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Vasudeva Dwadashi 2026: वासुदेव द्वादशी कब है? जानें श्रीकृष्ण पूजा का महत्व, व्रत विधि और उपायIt takes 14 minutes... to read this article !

सनातन हिंदू धर्म में भगवान श्री हरि विष्णु और उनके अवतारों की पूजा का विशेष विधान है। आषाढ़ मास का समय आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत ही संवेदनशील और फलदायी माना जाता है। इसी पवित्र महीने में देवशयनी एकादशी के ठीक अगले दिन एक अत्यंत मंगलकारी और परम पुण्यदायी व्रत आता है, जिसे ‘वासुदेव द्वादशी’ (Vasudeva Dwadashi) कहा जाता है।

यह पावन दिन पूर्ण रूप से भगवान विष्णु के पूर्णावतार, आनंदकंद भगवान श्रीकृष्ण (वासुदेव) और माता लक्ष्मी को समर्पित है। इसी दिन से ‘चातुर्मास’ (Chaturmas) के नियमों और व्रतों का विधिवत आरंभ भी माना जाता है। मान्यता है कि जो भक्त वासुदेव द्वादशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण की सच्चे मन से आराधना करता है, उसके जीवन के सभी कष्ट, पाप और दरिद्रता नष्ट हो जाते हैं और अंत में उसे बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।

यदि आप भी यह जानना चाहते हैं कि वर्ष 2026 में वासुदेव द्वादशी कब है (Vasudeva Dwadashi 2026 Date), इसका धार्मिक और पौराणिक महत्व क्या है, व्रत के नियम क्या हैं, भगवान वासुदेव की पूजा विधि क्या होनी चाहिए और इस दिन जीवन की समस्याओं को दूर करने के लिए कौन से अचूक उपाय करने चाहिए, तो यह विस्तृत और प्रामाणिक लेख आपके लिए ही तैयार किया गया है।

1. वर्ष 2026 में वासुदेव द्वादशी कब है? (Vasudeva Dwadashi 2026 Date & Time)

हिंदू पंचांग के अनुसार, वासुदेव द्वादशी का व्रत हर वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। यह देवशयनी एकादशी (जिस दिन भगवान विष्णु चार महीने के लिए योग निद्रा में जाते हैं) के ठीक अगले दिन आता है।

वैदिक पंचांग की सटीक गणनाओं के अनुसार, वर्ष 2026 में वासुदेव द्वादशी का पावन पर्व 26 जुलाई 2026, रविवार को मनाया जाएगा। रविवार का दिन सूर्य देव का भी दिन है, और वासुदेव भगवान सूर्य के समान ही जगत को प्रकाशित करने वाले हैं, जिससे इस दिन का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है।

वासुदेव द्वादशी 2026: शुभ मुहूर्त और पारण का समय (Muhurat Table)

किसी भी व्रत और पूजा का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है, जब उसे सही मुहूर्त में किया जाए। वासुदेव द्वादशी के व्रत और पूजा के लिए शुभ मुहूर्त की तालिका यहाँ दी गई है:

विवरण (Event Details) तिथि और समय (Date & Time 2026)
वासुदेव द्वादशी 2026 की मुख्य तिथि 26 जुलाई 2026 (रविवार)
आषाढ़ शुक्ल द्वादशी तिथि का आरंभ 25 जुलाई 2026, रात्रि 09:15 बजे से
आषाढ़ शुक्ल द्वादशी तिथि की समाप्ति 26 जुलाई 2026, रात्रि 11:20 बजे तक
प्रातःकालीन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 07:30 बजे से 09:10 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त (दोपहर की पूजा के लिए) सुबह 11:55 बजे से दोपहर 12:45 बजे तक
गोधूलि बेला (संध्या पूजा का समय) शाम 06:55 बजे से 08:15 बजे तक

(नोट: एकादशी का व्रत रखने वाले श्रद्धालु 26 जुलाई की सुबह सूर्योदय के बाद हरि वासर समाप्त होने पर अपना व्रत पारण (खोलना) करेंगे। जो लोग वासुदेव द्वादशी का व्रत कर रहे हैं, वे पूरे दिन उपवास रखकर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करेंगे।)

2. वासुदेव द्वादशी क्या है और इसका अर्थ? (Meaning of Vasudeva Dwadashi)

‘वासुदेव’ भगवान श्रीकृष्ण का ही एक अत्यंत पवित्र नाम है। इसका अर्थ दो प्रकार से समझा जाता है:

