इसके अलावा, इस दिन को देश के विभिन्न हिस्सों में ‘नारली पूर्णिमा’, ‘झूलन यात्रा’, ‘उपाकर्म’ और ‘संस्कृत दिवस’ के रूप में भी जाना जाता है।

इस आधुनिक युग में जहाँ हम अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं, श्रावण पूर्णिमा हमें हमारे संस्कारों, धर्म और रिश्तों की पवित्रता की याद दिलाती है। यदि आप भी जानना चाहते हैं कि वर्ष 2026 में श्रावण पूर्णिमा कब है (Shravan Purnima 2026 Date), इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है, भद्रा काल का समय क्या रहेगा, व्रत की कथा क्या है और माता लक्ष्मी व भगवान शिव की कृपा पाने के लिए कौन से उपाय करने चाहिए, तो यह विस्तृत और शोधपरक लेख आपके लिए ही है।

1. वर्ष 2026 में श्रावण पूर्णिमा कब है? (Shravan Purnima 2026 Exact Date)

हिंदू पंचांग के अनुसार, श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को श्रावण पूर्णिमा कहा जाता है। कोई भी पूर्णिमा तब मानी जाती है जब चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होकर आकाश में चमकता है।

वैदिक पंचांग की गणनाओं के अनुसार, वर्ष 2026 में श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त 2026 (गुरुवार) की सुबह से प्रारंभ होगी और 28 अगस्त 2026 (शुक्रवार) की सुबह तक रहेगी।

सनातन धर्म में सूर्योदय के समय व्याप्त तिथि (उदया तिथि) को ही मुख्य पर्व के रूप में मनाने का विधान है। अतः स्नान-दान और रक्षाबंधन का मुख्य पर्व 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को ही मनाया जाएगा।

श्रावण पूर्णिमा 2026: शुभ मुहूर्त और भद्रा काल का समय (Muhurat Table)

रक्षाबंधन और श्रावण पूर्णिमा की पूजा में ‘भद्रा काल’ का विशेष ध्यान रखा जाता है, क्योंकि भद्रा काल में राखी बांधना या कोई भी शुभ कार्य करना पूर्णतः वर्जित होता है। यहाँ 2026 के लिए शुभ मुहूर्त की तालिका दी गई है:

विवरण (Event Details) तिथि और समय (Date & Time)
श्रावण पूर्णिमा 2026 (मुख्य पर्व तिथि) 28 अगस्त 2026 (शुक्रवार)
पूर्णिमा तिथि का आरंभ 27 अगस्त 2026, प्रातः 09:08 बजे से
पूर्णिमा तिथि की समाप्ति 28 अगस्त 2026, प्रातः 09:48 बजे तक
भद्रा काल का समय 27 अगस्त को दिन में (28 अगस्त की सुबह भद्रा नहीं रहेगी)
स्नान-दान का शुभ मुहूर्त 28 अगस्त, प्रातः 04:30 बजे से 06:00 बजे तक (ब्रह्म मुहूर्त)
रक्षाबंधन (राखी बांधने) का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त 28 अगस्त 2026, सुबह 06:15 बजे से 09:45 बजे तक
सत्यनारायण पूजा का समय 28 अगस्त, प्रातःकाल या 27 अगस्त की संध्या (पूर्णिमा व्यापिनी रात्रि)

(नोट: चूँकि पूर्णिमा 28 अगस्त की सुबह 09:48 बजे समाप्त हो जाएगी, इसलिए रक्षाबंधन का कार्य सुबह-सुबह ही कर लेना सबसे उत्तम रहेगा। 28 अगस्त की सुबह कोई भद्रा नहीं होने के कारण यह समय राखी के लिए अत्यंत शुभ है।)

2. श्रावण पूर्णिमा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व (Significance of Shravan Purnima)

श्रावण पूर्णिमा का दिन भारतीय जनमानस में अपनी विविधता के लिए जाना जाता है। इसे देश के हर कोने में अलग-अलग मान्यताओं और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। इसका महत्व निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

ये भी पढ़ें:  Bhairav Gayatri Mantra Sadhana: कैसे करें? जानें साधना विधि, नियम, लाभ, महत्व और सावधानियां

I. रक्षाबंधन (Raksha Bandhan)

उत्तर भारत और मध्य भारत में श्रावण पूर्णिमा का सबसे बड़ा आकर्षण ‘रक्षाबंधन’ है। यह भाई-बहन के निस्वार्थ प्रेम, सुरक्षा और सम्मान का पर्व है। बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा-सूत्र (राखी) बांधती हैं और उनके उज्ज्वल भविष्य व लंबी आयु की कामना करती हैं, वहीं भाई उनकी उम्र भर रक्षा करने का वचन देते हैं।

