सनातन धर्म और वैदिक दर्शन में ‘अग्नि’ (Fire) को केवल एक भौतिक तत्व नहीं, बल्कि साक्षात देवता, परम ऊर्जा और ब्रह्मांड का मुख माना गया है। वेद कहते हैं कि अग्नि देव ही वह ‘पुल’ (Bridge) हैं जो मनुष्यों की प्रार्थनाओं और आहुतियों को देवताओं तक पहुँचाते हैं। जब जीवन में घोर अंधकार छा जाए, शरीर रोगों से घिर जाए, हर कार्य में विफलता मिलने लगे और भीतर का उत्साह (Energy/Enthusiasm) पूरी तरह से समाप्त हो जाए, तब मनुष्य को अग्नि देव की शरण में जाना चाहिए।
अग्नि देव की स्तुति और उनकी ब्रह्मांडीय ऊर्जा को अपने भीतर जाग्रत करने का सबसे अमोघ और प्रामाणिक उपाय है— ‘आग्नेय स्तोत्र’ (Agneya Stotra)। ‘आग्नेय’ का अर्थ है— ‘अग्नि से उत्पन्न’ या ‘अग्नि से संबंधित’। यह स्तोत्र व्यक्ति के जीवन के सभी प्रकार के मल, दरिद्रता, पाप और नकारात्मक ऊर्जा को जलाकर भस्म कर देता है और उसे कुंदन की तरह चमका देता है।
इस अत्यंत विस्तृत, ज्ञानवर्धक और रहस्यमयी लेख में हम जानेंगे कि अग्नि देव का रहस्य क्या है, Agneya Stotra Lyrics in Sanskrit का मूल भाव और शक्ति क्या है, इसके पाठ से जीवन में कौन से अकल्पनीय लाभ प्राप्त होते हैं, वास्तु दोष (आग्नेय कोण) के निवारण में इसका क्या महत्व है, और इस स्तोत्र को सिद्ध करने की प्रामाणिक तांत्रिक व वैदिक विधि क्या है।
आग्नेय स्तोत्र और अग्नि देव का वैदिक रहस्य (Mystery of Agni Dev)
वेदों में अग्नि देव का स्थान सबसे ऊँचा है। ऋग्वेद का आरंभ ही ‘अग्निमीळे पुरोहितं’ से होता है। अग्नि देव को देवताओं का ‘मुख’ (Mouth of Gods) कहा गया है। आप चाहे किसी भी देवता (शिव, विष्णु, दुर्गा, इन्द्र) की पूजा कर रहे हों, यदि आप यज्ञ या हवन करते हैं, तो वह आहुति अग्नि देव के माध्यम से ही उन इष्ट देव तक पहुँचती है।
अग्नि के तीन प्रमुख रूप हैं:
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भौतिक अग्नि (Physical Fire): जो संसार को प्रकाश और ऊष्मा देती है।
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जठराग्नि (Digestive Fire): जो हमारे शरीर के भीतर रहकर भोजन पचाती है और हमें प्राणवान रखती है।
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ज्ञानाग्नि (Fire of Knowledge): जो हमारी चेतना में रहकर अज्ञान के अंधकार को नष्ट करती है।
‘आग्नेय स्तोत्र’ का पाठ इन तीनों प्रकार की अग्नियों को संतुलित और जाग्रत करता है। जब शरीर की जठराग्नि तेज़ होती है, तो रोग नष्ट होते हैं; जब ज्ञानाग्नि तेज़ होती है, तो मूर्खता और असफलता दूर होती है; और जब भौतिक अग्नि का आशीर्वाद मिलता है, तो घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है।
आग्नेय स्तोत्र (संस्कृत) | Agneya Stotra Lyrics in Sanskrit (स्तोत्र का मूल भाव और दर्शन)
Agney Stotra Lyrics | आग्नेय स्तोत्र हिंदी
अधुना गिरिजानन्द आञ्जनेयास्त्रमुत्तमम् ।
समन्त्रं सप्रयोगं च वद मे परमेश्वर ।।१।।
।।ईश्वर उवाच।।
ब्रह्मास्त्रं स्तम्भकाधारि महाबलपराक्रम् ।
मन्त्रोद्धारमहं वक्ष्ये श्रृणु त्वं परमेश्वरि ।।२।।
आदौ प्रणवमुच्चार्य मायामन्मथ वाग्भवम् ।
शक्तिवाराहबीजं व वायुबीजमनन्तरम् ।।३।।
विषयं द्वितीयं पश्चाद्वायु-बीजमनन्तरम् ।
