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Jagannath Rath Yatra 2026: क्या आप जानते हैं भगवान जगन्नाथ हर साल मौसी के घर क्यों जाते हैं?It takes 13 minutes... to read this article !

भारत आस्था, परंपराओं और भव्य उत्सवों की पुण्य भूमि है। जब भी हिंदू धर्म के सबसे विशाल और रहस्यमयी त्योहारों का जिक्र होता है, तो ओडिशा के पुरी (Puri) शहर की ‘श्री जगन्नाथ रथयात्रा’ का नाम सबसे ऊपर आता है। यह पूरी दुनिया का एकमात्र ऐसा उत्सव है जिसमें भगवान स्वयं अपने भव्य मंदिर (गर्भगृह) से बाहर निकलते हैं और आम जनता को दर्शन देने के लिए सड़क पर आ जाते हैं।

सनातन पंचांग के अनुसार, इस साल 16 जुलाई 2026 (गुरुवार) को आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर पुरी की यह विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा निकाली जाएगी। इस दिन ब्रह्मांड के स्वामी भगवान जगन्नाथ (श्री कृष्ण), उनके बड़े भाई बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा तीन अलग-अलग विशालकाय रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकलेंगे।

जो भी व्यक्ति पुरी की रथयात्रा के बारे में थोड़ा बहुत भी जानता है, उसे यह पता होता है कि भगवान अपने मुख्य मंदिर से निकलकर 3 किलोमीटर दूर स्थित ‘गुंडिचा मंदिर’ जाते हैं और वहां 9 दिनों तक ठहरते हैं। इस गुंडिचा मंदिर को स्थानीय लोग और भक्त ‘मौसी मां का घर’ (Aunt’s House) कहते हैं।

लेकिन, क्या आपके मन में कभी यह सवाल आया है कि “Jagannath Rath Yatra 2026: क्या आप जानते हैं भगवान जगन्नाथ हर साल मौसी के घर क्यों जाते हैं?” आखिर ये ‘मौसी’ कौन हैं? भगवान को अपना इतना बड़ा मंदिर छोड़कर 9 दिनों के लिए मौसी के घर जाने की आवश्यकता क्यों पड़ती है?

इस प्रामाणिक और विस्तृत लेख में हम जगन्नाथ रथयात्रा से जुड़े इसी सबसे बड़े रहस्य, रानी गुंडिचा की पौराणिक कथा और मौसी के घर होने वाले 9 दिनों के अद्भुत अनुष्ठानों के बारे में विस्तार से जानेंगे।

1. भगवान जगन्नाथ की ‘मौसी’ कौन हैं? (Who is Queen Gundicha?)

इससे पहले कि हम यह जानें कि भगवान वहां क्यों जाते हैं, हमें यह जानना होगा कि यह ‘मौसी’ आखिर हैं कौन।

भगवान जगन्नाथ की इस ‘मौसी’ का वास्तविक नाम रानी गुंडिचा (Queen Gundicha) था। रानी गुंडिचा मालवा प्रदेश के महान राजा ‘इंद्रद्युम्न’ की पत्नी थीं। राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे और पुराणों के अनुसार, उन्होंने ही पुरी में भगवान जगन्नाथ के इस मूल और भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था।

रानी गुंडिचा भी भगवान जगन्नाथ के प्रति असीम भक्ति रखती थीं। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र जी और सुभद्रा जी की मूर्तियों के निर्माण से लेकर मंदिर की स्थापना तक, रानी गुंडिचा ने एक मां की तरह निस्वार्थ भाव से सेवा की थी। उनकी इसी निस्वार्थ भक्ति और वात्सल्य (Motherly love) के कारण भगवान जगन्नाथ ने रानी गुंडिचा को अपनी ‘मौसी’ (Mausi) का दर्जा दिया था। मुख्य मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर दूर स्थित जिस स्थान पर रानी गुंडिचा ने भगवान की मूर्तियों का निर्माण करवाया था, उसी जगह पर आज ‘गुंडिचा मंदिर’ (Gundicha Temple) स्थित है।

2. आखिर मौसी के घर क्यों जाते हैं भगवान जगन्नाथ? (The Core Legend)

“Jagannath Rath Yatra 2026: क्या आप जानते हैं भगवान जगन्नाथ हर साल मौसी के घर क्यों जाते हैं?” — इस प्रश्न का उत्तर स्कंद पुराण और उत्कल खंड की एक अत्यंत भावुक और रहस्यमयी कथा में छिपा है।

