Home Blog

Janmashtami 2026 Exact Date & Time: कृष्ण जन्माष्टमी कब है? जानें शुभ मुहूर्त, व्रत नियम और संपूर्ण पूजा विधिIt takes 14 minutes... to read this article !

सनातन धर्म में अनेक व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं, लेकिन कृष्ण जन्माष्टमी (Krishna Janmashtami) का पर्व भक्तों के लिए एक अलग ही उल्लास, प्रेम और आस्था का प्रतीक है। भगवान विष्णु के आठवें अवतार, मुरलीधर, लीलाधर, और जगतगुरु श्री कृष्ण के जन्मोत्सव को जन्माष्टमी के रूप में पूरे विश्व में अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। मथुरा के कारागार से लेकर गोकुल की गलियों तक और आज के आधुनिक युग में हर कृष्ण भक्त के हृदय में इस पर्व का एक विशेष स्थान है। यदि आप भी श्री कृष्ण के भक्त हैं और जानना चाहते हैं कि वर्ष 2026 में कृष्ण जन्माष्टमी कब है (Janmashtami 2026 Date), इसका शुभ मुहूर्त क्या है, पूजा की सही विधि क्या होनी चाहिए और इस पावन दिन से जुड़ी पौराणिक कथा क्या है, तो आप बिल्कुल सही जगह पर हैं।

वर्ष 2026 में कृष्ण जन्माष्टमी कब है? (Krishna Janmashtami 2026 Date)

हिंदू पंचांग (Hindu Calendar) के अनुसार, श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को, रोहिणी नक्षत्र और वृषभ लग्न की मध्यरात्रि (रात 12 बजे) में हुआ था। जब भी व्रत की तारीख तय की जाती है, तो अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है।

वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार, वर्ष 2026 में कृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व 4 सितंबर 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। (स्मार्त और वैष्णव संप्रदाय के अनुसार कई बार तिथियों में एक दिन का अंतर आ जाता है, लेकिन मुख्य रूप से अष्टमी तिथि का प्रभाव 4 सितंबर की मध्यरात्रि को व्याप्त रहेगा)।

Janmashtami 2026 Puja Muhurat (जन्माष्टमी 2026 शुभ मुहूर्त तालिका)

भगवान कृष्ण की पूजा का सबसे मुख्य समय ‘निशिता काल’ (मध्यरात्रि का समय) होता है, क्योंकि इसी समय कान्हा ने जन्म लिया था। यहाँ 2026 के लिए पूजा के शुभ मुहूर्त की विस्तृत तालिका दी गई है:

विवरण (Details) तिथि और समय (Date & Time)
कृष्ण जन्माष्टमी तिथि 4 सितंबर 2026 (शुक्रवार)
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि प्रारंभ 3 सितंबर 2026, शाम को
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि समाप्त 4 सितंबर 2026, शाम/रात को
रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ 4 सितंबर 2026
निशिता काल (मध्यरात्रि) पूजा का शुभ मुहूर्त रात 11:58 PM से 12:44 AM (5 सितंबर)
पूजा की कुल अवधि लगभग 46 मिनट
पारण का समय (Vrat Parana Time) 5 सितंबर 2026, सूर्योदय के बाद (रोहिणी नक्षत्र समाप्ति पर)

(नोट: सूर्योदय और स्थानीय पंचांग के अनुसार आपके शहर में समय में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है।)

कृष्ण जन्माष्टमी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व (Significance of Janmashtami)

जन्माष्टमी केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह बुराई पर अच्छाई की जीत, अंधकार पर प्रकाश की विजय और अधर्म पर धर्म की स्थापना का महा-उत्सव है।

1. धर्म की स्थापना का प्रतीक

श्रीमद्भगवद्गीता (Bhagavad Gita) में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है:

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥”

अर्थात, जब-जब पृथ्वी पर धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं धर्म की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए अवतार लेता हूँ। श्री कृष्ण का जन्म इसी प्रतिज्ञा का साक्षात प्रमाण है। उनका जन्म कंस जैसे अत्याचारी शासक के अंत और पृथ्वी को पाप मुक्त करने के लिए हुआ था।

2. निष्काम कर्म का संदेश

श्री कृष्ण का पूरा जीवन हमें यह सिखाता है कि जीवन में कितनी भी विपरीत परिस्थितियां क्यों न हों, हमें अपना कर्म पूरी ईमानदारी से करना चाहिए। जन्म लेते ही माता-पिता से बिछड़ना, बचपन में कई राक्षसों का सामना करना और महाभारत के युद्ध में एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाना— यह सब हमें ‘निष्काम कर्मयोग’ (Selfless Action) की प्रेरणा देता है।