ग्रसयुग्मं पुनर्वायुबीजं चोच्चार्य पार्वति ।।४।।
स्फुर-युग्मं वायु-बीजं प्रस्फुरद्वितीयं पुनः ।
वायुबीजं ततोच्चार्य हुं फट् स्वाहा समन्वितम् ।।५।।
आञ्जनेयास्त्रमनघे पञ्चपञ्चदशाक्षरम् ।
कालरुद्रो ऋषिः प्रोक्तो गायत्रीछन्द उच्यते ।।६।।
देवता विश्वरुप श्रीवायुपुत्रः कुलेश्वरि ।
ह्रूं बीजं कीलकं ग्लौं च ह्रीं-कार शक्तिमेव च ।।७।।
प्रयोगं सर्वकार्येषु चास्त्रेणानेन पार्वति ।
विद्वेषोच्चाटनेष्वेव मारणेषु प्रशस्यते ।।८।।
सीधे हाथ में जल लेकर विनियोग पढ़कर जल भूमि पर छोड़ दे।
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीहनुमाद्-आञ्जनेयास्त्र-विद्या-मन्त्रस्य कालरुद्र ऋषिः, गायत्री छन्दः, विश्वरुप-श्रीवायुपुत्रो देवता, ह्रूं बीजं, ग्लौं कीलकं, ह्रीं शक्तिः, मम शत्रुनिग्रहार्थे हनुमन्नस्त्र जपे विनियोगः।
मन्त्रः- “ॐ ह्रीं क्लीं ऐं सौं ग्लौं यं शोषय शोषय यं ग्रस ग्रस यं विदारय विदारय यं भस्मी कुरु कुरु यं स्फुर स्फुर यं प्रस्फुर प्रस्फुर यं सौं ग्लौं हुं फट् स्वाहा ।”
।। विधान ।।
नामद्वयं समुच्चार्यं मन्त्रदौ कुलसुन्दरि ।
प्रयोगेषु तथान्येषु सुप्रशस्तो ह्ययं मनुः ।।९।।
आदौ विद्वेषणं वक्ष्ये मन्त्रेणानेन पार्वति ।
काकोलूकदलग्रन्थी पवित्रीकृत-बुद्धिमान् ।।१०।।
तर्पयेच्छतवारं तु त्रिदिनाद्द्वेषमाप्नुयात् ।
ईक्ष्यकर्ममिदं म मन्त्रांते त्रिशतं जपेत् ।।११।।
वसिष्ठारुन्धतीभ्यां च भवोद्विद्वेषणं प्रिये ।
महद्विद्वेषणं भूत्वा कुरु शब्दं विना प्रिये ।।१२।।
मन्त्रं त्रिशतमुच्चार्य नित्यं मे कलहप्रिये ।
ग्राहस्थाने ग्रामपदे उच्चार्याष्ट शतं जपेत् ।।१३।।
ग्रामान्योन्यं भवेद्वैरमिष्टलाभो भवेत् प्रिये ।
देशशब्द समुच्चार्य द्विसहस्त्रं जपेन्मनुम् ।।१४।।
देशो नाशं समायाति अन्योन्यं क्लेश मे वच ।
रणशब्दं समुच्चार्य जपेदष्टोत्तरं शतम् ।।१५।।
अग्नौ नता तदा वायुदिनान्ते कलहो भवेत् ।
उच्चाटन प्रयोगं च वक्ष्येऽहं तव सुव्रते ।।१६।।
उच्चाटन पदान्तं च अस्त्रमष्टोत्तरं शतम् ।
तर्पयेद्भानुवारे यो निशायां लवणांबुना ।।१७।।
त्रिदिनादिकमन्त्रांते उच्चाटनमथो भवेत् ।
भौमे रात्रौ तथा नग्नो हनुमन् मूलमृत्तिकाम् ।।१८।।
नग्नेन संग्रहीत्वा तु स्पष्ट वाचाष्टोत्तरं जपेत् ।
समांशं च प्रेतभस्म शल्यचूर्णे समांशकम् ।।१९।।
यस्य मूर्ध्नि क्षिपेत्सद्यः काकवद्-भ्रमतेमहीम् ।
विप्रचाण्डालयोः शल्यं चिताभस्म तथैव च ।।२०।।
हनुमन्मूलमृद्ग्राह्या बध्वा प्रेतपटेन तु ।
गृहे वा ग्राममध्ये वा पत्तने रणमध्यमे ।।२१।।
निक्षिपेच्छत्रुगर्तेषु सद्यश्चोच्चाटनं भवेत् ।
तडागे स्थापयित्वा तु जलदारिद्यमाप्नुयात् ।।२२।।
मारणं संप्रवक्ष्यामि तवाहं श्रृणु सुव्रते ।
नरास्थिलेखनीं कृत्वा चिताङ्गारं च कज्जलम् ।।२३।।
प्रेतवस्त्रे लिखेदस्त्रं गर्त्त कृत्वा समुत्तमम् ।
श्मशाने निखनेत्सद्यः सहस्त्राद्रिपुमारणे ।।२४।।
न कुर्याद्विप्रजातिभ्यो मारणं मुक्तिमिच्छता ।
देवानां ब्राह्मणानां च गवां चैव सुरेश्वरि ।।२५।।
उपद्रवं न कुर्वीत द्वेषबुद्धया कदाचन ।
प्रयोक्तव्यं तथान्येषां न दोषो मुनिरब्रवीत् ।।२६।।
।। इति सुदर्शन-संहिताया आञ्नेयास्त्रम् ।।
स्तोत्र का मूल भाव (Essence of the Stotra)