मूर्तियों के निर्माण की शर्त और रानी की गलती

कथा के अनुसार, जब राजा इंद्रद्युम्न को समुद्र में एक दिव्य लकड़ी (दारु) मिली, तो उन्होंने उसी लकड़ी से भगवान की मूर्तियां बनवाने का निश्चय किया। देवताओं के शिल्पी भगवान विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई (Carpenter) का रूप धारण करके आए और उन्होंने मूर्तियां बनाने का जिम्मा लिया।

वृद्ध बढ़ई ने राजा के सामने एक कड़ी शर्त रखी— “मैं एक बंद कमरे के अंदर मूर्तियां बनाऊंगा। जब तक मूर्तियां पूरी नहीं बन जातीं, यानी 21 दिनों तक, कोई भी इस कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा। यदि किसी ने दरवाजा खोला, तो मैं काम अधूरा छोड़कर चला जाऊंगा।”

राजा ने शर्त मान ली। कई दिनों तक बंद कमरे के अंदर से आरी और हथौड़े की आवाजें आती रहीं। लेकिन 14वें दिन अचानक अंदर से आवाजें आनी बंद हो गईं। रानी गुंडिचा को घबराहट होने लगी कि कहीं उस बूढ़े बढ़ई को बिना खाए-पिए कुछ हो तो नहीं गया। अपने वात्सल्य और चिंता के कारण रानी गुंडिचा ने राजा इंद्रद्युम्न से जिद करके कमरे का दरवाजा खुलवा दिया।

भगवान का अधूरा स्वरूप

दरवाजा खुलते ही वह वृद्ध बढ़ई (विश्वकर्मा) वहां से अंतर्धान (गायब) हो गए। कमरे में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां रखी थीं, लेकिन वे अधूरी थीं। उनके हाथ-पैर और पंजे पूरी तरह से नहीं बने थे।

अपनी गलती के कारण भगवान का ऐसा अधूरा स्वरूप देखकर रानी गुंडिचा रोने लगीं और गहरी आत्मग्लानि में डूब गईं। उन्होंने खाना-पीना छोड़ दिया। तब भगवान जगन्नाथ ने राजा और रानी को दर्शन दिए और कहा कि— “आप शोक न करें। मेरी यही इच्छा थी। कलियुग में मैं अपने इसी रूप में भक्तों द्वारा पूजा जाऊंगा।”

रानी गुंडिचा को दिया गया ईश्वरीय वचन

रानी गुंडिचा भगवान के इस वात्सल्य से बहुत भावुक हुईं, लेकिन उनके मन में एक पीड़ा रह गई। तब उन्होंने भगवान से एक वरदान मांगा— “हे प्रभु! आपने हमारे बनाए इस मंदिर को अपना निवास तो बना लिया है, लेकिन मेरी इच्छा है कि आप वर्ष में कम से कम एक बार मेरे घर (जन्म स्थान) भी आएं और मेरा आतिथ्य स्वीकार करें।”

भगवान जगन्नाथ ने मुस्कुराकर अपनी परम भक्त रानी गुंडिचा को ‘मौसी’ कहकर पुकारा और उन्हें वचन दिया— “हे मौसी! मैं हर साल आषाढ़ मास में अपने बड़े भाई और बहन के साथ तुम्हारे घर (गुंडिचा मंदिर) आऊंगा और पूरे 9 दिनों तक वहीं विश्राम करूंगा।”

बस, इसी वचन और अपनी मौसी के निस्वार्थ प्रेम को निभाने के लिए ब्रह्मांड के स्वामी भगवान जगन्नाथ हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को अपना विशाल मंदिर छोड़कर रथ पर सवार होकर ‘गुंडिचा मंदिर’ जाते हैं।

3. बहन सुभद्रा की इच्छा: रथयात्रा का एक और कारण

मौसी के घर जाने के अलावा रथयात्रा से जुड़ी एक और बहुत ही सुंदर कथा है, जो भाई-बहन के प्रेम को दर्शाती है।

द्वापर युग में एक बार श्री कृष्ण (जगन्नाथ) और बलराम (बलभद्र) की लाड़ली बहन सुभद्रा ने अपने भाइयों से द्वारका नगरी (जिसे पुरी माना जाता है) के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की। अपनी बहन की इस इच्छा को पूरा करने के लिए दोनों भाइयों ने एक भव्य रथ तैयार करवाया।

उन्होंने सुभद्रा जी को बीच के रथ में बिठाया और खुद उनके आगे-पीछे के रथों में बैठकर उन्हें पूरे नगर का भ्रमण कराया। नगर घूमते हुए वे अपनी मौसी के घर भी गए। उसी प्राचीन भाई-बहन के प्रेम और परंपरा को जीवित रखने के लिए आज भी हर साल तीनों को रथों में बिठाकर नगर भ्रमण कराया जाता है और मौसी के घर ले जाया जाता है।