ये भी पढ़ें:  Pradosh Vrat 2026 Calendar: कब है प्रदोष व्रत? देखें Month-Wise Date & Puja Time

3. प्रेम और भक्ति का उत्सव

श्री कृष्ण प्रेम के साक्षात स्वरूप हैं। राधा-कृष्ण का प्रेम जीवात्मा (मनुष्य) और परमात्मा (ईश्वर) के मिलन का प्रतीक है। जन्माष्टमी का दिन भक्तों को अपने आराध्य के प्रति निस्वार्थ प्रेम और भक्ति व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। माना जाता है कि इस दिन सच्चे मन से व्रत और पूजा करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की पौराणिक कथा (The Legend of Krishna Janmashtami)

जन्माष्टमी की कथा के बिना यह पर्व अधूरा है। द्वापर युग में जब पृथ्वी पर पाप का बोझ बहुत बढ़ गया था, तब पृथ्वी ने गाय का रूप धारण कर ब्रह्मा जी और अन्य देवताओं के साथ भगवान विष्णु से रक्षा की गुहार लगाई। तब भगवान विष्णु ने उन्हें आश्वस्त किया कि वे ब्रज मंडल में देवकी और वसुदेव के पुत्र के रूप में अवतार लेंगे।

कंस का अत्याचार और आकाशवाणी

मथुरा का राजा कंस अत्यंत क्रूर और अत्याचारी था। उसने अपने पिता उग्रसेन को बंदी बनाकर राजगद्दी हथिया ली थी। कंस अपनी चचेरी बहन देवकी से बहुत प्रेम करता था। जब देवकी का विवाह यदुवंशी वसुदेव जी के साथ हुआ, तो कंस स्वयं उनका रथ हांक कर उन्हें विदा करने जा रहा था। तभी अचानक एक आकाशवाणी हुई:

“हे कंस! जिस देवकी को तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है, उसी का आठवां गर्भ तेरा काल बनेगा और तेरा वध करेगा।”

यह सुनकर कंस क्रोधित हो उठा और उसने देवकी को मारने के लिए तलवार निकाल ली। तब वसुदेव जी ने उसे वचन दिया कि देवकी की जो भी संतान होगी, वे उसे कंस को सौंप देंगे। इस शर्त पर कंस ने उन्हें जीवनदान दिया, लेकिन दोनों को काल कोठरी (कारागार) में बंदी बना लिया।

सात संतानों का वध और योगमाया का अवतरण

कारागार में देवकी ने एक-एक कर सात संतानों को जन्म दिया, और क्रूर कंस ने नवजात शिशुओं को पत्थरों पर पटक कर मार डाला। जब देवकी आठवीं बार गर्भवती हुईं, तो कंस ने कारागार की सुरक्षा कड़ी कर दी।

भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, घोर अंधकारमयी रात, रोहिणी नक्षत्र और मूसलाधार बारिश के बीच भगवान श्री हरि विष्णु ने अपनी माया से श्री कृष्ण के रूप में जन्म लिया। जन्म लेते ही उन्होंने वसुदेव और देवकी को अपने चतुर्भुज स्वरूप के दर्शन दिए और उन्हें निर्देश दिया कि वे इस शिशु को गोकुल में नंद बाबा और यशोदा के घर छोड़ आएं और वहां जन्मी योगमाया (कन्या) को ले आएं।

गोकुल की ओर प्रस्थान

भगवान की माया से कारागार के सभी पहरेदार गहरी नींद में सो गए और कोठरी के ताले अपने आप खुल गए। वसुदेव जी ने नवजात कृष्ण को एक सूप (टोकरी) में रखा और भारी बारिश में उफनती हुई यमुना नदी की ओर चल पड़े। शेषनाग ने अपने फनों से बाल कृष्ण को बारिश से बचाया। यमुना जी भी भगवान के चरण स्पर्श करने के लिए उफन रही थीं। जैसे ही कृष्ण जी के चरण यमुना के जल को लगे, नदी का स्तर नीचे चला गया और वसुदेव जी ने नदी पार कर ली।

गोकुल पहुंचकर वसुदेव जी ने देखा कि सभी गहरी नींद में हैं। उन्होंने कान्हा को यशोदा मैया के पास सुला दिया और वहां जन्मी कन्या (योगमाया) को लेकर वापस मथुरा आ गए। कारागार आते ही दरवाजे स्वतः बंद हो गए और पहरेदार जाग गए।

