सनातन धर्म की तांत्रिक और आगम परंपरा में जब ब्रह्मांड की सबसे उग्र, भयंकर और त्वरित फल देने वाली शक्ति का नाम लिया जाता है, तो वह माता प्रत्यंगिरा (Maa Pratyangira) का होता है। इन्हें ‘अथर्वण भद्रकाली’ और ‘नरसिम्ही’ (Narasimhika) के नाम से भी जाना जाता है। जब किसी व्यक्ति पर भयंकर से भयंकर काला जादू (Black Magic), मारण, उच्चाटन या किसी अघोरी तांत्रिक विद्या का प्रयोग किया गया हो, और दुनिया का कोई भी उपाय काम न आ रहा हो, तब माता प्रत्यंगिरा की उपासना ही एकमात्र और अंतिम ब्रह्मास्त्र होती है।
‘प्रत्यंगिरा’ शब्द का अर्थ है ‘रिवर्सल’ (Reversal) अर्थात् वापस पलटना। जो भी बुरी शक्ति, तंत्र-मंत्र या अघोरी प्रयोग आप पर भेजा गया है, माता प्रत्यंगिरा उसे बूमरैंग (Boomerang) की तरह उसी व्यक्ति पर वापस पलट देती हैं जिसने उसे भेजा था।
जब जीवन में शत्रु इतने शक्तिशाली हो जाएं कि आपका अस्तित्व संकट में पड़ जाए, तब ‘श्री प्रत्यङ्गिरा सहस्रनामावली’ (Shri Pratyangira Sahasranamavali) का पाठ एक अभेद्य ‘अग्नि कवच’ का कार्य करता है। ‘सहस्रनामावली’ का अर्थ है माता प्रत्यंगिरा के एक हजार (1000) अत्यंत पवित्र, शक्तिशाली और उग्र नामों का अर्चन।
इस अत्यंत विस्तृत, गूढ़ और ज्ञानवर्धक लेख में हम जानेंगे कि माता प्रत्यंगिरा का प्राकट्य कैसे हुआ, Shri Pratyangira Sahasranamavali Lyrics in Sanskrit की तांत्रिक महिमा क्या है, इन 1000 नामों का अर्चन करने से मिलने वाले चमत्कारी लाभ क्या हैं, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक तांत्रिक विधि क्या है।
माता प्रत्यंगिरा का प्राकट्य और उनका भयंकर स्वरूप
श्री प्रत्यंगिरा सहस्रनामावली की असीम शक्ति को समझने के लिए माता के प्राकट्य की पौराणिक कथा को जानना आवश्यक है।
प्राकट्य की कथा: शास्त्रों के अनुसार, जब भगवान विष्णु के अवतार ‘श्री नरसिंह’ (Narasimha) ने हिरण्यकश्यपु का वध किया, तो उसके दुष्ट रक्त का पान करने के कारण भगवान नरसिंह का क्रोध शांत ही नहीं हो रहा था। उनका क्रोध इतना भयंकर था कि संपूर्ण ब्रह्मांड जलकर भस्म होने की कगार पर आ गया। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने ‘शरभ’ (Sharabha – आधा पक्षी, आधा सिंह) का विशाल रूप धारण किया ताकि वे नरसिंह भगवान को शांत कर सकें।
परंतु भगवान नरसिंह का क्रोध कम होने के बजाय और बढ़ गया और उन्होंने ‘गंडभेरुंड’ (Gandabherunda – दो सिर वाला एक भयंकर पक्षी) का रूप धारण कर लिया। शिव (शरभ) और विष्णु (गंडभेरुंड) के इस महायुद्ध से सृष्टि का विनाश निश्चित लगने लगा। तब ब्रह्मांड को बचाने के लिए माता पार्वती (शक्ति) ने शरभ के पंखों से एक अत्यंत उग्र और महाभयंकर रूप धारण किया, जो ‘माता प्रत्यंगिरा’ कहलाईं। माता प्रत्यंगिरा के प्राकट्य और उनकी सिंह गर्जना मात्र से ही भगवान नरसिंह और शरभ दोनों शांत हो गए।
स्वरूप का तांत्रिक रहस्य: माता प्रत्यंगिरा का चेहरा सिंह (शेर) का है और शरीर एक पूर्ण स्त्री का है। उनका वर्ण (रंग) घने अंधकार के समान नीला/काला है। उनके 1008 सिर और 2016 हाथ हैं (कुछ स्थानों पर उन्हें 4 भुजाओं वाली भी दर्शाया गया है)। वे रथ पर सवार हैं जिसे चार सिंह खींचते हैं। माता का यह सिंहमुखी स्वरूप इस बात का प्रतीक है कि वे अज्ञान और नकारात्मकता रूपी हाथी को चीरने वाली शेरनी हैं।
सहस्रनामावली का महत्व: 1000 उग्र और जाग्रत नामों की तांत्रिक शक्ति
तंत्र शास्त्र में ‘सहस्रनाम स्तोत्र’ और ‘सहस्रनामावली’ का प्रयोग अलग-अलग उद्देश्यों के लिए होता है। स्तोत्र का पाठ श्लोकों के रूप में किया जाता है, जबकि ‘सहस्रनामावली’ में माता के प्रत्येक नाम को एक ‘बीज मंत्र’ (Seed Mantra) की तरह सिद्ध किया जाता है।
प्रत्येक नाम के आरंभ में ‘ॐ’ और अंत में ‘नमः’ लगा होता है (जैसे- ॐ प्रत्यङ्गिरायै नमः)। जब साधक माता के इन 1000 अलग-अलग तांत्रिक स्वरूपों का संस्कृत में उच्चारण करते हुए उन्हें लाल पुष्प या विशेष आहुति अर्पित करता है, तो उसके आस-पास एक ‘नीली और लाल अग्नि’ का सुरक्षा चक्र (Aura) उत्पन्न होता है। यह 1000 नाम ब्रह्मांड की सभी बुरी शक्तियों, दुर्भाग्य और प्रेत बाधाओं को सोख लेने की क्षमता रखते हैं।
Shri Pratyangira Sahasranamavali | (श्री प्रत्यङ्गिरा सहस्रनामावली: 1000 नामों का पवित्र संग्रह – Lyrics in Sanskrit)
(माता प्रत्यंगिरा की साधना अत्यंत उग्र और गोपनीय है। सनातन तांत्रिक परंपरा की मर्यादा को बनाए रखने के लिए, माता के संपूर्ण 1000 नामों का अर्चन केवल किसी योग्य गुरु से दीक्षा लेकर या प्रामाणिक ग्रंथ से ही करना चाहिए। यहाँ हम सहस्रार्चन की विधि, सिद्ध ध्यान मंत्र और अर्चन के लिए कुछ प्रमुख जाग्रत नामों का उल्लेख कर रहे हैं, जिनसे साधना की शुरुआत होती है।)
सहस्रनामावली अर्चन से पूर्व का सिद्ध ध्यान मंत्र (Dhyana Sloka):