4. गुंडिचा मंदिर: भगवान जगन्नाथ की जन्मस्थली (The Aunt’s House)

मुख्य जगन्नाथ मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर वास्तुकला का एक अद्भुत नमूना है। यह मंदिर साल के 356 दिन लगभग सूना रहता है, लेकिन आषाढ़ महीने के इन 9 दिनों में यह पृथ्वी का सबसे जाग्रत और पवित्र स्थान बन जाता है।

  • आड़प मंडप (Adapa Mandap): गुंडिचा मंदिर के अंदर स्थित उस विशेष चबूतरे को ‘आड़प मंडप’ या ‘जन्म वेदी’ कहा जाता है, जहां भगवान की मूर्तियों का निर्माण हुआ था। रथयात्रा के दौरान भगवान इन्ही 9 दिनों तक इसी मंडप पर विराजमान होते हैं।

  • पाप नाशक दर्शन: स्कंद पुराण के अनुसार, जो भक्त गुंडिचा मंदिर में ‘आड़प मंडप’ पर विराजमान भगवान जगन्नाथ के दर्शन कर लेता है, उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे सीधे मोक्ष (बैकुंठ) की प्राप्ति होती है। इसे ‘आड़प दर्शन’ कहा जाता है।

  • गुंडिचा मार्जन: रथयात्रा से ठीक एक दिन पहले भगवान के स्वागत के लिए गुंडिचा मंदिर की साफ-सफाई की जाती है। सैकड़ों भक्त अपने हाथों से पानी और झाड़ू लेकर मंदिर को धोते हैं। इसे ‘गुंडिचा मार्जन’ कहते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस परंपरा को विशेष महत्व दिया था। यह हमारे मन की सफाई का भी प्रतीक है।

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5. मौसी के घर के 9 दिन: खास भोग और परंपराएं (The 9 Days at Mausi’s House)

जब हम अपने ननिहाल या मौसी के घर जाते हैं, तो वहां हमारा बहुत लाड़-प्यार होता है और हमें हमारे पसंदीदा पकवान खाने को मिलते हैं। भगवान जगन्नाथ के साथ भी बिल्कुल ऐसा ही होता है!

‘पोड़ा पीठा’ का विशेष भोग (Poda Pitha)

मौसी के घर 9 दिनों तक भगवान को कोई साधारण भोग नहीं लगता। इन 9 दिनों में भगवान जगन्नाथ को उनका सबसे पसंदीदा व्यंजन ‘पोड़ा पीठा’ (Poda Pitha) खिलाया जाता है। यह चावल, गुड़, नारियल, इलायची और घी से बना एक विशेष प्रकार का पारंपरिक ओडिया पैनकेक (Pancake) होता है, जिसे धीमी आंच पर बेक करके बनाया जाता है। मान्यता है कि रानी गुंडिचा भगवान के लिए अपने हाथों से यह पीठा बनाती थीं, इसलिए आज भी यह परंपरा निभाई जाती है।

हेरा पंचमी: जब माता लक्ष्मी हो जाती हैं क्रोधित (Hera Panchami)

मौसी के घर भगवान के प्रवास के दौरान 5वें दिन एक बहुत ही रोचक और मधुर घटना होती है, जिसे ‘हेरा पंचमी’ (Hera Panchami) कहा जाता है। साल 2026 में यह रस्म 20 जुलाई को निभाई जाएगी।

जब भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ मौसी के घर चले जाते हैं, तो उनकी पत्नी माता लक्ष्मी मुख्य मंदिर में अकेली रह जाती हैं। भगवान उन्हें साथ नहीं ले जाते। 5 दिन बीत जाने के बाद माता लक्ष्मी का धैर्य टूट जाता है और वे क्रोधित हो जाती हैं।

वे एक सजी हुई पालकी में बैठकर भगवान को ढूंढते हुए (हेरा का अर्थ है देखना/ढूंढना) गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं। वहां जाकर वे देखती हैं कि भगवान अपनी मौसी के घर बहुत आनंद से हैं और पोड़ा पीठा खा रहे हैं। यह देखकर माता लक्ष्मी का गुस्सा और बढ़ जाता है। गुस्से में आकर माता लक्ष्मी के सेवक भगवान जगन्नाथ के रथ (नंदीघोष) का एक हिस्सा या पहिया तोड़ देते हैं। इसके बाद माता लक्ष्मी एक गुप्त रास्ते से बिना भगवान से मिले वापस मुख्य मंदिर लौट जाती हैं।