  1. वसुदेव के पुत्र: द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने माता देवकी और पिता वसुदेव के घर अवतार लिया था, इसलिए उन्हें ‘वासुदेव’ कहा जाता है।

  2. सर्वव्यापी ईश्वर: संस्कृत में ‘वासु’ का अर्थ है ‘सब जगह बसने वाला’ या ‘प्राण’। जो ईश्वर कण-कण में व्याप्त है और सभी प्राणियों के हृदय में निवास करता है, उसे ‘वासुदेव’ कहा जाता है।

‘द्वादशी’ हिंदू पंचांग की बारहवीं तिथि (12th Lunar Day) है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की यह द्वादशी भगवान वासुदेव के पूजन और चातुर्मास के संकल्प के लिए सबसे उपयुक्त मानी गई है, इसलिए इसे वासुदेव द्वादशी कहा जाता है।

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3. वासुदेव द्वादशी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व (Significance of Vasudeva Dwadashi)

हिंदू धर्म शास्त्रों (विशेषकर विष्णु पुराण और पद्म पुराण) में वासुदेव द्वादशी की अपार महिमा का वर्णन मिलता है। इस दिन का महत्व निम्नलिखित कारणों से अत्यंत विशिष्ट है:

I. चातुर्मास के व्रतों का आरंभ (Start of Chaturmas Vrata)

देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योग निद्रा में चले जाते हैं। इसके अगले दिन यानी वासुदेव द्वादशी से ‘चातुर्मास’ (अगले चार महीने – आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन) के व्रत, नियम और तपस्या का विधिवत आरंभ होता है। साधक इस दिन भगवान वासुदेव से प्रार्थना करते हैं कि, “हे प्रभु! आपके शयन काल में भी मेरी भक्ति निर्विघ्न चलती रहे।”

II. पापों का नाश और मोक्ष की प्राप्ति

मान्यता है कि जो व्यक्ति वासुदेव द्वादशी के दिन सच्चे मन से उपवास रखता है और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करता है, उसके जन्म-जन्मांतर के संचित पाप भस्म हो जाते हैं। यह व्रत मनुष्य को भौतिक मोह-माया से निकालकर मोक्ष (बैकुंठ धाम) के मार्ग पर ले जाता है।

III. संतान सुख और पारिवारिक शांति

जैसे वसुदेव और देवकी को स्वयं भगवान पुत्र रूप में प्राप्त हुए थे, वैसे ही जो दंपत्ति संतान प्राप्ति की कामना से यह व्रत करते हैं, उन्हें सुयोग्य, संस्कारी और स्वस्थ संतान की प्राप्ति होती है। इसके प्रभाव से पारिवारिक कलह शांत होते हैं और घर में प्रेम बढ़ता है।

IV. स्वर्ण दान के समान फल

पुराणों के अनुसार, वासुदेव द्वादशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण को तुलसी दल और पीले पुष्प अर्पित करने मात्र से हजारों गौ-दान और स्वर्ण दान के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।

4. वासुदेव द्वादशी की संपूर्ण पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)

वासुदेव द्वादशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण (बाल गोपाल या शंख-चक्र-गदा-पद्म धारी स्वरूप) और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। 26 जुलाई 2026 को इस शास्त्र-सम्मत विधि से पूजा करें:

१. प्रातःकालीन संकल्प और स्नान

  • द्वादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व (ब्रह्म मुहूर्त में) उठें।

  • नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल और हल्दी डालकर स्नान करें।

  • स्वच्छ और पीले रंग के वस्त्र धारण करें (भगवान वासुदेव को पीला रंग अत्यंत प्रिय है)।

  • हाथ में जल, अक्षत (चावल), और एक पीला फूल लेकर व्रत का संकल्प लें: “हे वासुदेव, हे जगत्पते! मैं (अपना नाम और गोत्र), अपने पापों के क्षय और आपकी असीम कृपा प्राप्ति हेतु आज वासुदेव द्वादशी का व्रत एवं पूजन करने का संकल्प लेता/लेती हूँ।”

२. चौकी की स्थापना और पंचामृत स्नान

  • घर के पूजा कक्ष या पूर्व दिशा की ओर एक साफ लकड़ी की चौकी (पाटा) रखें। उस पर पीला रेशमी कपड़ा बिछाएं।

  • चौकी पर भगवान श्रीकृष्ण (वासुदेव), भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।

