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Jagannath Temple History: पुरी जगन्नाथ मंदिर का इतिहास: कब और किसने बनवाया था? जानिए रहस्यIt takes 10 minutes... to read this article !

भारत की सनातन संस्कृति और आस्था के प्रमुख केंद्रों में से एक है— ओडिशा के पुरी तट पर स्थित भगवान श्री जगन्नाथ का भव्य मंदिर। यह पवित्र स्थल हिंदुओं के पवित्र ‘चार धाम’ (बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम और पुरी) में से एक है। यहाँ भगवान श्री कृष्ण को ‘जगन्नाथ’ (जगत के नाथ) के रूप में पूजा जाता है, और उनके साथ उनके बड़े भाई बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा भी विराजमान हैं।

“पुरी जगन्नाथ मंदिर का इतिहास: कब और किसने बनवाया था?” यह एक ऐसा प्रश्न है जो इतिहास और पौराणिकता के अद्भुत संगम की ओर ले जाता है। इस मंदिर का निर्माण केवल ईंट और पत्थरों से नहीं, बल्कि युगों पुरानी आस्था, किंवदंतियों और भगवान के प्रति अगाध प्रेम से हुआ है।

इस विस्तृत लेख में हम पुरी जगन्नाथ मंदिर के इतिहास, इसकी उत्पत्ति से जुड़ी पौराणिक कथाओं, इसके ऐतिहासिक निर्माणकर्ताओं (गंगा राजवंश), वास्तुकला, चमत्कारों और विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा के बारे में गहराई से जानेंगे।

1. जगन्नाथ मंदिर की पौराणिक उत्पत्ति और राजा इंद्रद्युम्न की कथा

ऐतिहासिक प्रमाणों से परे, जगन्नाथ मंदिर की उत्पत्ति स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण और ओड़िया महाभारत (सरला दास द्वारा रचित) में विस्तार से वर्णित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर का प्रारंभिक निर्माण मालवा के सूर्यवंशी राजा इंद्रद्युम्न ने करवाया था।

नील माधव की खोज

कथा के अनुसार, सतयुग में भगवान विष्णु की नीलमणि से बनी एक अत्यंत सुंदर मूर्ति थी, जिसे ‘नील माधव’ कहा जाता था। शबर (आदिवासी) समुदाय के मुखिया विश्वावसु भगवान नील माधव की गुप्त रूप से एक गुफा में पूजा करते थे। जब राजा इंद्रद्युम्न को इस मूर्ति के बारे में पता चला, तो उन्होंने अपने राजपुरोहित के भाई विद्यापति को मूर्ति खोजने के लिए भेजा।

विद्यापति ने विश्वावसु की पुत्री ललिता से विवाह कर लिया और अपने ससुर से नील माधव के दर्शन कराने का आग्रह किया। विश्वावसु ने विद्यापति की आंखों पर पट्टी बांधकर उन्हें गुफा तक ले जाने की शर्त रखी। लेकिन चतुर विद्यापति ने रास्ते में सरसों के दाने गिरा दिए, जो बारिश के बाद पौधों में बदल गए और गुफा का रास्ता बता दिया। जब राजा इंद्रद्युम्न मूर्ति लेने पहुंचे, तो भगवान नील माधव वहां से अंतर्धान हो गए।

दारू ब्रह्म (लकड़ी का लट्ठा) और विश्वकर्मा

मूर्ति के गायब होने से राजा इंद्रद्युम्न बहुत दुखी हुए। तब आकाशवाणी हुई कि भगवान समुद्र तट पर एक विशाल तैरते हुए लकड़ी के लट्ठे (दारू ब्रह्म) के रूप में प्रकट होंगे, जिससे नई मूर्ति बनाई जाएगी। राजा को समुद्र में वह लकड़ी मिल गई, लेकिन कोई भी बढ़ई उसे काट नहीं सका।

तभी, भगवान विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई (अनंत महाराणा) का रूप धारण करके आए। उन्होंने मूर्ति बनाने की एक शर्त रखी— वह 21 दिनों तक एक बंद कमरे में मूर्ति बनाएंगे और कोई भी दरवाज़ा नहीं खोलेगा।