यह रस्म दांपत्य जीवन (Marital life) की मीठी नोकझोंक और रूठने-मनाने की मानवीय भावनाओं को दर्शाती है। यह सिद्ध करता है कि भगवान भी मानवीय भावनाओं से अछूते नहीं हैं।

6. बाहुड़ा यात्रा: घर वापसी का सफर (The Return Journey – Bahuda Yatra)

मौसी के घर 9 दिन के शानदार आतिथ्य और विश्राम के बाद, आषाढ़ शुक्ल दशमी के दिन भगवान की वापसी की यात्रा शुरू होती है।

  • बाहुड़ा यात्रा (24 जुलाई 2026): इस दिन तीनों देवता अपने-अपने रथों (नंदीघोष, तालध्वज और दर्पदलन) पर सवार होकर वापस मुख्य जगन्नाथ मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। इसे ‘रिटर्न जर्नी’ (Return Journey) कहा जाता है।

  • मौसी मां का दर्शन: लौटते समय रास्ते में भगवान जगन्नाथ का रथ ‘मौसी मां मंदिर’ (अर्धासिनी मंदिर) के पास थोड़ी देर के लिए रुकता है। यहां भगवान अपनी मौसी (अर्धासिनी) के हाथों से बना ‘पोड़ा पीठा’ एक बार फिर ग्रहण करते हैं।

  • सुना बेश (Suna Besha – 25 जुलाई 2026): बाहुड़ा यात्रा के बाद भगवान तुरंत मंदिर के अंदर नहीं जाते। एकादशी के दिन रथों पर ही भगवान को कई सौ किलो शुद्ध सोने के भारी आभूषणों (स्वर्ण वेश) से सजाया जाता है। इस राजशाही रूप को देखने के लिए लाखों की भीड़ उमड़ती है।

नीलाद्री बीजे: माता लक्ष्मी को मनाना (Niladri Bije)

अंत में जब भगवान वापस अपने गर्भगृह में प्रवेश (नीलाद्री बीजे) करने जाते हैं, तो उनके सामने एक और संकट खड़ा हो जाता है। गुस्साई हुई माता लक्ष्मी मंदिर के द्वार (जय-विजय द्वार) अंदर से बंद कर लेती हैं और भगवान जगन्नाथ को अंदर आने नहीं देतीं। भगवान और माता लक्ष्मी के बीच सेवकों के माध्यम से संवाद (मीठी नोकझोंक) होता है।

अंततः माता लक्ष्मी का क्रोध शांत करने और उन्हें मनाने के लिए भगवान जगन्नाथ उन्हें मीठा ‘रसगुल्ला’ (Rasgulla) भेंट करते हैं। रसगुल्ला पाकर माता लक्ष्मी प्रसन्न हो जाती हैं और मंदिर के द्वार खोल देती हैं। इसके बाद भगवान अपने रत्न सिंहासन पर विराजमान हो जाते हैं। (यही कारण है कि नीलाद्री बीजे के दिन को ओडिशा में ‘रसगुल्ला दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है।)

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7. रथयात्रा 2026: क्या है इसका गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व?

“Jagannath Rath Yatra 2026: क्या आप जानते हैं भगवान जगन्नाथ हर साल मौसी के घर क्यों जाते हैं?” — इस पूरी कथा और यात्रा के पीछे एक बहुत गहरा आध्यात्मिक दर्शन (Spiritual Philosophy) छिपा हुआ है।

  1. ईश्वर का मानवीयकरण (Humanization of God): दुनिया भर के धर्मों में ईश्वर को एक दूर की, सर्वोच्च और डरावनी शक्ति माना गया है। लेकिन जगन्नाथ संस्कृति में ईश्वर हमारे परिवार के एक सदस्य की तरह हैं। वे स्नान करने से बीमार भी पड़ते हैं, काढ़ा भी पीते हैं, मौसी के घर घूमने भी जाते हैं, वहां अपना पसंदीदा मीठा भी खाते हैं, और पत्नी के रूठने पर उसे रसगुल्ला खिलाकर मनाते भी हैं। यह अपनापन भक्त और भगवान के बीच की दूरी को खत्म कर देता है।

  2. समानता का संदेश: भगवान जगन्नाथ (विष्णु) यह संदेश देते हैं कि जब भक्त किसी कारणवश मेरे पास नहीं आ पाता, तो मैं स्वयं उसके पास जाता हूं। रथयात्रा इसलिए निकाली जाती है ताकि वे लोग (बीमार, वृद्ध, या अन्य धर्मों के लोग) जो मंदिर के अंदर नहीं जा सकते, उन्हें सड़क पर भगवान के दर्शन सुलभ हो सकें।