  • बाल गोपाल (लड्डू गोपाल) की मूर्ति हो तो उन्हें एक थाली में रखकर दक्षिणावर्ती शंख से जल और पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से स्नान कराएं।

  • स्नान के बाद उन्हें स्वच्छ जल से धोकर पोंछें और सुंदर पीले वस्त्र व आभूषण पहनाएं।

३. षोडशोपचार पूजन (16-Step Puja)

  • भगवान वासुदेव को पीला चंदन (गोपी चंदन) और कुमकुम का तिलक लगाएं।

  • उन्हें वैजयंती की माला और पीले फूल (जैसे गेंदा, कमल या पीले गुलाब) अर्पित करें।

  • भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की कोई भी पूजा ‘तुलसी’ (Tulsi) के बिना अधूरी मानी जाती है। इसलिए उनके चरणों में तुलसी दल अवश्य अर्पित करें।

  • धूप, गाय के घी का दीपक और कपूर जलाएं।

४. मंत्र जाप और स्तोत्र पाठ

  • कुश के आसन पर बैठकर तुलसी की माला से भगवान के महामंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” की कम से कम 108 बार (एक माला) जाप करें।

  • इस दिन ‘विष्णु सहस्रनाम’ (Vishnu Sahasranama) या ‘मधुराष्टकम’ का पाठ करना अत्यंत चमत्कारिक परिणाम देता है।

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५. नैवेद्य (भोग) और आरती

  • भगवान वासुदेव को माखन-मिश्री, पंजिरी, ताजे फल, और पीले रंग की मिठाई (जैसे बेसन के लड्डू) का भोग लगाएं। भोग में तुलसी का पत्ता जरूर डालें।

  • परिवार के सभी सदस्यों के साथ मिलकर भगवान श्रीकृष्ण और विष्णु जी की आरती उतारें।

  • आरती के बाद क्षमा प्रार्थना करें और उपस्थित सभी लोगों में प्रसाद का वितरण करें।

5. वासुदेव द्वादशी की पौराणिक व्रत कथा (The Pauranik Vrat Katha)

किसी भी व्रत का पूरा फल तब तक प्राप्त नहीं होता, जब तक उस व्रत की कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण या पठन न किया जाए। वासुदेव द्वादशी से जुड़ी यह अत्यंत मर्मस्पर्शी कथा पुराणों में वर्णित है:

कथा (वसुदेव और देवकी का तप):

सतयुग में महर्षि कश्यप और माता अदिति ने भगवान विष्णु की अत्यंत कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। महर्षि कश्यप और अदिति ने कहा, “हे प्रभु! हम दोनों की प्रबल इच्छा है कि आप स्वयं हमारे पुत्र के रूप में जन्म लें।” भगवान विष्णु ने कहा, “तथास्तु! द्वापर युग में जब धर्म का पतन होगा, तब मैं तुम्हारे घर पुत्र रूप में अवतार लूंगा।”

द्वापर युग में महर्षि कश्यप ने ‘वसुदेव’ के रूप में और माता अदिति ने ‘देवकी’ के रूप में जन्म लिया। देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ, लेकिन देवकी का क्रूर भाई कंस उन दोनों के लिए काल बन गया। आकाशवाणी के अनुसार, देवकी का आठवां पुत्र कंस का वध करने वाला था, इसलिए कंस ने वसुदेव और देवकी को कारागार (जेल) में डाल दिया और उनके एक-एक करके सात बच्चों को मार डाला।

कारागार के घोर कष्ट, अंधकार और दुख में, माता देवकी और वसुदेव ने देवर्षि नारद के उपदेश से आषाढ़ शुक्ल द्वादशी (वासुदेव द्वादशी) का निर्जला व्रत किया। उन्होंने पूरे विधि-विधान से भगवान वासुदेव का स्मरण किया और यह संकल्प लिया कि, “हे प्रभु! आप हमारी रक्षा करें और अपने दिए हुए वरदान को सत्य सिद्ध करें।”

इस व्रत के प्रताप और उनके अटूट विश्वास के कारण, भगवान श्री हरि विष्णु ने भाद्रपद मास की अष्टमी (जन्माष्टमी) की आधी रात को कारागार में माता देवकी के गर्भ से ‘श्रीकृष्ण’ (वासुदेव) के रूप में पूर्णावतार लिया। भगवान के जन्म लेते ही कारागार के सभी ताले अपने आप टूट गए, पहरेदार गहरी नींद में सो गए और यमुना नदी ने भी वसुदेव जी को रास्ता दे दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने अंततः कंस का वध कर पृथ्वी को उसके अत्याचारों से मुक्त किया।