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महीनों तक अंदर से काम की आवाज़ आती रही, लेकिन कुछ दिनों बाद आवाज़ अचानक बंद हो गई। राजा की पत्नी रानी गुंडिचा को चिंता हुई कि कहीं वृद्ध बढ़ई को कुछ हो तो नहीं गया। उनके आग्रह पर राजा ने दरवाज़ा खुलवा दिया। शर्त टूटने के कारण वृद्ध बढ़ई तुरंत गायब हो गया और मूर्तियां अधूरी रह गईं (उनके हाथ-पैर पूरी तरह नहीं बन पाए थे)। राजा ने इसे भगवान की इच्छा माना और उन्हीं अधूरी मूर्तियों को मंदिर में स्थापित कर दिया। आज भी भगवान जगन्नाथ इसी रूप में पूजे जाते हैं।

2. ऐतिहासिक दृष्टिकोण: कब और किसने बनवाया था?

पुरातात्विक और ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार, वर्तमान पुरी जगन्नाथ मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में हुआ था। यह मंदिर कलिंग वास्तुकला (Kalinga Architecture) का एक उत्कृष्ट और भव्य उदाहरण है।

कलिंग नरेश अनंतवर्मन चोडगंग देव

वर्तमान पत्थर के विशाल मंदिर का निर्माण पूर्वी गंगा राजवंश (Eastern Ganga Dynasty) के प्रतापी राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने 12वीं शताब्दी (लगभग 1136 ईस्वी) में शुरू करवाया था। राजा चोडगंग देव एक शैव थे, लेकिन बाद में महान वैष्णव संत रामानुजाचार्य के प्रभाव में आकर वे वैष्णव बन गए। उन्होंने भगवान जगन्नाथ के प्रति अपनी भक्ति प्रदर्शित करने के लिए इस भव्य मंदिर की नींव रखी थी।

उन्होंने जगमोहन (प्रार्थना कक्ष) और मुख्य देउला (गर्भगृह) का निर्माण कार्य शुरू किया था।

अनंगभीम देव तृतीय द्वारा निर्माण पूर्ण

राजा चोडगंग देव के निधन के बाद मंदिर का निर्माण कार्य धीमा पड़ गया। बाद में उनके वंशज, राजा अनंगभीम देव तृतीय ने वर्ष 1197 ईस्वी के आसपास इस मंदिर का निर्माण कार्य पूरी तरह से संपन्न करवाया। उन्होंने मंदिर की प्रतिष्ठापना की और इसे इसका वर्तमान भव्य स्वरूप प्रदान किया।

तब से लेकर आज तक, यह मंदिर मराठों, मुगलों और अफगानों के कई हमलों का गवाह रहा है, लेकिन भगवान जगन्नाथ की महिमा और पुजारियों के बलिदान के कारण मूर्तियों और मंदिर की आस्था हमेशा सुरक्षित रही।

3. मंदिर की कलिंग वास्तुकला (Architecture of the Temple)

पुरी का जगन्नाथ मंदिर 400,000 वर्ग फुट के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है। यह मंदिर दो विशाल प्राचीरों से घिरा हुआ है:

  • मेघनाद पचेरी: यह मंदिर की बाहरी दीवार है, जो 20 फीट ऊंची है और मंदिर को बाहरी दुनिया के शोर से अलग करती है।

  • कुर्मा बेढ़ा: यह मंदिर की भीतरी दीवार है जो कछुए (कुर्मा) के आकार की है।

मुख्य मंदिर (विमान) की ऊंचाई लगभग 214 फीट (65 मीटर) है, जो इसे ओडिशा के सबसे ऊंचे मंदिरों में से एक बनाती है।

मंदिर के चार मुख्य द्वार:

मंदिर में प्रवेश के लिए चार दिशाओं में चार विशाल द्वार हैं, जिनका अपना विशेष महत्व है:

  1. सिंह द्वार (Lion Gate): यह पूर्वी द्वार है और मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार है। इसके दोनों ओर दो विशाल शेरों की मूर्तियां हैं।

  2. अश्व द्वार (Horse Gate): यह दक्षिणी द्वार है।

  3. व्याघ्र द्वार (Tiger Gate): यह पश्चिमी द्वार है।

  4. हस्ती द्वार (Elephant Gate): यह उत्तरी द्वार है।

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4. पुरी जगन्नाथ मंदिर के अनसुलझे रहस्य और चमत्कार