जब कंस को कन्या के जन्म की सूचना मिली, तो वह उसे मारने दौड़ा। जैसे ही उसने कन्या को पत्थर पर पटकना चाहा, वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गई और अष्टभुजी देवी (विंध्यवासिनी) के रूप में प्रकट होकर बोली— “अरे मूर्ख कंस! मुझे मारने से क्या होगा? तेरा वध करने वाला तो गोकुल में सुरक्षित पहुँच चुका है।”

अगली सुबह गोकुल में नंद बाबा और यशोदा के घर कृष्ण जन्म का जश्न मनाया गया, और इसी अद्भुत लीला की याद में आज भी जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है।

कृष्ण जन्माष्टमी की संपूर्ण पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)

जन्माष्टमी के दिन भगवान के बाल स्वरूप (लड्डू गोपाल) की पूजा की जाती है। यदि आप घर पर जन्माष्टमी की पूजा कर रहे हैं, तो नीचे दी गई विधि का पालन करें:

ये भी पढ़ें:  Akhand Lakshmi Kripa Mantra Sadhana: कैसे करें? जानें साधना विधि, नियम, लाभ, महत्व और सावधानियां

पूजा की आवश्यक सामग्री (Puja Samagri List)

  • बाल कृष्ण (लड्डू गोपाल) की मूर्ति

  • सुंदर सा झूला या पालना

  • नया पीला वस्त्र (भगवान के लिए)

  • बांसुरी, मोरपंख, और वैजयंती माला

  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, और शक्कर)

  • गंगाजल, साफ जल, और इत्र

  • चंदन, रोली, कुमकुम, और अक्षत (चावल)

  • माखन, मिश्री, धनिया की पंजीरी, और तुलसी दल

  • फल, मिठाइयां (पेड़े), और 56 भोग (यदि संभव हो)

  • दीपक, कपूर, और धूपबत्ती

निशिता काल (मध्यरात्रि) की पूजा विधि

  1. स्थान की शुद्धि: रात 11:30 बजे के आसपास उठकर स्नान करें (यदि संभव हो) और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को साफ करें और फूलों से सजाएं।

  2. चौकी स्थापना: एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान के पालने को रखें।

  3. संकल्प और ध्यान: हाथ में जल और पुष्प लेकर व्रत पूर्ण होने का संकल्प लें और भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करें।

  4. लड्डू गोपाल का अभिषेक: रात के 12 बजते ही, लड्डू गोपाल को एक थाली में बिठाएं। शंख या दक्षिणावर्ती शंख के माध्यम से पहले गंगाजल, फिर पंचामृत, और अंत में शुद्ध जल से भगवान का अभिषेक करें। इस दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का निरंतर जाप करते रहें।

  5. श्रृंगार (Decoration): अभिषेक के बाद भगवान को मुलायम तौलिये से पोंछें। उन्हें नए पीले वस्त्र पहनाएं। मुकुट, बांसुरी, मोरपंख, पायल और वैजयंती माला से उनका सुंदर श्रृंगार करें।

  6. झूला झुलाना: श्रृंगार के बाद कान्हा को पालने में विराजमान करें और उन्हें प्रेम से झूला झुलाएं।

  7. तिलक और भोग (Offering): भगवान को चंदन और कुमकुम का तिलक लगाएं। इसके बाद उन्हें माखन-मिश्री, धनिया की पंजीरी, ताजे फल और मिठाइयों का भोग लगाएं। (ध्यान रहे: भगवान कृष्ण के भोग में तुलसी पत्र अवश्य शामिल करें, इसके बिना वे भोग स्वीकार नहीं करते)।

  8. आरती: घी का दीपक और कपूर जलाकर भगवान श्री कृष्ण की आरती करें (“आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की…”)।

  9. क्षमा प्रार्थना: अंत में पूजा में हुई किसी भी भूल-चूक के लिए भगवान से क्षमा मांगें और अपनी मनोकामना उनके चरणों में रखें।

  10. प्रसाद वितरण: आरती के बाद घर के सभी सदस्यों को पंचामृत और पंजीरी का प्रसाद बांटें।

जन्माष्टमी व्रत के कड़े नियम और सावधानियां (Vrat Rules and Guidelines)

सनातन धर्म में जन्माष्टमी के व्रत को ‘व्रतराज’ (व्रतों का राजा) कहा गया है। यह व्रत बहुत ही पवित्रता और कड़े नियमों के साथ रखा जाता है।