माता प्रत्यंगिरा के 1000 नामों का अर्चन शुरू करने से पूर्व आँखें बंद करके लाल पुष्प हाथ में लें और माता के इस भयंकर स्वरूप का ध्यान करें:
ॐ क्षमा-मण्डित-सर्वाङ्गीं महा-भैरव-रूपिणीम्। सिंह-वक्त्रां त्रिनेत्रां च कपाल-खट्वाङ्ग-धारिणीम्॥ खड्गं पाशं तथा शूलं डमरुं दधतीं करैः। प्रत्यङ्गिरां भजे देवीमथर्वण-विशारदाम्॥
(अर्थ: जो अपने संपूर्ण अंगों में क्षमा (और भयंकरता) धारण किए हुए हैं, जो महा-भैरव का रूप हैं। जिनका मुख सिंह के समान है, जिनके तीन नेत्र हैं, और जो कपाल (खोपड़ी) तथा खट्वांग धारण करती हैं। जो अपने हाथों में खड्ग, पाश, त्रिशूल और डमरू धारण करती हैं, ऐसी अथर्वण वेद की अधिष्ठात्री देवी प्रत्यंगिरा का मैं भजन/ध्यान करता हूँ।)
ॐ देव्यै नमः ।
ॐ प्रत्यङ्गिरायै नमः ।
ॐ दिव्यायै नमः ।
ॐ सरसायै नमः ।
ॐ शशिशेखरायै नमः ।
ॐ सुमनायै नमः ।
ॐ सामिधेत्यै नमः ।
ॐ समस्तसुरशेमुष्यै नमः ।
ॐ सर्वसम्पत्तिजनन्यै नमः ।
ॐ सर्वदायै नमः ।
ॐ सिन्धुसेविन्यै नमः ।
ॐ शम्भुसीमन्तिन्यै नमः ।
ॐ सीमायै नमः ।
ॐ सुराराध्यायै नमः ।
ॐ सुधारसायै नमः ।
ॐ रसायै नमः ।
ॐ रसवत्यै नमः ।
ॐ वेलायै नमः ।
ॐ वन्यायै नमः ।
ॐ वनमालिन्यै नमः । २०
ॐ वनजाक्ष्यै नमः ।
ॐ वनचर्यै नमः ।
ॐ वन्यै नमः ।
ॐ वनविनोदिन्यै नमः ।
ॐ वेगिन्यै नमः ।
ॐ वेगदायै नमः ।
ॐ वेगबलास्यायै नमः ।
ॐ बलाधिकायै नमः ।
ॐ कलायै नमः ।
ॐ कलप्रियायै नमः ।
ॐ कोल्यै नमः ।
ॐ कोमलायै नमः ।
ॐ कालकामिन्यै नमः ।
ॐ कमलायै नमः ।
ॐ कमलास्यायै नमः ।
ॐ कमलस्थायै नमः ।
ॐ कलावत्यै नमः ।
ॐ कुलीनायै नमः ।
ॐ कुटिलायै नमः ।
ॐ कान्तायै नमः । ४०
ॐ कोकिलायै नमः ।
ॐ कलभाषिण्यै नमः ।
ॐ कीरकील्यै नमः ।
ॐ कलायै नमः ।
ॐ काल्यै नमः ।
ॐ कपालिन्यै नमः ।
ॐ कालिकायै नमः ।
ॐ केशिन्यै नमः ।
ॐ कुशावर्तायै नमः ।
ॐ कौशाम्ब्यै नमः ।
ॐ केशवप्रियायै नमः ।
ॐ काश्यै नमः ।
ॐ कलायै नमः ।
ॐ महाकाश्यै नमः ।
ॐ सङ्काशायै नमः ।
ॐ केशदायिन्यै नमः ।
ॐ कुण्डल्यै नमः ।
ॐ कुण्डलास्यायै नमः ।
ॐ कुण्डलाङ्गदमण्डितायै नमः ।
ॐ कुणपाल्यै नमः । ६०
ॐ कुमुदिन्यै नमः ।
ॐ कुमुदायै नमः ।
ॐ प्रीतिवर्धिन्यै नमः ।
ॐ कुन्दप्रियायै नमः ।
ॐ कुन्दरुचये नमः ।
ॐ कुरङ्गमदनोदिन्यै नमः ।
ॐ कुरङ्गनयनायै नमः ।
ॐ कुन्दायै नमः ।
ॐ कुरुवृन्दायै नमः ।
ॐ अभिनन्दिन्यै नमः ।
ॐ कुसुम्भकुसुमायै नमः ।
ॐ काञ्च्यै नमः ।
ॐ क्वणत्किङ्किणिकायै नमः ।
ॐ कटायै नमः ।
ॐ कठोरायै नमः ।
ॐ करुणायै नमः ।
ॐ काष्ठायै नमः ।
ॐ कौमुद्यै नमः ।
ॐ कम्बुकण्ठिन्यै नमः ।
ॐ कपर्दिन्यै नमः । ८०
ॐ कपटिन्यै नमः ।
ॐ कण्ठिन्यै नमः ।
ॐ कालकण्ठिकायै नमः ।
ॐ कीरहस्तायै नमः ।
ॐ कुमार्यै नमः ।
ॐ कुरुदायै नमः ।
ॐ कुसुमप्रियायै नमः ।
ॐ कुञ्जरस्थायै नमः ।
ॐ कुञ्जरतायै नमः ।
ॐ कुम्भिन्यै नमः ।
ॐ कुम्भस्तनद्वयायै नमः ।
ॐ कुम्भिगायै नमः ।
ॐ करिभोगायै नमः ।
ॐ कदल्यै नमः ।
ॐ दलशालिन्यै नमः ।
ॐ कुपितायै नमः ।
ॐ कोटरस्थायै नमः ।
ॐ कङ्काल्यै नमः ।
ॐ कन्दरोदरायै नमः ।
ॐ एकान्तवासिन्यै नमः । १००
ॐ काञ्च्यै नमः ।
ॐ कम्पमानशिरोरुहायै नमः ।
ॐ कादम्बर्यै नमः ।
ॐ कदम्बस्थायै नमः ।
ॐ कुङ्कुमप्रेमधारिण्यै नमः ।
ॐ कुटुम्बिनीप्रियायै नमः ।
ॐ आकूत्यै नमः ।
ॐ क्रतवे नमः ।
ॐ क्रतुकर्यै नमः ।
ॐ प्रियायै नमः ।
ॐ कात्यायन्यै नमः ।
ॐ कृत्तिकायै नमः ।
ॐ कार्तिकेयप्रवर्तिन्यै नमः ।
ॐ कामपत्न्यै नमः ।
ॐ कामदात्र्यै नमः ।
ॐ कामेश्यै नमः ।
ॐ कामवन्दितायै नमः ।
ॐ कामरूपायै नमः ।
ॐ क्रमावर्त्यै नमः ।
ॐ कामाक्ष्यै नमः । १२०
ॐ काममोहितायै नमः ।
ॐ खड्गिन्यै नमः ।
ॐ खेचर्यै नमः ।
ॐ खड्गायै नमः ।
ॐ खञ्जरीटेक्षणायै नमः ।
ॐ खलायै नमः ।
ॐ खरगायै नमः ।
ॐ खरनाथायै नमः ।
ॐ खरास्यायै नमः ।
ॐ खेलनप्रियायै नमः ।
ॐ खरांश्वायै नमः ।
ॐ खेटिन्यै नमः ।
ॐ खट्वायै नमः ।
ॐ खगायै नमः ।
ॐ खट्वाङ्गधारिण्यै नमः ।
ॐ खरखण्डिन्यै नमः ।
ॐ ख्यातायै नमः ।
ॐ खण्डितायै नमः ।
ॐ खण्डनीस्थितायै नमः ।
ॐ खण्डप्रियायै नमः । १४०
ॐ खण्डखाद्यायै नमः ।
ॐ सेन्दुखण्डायै नमः ।
ॐ खण्डिन्यै नमः ।
ॐ गङ्गायै नमः ।
ॐ गोदावर्यै नमः ।
ॐ गौर्यै नमः ।
ॐ गोमत्यै नमः ।
ॐ गौतम्यै नमः ।
ॐ गयायै नमः ।
ॐ गेयायै नमः ।
ॐ गगनगायै नमः ।
ॐ गारुड्यै नमः ।
ॐ गरुडध्वजायै नमः ।
ॐ गीतायै नमः ।
ॐ गीतप्रियायै नमः ।
ॐ गोपायै नमः ।
ॐ गण्डप्रीतायै नमः ।
ॐ गुणिने नमः ।
ॐ गिरायै नमः ।
ॐ गवे नमः । १६०
ॐ गौर्यै नमः ।
ॐ मन्दमदनायै नमः ।
ॐ गोकुलायै नमः ।
ॐ गोप्रतारिण्यै नमः ।
ॐ गोदायै नमः ।
ॐ गोविन्दिन्यै नमः ।
ॐ गूढायै नमः ।
ॐ निर्गूढायै नमः ।
ॐ गूढविग्रहायै नमः ।
ॐ गुञ्जिन्यै नमः ।
ॐ गजगायै नमः ।
ॐ गोप्यै नमः ।
ॐ गोत्रक्षयकर्यै नमः ।
ॐ गदायै नमः ।
ॐ गिरिभूपालदुहितायै नमः ।
ॐ गोगायै नमः ।
ॐ गोच्छलवर्धिन्यै नमः ।
ॐ घनस्तन्यै नमः ।
ॐ घनरुचये नमः ।
ॐ घनेहायै नमः । १८०
ॐ घननिःस्वनायै नमः ।
ॐ घूत्कारिण्यै नमः ।
ॐ घूघकर्यै नमः ।
ॐ घुघूकपरिवारितायै नमः ।