जगन्नाथ मंदिर केवल अपने इतिहास के लिए नहीं, बल्कि उन चमत्कारों के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है, जिन्हें आज तक आधुनिक विज्ञान भी पूरी तरह से नहीं सुलझा पाया है।

रहस्य / चमत्कार विवरण (Description)
हवा के विपरीत झंडा मंदिर के शिखर पर लगा झंडा (पतित पावन बाना) हमेशा हवा के बहाव की विपरीत दिशा में लहराता है।
सुदर्शन चक्र का रहस्य मंदिर के शीर्ष पर स्थापित 20 फीट ऊंचे और एक टन भारी ‘नील चक्र’ को पुरी के किसी भी कोने से देखें, वह हमेशा आपके सामने ही दिखाई देता है।
शिखर की परछाई नहीं बनती मुख्य मंदिर की वास्तुकला इतनी अद्भुत है कि दिन के किसी भी समय इसके मुख्य गुंबद की परछाई (Shadow) जमीन पर नहीं पड़ती।
पक्षियों का न उड़ना मंदिर के मुख्य गुंबद के ठीक ऊपर आज तक किसी भी पक्षी को उड़ते हुए या बैठे हुए नहीं देखा गया है। इसके ऊपर से हवाई जहाज़ या हेलीकॉप्टर भी नहीं गुज़रते।
समुद्र की आवाज़ का बंद होना जैसे ही आप सिंह द्वार से मंदिर के अंदर पहला कदम रखते हैं, समुद्र की लहरों की भारी आवाज़ अचानक आनी बंद हो जाती है। बाहर आते ही आवाज़ फिर सुनाई देती है।
महाप्रसाद पकाने की जादुई विधि भगवान का प्रसाद मिट्टी के 7 बर्तनों को एक के ऊपर एक रखकर लकड़ी की आग पर पकाया जाता है। आश्चर्यजनक रूप से, सबसे ऊपर रखे बर्तन का प्रसाद सबसे पहले पकता है।
प्रसाद कभी कम नहीं पड़ता

मंदिर में रोज़ाना लाखों भक्त आते हैं, लेकिन प्रसाद (आनंद बाज़ार में) कभी कम नहीं पड़ता। और जैसे ही मंदिर के पट बंद होने का समय आता है, सारा प्रसाद अपने आप खत्म हो जाता है, एक दाना भी व्यर्थ नहीं जाता।

5. नव कलेवर (Nabakalebara) परंपरा

जगन्नाथ मंदिर की एक और सबसे अनूठी परंपरा है ‘नव कलेवर’, जिसका अर्थ है ‘नया शरीर धारण करना’। हिंदू धर्म में भगवान की मूर्तियां आमतौर पर पत्थर या धातु की होती हैं जो सदियों तक रहती हैं, लेकिन जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियां विशेष ‘नीम की लकड़ी’ (Daru Brahma) से बनी होती हैं।

चूंकि लकड़ी नश्वर है, इसलिए हर 12 से 19 साल के बीच मूर्तियों को बदल दिया जाता है। यह अनुष्ठान तब होता है जब हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ का महीना दो बार (अधिक मास) आता है।

नई मूर्तियों के लिए नीम के पेड़ की तलाश बहुत कठोर नियमों के तहत की जाती है। पेड़ में कोई घोंसला नहीं होना चाहिए, पेड़ के पास सांप का बिल और श्मशान होना चाहिए, और पेड़ पर शंख, चक्र, गदा, पद्म के प्राकृतिक चिह्न होने चाहिए। पुरानी मूर्तियों से ‘ब्रह्म पदार्थ’ (एक रहस्यमयी वस्तु जिसे भगवान कृष्ण का धड़कता हुआ हृदय माना जाता है) को निकालकर नई मूर्तियों में स्थापित किया जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान पूरे पुरी शहर की बिजली काट दी जाती है और मुख्य पुजारी की आंखों पर भी पट्टी बंधी होती है।

6. विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा (Rath Yatra)

पुरी का जगन्नाथ मंदिर दुनिया के एकमात्र ऐसे मंदिरों में से एक है जहां भगवान साल में एक बार अपने गर्भगृह से बाहर आकर भक्तों को दर्शन देते हैं। इसे रथ यात्रा (Rath Yatra) या ‘गुंडिचा यात्रा’ कहा जाता है।