आग्नेय स्तोत्र में अग्नि देव के दिव्य, तेजोमय और कल्याणकारी स्वरूप का बहुत ही लयबद्ध और ऊर्जावान वंदन किया गया है। इस स्तोत्र में साधक अग्नि देव से प्रार्थना करता है:
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“हे सप्तजिह्वा (सात जीभों वाले) अग्नि देव! हे वैश्वानर! हे हव्यवाहन! मैं आपके तेजोमय स्वरूप को प्रणाम करता हूँ।”
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“हे अंधकार के नाशक! मेरे जीवन की अज्ञानता, दरिद्रता, और रोगों को अपनी पवित्र ज्वालाओं में भस्म कर दें।”
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“हे देवताओं के दूत! मेरे द्वारा किए गए शुभ कर्मों को देवताओं तक पहुँचाएं और मुझे अजेय तेज, बल और आरोग्य प्रदान करें।”
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“हे सुवर्ण के समान कांति वाले देव! मेरे घर के सभी वास्तु दोषों और नकारात्मक शक्तियों को जलाकर राख कर दें।”
जब कोई साधक शुद्ध मन और स्पष्ट उच्चारण के साथ संस्कृत में इस स्तोत्र का गान करता है, तो उसके शरीर के ‘मणिपूर चक्र’ (Solar Plexus Chakra – नाभि का चक्र, जिसका तत्व अग्नि है) में असीम ऊर्जा का संचार होने लगता है।
आग्नेय स्तोत्र के अचूक और अकल्पनीय लाभ (Benefits of Agneya Stotra)
अग्नि का स्वभाव है ‘ऊर्ध्वगामी’ होना (हमेशा ऊपर की ओर उठना)। जो व्यक्ति आग्नेय स्तोत्र का नियमित पाठ करता है, उसका जीवन भी अग्नि की लपटों की तरह हमेशा ऊपर की ओर (प्रगति की ओर) ही उठता है। आइए इसके चमत्कारी लाभों को विस्तार से जानें:
1. भयंकर दरिद्रता का नाश और अपार ऐश्वर्य की प्राप्ति
अग्नि देव को वेदों में ‘रत्नधातमम्’ (रत्नों को धारण करने वाला और देने वाला) कहा गया है। सोना (Gold) अग्नि का ही स्वरूप माना जाता है। जब घर में आर्थिक तंगी हो, व्यापार ठप पड़ गया हो, और कर्ज़ का बोझ बढ़ रहा हो, तो आग्नेय स्तोत्र का पाठ दरिद्रता रूपी कचरे को भस्म कर देता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति के भीतर नई ऊर्जा आती है और वह धन कमाने के नए अवसर अपनी ओर आकर्षित करने लगता है।
2. रोगों से अकल्पनीय मुक्ति और जठराग्नि की शुद्धि (Health Benefits)
आयुर्वेद के अनुसार, शरीर की सभी बीमारियों (जैसे पेट के रोग, मोटापा, आलस्य, त्वचा के रोग) का मूल कारण शरीर की ‘अग्नि’ (Digestive Fire) का मंद पड़ जाना है। जब जठराग्नि मंद होती है, तो शरीर में विष (Toxins) बनने लगते हैं। आग्नेय स्तोत्र का सस्वर पाठ शरीर के मणिपूर चक्र को जाग्रत करता है, जिससे पाचन तंत्र मजबूत होता है, रक्त शुद्ध होता है और पुराने से पुराने रोग नष्ट होने लगते हैं। यह स्तोत्र दीर्घायु और आरोग्य प्रदान करता है।
3. वास्तु दोष (Vastu Dosh) और विशेषकर ‘आग्नेय कोण’ के दोष का निवारण
वास्तु शास्त्र में दक्षिण-पूर्व (South-East) दिशा को ‘आग्नेय कोण’ कहा जाता है, जिसके स्वामी स्वयं अग्नि देव हैं। यदि आपके घर के आग्नेय कोण में कोई वास्तु दोष है (जैसे वहाँ पानी का टैंक हो, शौचालय हो, या वह कोना कटा हुआ हो), तो घर में हमेशा कलह, धन की हानि और महिलाओं का स्वास्थ्य खराब रहता है। इस घर के आग्नेय कोण में खड़े होकर या वहाँ दीपक जलाकर आग्नेय स्तोत्र का पाठ करने से भयंकर से भयंकर वास्तु दोष का प्रभाव स्वतः ही नष्ट हो जाता है।