II. हयग्रीव जयंती (Hayagriva Jayanti)

दक्षिण भारत में श्रावण पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु के ‘हयग्रीव’ (अश्वमुख या घोड़े के मुख वाले) अवतार की जयंती मनाई जाती है। भगवान हयग्रीव को ज्ञान, विद्या और बुद्धि का देवता माना जाता है। इस दिन विद्यार्थियों द्वारा उनकी विशेष पूजा की जाती है।

III. उपाकर्म और अवनि अवित्तम (Upakarma)

ब्राह्मण वर्ग के लिए यह दिन आत्म-शुद्धि का दिन है। इस दिन ‘यजुर्वेद उपाकर्म’ (Yajurveda Upakarma) किया जाता है, जिसे दक्षिण भारत में ‘अवनि अवित्तम’ कहते हैं। इस दिन वैदिक ब्राह्मण अपने पुराने जनेऊ (यज्ञोपवीत) को त्यागकर नया जनेऊ धारण करते हैं और वेदों के अध्ययन का संकल्प लेते हैं।

IV. नारली पूर्णिमा (Narali Purnima)

महाराष्ट्र, गोवा और गुजरात के तटीय क्षेत्रों (Coastal areas) में इसे ‘नारली पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मछुआरे समुद्र देव (वरुण देव) की पूजा करते हैं और उन्हें नारियल (नारल) अर्पित करते हैं, ताकि समुद्र शांत रहे और उनकी आजीविका सुरक्षित रहे।

V. झूलन यात्रा (Jhulan Yatra)

पश्चिम बंगाल और ओडिशा में श्रावण पूर्णिमा को झूलन यात्रा के समापन के रूप में मनाया जाता है। इस्कॉन (ISKCON) और राधा-कृष्ण मंदिरों में भगवान को सुंदर झूलों पर झुलाया जाता है। यह भगवान कृष्ण और राधा रानी के दिव्य प्रेम का उत्सव है।

VI. विश्व संस्कृत दिवस (World Sanskrit Day)

श्रावण पूर्णिमा के दिन ही ‘विश्व संस्कृत दिवस’ मनाया जाता है। संस्कृत को देववाणी (देवताओं की भाषा) कहा जाता है। भारत सरकार ने 1969 में इस दिन को संस्कृत दिवस के रूप में घोषित किया था, क्योंकि यह दिन वेदों के पठन-पाठन (उपाकर्म) से जुड़ा है।

3. श्रावण पूर्णिमा की संपूर्ण पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)

श्रावण पूर्णिमा के दिन भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान विष्णु (सत्यनारायण रूप में) और चंद्र देव की पूजा का विशेष विधान है। इस दिन की पूजा प्रक्रिया इस प्रकार है:

प्रातःकालीन स्नान और दान (Morning Rituals)

  1. तीर्थ स्नान: यदि संभव हो तो सुबह जल्दी उठकर गंगा, यमुना, नर्मदा या किसी पवित्र नदी में स्नान करें। यदि घर पर स्नान कर रहे हैं, तो नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिला लें।

  2. संकल्प: स्नान के पश्चात स्वच्छ (पीले या सफेद) वस्त्र धारण करें। हाथ में जल और अक्षत (चावल) लेकर व्रत, पूजा और दान का संकल्प लें।

  3. सूर्य अर्घ्य: तांबे के लोटे में जल, लाल फूल, रोली और अक्षत डालकर उगते हुए सूर्य देव को अर्घ्य दें (ॐ सूर्याय नमः)।

  4. दान: श्रावण पूर्णिमा पर ब्राह्मणों या गरीबों को अन्न, वस्त्र, छाता, जूते और दक्षिणा का दान करना महापुण्यकारी माना जाता है।

भगवान शिव का रुद्राभिषेक (Shiva Puja)

चूँकि यह सावन का अंतिम दिन होता है, इसलिए इस दिन भगवान शिव की पूजा का अनंत गुना फल मिलता है।

  • घर के मंदिर या शिवालय में जाकर शिवलिंग का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) और गंगाजल से रुद्राभिषेक करें।

  • भगवान शिव को 108 बेलपत्र (ॐ नमः शिवाय का जाप करते हुए), भांग, धतूरा, और सफेद पुष्प अर्पित करें।

श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा (Satyanarayan Puja)

पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की पूजा और कथा का पाठ घर में सुख, शांति और ऐश्वर्य लाता है।

  • एक लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान सत्यनारायण (विष्णु जी) का चित्र स्थापित करें।

  • उन्हें पीले चंदन का तिलक लगाएं, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें।

  • भोग: आटे को भूनकर उसमें चीनी/गुड़ मिलाकर ‘कसार’ (पंजीरी) बनाएं और पंचामृत के साथ भगवान को भोग लगाएं। (बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते)।

  • परिवार के साथ बैठकर सत्यनारायण भगवान की कथा पढ़ें या सुनें। अंत में कपूर से आरती करें।

रक्षाबंधन की पूजा विधि (Rakhi Tying Ritual)

  • राखी बांधने से पहले रक्षा-सूत्र (राखी) को भगवान श्री कृष्ण या इष्ट देव के चरणों में रखकर उसे अभिमंत्रित करें।

  • भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बिठाएं।

  • भाई के माथे पर कुमकुम और अक्षत का तिलक लगाएं। उसकी कलाई पर राखी बांधें और यह मंत्र बोलें (या मन में भाव रखें): “येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”

  • भाई की आरती उतारें, उसे मिठाई खिलाएं। भाई भी अपनी बहन को रक्षा का वचन और उपहार दें।

ये भी पढ़ें:  Hariyali Amavasya 2026: हरियाली अमावस्या पर कौन-से पौधे लगाना माना जाता है सबसे शुभ?

रात्रि में चंद्र देव की पूजा (Moon Worship)

पूर्णिमा की रात को चंद्रमा अपनी पूर्ण ऊर्जा में होता है।

  • रात को चंद्रोदय होने पर एक कलश में जल, थोड़ा सा कच्चा दूध, सफेद फूल और चीनी डालकर चंद्र देव को अर्घ्य दें।

  • “ॐ सोमाय नमः” मंत्र का जाप करें। यह मानसिक शांति प्रदान करता है।

4. श्रावण पूर्णिमा (रक्षाबंधन) की पौराणिक व्रत कथा (The Vrat Katha)

रक्षाबंधन और श्रावण पूर्णिमा से जुड़ी दो कथाएं शास्त्रों में सर्वाधिक प्रचलित हैं:

कथा 1: देवराज इंद्र और शची की कथा (The Origin of Rakhi)

भविष्य पुराण के अनुसार, प्राचीन काल में देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। यह युद्ध लगातार 12 वर्षों तक चलता रहा। असुरों का राजा वृत्रासुर बहुत शक्तिशाली था और उसने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। देवराज इंद्र अपना राज्य हारने के बाद निराश होकर देवगुरु बृहस्पति के पास गए और अपनी व्यथा सुनाई।

देवगुरु बृहस्पति ने इंद्र को श्रावण पूर्णिमा के दिन व्रत और पूजा करने का सुझाव दिया। जब इंद्र युद्ध के लिए जाने लगे, तो उनकी पत्नी इंद्राणी (शची) ने श्रावण पूर्णिमा के दिन कठोर तपस्या की और अपने तपोबल से एक रक्षा-सूत्र (पवित्र धागा) तैयार किया। शची ने वह रक्षा-सूत्र देवराज इंद्र की दाहिनी कलाई पर बांध दिया और उनके विजयी होने की कामना की।

इस पवित्र रक्षा-सूत्र की शक्ति और श्रावण पूर्णिमा के व्रत के प्रभाव से देवराज इंद्र ने असुरों को युद्ध में परास्त कर दिया और अपना स्वर्ग का राज्य पुनः प्राप्त कर लिया। इसी घटना के बाद से श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षा-सूत्र (राखी) बांधने की परंपरा की शुरुआत हुई।

कथा 2: भगवान विष्णु और राजा बलि की कथा

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, असुरों के राजा बलि ने अपने बाहुबल से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। तब देवताओं की पुकार पर भगवान विष्णु ने ‘वामन अवतार’ लिया और राजा बलि से भिक्षा में तीन पग भूमि मांगी। वामन भगवान ने दो पग में ही आकाश, पाताल और पृथ्वी को नाप लिया। जब तीसरा पग रखने की जगह नहीं बची, तो बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। भगवान बलि की दानवीरता से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने बलि को पाताल लोक का राजा बना दिया।

बलि ने भगवान विष्णु से वरदान मांगा कि “प्रभु! आप हमेशा मेरे महल के द्वारपाल बनकर पाताल में ही मेरे साथ रहें।” भगवान विष्णु को अपना वचन निभाते हुए पाताल लोक में रुकना पड़ा। इससे बैकुंठ लोक में माता लक्ष्मी अत्यंत दुखी हो गईं।