ॐ घण्टानादप्रियायै नमः ।
ॐ घण्टायै नमः ।
ॐ घनाघोटकवाहिन्यै नमः ।
ॐ घोररूपायै नमः ।
ॐ घोरायै नमः ।
ॐ घूत्यै नमः ।
ॐ प्रतिघनायै नमः ।
ॐ घन्यै नमः ।
ॐ घृताच्यै नमः ।
ॐ घनपुष्ट्यै नमः ।
ॐ घटायै नमः ।
ॐ घनघटायै नमः ।
ॐ अमृतायै नमः ।
ॐ घटस्यायै नमः ।
ॐ घटनायै नमः ।
ॐ घोघघातपातनिवारिण्यै नमः । २००
ॐ चञ्चरीक्यै नमः ।
ॐ चकोर्यै नमः ।
ॐ चामुण्डायै नमः ।
ॐ चीरधारिण्यै नमः ।
ॐ चातुर्यै नमः ।
ॐ चपलायै नमः ।
ॐ चक्रचलायै नमः ।
ॐ चेलायै नमः ।
ॐ चलायै नमः ।
ॐ अचलायै नमः ।
ॐ चतुश्चिरन्तनायै नमः ।
ॐ चाकायै नमः ।
ॐ चिक्यायै नमः ।
ॐ चामीकरच्छवये नमः ।
ॐ चापिन्यै नमः ।
ॐ चपलायै नमः ।
ॐ चम्प्वै नमः ।
ॐ चिन्तायै नमः ।
ॐ चिन्तामणये नमः ।
ॐ चितायै नमः । २२०
ॐ चातुर्वर्ण्यमय्यै नमः ।
ॐ चञ्चवे नमः ।
ॐ चौराचार्यायै नमः ।
ॐ चमत्कृतये नमः ।
ॐ चक्रवर्तिवध्वै नमः ।
ॐ चक्रायै नमः ।
ॐ चक्राङ्गायै नमः ।
ॐ चक्रमोदिन्यै नमः ।
ॐ चेतश्चर्यै नमः ।
ॐ चित्तवृत्त्यै नमः ।
ॐ अचेतायै नमः ।
ॐ चेतनप्रदायै नमः ।
ॐ चाम्पेय्यै नमः ।
ॐ चम्पकप्रीत्यै नमः ।
ॐ चण्ड्यै नमः ।
ॐ चण्डालवासिन्यै नमः ।
ॐ चिरञ्जीवितटायै नमः ।
ॐ चिञ्चायै नमः ।
ॐ तरुमूलनिवासिन्यै नमः ।
ॐ छुरिकायै नमः । २४०
ॐ छत्रमध्यस्थायै नमः ।
ॐ छिद्रायै नमः ।
ॐ छेदकर्यै नमः ।
ॐ छिदायै नमः ।
ॐ छुछुन्दरीपलप्रीत्यै नमः ।
ॐ छुछुन्दरीनिभस्वनायै नमः ।
ॐ छलिन्यै नमः ।
ॐ छलदायै नमः ।
ॐ छत्रायै नमः ।
ॐ छिटिकायै नमः ।
ॐ छेककृते नमः ।
ॐ छगिन्यै नमः ।
ॐ छान्दस्यै नमः ।
ॐ छायायै नमः ।
ॐ छायाकृच्छाद्यै नमः ।
ॐ जयायै नमः ।
ॐ जयदायै नमः ।
ॐ जात्यै नमः ।
ॐ जयस्थायै नमः ।
ॐ जयवर्धिन्यै नमः । २६०
ॐ जपापुष्पप्रियायै नमः ।
ॐ जप्यायै नमः ।
ॐ जृम्भिण्यै नमः ।
ॐ यामलायै नमः ।
ॐ युतायै नमः ।
ॐ जम्बूप्रियायै नमः ।
ॐ जयस्थायै नमः ।
ॐ जङ्गमायै नमः ।
ॐ जङ्गमप्रियायै नमः ।
ॐ जन्तवे नमः ।
ॐ जन्तुप्रधानायै नमः ।
ॐ जरत्कर्णायै नमः ।
ॐ जरद्भवायै नमः ।
ॐ जातिप्रियायै नमः ।
ॐ जीवनस्थायै नमः ।
ॐ जीमूतसदृशच्छवये नमः ।
ॐ जन्यायै नमः ।
ॐ जनहितायै नमः ।
ॐ जायायै नमः ।
ॐ जम्भभिदे नमः । २८०
ॐ जम्भमालिन्यै नमः ।
ॐ जवदायै नमः ।
ॐ जववद्वाहायै नमः ।
ॐ जवान्यै नमः ।
ॐ ज्वरघ्ने नमः ।
ॐ ज्वरायै नमः ।
ॐ झञ्झानिलमय्यै नमः ।
ॐ झञ्झायै नमः ।
ॐ झणत्कारकरायै नमः ।
ॐ झिण्टीशायै नमः ।
ॐ झम्पकृते नमः ।
ॐ झम्पायै नमः ।
ॐ झम्पत्रासनिवारिण्यै नमः ।
ॐ टकारस्थायै नमः ।
ॐ टङ्कधरायै नमः ।
ॐ टङ्कारायै नमः ।
ॐ करशाटिन्यै नमः ।
ॐ ठक्कुरायै नमः ।
ॐ ठीत्कृत्यै नमः ।
ॐ ठिण्ठ्यै नमः । ३००
ॐ ठिण्ठीरवसमावृतायै नमः ।
ॐ ठण्ठानिलमय्यै नमः ।
ॐ ठण्ठायै नमः ।
ॐ ठणत्कारकरायै नमः ।
ॐ ठसायै नमः ।
ॐ डाकिन्यै नमः ।
ॐ डामर्यै नमः ।
ॐ डिण्डिमध्वनिनन्दिन्यै नमः ।
ॐ ढक्कास्वनप्रियायै नमः ।
ॐ ढक्कायै नमः ।
ॐ तपिन्यै नमः ।
ॐ तापिन्यै नमः ।
ॐ तरुण्यै नमः ।
ॐ तुन्दिलायै नमः ।
ॐ तुन्दायै नमः ।
ॐ तामस्यै नमः ।
ॐ तपःप्रियायै नमः ।
ॐ ताम्रायै नमः ।
ॐ ताम्राम्बरायै नमः ।
ॐ ताल्यै नमः । ३२०
ॐ तालीदलविभूषणायै नमः ।
ॐ तुरङ्गायै नमः ।
ॐ त्वरितायै नमः ।
ॐ त्रेतायै नमः ।
ॐ तोतुलायै नमः ।
ॐ तोदिन्यै नमः ।
ॐ तुलायै नमः ।
ॐ तापत्रयहरायै नमः ।
ॐ तप्तायै नमः ।
ॐ तालकेश्यै नमः ।
ॐ तमालिन्यै नमः ।
ॐ तमालदलवच्छामायै नमः ।
ॐ तालम्लानवत्यै नमः ।
ॐ तम्यै नमः ।
ॐ तामस्यै नमः ।
ॐ तमिस्रायै नमः ।
ॐ तीव्रायै नमः ।
ॐ तीव्रपराक्रमायै नमः ।
ॐ तटस्थायै नमः ।
ॐ तिलतैलाक्तायै नमः । ३४०
ॐ तरण्यै नमः ।
ॐ तपनद्युतये नमः ।
ॐ तिलोत्तमायै नमः ।
ॐ तिलककृते नमः ।
ॐ तारकाधीशशेखरायै नमः ।
ॐ तिलपुष्पप्रियायै नमः ।
ॐ तारायै नमः ।
ॐ तारकेश्यै नमः ।
ॐ कुटुम्बिन्यै नमः ।
ॐ स्थाणुपत्न्यै नमः ।
ॐ स्थितिकर्यै नमः ।
ॐ स्थलस्थायै नमः ।
ॐ स्थलवर्धिन्यै नमः ।
ॐ स्थित्यै नमः ।
ॐ स्थैर्यायै नमः ।
ॐ स्थविष्ठायै नमः ।
ॐ स्थापत्यै नमः ।
ॐ स्थलविग्रहायै नमः ।
ॐ दन्तिन्यै नमः ।
ॐ दण्डिन्यै नमः । ३६०
ॐ दीनायै नमः ।
ॐ दरिद्रायै नमः ।
ॐ दीनवत्सलायै नमः ।
ॐ देव्यै नमः ।
ॐ देववध्वै नमः ।
ॐ दैत्यदमन्यै नमः ।
ॐ दन्तभूषणायै नमः ।
ॐ दयावत्यै नमः ।
ॐ दमवत्यै नमः ।
ॐ दमदायै नमः ।
ॐ दाडिमस्तन्यै नमः ।
ॐ दन्दशूकनिभायै नमः ।
ॐ दैत्यदारिण्यै नमः ।
ॐ देवताननायै नमः ।
ॐ दोलाक्रीडायै नमः ।
ॐ दलायुषे नमः ।
ॐ दम्पतिभ्यां नमः ।
ॐ देवतामय्यै नमः ।
ॐ दशायै नमः ।
ॐ दीपस्थितायै नमः । ३८०
ॐ दोषायै नमः ।
ॐ दोषघ्ने नमः ।
ॐ दोषकारिण्यै नमः ।
ॐ दुर्गायै नमः ।
ॐ दुर्गार्तिशमन्यै नमः ।
ॐ दुर्गमायै नमः ।
ॐ दुर्गवासिन्यै नमः ।
ॐ दुर्गन्धनाशिन्यै नमः ।
ॐ दुःस्थायै नमः ।
ॐ दुःस्वप्नशमकारिण्यै नमः ।
ॐ दुर्वारायै नमः ।
ॐ दुन्दुभये नमः ।
ॐ भ्रान्तायै नमः ।
ॐ दूरस्थायै नमः ।
ॐ दूरवासिन्यै नमः ।
ॐ दरघ्ने नमः ।
ॐ दरदायै नमः ।
ॐ दात्र्यै नमः ।
ॐ दायादायै नमः ।
ॐ दुहितायै नमः । ४००
ॐ दयायै नमः ।
ॐ धुरन्धरायै नमः ।
