Home Blog

Sheetala Satam 2026 Date: शीतला सातम कब है? जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत नियम और कथाIt takes 15 minutes... to read this article !

सनातन हिंदू धर्म में प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और स्वास्थ्य को धर्म के साथ बहुत ही वैज्ञानिक और आध्यात्मिक ढंग से जोड़ा गया है। हमारे व्रत और त्योहार केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं हैं, बल्कि ये मानव शरीर और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखने के अद्भुत माध्यम हैं। ऐसा ही एक अत्यंत पावन और अनूठा पर्व है— ‘शीतला सातम’ (Sheetala Satam), जिसे उत्तर भारत के कई हिस्सों में ‘बासौड़ा’ (Basoda) या ‘शीतला सप्तमी/अष्टमी’ के नाम से भी जाना जाता है।

शीतला माता को स्वच्छता, आरोग्यता (स्वास्थ्य) और शीतलता (ठंडक) की देवी माना जाता है। मान्यता है कि जो भक्त शीतला सातम के दिन माता की विधिवत पूजा करता है और व्रत के नियमों का पालन करता है, उसके परिवार और बच्चों को चेचक (Smallpox), खसरा (Measles), और त्वचा संबंधी गंभीर बीमारियों का सामना नहीं करना पड़ता। इस दिन घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता और माता को बासी (ठंडे) भोजन का भोग लगाया जाता है।

यदि आप जानना चाहते हैं कि वर्ष 2026 में शीतला सातम कब है, इसका शुभ मुहूर्त क्या है, पूजा की सही विधि क्या है और इसके पीछे का वैज्ञानिक व धार्मिक महत्व क्या है, तो यह विस्तृत और शोधपरक लेख आपके लिए ही है। इस आर्टिकल में हम शीतला सातम से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी विस्तार से साझा करेंगे।

1. शीतला सातम 2026 में कब है? (Sheetala Satam 2026 Exact Date)

भारत के अलग-अलग राज्यों में शीतला सातम का पर्व मुख्य रूप से दो बार मनाया जाता है— पहला चैत्र मास में (होली के बाद) और दूसरा श्रावण (सावन) मास में (जन्माष्टमी से ठीक एक दिन पहले)।

चैत्र मास का बासौड़ा उत्तर भारत (राजस्थान, यूपी, हरियाणा) में अधिक प्रचलित है, जो मार्च-अप्रैल में आता है। वहीं, श्रावण मास की शीतला सातम (Shravan Sheetala Satam) गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में अत्यंत भव्यता के साथ मनाई जाती है। चूंकि वर्ष 2026 में श्रावण मास का समय चल रहा है, इसलिए हम श्रावण कृष्ण सप्तमी पर आने वाली शीतला सातम की बात करेंगे, जो जन्माष्टमी (कृष्ण जन्मोत्सव) से ठीक एक दिन पूर्व मनाई जाती है।

हिंदू पंचांग की गणनाओं के अनुसार, वर्ष 2026 में कृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर (शुक्रवार) को है। अतः उससे ठीक एक दिन पहले, 3 सितंबर 2026 (गुरुवार) को श्रावण मास की शीतला सातम का पावन पर्व मनाया जाएगा।

शीतला सातम 2026: शुभ मुहूर्त तालिका (Muhurat Table)

साधकों और व्रतियों की सुविधा के लिए यहाँ 3 सितंबर 2026 की शीतला सातम पूजा के शुभ मुहूर्त का विस्तृत विवरण दिया गया है:

विवरण (Event details) तिथि और समय (Date & Time)
शीतला सातम (सप्तमी) की तिथि 3 सितंबर 2026, गुरुवार
रांधण छठ (भोजन पकाने का दिन) 2 सितंबर 2026, बुधवार
सप्तमी तिथि का आरंभ 2 सितंबर 2026, रात्रि 09:25 बजे से
सप्तमी तिथि की समाप्ति 3 सितंबर 2026, रात्रि 11:15 बजे तक
शीतला माता की पूजा का श्रेष्ठ मुहूर्त सुबह 06:05 बजे से 08:30 बजे तक
अभिजित मुहूर्त (दोपहर की पूजा) सुबह 11:55 बजे से दोपहर 12:45 बजे तक