तभी से यह मान्यता है कि जो भी भक्त वासुदेव द्वादशी का व्रत रखता है, भगवान श्रीकृष्ण उसके जीवन के सभी ‘कारागार’ (समस्याओं, बीमारियों और दरिद्रता) के ताले खोल देते हैं और उसे पूर्ण स्वतंत्रता व सुख प्रदान करते हैं।

6. वासुदेव द्वादशी व्रत के कड़े नियम (Rules and Regulations of the Vrat)

यह व्रत भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए है, अतः इसमें सात्विकता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए:

  1. ब्रह्मचर्य का पालन: व्रत से एक दिन पूर्व (एकादशी) से लेकर त्रयोदशी की सुबह तक पूर्ण रूप से शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है।

  2. सात्विक आहार: यदि आप उपवास नहीं कर पा रहे हैं और केवल पूजा कर रहे हैं, तो भी इस दिन घर में मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज, और मसूर की दाल का प्रवेश वर्जित है।

  3. चावल का त्याग: एकादशी की तरह ही कई लोग वासुदेव द्वादशी के दिन भी चावल का सेवन नहीं करते हैं (हालांकि एकादशी का पारण चावल से किया जा सकता है, लेकिन जो द्वादशी का व्रत रखते हैं वे चावल से बचते हैं)।

  4. असत्य और क्रोध से बचें: व्रत के दिन किसी की निंदा करना, अपशब्द बोलना, या झूठ बोलने से व्रत का सारा पुण्य नष्ट हो जाता है। अपने मन को भगवान के भजनों में लगाए रखें।

  5. दिन में न सोएं: इस दिन महिलाओं और पुरुषों को दिन के समय सोना नहीं चाहिए।

7. वासुदेव द्वादशी के दिन किए जाने वाले अचूक उपाय (Special Astrological Remedies)

यदि आपके जीवन में कोई विशेष संकट है, आर्थिक परेशानी है या विवाह में बाधा आ रही है, तो 26 जुलाई 2026 को वासुदेव द्वादशी के दिन इन अचूक उपायों (Upay) को अवश्य आजमाएं:

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I. आर्थिक संकट दूर करने और धन प्राप्ति के लिए (For Wealth)

यदि आप भारी कर्ज में डूबे हैं या व्यापार में नुकसान हो रहा है, तो वासुदेव द्वादशी के दिन ‘दक्षिणावर्ती शंख’ में केसर मिश्रित कच्चा दूध भरकर भगवान वासुदेव (बाल गोपाल) का अभिषेक करें। अभिषेक के बाद वह दूध घर के सभी कोनों में थोड़ा-थोड़ा छिड़क दें। इससे घर में स्थिर लक्ष्मी का वास होता है और पैसों की तंगी हमेशा के लिए दूर हो जाती है।

II. संतान प्राप्ति के लिए (For Childbirth)

लंबे समय से संतान सुख से वंचित दंपत्तियों को इस दिन एक साथ बैठकर ‘संतान गोपाल मंत्र’ (ॐ देवकी सुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥) का 108 बार जाप करना चाहिए। भगवान को एक छोटी सी चांदी या लकड़ी की बांसुरी अर्पित करें। वासुदेव की कृपा से सूनी गोद शीघ्र भर जाती है।

III. विवाह में आ रही रुकावटों को दूर करने के लिए (For Early Marriage)

जिन युवक-युवतियों के विवाह में अनावश्यक देरी हो रही है, उन्हें इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को पीले रंग के वस्त्र (पीतांबर) और माता लक्ष्मी/राधा जी को लाल रंग की चुनरी अर्पित करनी चाहिए। साथ ही, केले के पेड़ की पूजा कर उसमें हल्दी मिला हुआ जल चढ़ाएं। इससे गुरु ग्रह (Jupiter) मजबूत होता है और विवाह के मार्ग खुल जाते हैं।

IV. घर में सुख-शांति और मानसिक तनाव से मुक्ति के लिए

यदि घर में रोज क्लेश होता है, तो वासुदेव द्वादशी की शाम को (गोधूलि बेला में) घर के आंगन में या तुलसी के पौधे के पास गाय के घी का एक दीपक जलाएं और तुलसी माता की 11 बार परिक्रमा करें। ऐसा करने से घर की सभी नकारात्मक ऊर्जा (Negative Energy) भस्म हो जाती है और परिवार में शांति स्थापित होती है।