4. तेज, ओज और असीम आत्मविश्वास (Self-Confidence) की प्राप्ति
जिन लोगों में आत्मविश्वास की कमी होती है, जिन्हें भीड़ में बोलने से डर लगता है, या जो हीन भावना (Inferiority Complex) के शिकार होते हैं, उनके भीतर ‘अग्नि तत्व’ कमज़ोर होता है। आग्नेय स्तोत्र व्यक्ति के भीतर सोई हुई ऊर्जा (Fire) को भड़का देता है। इसका पाठ करने वाले व्यक्ति के चेहरे पर एक दिव्य तेज (Aura) आ जाता है। उसकी वाणी में इतना प्रभाव आ जाता है कि लोग उसे ध्यान से सुनने पर विवश हो जाते हैं।
5. तंत्र-मंत्र, ऊपरी बाधाओं और काले जादू से पूर्ण रक्षा
अग्नि सबसे बड़ी ‘प्यूरीफायर’ (Purifier) है। जिस घर में रोज़ाना आग्नेय स्तोत्र का पाठ होता है, वहाँ के वातावरण में इतनी तेज़ सकारात्मक ऊर्जा फैल जाती है कि कोई भी नकारात्मक शक्ति (Negative Entity), भूत-प्रेत या किसी का किया हुआ तांत्रिक प्रयोग (Black Magic) वहां टिक नहीं सकता। यह स्तोत्र घर के चारों ओर एक ‘अग्नि-कवच’ का निर्माण कर देता है।
6. जन्म-जन्मांतर के पापों का भस्मीकरण
जैसे आग में डालने पर कचरा जलकर राख हो जाता है और सोना निखर कर बाहर आता है, वैसे ही आग्नेय स्तोत्र के पाठ से मनुष्य द्वारा जाने-अनजाने में किए गए सभी पाप भस्म हो जाते हैं। ज्ञानाग्नि जाग्रत होने से मनुष्य का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है और वह मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होता है।
आग्नेय स्तोत्र की प्रामाणिक वैदिक पाठ और अर्चन विधि (Authentic Puja Vidhi)
अग्नि देव अत्यंत पवित्र और जाग्रत देवता हैं। इसलिए आग्नेय स्तोत्र का पाठ करते समय शुद्धता और विधि का विशेष ध्यान रखना चाहिए। पूर्ण फल प्राप्ति के लिए शास्त्रों में बताई गई इस प्रामाणिक विधि का पालन करें:
1. उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त (Best Time)
अग्नि देव की आराधना के लिए रविवार (Sunday) और मंगलवार (Tuesday) का दिन सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। कृतिका नक्षत्र (जिसके स्वामी अग्नि हैं) के दिन भी इसका पाठ अत्यंत फलदायी होता है। पाठ का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल (सूर्योदय का समय) होता है। यदि आप इसे हवन (अग्निहोत्र) के साथ कर रहे हैं, तो इसका प्रभाव लाखों गुना बढ़ जाता है।
2. वस्त्र, दिशा और आसन का विधान
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वस्त्र: स्नानादि से निवृत्त होकर पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाएं। अग्नि देव को लाल, पीला और केसरिया रंग अत्यंत प्रिय है। पाठ के समय लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करना उत्तम है।
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दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव पूर्व (East) या दक्षिण-पूर्व (South-East / आग्नेय कोण) दिशा की ओर रखें।
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आसन: बैठने के लिए लाल रंग के ऊनी आसन या कुशा के आसन का प्रयोग करें।
3. पूजन सामग्री और अग्नि स्थापना (दीपक का महत्व)