(नोट: सूर्योदय के अनुसार स्थानीय समय में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है। पूजा हमेशा सुबह ठंडे समय में करना अधिक फलदायी माना जाता है।)

2. शीतला सातम का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व (Religious & Scientific Significance)

हिंदू धर्म में कोई भी त्योहार बिना वैज्ञानिक आधार के नहीं होता। शीतला सातम इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

धार्मिक महत्व (Religious Importance)

स्कंद पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, माता शीतला देवी दुर्गा (पार्वती) का ही एक कल्याणकारी अवतार हैं। इन्हें ‘रोग नाशिनी’ कहा जाता है। माता शीतला बच्चों की रक्षक हैं। प्राचीन काल में जब चेचक और खसरे जैसी महामारियां फैलती थीं, तब माता शीतला की उपासना ही एकमात्र सहारा होती थी। जो महिला शीतला सातम का व्रत रखकर ठंडे भोजन का भोग लगाती है, माता शीतला उसके बच्चों को दीर्घायु, निरोगी काया और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Perspective)

शीतला सातम (चाहे वह चैत्र मास की हो या श्रावण मास की) हमेशा ऋतुओं के संधिकाल (Transition of Seasons) में आती है।

  1. मौसम का बदलाव: सावन-भादों (मानसून) के मौसम में नमी बहुत अधिक होती है, जिससे बैक्टीरिया और फंगस बहुत तेजी से पनपते हैं। इस मौसम में पाचन तंत्र कमजोर हो जाता है।

  2. ठंडे भोजन का रहस्य: इस दिन बासी भोजन (जो एक रात पहले साफ-सफाई से पकाया गया हो) खाने का विधान है। इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि ऋतु परिवर्तन के समय हमारे पेट के ‘गट बैक्टीरिया’ (Gut Bacteria) को नए मौसम के अनुकूल होने की आवश्यकता होती है। रातों-रात फर्मेंट (Ferment) हुआ भोजन, जैसे राबड़ी या दही, प्रोबायोटिक्स (Probiotics) का काम करता है, जो आंतों को मजबूत बनाता है और शरीर की इम्युनिटी (Immunity) को बढ़ाता है।

  3. चूल्हा न जलाना: इस दिन अग्नि (चूल्हा) को विश्राम दिया जाता है। यह इस बात का संकेत है कि अब मौसम में बदलाव आ रहा है, अग्नि के प्रयोग और गर्म तासीर वाले भोजन को कम करके शीतलता प्रदान करने वाले भोजन को अपनाना चाहिए।

ये भी पढ़ें:  Gaj Lakshmi Puja Benefits: गजलक्ष्मी की पूजा के चमत्कारी लाभ, जानें खोया धन पाने का रहस्य (2026)

3. माता शीतला का स्वरूप और उनके अस्त्र-शस्त्र का रहस्य

शीतला माता का स्वरूप अत्यंत अद्वितीय है। उनके स्वरूप की हर एक वस्तु हमें स्वास्थ्य और स्वच्छता का संदेश देती है:

  • गधा (Donkey): माता शीतला का वाहन गधा (गर्दभ) है। गधा धैर्य, सहनशीलता और मेहनत का प्रतीक है। यह संकेत देता है कि बीमारी के समय मनुष्य को अत्यंत धैर्य रखना चाहिए।

  • झाड़ू (Broom): माता के एक हाथ में झाड़ू होती है, जो स्वच्छता (Cleanliness) का प्रतीक है। यह बताती है कि जहां सफाई होगी, वहां बीमारियां नहीं टिकेंगी।

  • ठंडे जल का कलश (Water Pot): माता के दूसरे हाथ में शीतल जल से भरा कलश होता है। यह कलश शीतलता, हाइड्रेशन (Hydration) और रोगों की शांति का प्रतीक है।

  • नीम के पत्ते (Neem Leaves): माता को नीम के पत्ते अत्यंत प्रिय हैं। नीम में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-वायरल गुण होते हैं, जो चेचक और त्वचा रोगों को दूर करने की सबसे अच्छी प्राकृतिक औषधि है।

  • सूप (Winnowing Fan): माता के सिर पर सूप (छाज) होता है, जिसका उपयोग अनाज से गंदगी को अलग करने के लिए किया जाता है। यह शरीर से विषैले तत्वों (Toxins) को बाहर निकालने का प्रतीक है।