ॐ धुरीणायै नमः ।
ॐ धौर्यै नमः ।
ॐ धिये नमः ।
ॐ धनदायिन्यै नमः ।
ॐ धीरायै नमः ।
ॐ अधीरायै नमः ।
ॐ धरित्र्यै नमः ।
ॐ धर्मदायै नमः ।
ॐ धीरमानसायै नमः ।
ॐ धनुर्धरायै नमः ।
ॐ दमन्यै नमः ।
ॐ धूर्तायै नमः ।
ॐ धूर्तपरिग्रहायै नमः ।
ॐ धूमवर्णायै नमः ।
ॐ धूमपानायै नमः ।
ॐ धूमलायै नमः ।
ॐ धूममोहिन्यै नमः ।
ॐ नलिन्यै नमः । ४२०
ॐ नन्दिन्यै नमः ।
ॐ नन्दायै नमः ।
ॐ नादिन्यै नमः ।
ॐ नन्दबालिकायै नमः ।
ॐ नवीनायै नमः ।
ॐ नर्मदायै नमः ।
ॐ नर्मिनेम्यै नमः ।
ॐ नियमनिश्चयायै नमः ।
ॐ निर्मलायै नमः ।
ॐ निगमाचारायै नमः ।
ॐ निम्नगायै नमः ।
ॐ नग्नकामिन्यै नमः ।
ॐ नीत्यै नमः ।
ॐ निरन्तरायै नमः ।
ॐ नग्न्यै नमः ।
ॐ निर्लेपायै नमः ।
ॐ निर्गुणायै नमः ।
ॐ नत्यै नमः ।
ॐ नीलग्रीवायै नमः ।
ॐ निरीहायै नमः । ४४०
ॐ निरञ्जनजन्यै नमः ।
ॐ नव्यै नमः ।
ॐ नवनीतप्रियायै नमः ।
ॐ नार्यै नमः ।
ॐ नरकार्णवतारिण्यै नमः ।
ॐ नारायण्यै नमः ।
ॐ निराकारायै नमः ।
ॐ निपुणायै नमः ।
ॐ निपुणप्रियायै नमः ।
ॐ निशायै नमः ।
ॐ निद्रायै नमः ।
ॐ नरेन्द्रस्थायै नमः ।
ॐ नमितायै नमः ।
ॐ अनमितायै नमः ।
ॐ निर्गुण्डिकायै नमः ।
ॐ निर्गुण्डायै नमः ।
ॐ निर्मांसायै नमः ।
ॐ अनामिकायै नमः ।
ॐ निभायै नमः ।
ॐ पताकिन्यै नमः । ४६०
ॐ पताकायै नमः ।
ॐ पलप्रीत्यै नमः ।
ॐ यशस्विन्यै नमः ।
ॐ पीनायै नमः ।
ॐ पीनस्तनायै नमः ।
ॐ पत्न्यै नमः ।
ॐ पवनाशनशायिन्यै नमः ।
ॐ परायै नमः ।
ॐ अपरायै नमः ।
ॐ कलापायै नमः ।
ॐ आप्पायै नमः ।
ॐ पाककृत्यरतिप्रियायै नमः ।
ॐ पवनस्थायै नमः ।
ॐ सुपवनायै नमः ।
ॐ तापसीप्रीतिवर्धिन्यै नमः ।
ॐ पशुवृद्धिकर्यै नमः ।
ॐ पुष्ट्यै नमः ।
ॐ पोषण्यै नमः ।
ॐ पुष्पवर्धिन्यै नमः ।
ॐ पुष्पिण्यै नमः । ४८०
ॐ पुस्तककरायै नमः ।
ॐ पुन्नागतलवासिन्यै नमः ।
ॐ पुरन्दरप्रियायै नमः ।
ॐ प्रीत्यै नमः ।
ॐ पुरमार्गनिवासिन्यै नमः ।
ॐ पाशिने नमः ।
ॐ पाशकरायै नमः ।
ॐ पाशायै नमः ।
ॐ बन्धुघ्ने नमः ।
ॐ पांसुलायै नमः ।
ॐ पशवे नमः ।
ॐ पटवे नमः ।
ॐ पटासायै नमः ।
ॐ परशुधारिण्यै नमः ।
ॐ पाशिन्यै नमः ।
ॐ पापघ्न्यै नमः ।
ॐ पतिपत्न्यै नमः ।
ॐ पतितायै नमः ।
ॐ अपतितायै नमः ।
ॐ पिशाच्यै नमः । ५००
ॐ पिशाचघ्न्यै नमः ।
ॐ पिशिताशनतोषितायै नमः ।
ॐ पानदायै नमः ।
ॐ पानपात्रायै नमः ।
ॐ पानदानकरोद्यतायै नमः ।
ॐ पेयायै नमः ।
ॐ प्रसिद्धायै नमः ।
ॐ पीयूषायै नमः ।
ॐ पूर्णायै नमः ।
ॐ पूर्णमनोरथायै नमः ।
ॐ पतद्गर्भायै नमः ।
ॐ पतद्गात्रायै नमः ।
ॐ पातपुण्यप्रियायै नमः ।
ॐ पुर्यै नमः ।
ॐ पङ्किलायै नमः ।
ॐ पङ्कमग्नायै नमः ।
ॐ पानीयायै नमः ।
ॐ पञ्जरस्थितायै नमः ।
ॐ पञ्चम्यै नमः ।
ॐ पञ्चयज्ञायै नमः । ५२०
ॐ पञ्चतायै नमः ।
ॐ पञ्चमप्रियायै नमः ।
ॐ पञ्चमुद्रायै नमः ।
ॐ पुण्डरीकायै नमः ।
ॐ पिक्यै नमः ।
ॐ पिङ्गललोचनायै नमः ।
ॐ प्रियङ्गुमञ्जर्यै नमः ।
ॐ पिण्ड्यै नमः ।
ॐ पिण्डितायै नमः ।
ॐ पाण्डुरप्रभायै नमः ।
ॐ प्रेतासनायै नमः ।
ॐ प्रियालुस्थायै नमः ।
ॐ पाण्डुघ्न्यै नमः ।
ॐ पीतसापहायै नमः ।
ॐ फलिन्यै नमः ।
ॐ फलधात्र्यै नमः ।
ॐ फलश्रिये नमः ।
ॐ फणिभूषणायै नमः ।
ॐ फूत्कारकारिण्यै नमः ।
ॐ स्फारायै नमः । ५४०
ॐ फुल्लायै नमः ।
ॐ फुल्लाम्बुजासनायै नमः ।
ॐ फिरङ्गघ्ने नमः ।
ॐ स्फीतमत्यै नमः ।
ॐ स्फीत्यै नमः ।
ॐ स्फीतकर्यै नमः ।
ॐ बलमायायै नमः ।
ॐ बलारातये नमः ।
ॐ बलिन्यै नमः ।
ॐ बलवर्धिन्यै नमः ।
ॐ वेणुवाद्यायै नमः ।
ॐ वनचर्यै नमः ।
ॐ विरावजनयित्र्यै नमः ।
ॐ विद्यायै नमः ।
ॐ विद्याप्रदायै नमः ।
ॐ विद्याबोधिन्यै नमः ।
ॐ बोधदायिन्यै नमः ।
ॐ बुद्धमात्रे नमः ।
ॐ बुद्धायै नमः ।
ॐ वनमालावत्यै नमः । ५६०
ॐ वरायै नमः ।
ॐ वरदायै नमः ।
ॐ वारुण्यै नमः ।
ॐ वीणायै नमः ।
ॐ वीणावादनतत्परायै नमः ।
ॐ विनोदिन्यै नमः ।
ॐ विनोदस्थायै नमः ।
ॐ वैष्णव्यै नमः ।
ॐ विष्णुवल्लभायै नमः ।
ॐ वैद्यायै नमः ।
ॐ वैद्यचिकित्सायै नमः ।
ॐ विवशायै नमः ।
ॐ विश्वविश्रुतायै नमः ।
ॐ विद्वत्कविकलायै नमः ।
ॐ वेत्त्रे नमः ।
ॐ वितन्द्रायै नमः ।
ॐ विगतज्वरायै नमः ।
ॐ विरावायै नमः ।
ॐ विविधारावायै नमः ।
ॐ बिम्बोष्ठ्यै नमः । ५८०
ॐ बिम्बवत्सलायै नमः ।
ॐ विन्ध्यस्थायै नमः ।
ॐ वीरवन्द्यायै नमः ।
ॐ वरीयसापराधविदे नमः ।
ॐ वेदान्तवेद्यायै नमः ।
ॐ वेद्यायै नमः ।
ॐ वैद्यायै नमः ।
ॐ विजयप्रदायै नमः ।
ॐ विरोधवर्धिन्यै नमः ।
ॐ वन्ध्यायै नमः ।
ॐ वन्ध्याबन्धनिवारिण्यै नमः ।
ॐ भगिन्यै नमः ।
ॐ भगमालायै नमः ।
ॐ भवान्यै नमः ।
ॐ भवभाविन्यै नमः ।
ॐ भीमायै नमः ।
ॐ भीमाननायै नमः ।
ॐ भैम्यै नमः ।
ॐ भङ्गुरायै नमः ।
ॐ भीमदर्शनायै नमः । ६००
ॐ भिल्ल्यै नमः ।
ॐ भल्लधरायै नमः ।
ॐ भीरवे नमः ।
ॐ भेरुण्डायै नमः ।
ॐ इभभयापहायै नमः ।
ॐ भगसर्पिण्यै नमः ।
ॐ भगायै नमः ।
ॐ भगरूपायै नमः ।
ॐ भगालयायै नमः ।
ॐ भगासनायै नमः ।
ॐ भगामोदायै नमः ।
ॐ भेर्यै नमः ।
ॐ भाङ्काररञ्जिन्यै नमः ।
ॐ भीषणायै नमः ।
ॐ अभीषणायै नमः ।
ॐ सर्वायै नमः ।
ॐ भगवत्यै नमः ।