बिना अग्नि प्रज्वलित किए आग्नेय स्तोत्र का पाठ नहीं करना चाहिए। एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। चौकी के ऊपर एक तांबे या पीतल के दीये में गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। यदि संभव हो तो मिट्टी के एक पात्र में गाय के गोबर का कंडा जलाकर छोटी सी साक्षात अग्नि प्रज्वलित करें। अग्नि देव को लाल चंदन (रक्त चंदन), कुमकुम, लाल पुष्प (गुड़हल या गुलाब) और अक्षत अर्पित करें।
4. दृढ़ संकल्प (Sankalpa)
दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत और एक लाल फूल लें। अपना नाम, गोत्र और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य (जैसे- “हे अग्नि देव, मैं अपने शरीर के अमुक रोग से मुक्ति, धन प्राप्ति, या घर के वास्तु दोष निवारण के लिए आपके आग्नेय स्तोत्र का 21/41 दिन तक पाठ करूँगा”) बोलें। फिर उस जल को धरती पर छोड़ दें।
5. स्तोत्र का पाठ और ध्यान (Chanting Method)
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सर्वप्रथम भगवान गणेश (“ॐ गं गणपतये नमः”) और अपने गुरु को प्रणाम करें।
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इसके बाद दीपक की लौ (Flame) की ओर देखते हुए (त्राटक करते हुए) पूर्ण एकाग्रता और ऊर्जा के साथ ‘आग्नेय स्तोत्र’ का पाठ आरंभ करें।
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यदि आप हवन कर रहे हैं, तो स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक के अंत में ‘स्वाहा’ बोलकर गाय के घी की आहुति अग्नि में दें।
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प्रतिदिन अपनी क्षमता और संकल्प के अनुसार इसका 1, 3, 5 या 11 बार पाठ करें।
6. क्षमा प्रार्थना और भोग (नैवेद्य)
पाठ पूर्ण होने के बाद अग्नि देव को बताशे, गुड़, घी, या किसी भी सात्विक मिठाई का भोग (दीपक की लौ में या हवन कुंड में आहुति देकर) अर्पित करें। अंत में क्षमा प्रार्थना करें कि “हे अग्नि देव, मन्त्र या उच्चारण में यदि कोई भूल हुई हो तो मुझे क्षमा करें।”
अग्नि साधना के अत्यंत कठोर नियम और सावधानियां (Strict Rules)
अग्नि देव साक्षात परब्रह्म का तेज़ हैं। अग्नि का कभी अपमान नहीं करना चाहिए। आग्नेय स्तोत्र का पाठ करने वाले साधक को इन नियमों का कठोरता से पालन करना चाहिए:
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अग्नि का सम्मान: कभी भी जलती हुई अग्नि या दीपक को अपने मुंह की फूंक मारकर न बुझाएं। यह अग्नि देव का घोर अपमान है। दीपक को स्वयं शांत होने दें या किसी पुष्प/पत्ते से हवा करके बुझाएं।
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पवित्रता: आग में कभी भी कचरा, जूठा भोजन या अपवित्र वस्तुएं न डालें।
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सात्विक आहार: अनुष्ठान के दिनों में पूर्ण सात्विक भोजन ग्रहण करें। मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज का पूर्णतः त्याग कर दें, क्योंकि ये पेट की जठराग्नि को दूषित करते हैं।
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ब्रह्मचर्य: संकल्प अवधि के दौरान शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करें।