यह यात्रा हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकाली जाती है। भगवान जगन्नाथ (नंदीघोष रथ), बलभद्र (तालध्वज रथ) और सुभद्रा (दर्पदलन रथ) तीन अलग-अलग विशाल और भव्य लकड़ी के रथों में सवार होकर अपनी मौसी के घर ‘गुंडिचा मंदिर’ जाते हैं।

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इन रथों का निर्माण हर साल नया किया जाता है और इसमें लोहे की किसी भी कील का इस्तेमाल नहीं होता। भगवान 9 दिनों तक गुंडिचा मंदिर में रहते हैं और फिर ‘बहुदा यात्रा’ (वापसी) के जरिए अपने मूल मंदिर लौट आते हैं। यह उत्सव समानता का प्रतीक है, जहां भगवान खुद मंदिर से बाहर आकर समाज के हर वर्ग, धर्म और जाति के लोगों से मिलते हैं।

“पुरी जगन्नाथ मंदिर का इतिहास: कब और किसने बनवाया था?” इस प्रश्न का उत्तर केवल कुछ राजाओं के नाम और तारीखों में नहीं सिमटा है। इसका असली उत्तर उन करोड़ों भक्तों की आस्था में है, जो भगवान जगन्नाथ को ब्रह्मांड का स्वामी मानते हैं।

12वीं शताब्दी में राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव द्वारा बनवाया गया यह कलिंग वास्तुकला का अजूबा आज भी मजबूती से खड़ा है। इसका कोई भी वैज्ञानिक रहस्य सुलझ नहीं पाया है, जो इसे और भी दिव्य और चमत्कारी बनाता है। पुरी का जगन्नाथ मंदिर केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि भारतीय अध्यात्म, रहस्य और अटूट भक्ति का एक जीता-जागता प्रमाण है। जो भी व्यक्ति एक बार इस मंदिर में प्रवेश कर भगवान जगन्नाथ के दर्शन कर लेता है और आनंद बाज़ार का महाप्रसाद ग्रहण कर लेता है, वह जीवन-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. पुरी जगन्नाथ मंदिर का निर्माण किसने करवाया था?

ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, वर्तमान पुरी जगन्नाथ मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी (लगभग 1136 ईस्वी) में पूर्वी गंगा राजवंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने शुरू करवाया था, जिसे बाद में राजा अनंगभीम देव तृतीय ने 1197 ईस्वी में पूरा किया।

2. जगन्नाथ जी की मूर्ति लकड़ी की क्यों होती है और अधूरी क्यों है?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई के रूप में मूर्ति बना रहे थे और उन्होंने 21 दिनों तक दरवाज़ा न खोलने की शर्त रखी थी। रानी गुंडिचा की व्याकुलता के कारण राजा ने दरवाज़ा पहले ही खोल दिया। शर्त टूटने से बढ़ई गायब हो गया और मूर्तियां (हाथ-पैर के बिना) अधूरी रह गईं। तभी से ये नीम की लकड़ी से बनी अधूरी मूर्तियों के रूप में ही पूजे जाते हैं।

3. पुरी जगन्नाथ मंदिर के सबसे बड़े चमत्कार क्या हैं?

मंदिर के कई रहस्य हैं, जैसे— मंदिर के शिखर के झंडे का हवा की विपरीत दिशा में उड़ना, दिन के किसी भी समय मंदिर की परछाई का न बनना, मंदिर के ऊपर से पक्षियों का न उड़ना, और सिंह द्वार के अंदर प्रवेश करते ही समुद्र की आवाज़ का पूरी तरह से बंद हो जाना।

4. मंदिर का ‘नील चक्र’ (सुदर्शन चक्र) कैसा है?

मंदिर के शीर्ष पर अष्टधातु से बना ‘नील चक्र’ स्थापित है। इस चक्र का रहस्य यह है कि आप पुरी शहर के किसी भी कोने से इसे देखें, इसका मुख हमेशा आपकी ही तरफ दिखाई देता है।

5. जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा क्यों निकाली जाती है?

मान्यता है कि एक बार बहन सुभद्रा ने अपने भाइयों से नगर देखने की इच्छा जताई थी। तब भगवान जगन्नाथ और बलभद्र उन्हें रथ पर बैठाकर नगर भ्रमण के लिए और अपनी मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) ले गए थे। इसी घटना की याद में हर साल आषाढ़ माह में यह विशाल रथ यात्रा निकाली जाती है।

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