ॐ भूषणायै नमः ।
ॐ भारद्वाज्यै नमः ।
ॐ भोगदात्र्यै नमः । ६२०
ॐ भवघ्न्यै नमः ।
ॐ भूतिभूषणायै नमः ।
ॐ भूतिदायै नमः ।
ॐ भूमिदात्र्यै नमः ।
ॐ भूपतित्वप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ भ्रमर्यै नमः ।
ॐ भ्रामर्यै नमः ।
ॐ नीलायै नमः ।
ॐ भूपालमुकुटस्थितायै नमः ।
ॐ मत्तायै नमः ।
ॐ मनोहरायै नमः ।
ॐ मनायै नमः ।
ॐ मानिन्यै नमः ।
ॐ मोहन्यै नमः ।
ॐ महायै नमः ।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः ।
ॐ मदाक्षीबायै नमः ।
ॐ मदिरायै नमः ।
ॐ मदिरालयायै नमः ।
ॐ मदोद्धतायै नमः । ६४०
ॐ मतङ्गस्थायै नमः ।
ॐ माधव्यै नमः ।
ॐ मधुमन्थिन्यै नमः ।
ॐ मेधायै नमः ।
ॐ मेधाकर्यै नमः ।
ॐ मेध्यायै नमः ।
ॐ मध्यायै नमः ।
ॐ मध्यवयस्थितायै नमः ।
ॐ मद्यपायै नमः ।
ॐ मांसलायै नमः ।
ॐ मत्स्यायै नमः ।
ॐ मोदिन्यै नमः ।
ॐ मैथुनोद्धतायै नमः ।
ॐ मुद्रायै नमः ।
ॐ मुद्रावत्यै नमः ।
ॐ मात्रे नमः ।
ॐ मायायै नमः ।
ॐ महिममन्दिरायै नमः ।
ॐ महामायायै नमः ।
ॐ महाविद्यायै नमः । ६६०
ॐ महामार्यै नमः ।
ॐ महेश्वर्यै नमः ।
ॐ महादेववध्वै नमः ।
ॐ मान्यायै नमः ।
ॐ मथुरायै नमः ।
ॐ मेरुमण्डलायै नमः ।
ॐ मेदस्वन्यै नमः ।
ॐ मेदसुश्रिये नमः ।
ॐ महिषासुरमर्दिन्यै नमः ।
ॐ मण्डपस्थायै नमः ।
ॐ मठस्थायै नमः ।
ॐ अमायै नमः ।
ॐ मालायै नमः ।
ॐ मालाविलासिन्यै नमः ।
ॐ मोक्षदायै नमः ।
ॐ मुण्डमालायै नमः ।
ॐ मन्दिरागर्भगर्भितायै नमः ।
ॐ मातङ्गिन्यै नमः ।
ॐ मातङ्ग्यै नमः ।
ॐ मतङ्गतनयायै नमः । ६८०
ॐ मधुवे नमः ।
ॐ मधुस्रवायै नमः ।
ॐ मधुरसायै नमः ।
ॐ मधूककुसुमप्रियायै नमः ।
ॐ यामिन्यै नमः ।
ॐ यामिनीनाथभूषायै नमः ।
ॐ यावकरञ्जितायै नमः ।
ॐ यवाङ्कुरप्रियायै नमः ।
ॐ यामायै नमः ।
ॐ यवन्यै नमः ।
ॐ यवनाधिपायै नमः ।
ॐ यमघ्न्यै नमः ।
ॐ यमवाण्यै नमः ।
ॐ यजमानस्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ यज्ञायै नमः ।
ॐ यज्यायै नमः ।
ॐ यजुषे नमः ।
ॐ यज्वायै नमः ।
ॐ यशोनिकरकारिण्यै नमः ।
ॐ यज्ञसूत्रप्रदायै नमः । ७००
ॐ ज्येष्ठायै नमः ।
ॐ यज्ञकर्मकर्यै नमः ।
ॐ यशसे नमः ।
ॐ यशस्विन्यै नमः ।
ॐ यज्ञसंस्थायै नमः ।
ॐ यूपस्तम्भनिवासिन्यै नमः ।
ॐ रञ्जितायै नमः ।
ॐ राजपत्न्यै नमः ।
ॐ रमायै नमः ।
ॐ रेखायै नमः ।
ॐ रव्यै नमः ।
ॐ रण्यै नमः ।
ॐ रजोवत्यै नमः ।
ॐ रजश्चित्रायै नमः ।
ॐ रजन्यै नमः ।
ॐ रजनीपतये नमः ।
ॐ रागिण्यै नमः ।
ॐ राजिन्यै नमः ।
ॐ राज्यायै नमः ।
ॐ राज्यदायै नमः । ७२०
ॐ राज्यवर्धिन्यै नमः ।
ॐ राजन्वत्यै नमः ।
ॐ राजनीत्यै नमः ।
ॐ तुर्यायै नमः ।
ॐ राजनिवासिन्यै नमः ।
ॐ रमण्यै नमः ।
ॐ रमणीयायै नमः ।
ॐ रामायै नमः ।
ॐ रामवत्यै नमः ।
ॐ रत्यै नमः ।
ॐ रेतोवत्यै नमः ।
ॐ रतोत्साहायै नमः ।
ॐ रोगघ्ने नमः ।
ॐ रोगकारिण्यै नमः ।
ॐ रङ्गायै नमः ।
ॐ रङ्गवत्यै नमः ।
ॐ रागायै नमः ।
ॐ रागज्ञायै नमः ।
ॐ रागिन्यै नमः ।
ॐ रणायै नमः । ७४०
ॐ रञ्जिकायै नमः ।
ॐ रञ्जक्यै नमः ।
ॐ रञ्जायै नमः ।
ॐ रञ्जिन्यै नमः ।
ॐ रक्तलोचनायै नमः ।
ॐ रक्तचर्मधरायै नमः ।
ॐ रन्त्र्यै नमः ।
ॐ रक्तस्थायै नमः ।
ॐ रक्तवाहिन्यै नमः ।
ॐ रम्भायै नमः ।
ॐ रम्भाफलप्रीत्यै नमः ।
ॐ रम्भोरवे नमः ।
ॐ राघवप्रियायै नमः ।
ॐ रङ्गभृते नमः ।
ॐ रङ्गमधुरायै नमः ।
ॐ रोदस्यै नमः ।
ॐ रोदसीगृहायै नमः ।
ॐ रोगकर्त्र्यै नमः ।
ॐ रोगहर्त्र्यै नमः ।
ॐ रोगभृते नमः । ७६०
ॐ रोगशायिन्यै नमः ।
ॐ वन्द्यै नमः ।
ॐ वन्दिस्तुतायै नमः ।
ॐ बन्धवे नमः ।
ॐ बन्धूककुसुमाधरायै नमः ।
ॐ वन्दितायै नमः ।
ॐ वन्दिमात्रे नमः ।
ॐ बन्धुरायै नमः ।
ॐ बैन्दव्यै नमः ।
ॐ विभायै नमः ।
ॐ विङ्क्यै नमः ।
ॐ विङ्कपलायै नमः ।
ॐ विङ्कायै नमः ।
ॐ विङ्कस्थायै नमः ।
ॐ विङ्कवत्सलायै नमः ।
ॐ वेदैर्विलग्नायै नमः ।
ॐ विग्नायै नमः ।
ॐ विधये नमः ।
ॐ विधिकर्यै नमः ।
ॐ विधायै नमः । ७८०
ॐ शङ्खिन्यै नमः ।
ॐ शङ्खनिलयायै नमः ।
ॐ शङ्खमालावत्यै नमः ।
ॐ शम्यै नमः ।
ॐ शङ्खपात्राशिन्यै नमः ।
ॐ शङ्खायै नमः ।
ॐ अशङ्खायै नमः ।
ॐ शङ्खगलायै नमः ।
ॐ शशिने नमः ।
ॐ शिम्ब्यै नमः ।
ॐ शरावत्यै नमः ।
ॐ श्यामायै नमः ।
ॐ श्यामाङ्ग्यै नमः ।
ॐ श्यामलोचनायै नमः ।
ॐ श्मशानस्थायै नमः ।
ॐ श्मशानायै नमः ।
ॐ श्मशानस्थलभूषणायै नमः ।
ॐ शर्मदायै नमः ।
ॐ शमहर्त्र्यै नमः ।
ॐ शाकिन्यै नमः । ८००
ॐ शङ्कुशेखरायै नमः ।
ॐ शान्त्यै नमः ।
ॐ शान्तिप्रदायै नमः ।
ॐ शेषायै नमः ।
ॐ शेषस्थायै नमः ।
ॐ शेषशायिन्यै नमः ।
ॐ शेमुष्यै नमः ।
ॐ शोषिण्यै नमः ।
ॐ शौर्यै नमः ।
ॐ शार्यै नमः ।
ॐ शौर्यायै नमः ।
ॐ शरायै नमः ।
ॐ शर्यै नमः ।
ॐ शापदायै नमः ।
ॐ शापहार्यै नमः ।
ॐ श्रिये नमः ।
ॐ शम्पायै नमः ।
ॐ शपथचापिन्यै नमः ।
ॐ शृङ्गिण्यै नमः ।
ॐ शृङ्गिपलभुजे नमः । ८२०
ॐ शङ्कर्यै नमः ।
ॐ शाङ्कर्यै नमः ।
ॐ शङ्कायै नमः ।
ॐ शङ्कापहायै नमः ।
ॐ शंस्थायै नमः ।
ॐ शाश्वत्यै नमः ।
ॐ शीतलायै नमः ।
ॐ शिवायै नमः ।
ॐ शवस्थायै नमः ।
ॐ शवभुजे नमः ।
ॐ शैव्यै नमः ।
ॐ शाववर्णायै नमः ।