व्रत के प्रकार

  • निर्जला व्रत: यह सबसे कठिन व्रत है, जिसमें भक्त आधी रात (कृष्ण जन्म) तक अन्न और जल दोनों का त्याग करते हैं। रात 12 बजे पूजा के बाद ही चरणामृत ग्रहण कर व्रत पारण किया जाता है।

  • फलाहारी व्रत: जो लोग निर्जला व्रत नहीं रख सकते (बीमार, गर्भवती महिलाएं या बुजुर्ग), वे फलाहार कर सकते हैं। इसमें दिन में फल, दूध, साबूदाना, सिंघाड़े या कुट्टू के आटे से बनी चीजें खाई जा सकती हैं।

ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण नियम

  1. अन्न का पूर्ण निषेध: व्रत के दिन चावल, गेहूं, दाल और किसी भी प्रकार के अन्न का सेवन पूरी तरह से वर्जित है।

  2. सात्विकता: इस दिन मन, वचन और कर्म से सात्विक रहना चाहिए। घर में लहसुन, प्याज, मांस या मदिरा का प्रवेश भी नहीं होना चाहिए।

  3. ब्रह्मचर्य का पालन: व्रत से एक दिन पहले (सप्तमी) से लेकर नवमी तिथि तक पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है।

  4. तुलसी पत्र तोड़ना मना है: जन्माष्टमी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। पूजा के लिए तुलसी पत्र एक दिन पहले ही तोड़ कर रख लेने चाहिए।

  5. किसी का अपमान न करें: इस पावन दिन किसी भी जीव को कष्ट न दें, किसी गरीब या बुजुर्ग का अपमान न करें। ऐसा करने से व्रत का फल नष्ट हो जाता है।

व्रत का पारण (Breaking the Fast)

शास्त्रों के अनुसार, जन्माष्टमी व्रत का पारण अगले दिन (नवमी तिथि) सूर्योदय के बाद और रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने पर किया जाना चाहिए। पारण हमेशा सात्विक भोजन से ही करें।

भारत में जन्माष्टमी का भव्य उत्सव (Janmashtami Celebrations Across India)

श्री कृष्ण का व्यक्तित्व इतना विशाल है कि उन्हें पूरे भारतवर्ष में अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है।

ये भी पढ़ें:  Rambha Apsara Mantra: रम्भा अप्सरा मंत्र, साधना विधि, नियम, सिद्धि, लाभ और सावधानियां

1. मथुरा और वृंदावन का उल्लास

मथुरा, जहां श्री कृष्ण का जन्म हुआ था, और वृंदावन, जहां उन्होंने अपना बचपन बिताया, वहां जन्माष्टमी का नजारा देखने लायक होता है। बांके बिहारी मंदिर और इस्कॉन मंदिर में हफ्तों पहले से तैयारियां शुरू हो जाती हैं। रात 12 बजे जैसे ही भगवान का जन्म होता है, पूरा शहर “नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” के जयकारों से गूंज उठता है।

2. महाराष्ट्र की ‘दही हांडी’ (Dahi Handi)

महाराष्ट्र में जन्माष्टमी के दूसरे दिन ‘दही हांडी’ का आयोजन होता है। यह श्री कृष्ण की माखन चुराने की बाल लीलाओं का प्रतीक है। गोविंदाओं की टोलियां मानव पिरामिड बनाकर ऊंचाई पर बंधी दही और माखन से भरी मटकी को फोड़ती हैं। यह उत्सव भाईचारे, साहस और टीम वर्क का अद्भुत उदाहरण है।

3. गुजरात का द्वारकाधीश मंदिर

श्री कृष्ण की कर्मभूमि और राजधानी ‘द्वारका’ में जन्माष्टमी का उत्सव बहुत ही राजसी अंदाज में मनाया जाता है। यहां भगवान को सोने और हीरों के आभूषणों से सजाया जाता है और द्वारकाधीश मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है।

4. विश्वभर के इस्कॉन मंदिर (ISKCON Temples)

भारत के बाहर भी, दुनिया भर के इस्कॉन मंदिरों में जन्माष्टमी को पूरी वैदिक परंपराओं के साथ मनाया जाता है। कीर्तन, प्रवचन, 56 भोग और मध्यरात्रि की महा-आरती का सीधा प्रसारण दुनिया भर के कृष्ण भक्त देखते हैं।

अष्टकम और मंत्र जाप (Mantras to Chant)

जन्माष्टमी के दिन भगवान को प्रसन्न करने के लिए मंत्र जाप का बहुत महत्व है। इस दिन आप निम्नलिखित सिद्ध मंत्रों का जाप रुद्राक्ष, तुलसी या वैजयंती माला से कर सकते हैं:

