नवग्रहों (Nine Planets) के मंत्रिमंडल में सेनापति का दर्जा प्राप्त भगवान ‘मंगल’ (Mars) ऊर्जा, साहस, पराक्रम, रक्त (Blood), और भूमि (Property) के अधिपति हैं। ज्योतिष और वैदिक शास्त्रों में मंगल को अत्यंत उग्र और ‘क्रूर ग्रह’ माना गया है, परंतु वे ही सबसे बड़े रक्षक और ‘ऋणहर्ता’ (कर्ज मिटाने वाले) भी हैं। जब जन्म कुंडली में मंगल नीच का हो, पापी ग्रहों के साथ हो, या ‘मांगलिक दोष’ (Mangal Dosh) बना रहा हो, तो व्यक्ति का जीवन कर्ज, बीमारियों, क्रोध, दुर्घटनाओं और दांपत्य जीवन के कलह से घिर जाता है।
जब ऐसा प्रतीत हो कि मेहनत करने के बावजूद कर्ज का पहाड़ बढ़ता ही जा रहा है, विवाह में लगातार बाधाएं आ रही हैं, और जीवन में हर ओर शत्रु खड़े हैं, तब शास्त्रों में वर्णित ‘अंगारक स्तोत्रम्’ (Angarak Stotram) एक संजीवनी बूटी का कार्य करता है। ‘अंगारक’ मंगल देव का ही एक प्रचंड नाम है, जिसका अर्थ है— ‘दहकते हुए अंगारे के समान लाल और तेजस्वी’।
इस अत्यंत विस्तृत, आध्यात्मिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम जानेंगे कि अंगारक (मंगल देव) का जन्म कैसे हुआ, Angarak Stotra Lyrics in Sanskrit के पाठ का मूल रहस्य क्या है, इसके पाठ से भारी कर्ज और मंगल दोष से कैसे मुक्ति मिलती है, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक वैदिक विधि क्या है।
अंगारक (मंगल देव) का प्राकट्य और उनका ‘भूमि पुत्र’ स्वरूप
अंगारक स्तोत्र की शक्ति को समझने के लिए हमें मंगल देव की उत्पत्ति के रहस्य को जानना होगा। स्कंद पुराण और ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार, एक बार भगवान शिव ‘अंधकासुर’ नामक भयंकर राक्षस के साथ युद्ध कर रहे थे। युद्ध अत्यंत भीषण था और भगवान शिव के मस्तक से पसीने की एक बूंद छलक कर पृथ्वी (भूमि) पर गिर पड़ी।
उस पसीने की बूंद के धरती पर गिरते ही एक अत्यंत तेजस्वी, लाल वर्ण (रंग) वाले बालक का जन्म हुआ। चूँकि इस बालक का जन्म भूमि (पृथ्वी माता) के गर्भ से हुआ था, इसलिए इन्हें ‘भौम’ और ‘भूमि-पुत्र’ कहा गया। इस बालक ने काशी (वाराणसी) में भगवान शिव की घोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर महादेव ने इन्हें नवग्रहों में ‘मंगल’ (Mangal) का पद प्रदान किया।
अंगार (आग) के समान लाल और उग्र होने के कारण इन्हें ‘अंगारक’ कहा गया, और बुराइयों को नष्ट कर जीवन में मंगल (शुभता) लाने के कारण इन्हें ‘मंगल’ कहा गया। इसलिए, जो भी साधक अंगारक स्तोत्र का पाठ करता है, उस पर साक्षात शिव और पृथ्वी माता दोनों की कृपा होती है।
अंगारक स्तोत्रम् (संस्कृत) | Angarak Stotra Lyrics in Sanskrit (स्तोत्र का मूल भाव और शक्ति)
Angaraka Stotram | अंगारक स्तोत्रम् हिंदी
अंगारकः शक्तिधरो लोहितांगो धरासुतः ।
कुमारो मंगलो भौमो महाकायो धनप्रदः ॥१॥
ऋणहर्ता दृष्टिकर्ता रोगकृत् रोगनाशनः ।
विद्युत्प्रभो व्रणकरः कामदो धनहृत् कुजः ॥२॥
सामगानप्रियो रक्तवस्त्रो रक्तायतेक्षणः।
लोहितो रक्तवर्णश्च सर्वकर्मावबोधकः ॥३॥
रक्तमाल्यधरो हेमकुण्डली ग्रहनायकः ।
नामान्येतानि भौमस्य यः पठेत् सततं नरः ॥४॥
ऋणं तस्य च दौर्भाग्यं दारिद्र्यं च विनश्यति ।
धनं प्राप्नोति विपुलं स्त्रियं चैव मनोरमाम् ॥५॥
वंशोद्योतकरं पुत्रं लभते नात्र संशयः,
योऽर्चयेदह्नि भौमस्य मङ्गलं बहुपुष्पकैः ।
सर्वं नश्यति पीडा च तस्य ग्रहकृता ध्रुवम् ॥६॥