ॐ शवोदर्यै नमः ।
ॐ शायिन्यै नमः ।
ॐ शावशयनायै नमः ।
ॐ शिंशिपायै नमः ।
ॐ शिंशिपायतायै नमः ।
ॐ शवाकुण्डलिन्यै नमः ।
ॐ शैवायै नमः ।
ॐ शङ्करायै नमः । ८४०
ॐ शिशिरायै नमः ।
ॐ शिरायै नमः ।
ॐ शवकाञ्च्यै नमः ।
ॐ शवश्रीकायै नमः ।
ॐ शवमालायै नमः ।
ॐ शवाकृत्यै नमः ।
ॐ शम्पिन्यै नमः ।
ॐ शङ्कुशक्त्यै नमः ।
ॐ शं नमः ।
ॐ शन्तनवे नमः ।
ॐ शीलदायिन्यै नमः ।
ॐ सिन्धवे नमः ।
ॐ सरस्वत्यै नमः ।
ॐ सिन्धुसुन्दर्यै नमः ।
ॐ सुन्दराननायै नमः ।
ॐ साधुसिद्ध्यै नमः ।
ॐ सिद्धिदात्र्यै नमः ।
ॐ सिद्धायै नमः ।
ॐ सिद्धसरस्वत्यै नमः ।
ॐ सन्तत्यै नमः । ८६०
ॐ सम्पदायै नमः ।
ॐ सम्पदे नमः ।
ॐ संविदे नमः ।
ॐ सम्पत्तिदायिन्यै नमः ।
ॐ सपत्न्यै नमः ।
ॐ सरसायै नमः ।
ॐ सारायै नमः ।
ॐ सरस्वतिकर्यै नमः ।
ॐ सुधायै नमः ।
ॐ सरसे नमः ।
ॐ समायै नमः ।
ॐ समानायै नमः ।
ॐ समाराध्यायै नमः ।
ॐ समस्तदायै नमः ।
ॐ समिद्धायै नमः ।
ॐ समदायै नमः ।
ॐ संमायै नमः ।
ॐ सम्मोहायै नमः ।
ॐ समदर्शनायै नमः ।
ॐ समित्यै नमः । ८८०
ॐ समिधायै नमः ।
ॐ सीमायै नमः ।
ॐ सावित्र्यै नमः ।
ॐ संविदायै नमः ।
ॐ सत्यै नमः ।
ॐ सवनायै नमः ।
ॐ सवनाधारायै नमः ।
ॐ सावनायै नमः ।
ॐ समरायै नमः ।
ॐ सम्यै नमः ।
ॐ समीरायै नमः ।
ॐ सुमनसे नमः ।
ॐ साध्व्यै नमः ।
ॐ सध्रीचीन्यै नमः ।
ॐ असहायिन्यै नमः ।
ॐ हंस्यै नमः ।
ॐ हंसगत्यै नमः ।
ॐ हंसायै नमः ।
ॐ हंसोज्ज्वलनिचोलयुजे नमः ।
ॐ हलिन्यै नमः । ९००
ॐ हलदायै नमः ।
ॐ हालायै नमः ।
ॐ हरश्रिये नमः ।
ॐ हरवल्लभायै नमः ।
ॐ हेलायै नमः ।
ॐ हेलावत्यै नमः ।
ॐ ह्रेषायै नमः ।
ॐ ह्रेषस्थायै नमः ।
ॐ ह्रेषवर्धिन्यै नमः ।
ॐ हन्त्रे नमः ।
ॐ हान्यै नमः ।
ॐ हयाह्वायै नमः ।
ॐ हृदे नमः ।
ॐ हन्तहायै नमः ।
ॐ हन्तहारिण्यै नमः ।
ॐ हुङ्कार्यै नमः ।
ॐ हन्तकृते नमः ।
ॐ हङ्कायै नमः ।
ॐ हीहायै नमः ।
ॐ हाहायै नमः । ९२०
ॐ हताहितायै नमः ।
ॐ हेमायै नमः ।
ॐ प्रभायै नमः ।
ॐ हरवत्यै नमः ।
ॐ हारीतायै नमः ।
ॐ हरिसम्मतायै नमः ।
ॐ होर्यै नमः ।
ॐ होत्र्यै नमः ।
ॐ होलिकायै नमः ।
ॐ होम्यायै नमः ।
ॐ होमायै नमः ।
ॐ हविषे नमः ।
ॐ हरये नमः ।
ॐ हारिण्यै नमः ।
ॐ हरिणीनेत्रायै नमः ।
ॐ हिमाचलनिवासिन्यै नमः ।
ॐ लम्बोदर्यै नमः ।
ॐ लम्बकर्णायै नमः ।
ॐ लम्बिकायै नमः ।
ॐ लम्बविग्रहायै नमः । ९४०
ॐ लीलायै नमः ।
ॐ लीलावत्यै नमः ।
ॐ लोलायै नमः ।
ॐ ललनायै नमः ।
ॐ लालितालतायै नमः ।
ॐ ललामलोचनायै नमः ।
ॐ लोच्यायै नमः ।
ॐ लोलाक्ष्यै नमः ।
ॐ लक्षणायै नमः ।
ॐ लटायै नमः ।
ॐ लम्पत्यै नमः ।
ॐ लुम्पत्यै नमः ।
ॐ लम्पायै नमः ।
ॐ लोपामुद्रायै नमः ।
ॐ ललन्त्यै नमः ।
ॐ लतिकायै नमः ।
ॐ लङ्घिकायै नमः ।
ॐ लङ्घायै नमः ।
ॐ लघिमायै नमः ।
ॐ लघुमध्यमायै नमः । ९६०
ॐ लघ्वीयस्यै नमः ।
ॐ लघूदर्कायै नमः ।
ॐ लूतायै नमः ।
ॐ लूतनिवारिण्यै नमः ।
ॐ लोमभृते नमः ।
ॐ लोमलोम्न्यै नमः ।
ॐ लुलुत्यै नमः ।
ॐ लुलुलुम्पिन्यै नमः ।
ॐ लुलायस्थायै नमः ।
ॐ लहर्यै नमः ।
ॐ लङ्कापुरपुरन्दर्यै नमः ।
ॐ लक्ष्म्यै नमः ।
ॐ लक्ष्मीप्रदायै नमः ।
ॐ लक्ष्यायै नमः ।
ॐ लक्ष्यबलगतिप्रदायै नमः ।
ॐ क्षणक्षपायै नमः ।
ॐ क्षणक्षीणायै नमः ।
ॐ क्षमायै नमः ।
ॐ क्षान्त्यै नमः ।
ॐ क्षमावत्यै नमः । ९८०
ॐ क्षामायै नमः ।
ॐ क्षामोदर्यै नमः ।
ॐ क्षोण्यै नमः ।
ॐ क्षोणिभृते नमः ।
ॐ क्षत्रियाङ्गनायै नमः ।
ॐ क्षपायै नमः ।
ॐ क्षपाकर्यै नमः ।
ॐ क्षीरायै नमः ।
ॐ क्षीरदायै नमः ।
ॐ क्षीरसागरायै नमः ।
ॐ क्षीणङ्कर्यै नमः ।
ॐ क्षयकर्यै नमः ।
ॐ क्षयभृते नमः ।
ॐ क्षयदायै नमः ।
ॐ क्षत्यै नमः ।
ॐ क्षरन्त्यै नमः ।
ॐ क्षुद्रिकायै नमः ।
ॐ क्षुद्रायै नमः ।
ॐ क्षुत्क्षामायै नमः ।
ॐ क्षरपातकायै नमः । १०००
इति श्री प्रत्यङ्गिरा सहस्रनामावली ।
(इसी क्रम में माता प्रत्यंगिरा के पूरे 1000 नामों का उच्चारण करते हुए लाल फूल या लाल कुमकुम अर्पित किया जाता है।)
श्री प्रत्यङ्गिरा सहस्रनामावली अर्चन के अचूक और अकल्पनीय लाभ (Benefits)
माता प्रत्यंगिरा की साधना को ‘कृत्या नाशिनी’ (काले जादू को नष्ट करने वाली) कहा जाता है। जिस प्रकार एक भूखा शेर अपने शिकार को चीर देता है, उसी प्रकार माता प्रत्यंगिरा के 1000 नाम साधक के सभी कष्टों को चीर देते हैं। इसके प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:
1. काले जादू, कृत्या और तंत्र-मंत्र का समूल नाश (Reversal of Black Magic)
यह माता प्रत्यंगिरा साधना का सबसे शक्तिशाली लाभ है। ‘ॐ कृत्याविनाशिन्यै नमः’। यदि किसी ने आपके ऊपर भयंकर से भयंकर काला जादू किया है, पुतला बनाकर (Voodoo) कष्ट दिया जा रहा है या खिलाया-पिलाया गया है, तो इस सहस्रनामावली का पाठ उस प्रयोग को तुरंत नष्ट कर देता है और उस तांत्रिक प्रयोग को उसी व्यक्ति पर वापस पलट (Reverse) देता है जिसने उसे किया था।
2. भयंकर शत्रुओं का पूर्ण रूप से संहार (Destruction of Enemies)