अपने स्वामी को वापस लाने के लिए माता लक्ष्मी श्रावण पूर्णिमा के दिन एक गरीब स्त्री का रूप धारण करके पाताल लोक पहुंचीं। उन्होंने राजा बलि को अपना भाई बनाकर उसकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा। राजा बलि ने जब उनसे उपहार मांगने को कहा, तो माता लक्ष्मी ने अपने असली स्वरूप में आकर भगवान विष्णु को वापस मांग लिया। राजा बलि ने अपनी बहन का वचन पूरा किया और भगवान विष्णु को बैकुंठ जाने दिया। तब से रक्षाबंधन का यह पावन पर्व मनाया जाता है।

5. श्रावण पूर्णिमा पर किए जाने वाले विशेष ज्योतिषीय उपाय (Astrological Remedies)

श्रावण पूर्णिमा का दिन सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर होता है। यदि आपके जीवन में धन, स्वास्थ्य या रिश्तों से जुड़ी परेशानियां हैं, तो इस दिन निम्नलिखित अचूक उपाय (Upay) अवश्य करें:

I. आर्थिक संकट दूर करने और धन प्राप्ति के लिए

श्रावण पूर्णिमा की रात माता लक्ष्मी पृथ्वी का भ्रमण करती हैं। इस रात को 11 कौड़ियां (पीली कौड़ियां) लें और उन पर हल्दी का तिलक लगाकर माता लक्ष्मी के चरणों में रख दें। माता लक्ष्मी के सिद्ध मंत्र “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः” का एक माला जाप करें। अगले दिन इन कौड़ियों को एक लाल कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी या धन रखने वाले स्थान पर रख दें। घर में कभी पैसों की कमी नहीं रहेगी।

ये भी पढ़ें:  Amarnath Yatra 2026: बाबा बर्फानी की गुफा सबसे पहले किसने खोजी थी? जानें उस रहस्यमयी शिवभक्त की कहानी

II. मानसिक शांति और डिप्रेशन से मुक्ति के लिए

जिन लोगों को बहुत अधिक गुस्सा आता है, घबराहट (Anxiety) रहती है या रात को नींद नहीं आती, उनकी जन्म कुंडली में चंद्रमा कमजोर होता है। श्रावण पूर्णिमा की रात चंद्रमा की रोशनी में बैठकर 15-20 मिनट तक “ॐ नमः शिवाय” या “ॐ चंद्रमसे नमः” का मानसिक जाप करें। साथ ही, चांदी के गिलास में दूध या पानी पिएं। चंद्रमा की किरणें मस्तिष्क को अद्भुत शीतलता प्रदान करती हैं।

III. विवाह में आ रही अड़चनें दूर करने के लिए

जिन युवक-युवतियों के विवाह में देरी हो रही है, उन्हें श्रावण पूर्णिमा के दिन भगवान शिव और माता पार्वती का एक साथ पंचामृत से अभिषेक करना चाहिए। माता पार्वती को लाल चुनरी और सुहाग का सामान अर्पित करें। यह उपाय शीघ्र विवाह के योग बनाता है।

IV. व्यापार और नौकरी में सफलता के लिए

पूर्णिमा के दिन पीपल के वृक्ष की जड़ में जल में मीठा दूध मिलाकर अर्पित करें और वृक्ष की सात परिक्रमा करें। मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन पीपल के पेड़ में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का साक्षात वास होता है। यह उपाय करियर में बंद रास्तों को खोल देता है।

V. राहु-केतु और शनि दोष निवारण

यदि कुंडली में राहु-केतु या कालसर्प दोष है, तो श्रावण पूर्णिमा के दिन किसी प्राचीन शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर ‘रुद्राभिषेक’ करवाएं। इसके साथ ही गरीब और जरूरतमंद लोगों को सफेद वस्तु (जैसे चावल, चीनी, या सफेद वस्त्र) का दान करें।

6. श्रावण पूर्णिमा पर क्या करें और क्या न करें? (Do’s and Don’ts)

इस पवित्र दिन के आध्यात्मिक लाभों को सुरक्षित रखने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है:

क्या करें (Do’s):

  • घर में पूर्ण सात्विकता और शांति का माहौल बनाए रखें।

  • गीता, रामायण या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।

  • पूर्णिमा के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें।

  • दान-पुण्य और जानवरों (विशेषकर गाय और कुत्तों) को भोजन कराएं।

क्या न करें (Don’ts):