4. रांधण छठ क्या है? (Significance of Randhan Chhath)

शीतला सातम से ठीक एक दिन पहले ‘रांधण छठ’ (षष्ठी तिथि) मनाई जाती है। ‘रांधण’ का अर्थ है ‘पकाना’ (Cooking)। चूंकि शीतला सातम के दिन घर में चूल्हा जलाना पूर्णतः वर्जित होता है, इसलिए सातम के लिए सारा भोजन (नैवेद्य) छठ के दिन ही पका लिया जाता है।

2026 में रांधण छठ 2 सितंबर (बुधवार) को मनाई जाएगी।

रांधण छठ के नियम:

  1. इस दिन महिलाएं घर और रसोई की बहुत अच्छी तरह से साफ-सफाई करती हैं।

  2. दोपहर या शाम के समय तरह-तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं।

  3. गुजरात और अन्य राज्यों में इस दिन विशेष रूप से बाजरे की रोटी (ठेपला), मीठी राबड़ी, दही-चावल, पुए, मालपुए, बेसन की पपड़ी, और ‘कुलेर’ (बाजरे के आटे, घी और गुड़ का मिश्रण) बनाया जाता है।

  4. रात के समय जब सारा खाना बन जाता है, तो गैस स्टोव या चूल्हे की अच्छी तरह से सफाई की जाती है।

  5. चूल्हे पर कुमकुम (रोली) से स्वास्तिक बनाया जाता है, पुष्प अर्पित किए जाते हैं और चूल्हा देवता से प्रार्थना की जाती है कि “कल आप विश्राम करें और हमारे घर में शीतलता बनाए रखें।”

5. शीतला सातम 2026: संपूर्ण पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)

शीतला माता की पूजा अत्यंत सादगी और पवित्रता के साथ की जाती है। 3 सितंबर 2026 को सातम के दिन निम्नलिखित पूजा विधि का पालन करें:

१. प्रातःकालीन स्नान (Morning Bath)

  • शीतला सातम के दिन सूर्योदय से पूर्व (ब्रह्म मुहूर्त में) उठना चाहिए।

  • व्रत रखने वाली महिलाओं को इस दिन ठंडे पानी (Cold water) से स्नान करना चाहिए। भूलकर भी गर्म पानी का प्रयोग न करें।

  • स्नान के बाद स्वच्छ (हल्के रंग के) वस्त्र धारण करें।

२. पूजा की थाली तैयार करना (Preparation of Puja Thali)

पूजा की थाली में रात का बना हुआ बासी भोजन रखें। मुख्य रूप से थाली में:

  • कुलेर (बाजरे का आटा, गुड़ और घी का मिश्रण)

  • राबड़ी (बाजरे या मक्के की)

  • मीठे पुए या गुलगुले

  • दही और चावल

  • हल्दी, कुमकुम, रोली, अक्षत (चावल)

  • कच्चा सूत (सफेद धागा), मोली (लाल धागा)

  • मेहंदी, जल का कलश और नीम के ताजे पत्ते रखें।

    (नोट: पूजा की थाली में कोई भी गर्म वस्तु या दीपक जलाने के लिए माचिस नहीं रखी जाती। इस दिन माता की आरती बिना दीपक जलाए (ठंडी आरती) या कपूर/सूखे दीये से की जाती है)।

३. माता शीतला की पूजा (Worship Process)

  • यदि आपके घर के आस-पास शीतला माता का मंदिर है, तो वहां जाएं। यदि मंदिर नहीं है, तो घर के आंगन में मिट्टी से एक छोटी सी ‘ढेरी’ (प्रतीकात्मक स्वरूप) बना लें या नीम के पेड़ की जड़ में पूजा करें।

  • माता शीतला को सबसे पहले ठंडे जल से स्नान कराएं।

  • उन्हें हल्दी, रोली और कुमकुम का तिलक लगाएं। (शीतला माता को लाल सिंदूर नहीं, बल्कि हल्दी और मेहंदी अधिक प्रिय है)।

  • माता को कच्चे सूत का धागा और वस्त्र (चुनरी) अर्पित करें।

  • रात का बना हुआ बासी भोजन (कुलेर, दही, चावल, राबड़ी) माता को नैवेद्य (भोग) के रूप में अर्पित करें।