जब विरोधी अकारण ही आपको बर्बाद करने पर तुल जाएं और जान-माल का खतरा उत्पन्न हो जाए, तब माता प्रत्यंगिरा की शरण लें। इन 1000 नामों का अर्चन शत्रुओं के अहंकार को चूर-चूर कर देता है। माता की ऊर्जा से विरोधियों की बुद्धि और शक्ति स्तम्भित (Paralyze) हो जाती है और वे आपके मार्ग से हमेशा के लिए हट जाते हैं।
3. ऊपरी बाधाओं, भूत-प्रेत और पिशाचों से मुक्ति
यदि घर में अज्ञात साये (Negative Entities) दिखाई देते हों, बिना बात के दुर्घटनाएं होती हों या घर का माहौल हमेशा तनावपूर्ण और डरावना रहता हो, तो माता प्रत्यंगिरा का सहस्रनाम घर की सारी नकारात्मक ऊर्जा को भस्म कर देता है। घर के चारों ओर माता का एक ‘अग्नि घेरा’ बन जाता है जिसे कोई आसुरी शक्ति नहीं भेद सकती।
4. मुकदमों (Court Cases) और भारी विवादों में अकल्पनीय विजय
जो लोग लंबे समय से कोर्ट-कचहरी के मामलों में उलझे हैं, जिन पर झूठे आरोप लगे हैं, उन्हें माता भद्रकाली (प्रत्यंगिरा) की आराधना करनी चाहिए। माता सत्य की रक्षक हैं। उनके प्रभाव से न्यायाधीश (Judge) की बुद्धि भी सत्य के पक्ष में आ जाती है और निर्णय साधक के हित में होता है।
5. मृत्यु भय (अकाल मृत्यु) और असाध्य रोगों से रक्षा
जिन लोगों को अक्सर एक्सीडेंट का डर सताता है या जो किसी ऐसी रहस्यमयी बीमारी से पीड़ित हैं जिसका पता डॉक्टर भी नहीं लगा पा रहे (जो अक्सर तंत्र बाधा के कारण होता है), उनके लिए माता की यह नामावली अमृत का कार्य करती है। माता ‘महामृत्युंजय’ शिव की शक्ति हैं, जो यमदूतों को भी वापस लौटा सकती हैं।
6. नवग्रह शांति, विशेषकर राहु-केतु और शनि की शांति
माता प्रत्यंगिरा छाया ग्रहों (राहु और केतु) और शनि देव के दुष्प्रभावों को पल भर में शांत कर देती हैं। जन्म कुंडली के बड़े से बड़े दोष (जैसे ग्रहण दोष, चांडाल दोष) इनके सहस्रनाम के प्रभाव से निष्फल हो जाते हैं।
श्री प्रत्यङ्गिरा सहस्रनामावली की प्रामाणिक तांत्रिक और वैदिक अर्चन विधि (Authentic Puja Vidhi)
माता प्रत्यंगिरा की साधना अत्यंत उग्र है। यदि आप घर पर 1000 नामों का अर्चन (सहस्रार्चन) करना चाहते हैं, तो इस प्रामाणिक विधि और नियमों का कठोरता से पालन करें:
1. उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त (Best Time)
माता प्रत्यंगिरा की उग्र साधना के लिए अमावस्या (New Moon Day) का दिन सबसे श्रेष्ठ और सर्वाधिक शक्तिशाली माना जाता है। इसके अलावा कृष्ण पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, या मंगलवार/रविवार की रात्रि में इसका पाठ करना अनंत गुना फल देता है। पूजा का समय हमेशा निशीथ काल (मध्य रात्रि 10 बजे से 2 बजे के बीच) होना चाहिए।
2. वस्त्र, दिशा और आसन का विधान
स्नान करके पूर्णतः शुद्ध हो जाएं। माता को लाल और काला रंग अत्यंत प्रिय है। लाल रंग के वस्त्र (विशेषकर धोती/साड़ी) धारण करें। पूजा करते समय अपना मुख दक्षिण (South) या पूर्व (East) दिशा की ओर रखें। बैठने के लिए लाल रंग के ऊनी आसन या कुशा के आसन का प्रयोग करें।
3. पूजन सामग्री और स्थापना
एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माता प्रत्यंगिरा (सिंहमुखी) का चित्र या सिद्ध ‘प्रत्यंगिरा यंत्र’ स्थापित करें। उनके सामने तिल के तेल या सरसों के तेल का एक अखंड दीपक जलाएं। वातावरण को शुद्ध करने के लिए गुग्गुल या लोहबान का धूप जलाएं (यह तांत्रिक ऊर्जा को खींचता है)।
4. दृढ़ संकल्प (Sankalpa) और गुरु वंदना
दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत और एक लाल फूल लेकर अपना नाम, गोत्र और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य (जैसे- अमुक शत्रु की शांति या काले जादू से मुक्ति) बोलें। फिर जल धरती पर छोड़ दें। इसके बाद अपने गुरु, भगवान शिव (शरभेश्वर) और भगवान नरसिंह का मानसिक रूप से ध्यान अवश्य करें, क्योंकि माता इन्हीं की ऊर्जा को संतुलित करती हैं।
5. सहस्रार्चन की ब्रह्मास्त्र विधि (1000 आहुतियां/पुष्पांजलि)
अपने पास एक पात्र में 1000 की संख्या में लाल पुष्प (जैसे गुड़हल/Hibiscus), लाल कुमकुम, या लाल मिर्च (Red Chillies) रख लें। (विशेष तांत्रिक होमाम/हवन में माता को सूखी लाल मिर्च की ही आहुति दी जाती है)। अब माता का एक नाम बोलें (जैसे- ॐ सिंहमुख्यै नमः) और एक लाल फूल या थोड़ा कुमकुम माता के यंत्र/चित्र के सामने अर्पित करें। 1000 नामों के साथ 1000 बार अर्पण करने की यह विधि ‘सहस्रार्चन’ कहलाती है।
6. सात्विक/तांत्रिक भोग (नैवेद्य) और आरती
अर्चन पूर्ण होने के बाद माता को उबले हुए चने (काले चने), गुड़, अनार, या पान के पत्ते का भोग लगाएं। अंत में माता की आरती करें और सबसे अंत में ‘क्षमा प्रार्थना’ अवश्य पढ़ें, क्योंकि माता बहुत उग्र हैं और अनजाने में हुई भूल की क्षमा मांगना अनिवार्य है।
माता प्रत्यंगिरा साधना के अत्यंत कठोर नियम और सावधानियां (Strict Rules & Precautions)