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क्रोध पर नियंत्रण: चूँकि इस पाठ से शरीर में ‘अग्नि तत्व’ (गर्मी) बढ़ता है, इसलिए आपको अचानक बहुत क्रोध आ सकता है। आपको अपने क्रोध पर पूर्ण नियंत्रण रखना होगा, अन्यथा साधना का पूरा फल नष्ट हो जाएगा।
Agneya Stotra केवल कुछ संस्कृत श्लोकों का संकलन नहीं है; यह उस अनंत ज्वाला को अपने भीतर प्रज्वलित करने का विज्ञान है जो इस पूरे ब्रह्मांड को रोशन किए हुए है। जब जीवन की परेशानियां आपको अंदर से ठंडा और निराश कर दें, जब ऐसा लगे कि अब आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं बचा है, तब आग्नेय स्तोत्र आपके भीतर एक नए सूर्य का उदय करता है।
सनातन धर्म की इस प्राचीन विद्या को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। जब आप पूर्ण श्रद्धा और पवित्रता के साथ अग्नि देव के इस स्तोत्र का गान करते हैं, तो आपके जीवन के सभी वास्तु दोष, रोग, दरिद्रता और भय सदा के लिए भस्म हो जाते हैं। आपके व्यक्तित्व में एक ऐसा चुंबकीय तेज और ओज आ जाता है कि सफलता स्वयं आपके कदम चूमने लगती है। अपने भीतर की ज्वाला को जाग्रत करें और विजय की ओर बढ़ें। ॐ अग्नये नमः!
आग्नेय स्तोत्र: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. आग्नेय स्तोत्र का पाठ मुख्य रूप से किस देवता को समर्पित है?
आग्नेय स्तोत्र मुख्य रूप से ‘अग्नि देव’ (Fire God) को समर्पित है, जो ऋग्वेद के प्रमुख देवता हैं और देवताओं के दूत (मुख) माने जाते हैं। यह स्तोत्र अग्नि देव की ब्रह्मांडीय ऊर्जा, तेज और पवित्रता की स्तुति करता है।
2. आग्नेय स्तोत्र का पाठ करने का सबसे शुभ दिन और समय कौन सा है?
अग्नि देव की आराधना के लिए रविवार (Sunday) और मंगलवार (Tuesday) का दिन सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। इस स्तोत्र का पाठ प्रातःकाल (सूर्योदय के समय) पूर्व दिशा या आग्नेय कोण की ओर मुख करके करना सबसे अधिक फलदायी होता है।
3. घर के वास्तु दोष में आग्नेय स्तोत्र कैसे सहायक है?
वास्तु शास्त्र के अनुसार घर की दक्षिण-पूर्व (South-East) दिशा को ‘आग्नेय कोण’ कहा जाता है। यदि इस दिशा में कोई वास्तु दोष (जैसे वहां शौचालय या पानी का स्रोत होना) है, तो घर के आग्नेय कोण में गाय के घी का दीपक जलाकर इस स्तोत्र का पाठ करने से अग्नि तत्व संतुलित होता है और भयंकर वास्तु दोष का प्रभाव शांत हो जाता है।
4. क्या इस स्तोत्र से स्वास्थ्य संबंधी (Health) लाभ भी मिलते हैं?
जी हाँ, बिल्कुल! आयुर्वेद के अनुसार सभी रोगों का कारण ‘जठराग्नि’ (Digestive fire) का कमज़ोर होना है। आग्नेय स्तोत्र का पाठ शरीर के ‘मणिपूर चक्र’ (नाभि चक्र) को जाग्रत करता है, जिससे पाचन तंत्र मजबूत होता है, रक्त शुद्ध होता है और पुराने से पुराने रोग नष्ट होने लगते हैं।
5. क्या महिलाएं भी आग्नेय स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?
हाँ, सनातन धर्म में महिलाएं भी पूर्ण सात्विकता और पवित्रता के साथ अग्नि देव के इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं। केवल मासिक धर्म (Periods) के दौरान पूजा कक्ष में जाने, दीपक प्रज्वलित करने और सस्वर पाठ करने से बचना चाहिए; उस दौरान वे मानसिक रूप से इष्ट का ध्यान कर सकती हैं।