  • माता के चरणों में नीम के पत्ते चढ़ाएं।

ये भी पढ़ें:  Ashadha Amavasya 2026: 13 या 14 जुलाई? जानें सही तिथि, स्नान-दान का मुहूर्त और पितरों की कृपा पाने के विशेष उपाय

४. कथा श्रवण और होलिका दहन स्थल की पूजा

  • पूजा के स्थान पर बैठकर हाथ में कुछ अक्षत (चावल) या बाजरे के दाने लेकर ‘शीतला माता की कथा’ सुनें। (कथा नीचे दी गई है)।

  • उत्तर भारत में परंपरानुसार, पूजा के बाद होलिका दहन वाले स्थान पर जाकर वहां जल और हल्दी चढ़ाई जाती है।

५. घर लौटकर किए जाने वाले कार्य

  • पूजा करने के बाद घर लौटते समय मुख्य द्वार के दोनों ओर हल्दी के हाथ (थापे) लगाएं।

  • घर में आकर जिस जल के कलश से माता को जल चढ़ाया था, उसका बचा हुआ पवित्र जल पूरे घर में छिड़कें (इससे घर की नकारात्मकता और बीमारियां दूर होती हैं)।

  • इसके बाद परिवार के सभी सदस्य माता का प्रसाद (ठंडा भोजन) ग्रहण करें।

6. शीतला सातम व्रत के कड़े नियम और सावधानियाँ (Strict Rules of the Vrat)

शीतला माता की पूजा में भूल-चूक की गुंजाइश कम होती है, क्योंकि माता बहुत जल्दी रुष्ट (नाराज) भी हो जाती हैं। इसलिए इन कड़े नियमों का पालन अवश्य करें:

  1. चूल्हा जलाना पूर्णतः वर्जित: सातम के दिन घर में माचिस, गैस स्टोव या किसी भी प्रकार की अग्नि जलाना घोर पाप माना जाता है। इस दिन चाय बनाना या गर्म दूध पीना भी वर्जित है।

  2. गर्म पानी का निषेध: स्नान करने या पीने के लिए गर्म पानी का प्रयोग बिल्कुल न करें।

  3. बाल न धोएं: महिलाओं को शीतला सातम के दिन अपने बाल (सिर) नहीं धोने चाहिए। यदि बाल धोने हैं, तो रांधण छठ या उससे पहले ही धो लें।

  4. सिलाई-बुनाई वर्जित: इस दिन कैंची का प्रयोग करना, सुई-धागे से सिलाई करना या कपड़े सिलना सख्त मना है।

  5. ताजा भोजन न खाएं: पूरे दिन केवल वही भोजन ग्रहण करें जो एक रात पहले (रांधण छठ को) पकाया गया हो। बाजार से लाकर कोई भी गर्म या ताजी चीज न खाएं।

  6. तामसिक भोजन का निषेध: घर में किसी भी प्रकार का मांसाहार, शराब, लहसुन और प्याज का प्रयोग बिल्कुल नहीं होना चाहिए।

7. माता शीतला की पौराणिक व्रत कथा (The Vrat Katha)

किसी भी व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसकी कथा को सच्चे मन से सुना या पढ़ा जाए। शीतला सातम की सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथा इस प्रकार है:

कथा:

प्राचीन काल में एक गांव में एक बुढ़िया माई रहती थी। वह माता शीतला की परम भक्त थी। वह हर वर्ष शीतला सप्तमी के दिन ठंडा भोजन बनाती थी और माता की पूरे विधि-विधान से पूजा करती थी। उस दिन वह अपने घर में चूल्हा भी नहीं जलाती थी।

उसी गांव में अन्य लोग शीतला माता के महत्व को नहीं जानते थे और सातम के दिन भी गर्म भोजन पकाते और खाते थे।

एक बार शीतला सातम के दिन गांव में भयानक आग लग गई। आग ने पूरे गांव को अपनी चपेट में ले लिया। गांव की सारी झोपड़ियां, मकान और खेत जलकर राख हो गए। लोगों में हाहाकार मच गया। लेकिन जब आग शांत हुई, तो गांव वालों ने एक बहुत ही बड़ा चमत्कार देखा।

पूरे गांव में केवल उसी बुढ़िया माई की झोपड़ी सुरक्षित थी। उसकी झोपड़ी को आग की एक लपट ने भी नहीं छुआ था। यह देखकर गांव वालों को बहुत आश्चर्य हुआ। सभी लोग दौड़कर बुढ़िया माई के पास गए और पूछने लगे— “माई! ऐसा कैसे चमत्कार हुआ कि हम सबका घर जल गया, लेकिन तुम्हारी झोपड़ी पूरी तरह सुरक्षित है?”