  • “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” (यह द्वादशाक्षर मंत्र मोक्ष प्रदायक है)।

  • “कृं कृष्णाय नमः” (यह भगवान कृष्ण का मूल मंत्र है)।

  • “हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे।” (यह महामंत्र मन को असीम शांति प्रदान करता है)।

  • जो दंपत्ति संतान प्राप्ति की कामना रखते हैं, उन्हें इस दिन “संतान गोपाल मंत्र” (ॐ देवकी सुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥) का 108 बार जाप अवश्य करना चाहिए।

कृष्ण जन्माष्टमी (Janmashtami 2026) केवल एक तारीख या व्रत नहीं है, यह हमारे भीतर बैठे ‘कृष्ण तत्व’ को जगाने का दिन है। जिस प्रकार घोर अंधकार और कारागार के कष्टों के बीच भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था, उसी प्रकार यह पर्व हमें संदेश देता है कि हमारे जीवन में कितनी भी निराशा या अंधकार क्यों न हो, ईश्वर का प्रकाश एक दिन अवश्य जन्म लेता है।

वर्ष 2026 में 4 सितंबर को आने वाली इस जन्माष्टमी पर पूरे विधि-विधान से लड्डू गोपाल की पूजा करें, व्रत के नियमों का पालन करें और उनके बताए गए ‘गीता के ज्ञान’ को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें। भगवान द्वारकाधीश आपके जीवन को सुख, शांति, समृद्धि और प्रेम से भर दें, यही हमारी कामना है।

“नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की!”

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs Regarding Janmashtami 2026)

1. 2026 में जन्माष्टमी किस तारीख को मनाई जाएगी?

वर्ष 2026 में कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व 4 सितंबर 2026, शुक्रवार के दिन मनाया जाएगा। स्मार्त और वैष्णव संप्रदाय के अनुसार कई बार अलग-अलग दिन मनाया जाता है, लेकिन मुख्य रूप से अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का शुभ संयोग 4 सितंबर की रात को ही प्राप्त हो रहा है।

2. जन्माष्टमी की रात 12 बजे ही पूजा क्यों की जाती है?

हिंदू धर्मग्रंथों (जैसे श्रीमद्भागवत पुराण) के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को, रोहिणी नक्षत्र में, ठीक मध्यरात्रि (निशिता काल) रात 12 बजे हुआ था। इसलिए उनके जन्मोत्सव की मुख्य पूजा और अभिषेक हमेशा रात 12 बजे ही संपन्न किए जाते हैं।

3. क्या हम जन्माष्टमी के व्रत में पानी पी सकते हैं?

यह आपकी व्रत रखने की क्षमता और संकल्प पर निर्भर करता है। जन्माष्टमी का ‘निर्जला व्रत’ सबसे उत्तम माना जाता है जिसमें आधी रात तक पानी भी नहीं पिया जाता। लेकिन यदि आप शारीरिक रूप से कमजोर हैं, या आपको स्वास्थ्य संबंधी समस्या है, तो आप ‘फलाहारी व्रत’ रख सकते हैं जिसमें जल, दूध और ताजे फलों का सेवन किया जा सकता है।

4. लड्डू गोपाल को जन्माष्टमी पर क्या भोग लगाना चाहिए?

भगवान श्रीकृष्ण को दूध से बनी चीजें अत्यंत प्रिय हैं। जन्माष्टमी के दिन उन्हें विशेष रूप से माखन-मिश्री, धनिया की पंजीरी (जो कि स्वास्थ्यवर्धक भी होती है), खीर, पंचामृत और ताजे फलों का भोग लगाना चाहिए। ध्यान रहे, किसी भी भोग में ‘तुलसी पत्र’ जरूर डालें, तभी भगवान भोग स्वीकार करते हैं।

5. जन्माष्टमी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना मना क्यों है?

शास्त्रों के अनुसार, भगवान विष्णु और उनके अवतारों की पूजा में तुलसी का विशेष महत्व है, लेकिन कुछ विशेष तिथियों जैसे एकादशी, रविवार और भगवान के जन्मोत्सव (जन्माष्टमी, रामनवमी) पर तुलसी के पत्ते तोड़ना वर्जित माना गया है। इसलिए, पूजा के उपयोग के लिए तुलसी के पत्ते एक दिन पहले (सप्तमी तिथि को) ही तोड़ कर रख लेने चाहिए। बासी तुलसी भी पूजा के लिए पवित्र मानी जाती है।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

error: Content is protected !!