  3. अहंकार का त्याग: पुरी का राजा जब सोने की झाड़ू से रथ का रास्ता साफ करता है (छैरा पहंरा रस्म), तो वह यह साबित करता है कि ईश्वर के दरबार में कोई राजा या रंक नहीं होता। जब लाखों लोग एक साथ रथ खींचते हैं, तो उनके भीतर का ‘मैं’ (अहंकार) नष्ट हो जाता है।

  4. जीवन एक रथ है: कठोपनिषद के अनुसार, यह शरीर एक रथ है, इन्द्रियां घोड़े हैं, और आत्मा उस रथ का रथी है। भगवान का रथ खींचना यह दर्शाता है कि हम अपने जीवन की डोर (लगाम) ईश्वर के हाथों में सौंप रहे हैं।

इस विस्तृत और ज्ञानवर्धक लेख के माध्यम से अब आपके सामने “Jagannath Rath Yatra 2026: क्या आप जानते हैं भगवान जगन्नाथ हर साल मौसी के घर क्यों जाते हैं?” का पूरा रहस्य उजागर हो चुका है।

भगवान जगन्नाथ की गुंडिचा मंदिर (मौसी के घर) की यह यात्रा केवल एक प्राचीन परंपरा नहीं है, बल्कि यह प्रेम, समर्पण और वात्सल्य की जीत है। रानी गुंडिचा का भगवान के प्रति जो निस्वार्थ प्रेम था, उसी प्रेम के वशीभूत होकर ब्रह्मांड के रचयिता हर साल अपना स्वर्ण जड़ित सिंहासन छोड़कर 9 दिनों के लिए एक साधारण रथ पर सवार होकर अपनी मौसी के घर जाते हैं।

यदि आप साल 2026 में 16 जुलाई को होने वाली इस महा-रथयात्रा में शामिल होने का अवसर पाते हैं, तो केवल एक दर्शक बनकर न जाएं। भगवान जगन्नाथ के ‘नंदीघोष’ रथ की रस्सी को जब आप छुएं, तो उस वात्सल्य और प्रेम को महसूस करें जिसके कारण भगवान आज भी सड़क पर उतर आते हैं। गुंडिचा मंदिर में आड़प मंडप के दर्शन करें, यह आपके जीवन को एक नई ऊर्जा, शांति और मोक्ष के मार्ग से भर देगा।

जय जगन्नाथ! जय बलभद्र! जय सुभद्रा!

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. साल 2026 में जगन्नाथ रथयात्रा किस तारीख को निकाली जाएगी?

हिंदू पंचांग के अनुसार, साल 2026 में भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा 16 जुलाई (गुरुवार) को पुरी (ओडिशा) में निकाली जाएगी।

2. भगवान जगन्नाथ की मौसी का असली नाम क्या है?

भगवान जगन्नाथ की ‘मौसी’ का वास्तविक नाम रानी गुंडिचा था। वे मालवा के राजा इंद्रद्युम्न की पत्नी थीं, जिन्होंने भगवान जगन्नाथ के मूल मंदिर का निर्माण करवाया था।

3. भगवान जगन्नाथ मौसी के घर कितने दिन तक रहते हैं?

भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ गुंडिचा मंदिर (मौसी के घर) में पूरे 9 दिनों तक प्रवास (विश्राम) करते हैं।

4. गुंडिचा मंदिर में भगवान जगन्नाथ को कौन सा विशेष भोग लगाया जाता है?

मौसी के घर 9 दिनों के प्रवास के दौरान भगवान जगन्नाथ को उनका पसंदीदा पारंपरिक ओडिया व्यंजन ‘पोड़ा पीठा’ (Poda Pitha) विशेष रूप से खिलाया जाता है।

5. ‘हेरा पंचमी’ क्या है और इस दिन क्या होता है?

रथयात्रा के पांचवें दिन भगवान की पत्नी माता लक्ष्मी उन्हें खोजते हुए गुंडिचा मंदिर आती हैं। भगवान को वहां आनंद में देखकर माता लक्ष्मी क्रोधित हो जाती हैं और गुस्से में भगवान के रथ का एक पहिया तोड़कर वापस लौट जाती हैं। इस रस्म को हेरा पंचमी कहते हैं।

6. बाहुड़ा यात्रा (Bahuda Yatra) 2026 में कब है?

गुंडिचा मंदिर (मौसी के घर) से भगवान जगन्नाथ की मुख्य मंदिर वापसी की यात्रा को बाहुड़ा यात्रा कहते हैं। साल 2026 में यह रिटर्न जर्नी 24 जुलाई (शुक्रवार) को होगी।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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