बुढ़िया माई ने मुस्कुराकर कहा— “अरे गांव वालों! यह मेरा चमत्कार नहीं, बल्कि ‘माता शीतला’ की कृपा है। आज शीतला सातम का पावन दिन है। मैंने कल ही भोजन पका लिया था और आज घर में चूल्हा नहीं जलाया। मैंने माता को ठंडे भोजन का भोग लगाया और स्वयं भी ठंडा भोजन किया। तुम सबने माता के नियमों का उल्लंघन किया और गर्म खाना पकाया। यह माता शीतला के क्रोध का ही परिणाम है कि तुम्हारे घर जल गए, और उनकी शीतलता का प्रभाव है कि मेरी झोपड़ी बच गई।”

यह सुनकर पूरे गांव वालों को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने माता शीतला से रो-रोकर क्षमा मांगी। माता शीतला अत्यंत दयालु हैं, उन्होंने गांव वालों को क्षमा कर दिया। उसी दिन से पूरे गांव में, और धीरे-धीरे पूरे देश में शीतला सातम के दिन चूल्हा न जलाने और ठंडे भोजन का भोग लगाने की परंपरा शुरू हो गई।

ये भी पढ़ें:  Guru Purnima 2026: क्यों मनाई जाती है गुरु पूर्णिमा? जानें Vyas Purnima Ki Katha & Importance

अन्य लोक कथा (देवरानी-जेठानी की कथा):

एक अन्य कथा के अनुसार, किसी घर में एक जेठानी और देवरानी थीं। रांधण छठ के दिन दोनों ने खाना बनाया। लेकिन रात को देवरानी चूल्हे की आग बुझाना भूल गई और सो गई। रात को जब शीतला माता घर में भ्रमण करने आईं, तो उन्होंने गलती से जलते हुए चूल्हे में पैर रख दिया, जिससे माता के पैर बुरी तरह जल गए।

क्रोधित होकर माता ने श्राप दिया, जिससे देवरानी का नवजात पुत्र मृत्यु को प्राप्त हो गया। जब सुबह देवरानी उठी तो उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। वह रोते-रोते अपने मृत बच्चे को लेकर जंगल की ओर भागी। रास्ते में उसे एक बूढ़ी औरत (जो स्वयं शीतला माता थीं) मिलीं, जो अपने जले हुए पैरों के दर्द से कराह रही थीं। देवरानी ने तुरंत दही (ठंडी चीज) से माता के पैरों की जलन शांत की। माता प्रसन्न हुईं और उन्होंने अपना असली रूप दिखाकर देवरानी के पुत्र को पुनः जीवित कर दिया। इस घटना के बाद से अग्नि न जलाने का नियम कड़ाई से लागू हो गया।

8. शीतला सातम पर क्या खाएं और क्या न खाएं? (Dietary Rules)

क्या खाएं (What to eat):

  • मीठी राबड़ी: बाजरे या मक्के के आटे को छाछ (बटरमिल्क) में पकाकर बनाया जाता है, जो पेट के लिए अत्यंत शीतल होता है।

  • कुलेर: गुजरात में विशेष रूप से बाजरे के आटे, गुड़ और घी को बिना गैस जलाए हाथों से रगड़कर (गूंधकर) बनाया जाता है।

  • बासी रोटी और दही: यह इम्युनिटी बढ़ाने का सबसे बेहतरीन कॉम्बिनेशन है।

  • दही बड़े, बेसन की पपड़ी, मीठे पुए और चावल।

क्या न खाएं (What not to eat):

  • गर्म चाय, कॉफी, या गर्म दूध।

  • तुरंत पका हुआ कोई भी ताजा भोजन।

  • गर्म तासीर वाली चीजें जैसे तीखे मसाले।

9. शीतला माता के चमत्कारी मंत्र (Sheetala Mata Mantras)

पूजा करते समय माता शीतला के इन सिद्ध मंत्रों का जाप करने से घर में बीमारियों का प्रवेश नहीं होता:

  1. शीतला माता का मूल मंत्र:

“ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः”

  1. रोग निवारण मंत्र:

“वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्। मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालङ्कृतमस्तकाम्॥”

(अर्थ: मैं उन शीतला माता की वंदना करता हूँ, जो गधे पर विराजमान हैं, जिनके एक हाथ में झाड़ू, दूसरे में जल का कलश है और सिर पर सूप सुशोभित है।)

Sheetala Satam 2026 केवल बासी भोजन खाने का दिन नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को प्रकृति की लय (Rhythm of Nature) के साथ तालमेल बिठाने का संदेश देता है। 3 सितंबर 2026 को आने वाला यह पावन पर्व हमें स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और ऋतुओं के अनुकूल आहार-विहार अपनाने की प्रेरणा देता है।

इस दिन माताओं को पूर्ण श्रद्धा, पवित्रता और आस्था के साथ माता शीतला का पूजन करना चाहिए। आधुनिक चिकित्सा अपनी जगह है, लेकिन माता शीतला की कृपा से मिलने वाला ‘मनोवैज्ञानिक संबल’ और ‘प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता’ (Natural Immunity) किसी भी संजीवनी से कम नहीं है। माता शीतला आप सभी के परिवारों की रक्षा करें और आपके घर में सुख, शांति और आरोग्यता की शीतलता हमेशा बनी रहे।

॥ जय माता शीतला ॥

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: वर्ष 2026 में शीतला सातम (श्रावण मास) किस दिन है?

उत्तर: वर्ष 2026 में श्रावण मास की कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि यानी शीतला सातम 3 सितंबर 2026 (गुरुवार) को मनाई जाएगी। यह पर्व कृष्ण जन्माष्टमी से ठीक एक दिन पहले आता है।

प्रश्न 2: शीतला सातम के दिन घर में चूल्हा क्यों नहीं जलाया जाता?

उत्तर: धार्मिक मान्यता है कि शीतला माता को शीतलता (ठंडक) अत्यंत प्रिय है। यदि सातम के दिन घर में चूल्हा (अग्नि) जलाया जाता है, तो माता को कष्ट होता है और उनका शरीर जलने लगता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, इस दिन अग्नि को विश्राम देकर बासी फर्मेंटेड भोजन खाने से आंतों (Gut health) को मजबूती मिलती है और मौसम बदलने से होने वाली बीमारियों से बचाव होता है।

प्रश्न 3: रांधण छठ क्या होती है और इसका क्या महत्व है?

उत्तर: रांधण छठ शीतला सातम से एक दिन पहले (षष्ठी तिथि) को मनाई जाती है। ‘रांधण’ का अर्थ है खाना पकाना। चूंकि सातम को चूल्हा जलाना मना होता है, इसलिए महिलाएं रांधण छठ के दिन ही सातम के लिए सभी प्रकार का भोजन (राबड़ी, कुलेर, पुए, पूरी आदि) बनाकर रख लेती हैं। 2026 में रांधण छठ 2 सितंबर को है।

प्रश्न 4: शीतला सातम की पूजा के लिए ‘कुलेर’ (Kuler) कैसे बनाया जाता है?

उत्तर: कुलेर माता शीतला का सबसे प्रिय भोग है। इसे बनाने के लिए गैस या अग्नि की आवश्यकता नहीं होती। बाजरे के कच्चे आटे में देसी घी और बारीक पिसा हुआ गुड़ मिलाया जाता है। इसे हाथों से तब तक मसला जाता है जब तक कि घी के कारण यह लड्डू के रूप में बंधने न लगे। यही शुद्ध ‘कुलेर’ माता को नैवेद्य के रूप में चढ़ाया जाता है।

प्रश्न 5: क्या शीतला सातम के दिन गर्म पानी से स्नान कर सकते हैं?

उत्तर: नहीं, शीतला सातम के व्रत नियमों के अनुसार इस दिन गर्म पानी का प्रयोग (चाहे वह स्नान के लिए हो या पीने के लिए) पूर्णतः वर्जित है। व्रत रखने वाली महिलाओं और परिवार के सदस्यों को ठंडे (सामान्य) जल से ही स्नान करना चाहिए। यह शरीर की गर्मी को शांत करने और त्वचा रोगों से बचने का प्रतीक है।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

error: Content is protected !!