8. वासुदेव द्वादशी से चातुर्मास का संबंध (Connection with Chaturmas)

वासुदेव द्वादशी का दिन इसलिए भी विशेष है क्योंकि इसी दिन से संन्यासियों, तपस्वियों और गृहस्थों के लिए ‘चातुर्मास’ के नियमों का पालन शुरू हो जाता है।

चार महीने तक (देवउठनी एकादशी तक) भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं और सृष्टि का कार्यभार भगवान शिव संभालते हैं। इन चार महीनों में विवाह, मुंडन, सगाई या गृह प्रवेश जैसे लौकिक शुभ कार्य नहीं किए जाते।

वासुदेव द्वादशी के दिन साधक यह संकल्प लेते हैं कि वे अगले चार महीनों तक किसी एक विशेष वस्तु (जैसे मीठा, तेल, विशेष सब्जी या एक समय का भोजन) का त्याग करेंगे और अपना अधिक से अधिक समय ईश्वर के ध्यान और शास्त्रों के अध्ययन में लगाएंगे।

Vasudeva Dwadashi 2026 (26 जुलाई 2026) केवल एक उपवास का दिन नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को जीवन की भागदौड़ से रोककर ईश्वर के साथ एक गहरा संबंध स्थापित करने का अवसर देता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि संसार में चाहे कितना भी अंधकार या कष्ट (कंस के कारागार की तरह) क्यों न हो, भगवान वासुदेव पर अटूट विश्वास रखने वाले का कभी अहित नहीं हो सकता।

इस वर्ष आप भी वासुदेव द्वादशी के पावन अवसर पर सुबह जल्दी उठें, पूर्ण सात्विकता के साथ भगवान श्रीकृष्ण और माता लक्ष्मी की पूजा करें। उन्हें माखन-मिश्री का भोग लगाएं और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करें। भगवान वासुदेव आपके जीवन के सभी कष्टों को हर लें और आपके परिवार को सुख, शांति, आरोग्य और समृद्धि प्रदान करें, यही हमारी मंगल कामना है।

“जय श्री कृष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय!”

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Top 5 FAQs on Vasudeva Dwadashi 2026)

प्रश्न 1: वर्ष 2026 में वासुदेव द्वादशी किस तारीख को है?

उत्तर: हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में वासुदेव द्वादशी का पावन पर्व 26 जुलाई 2026, रविवार को मनाया जाएगा। यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को, देवशयनी एकादशी के ठीक अगले दिन आता है।

प्रश्न 2: वासुदेव द्वादशी के दिन किस देवता की पूजा की जाती है?

उत्तर: इस दिन मुख्य रूप से भगवान श्री हरि विष्णु के अवतार भगवान श्रीकृष्ण (जिन्हें वासुदेव कहा जाता है) की पूजा की जाती है। उनके साथ-साथ माता लक्ष्मी और तुलसी जी की पूजा का भी विशेष विधान है।

प्रश्न 3: वासुदेव द्वादशी और देवशयनी एकादशी में क्या संबंध है?

उत्तर: देवशयनी एकादशी (आषाढ़ शुक्ल एकादशी) के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं। इसके ठीक अगले दिन यानी वासुदेव द्वादशी से ‘चातुर्मास’ के व्रतों, नियमों और तपस्या का विधिवत आरंभ होता है। साधक वासुदेव भगवान की पूजा कर चातुर्मास के व्रत का संकल्प लेते हैं।

प्रश्न 4: वासुदेव द्वादशी के दिन क्या नहीं करना चाहिए?

उत्तर: यह एक अत्यंत पवित्र दिन है। इस दिन घर में तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज) बिल्कुल नहीं बनाना चाहिए। बाल और नाखून काटने से बचना चाहिए। साथ ही, दिन के समय सोना, झूठ बोलना और किसी पर क्रोध करना व्रत के पुण्यों को नष्ट कर देता है।

प्रश्न 5: क्या वासुदेव द्वादशी का व्रत कुंवारी कन्याएं रख सकती हैं?

उत्तर: जी हाँ, वासुदेव द्वादशी का व्रत कुंवारी कन्याएं, सुहागिन महिलाएं, पुरुष और बुजुर्ग— सभी रख सकते हैं। कुंवारी कन्याओं द्वारा यह व्रत रखने से उन्हें भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से सुयोग्य और मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति होती है और विवाह में आ रही सभी रुकावटें दूर हो जाती हैं।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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