  • घर में तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, अंडा, लहसुन, प्याज) बिल्कुल न बनाएं और न खाएं।

  • भद्रा काल (Bhadra Kaal) में राखी न बांधें (यह बहुत अशुभ माना जाता है)।

  • बाल, दाढ़ी या नाखून न काटें।

  • घर के बुजुर्गों, महिलाओं या बच्चों पर क्रोध न करें। किसी को अपशब्द न बोलें।

Shravan Purnima 2026 केवल कैलेंडर में दर्ज एक तिथि नहीं है, बल्कि यह हमारे धर्म, रिश्तों की पवित्रता, और प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता का महा-उत्सव है। 28 अगस्त 2026 को आने वाला यह पावन दिन हमें मौका देता है कि हम अपने जीवन की नकारात्मकताओं को दूर करें और प्रेम, सुरक्षा व शांति का वातावरण स्थापित करें।

चाहे वह बहन द्वारा भाई की कलाई पर बंधा रक्षा-सूत्र हो, या समुद्र देव को अर्पित किया गया नारियल, या फिर भगवान सत्यनारायण की आरती— श्रावण पूर्णिमा का हर रंग हमें ईश्वर की निकटता का अहसास कराता है। इस वर्ष आप भी पूरे विधि-विधान से श्रावण पूर्णिमा का व्रत रखें, शिव-विष्णु की आराधना करें और अपने परिवार के साथ इस त्योहार का आनंद लें। भगवान आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें।

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय! ॐ नमः शिवाय!”

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs on Shravan Purnima)

प्रश्न 1: वर्ष 2026 में श्रावण पूर्णिमा (Shravan Purnima) और रक्षाबंधन किस दिन है?

उत्तर: वैदिक पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में श्रावण पूर्णिमा और रक्षाबंधन का मुख्य पर्व 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त की सुबह 09:08 बजे से प्रारंभ होकर 28 अगस्त की सुबह 09:48 बजे तक रहेगी।

प्रश्न 2: रक्षाबंधन पर राखी बांधने का शुभ मुहूर्त क्या है और भद्रा काल कब है?

उत्तर: 2026 में रक्षाबंधन के दिन (28 अगस्त की सुबह) भद्रा का साया नहीं रहेगा। भद्रा 27 अगस्त को ही समाप्त हो जाएगी। इसलिए 28 अगस्त को सुबह 06:15 बजे से लेकर 09:45 बजे तक राखी बांधने का सर्वश्रेष्ठ और अति शुभ मुहूर्त है, क्योंकि इसी समय पूर्णिमा तिथि व्याप्त रहेगी।

प्रश्न 3: श्रावण पूर्णिमा के दिन भगवान सत्यनारायण की पूजा क्यों की जाती है?

उत्तर: हिंदू शास्त्रों के अनुसार, प्रत्येक पूर्णिमा तिथि भगवान विष्णु (श्री हरि) को समर्पित होती है। श्रावण मास अत्यंत पवित्र है, अतः इस पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु के ‘सत्यनारायण’ स्वरूप की कथा और पूजा करने से घर में अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है, सुख-शांति आती है और जीवन में सत्य व धर्म की स्थापना होती है।

प्रश्न 4: नारली पूर्णिमा क्या होती है और यह कहाँ मनाई जाती है?

उत्तर: ‘नारली पूर्णिमा’ श्रावण पूर्णिमा का ही दूसरा नाम है, जो मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गोवा और गुजरात के तटीय क्षेत्रों में मछुआरा समुदाय (कोली समाज) द्वारा मनाई जाती है। मानसून के बाद इस दिन से वे फिर से समुद्र में मछली पकड़ने जाते हैं। वे समुद्र देव (वरुण देव) को नारियल (नारल) अर्पित करके प्रार्थना करते हैं कि उनकी समुद्री यात्रा सुरक्षित रहे।

प्रश्न 5: श्रावण पूर्णिमा के व्रत में क्या खा सकते हैं?

उत्तर: श्रावण पूर्णिमा का व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार इसे फलाहारी या एक समय का भोजन (एक भुक्त) करके रख सकते हैं। फलाहार में ताजे फल, दूध, दही, साबूदाना या मेवे लिए जा सकते हैं। यदि आप अन्न ग्रहण कर रहे हैं, तो वह पूर्णतः सात्विक (बिना लहसुन-प्याज का) होना चाहिए। व्रत पारण चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद या सत्यनारायण पूजा के बाद किया जाता है।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

error: Content is protected !!