यह ब्रह्मांड की सबसे शक्तिशाली तांत्रिक विद्याओं में से एक है। इसकी पवित्रता और उग्रता को संभालने के लिए इन नियमों का पालन अनिवार्य है:
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गुरु दीक्षा है अनिवार्य: माता प्रत्यंगिरा की विशेष तांत्रिक साधना, मारण या सकाम प्रयोग बिना योग्य ‘गुरु’ के निर्देशन के कभी नहीं करनी चाहिए। यदि आप सामान्य रक्षण (Defense) के लिए पाठ कर रहे हैं, तो भगवान शिव को गुरु मानकर ही पाठ शुरू करें।
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सत्कर्म और अकारण प्रयोग का निषेध: यदि आप किसी निर्दोष व्यक्ति से ईर्ष्या के कारण या अपने लालच के लिए माता प्रत्यंगिरा का प्रयोग करेंगे, तो माता उस निर्दोष को तो बचा लेंगी, लेकिन माता की उग्र ऊर्जा आपका ही सर्वनाश कर देगी। यह केवल अंतिम रक्षा (Last Resort) का अस्त्र है।
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पूर्ण सात्विकता: अनुष्ठान के दौरान मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज और किसी भी प्रकार के नशे का पूर्णतया त्याग कर दें।
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ब्रह्मचर्य: साधना के दिनों में शारीरिक और मानसिक रूप से कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करें।
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स्त्रियों और बच्चों से दूरी: जो लोग बहुत कमज़ोर दिल के हैं या डरपोक हैं, उन्हें माता के इस उग्र स्वरूप की साधना से बचना चाहिए। यह वीर भाव (Courageous) के साधकों की साधना है।
Shri Pratyangira Sahasranamavali केवल 1000 शब्दों का संग्रह नहीं है; यह एक ऐसा जाग्रत ‘परमाणु अस्त्र’ (Nuclear Weapon) है जो बुरी शक्तियों और तांत्रिक प्रयोगों के सम्राज्यों को पल भर में राख कर सकता है। जब चारों तरफ से दुश्मनों ने घेर लिया हो, न्याय की कोई उम्मीद न बची हो और इंसान पूरी तरह टूट चुका हो, तब माता प्रत्यंगिरा अपनी सिंह गर्जना के साथ भक्त की रक्षा के लिए प्रकट होती हैं।
माता अपने भक्तों के लिए एक अत्यंत करुणामयी रक्षक हैं, और दुश्मनों के लिए साक्षात महाकाल हैं। लाल वस्त्र पहनकर, पूर्ण श्रद्धा, विश्वास और निर्भयता के साथ माता के इन 1000 नामों का ध्यान और अर्चन करें। आप स्वयं देखेंगे कि जो नकारात्मक शक्तियां कल तक आपको बर्बाद कर रही थीं, वे आज उसी दिशा में वापस लौट गई हैं जहाँ से उन्हें भेजा गया था। आपके जीवन में अभय, शांति और ऐश्वर्य का उदय होगा। जय माता प्रत्यंगिरा! जय अथर्वण भद्रकाली!
श्री प्रत्यङ्गिरा सहस्रनामावली: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. माता प्रत्यंगिरा कौन हैं और उन्हें किस लिए पूजा जाता है?
माता प्रत्यंगिरा भगवान शिव (शरभेश्वर) और माता शक्ति का एक अत्यंत उग्र और भयंकर स्वरूप हैं। उनका मुख सिंह (शेर) का और शरीर स्त्री का है। मुख्य रूप से उन पर किए गए काले जादू (Black Magic), बुरी नज़र, तंत्र-मंत्र और भयंकर शत्रुओं का सर्वनाश करने के लिए उनकी पूजा की जाती है। वे बुरी शक्तियों को वापस पलट (Reverse) देती हैं।
2. क्या कोई सामान्य गृहस्थ व्यक्ति माता प्रत्यंगिरा सहस्रनामावली का पाठ कर सकता है?
जी हाँ, कोई भी सामान्य गृहस्थ अपने परिवार की रक्षा और काले जादू या शत्रुओं से बचाव (Defense) के लिए पूर्ण सात्विकता और पवित्रता के साथ इसका पाठ कर सकता है। परंतु इसका प्रयोग किसी निर्दोष को कष्ट पहुंचाने के लिए (Offense) कभी नहीं करना चाहिए, अन्यथा भयंकर परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
3. माता प्रत्यंगिरा की पूजा या अर्चन के लिए सबसे शुभ दिन और समय कौन सा है?
माता प्रत्यंगिरा की उग्र साधना के लिए अमावस्या (New Moon Day) का दिन सबसे श्रेष्ठ और शक्तिशाली माना जाता है। इसके अलावा इसे मंगलवार या अष्टमी को भी किया जा सकता है। पाठ का समय मध्य रात्रि (निशीथ काल – रात 10 बजे से 2 बजे के बीच) सबसे फलदायी होता है।
4. सहस्रार्चन या माता प्रत्यंगिरा के हवन में सूखी लाल मिर्च (Red Chillies) का प्रयोग क्यों किया जाता है?
माता प्रत्यंगिरा अग्नि और उग्रता की देवी हैं। तांत्रिक हवन में माता को सूखी लाल मिर्च की आहुति दी जाती है। ऐसा माना जाता है कि मिर्च का तीखापन और जलन शत्रुओं के अहंकार, बुरी शक्तियों और काले जादू को जलाकर भस्म कर देता है। विशेष बात यह है कि माता के हवन में लाल मिर्च डालने से उसकी तेज गंध (धसका) नहीं आती।
5. क्या इस उग्र साधना के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?
यदि आप माता प्रत्यंगिरा की विशुद्ध तांत्रिक साधना या विशेष हवन कर रहे हैं, तो गुरु दीक्षा पूर्णतः अनिवार्य है, क्योंकि उनकी ऊर्जा संभालना आम व्यक्ति के बस की बात नहीं है। परंतु, यदि आप केवल भक्ति भाव और अपनी सुरक्षा के लिए 1000 नामों का सामान्य अर्चन कर रहे हैं, तो भगवान शिव को मानसिक रूप से गुरु मानकर इसे किया जा सकता है।