सनातन हिंदू धर्म में श्रावण (सावन) का महीना अत्यंत पवित्र माना गया है। यह मास केवल भगवान शिव की आराधना के लिए ही नहीं, बल्कि धन, ऐश्वर्य और सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए भी सर्वश्रेष्ठ है। सावन के महीने में माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए एक अत्यंत प्रभावशाली और मंगलकारी व्रत रखा जाता है, जिसे ‘वरलक्ष्मी व्रत’ (Varalakshmi Vrat) कहा जाता है।
‘वर’ का अर्थ है वरदान और ‘लक्ष्मी’ का अर्थ है धन, सुख और समृद्धि की देवी। अर्थात, वरलक्ष्मी माता लक्ष्मी का वह स्वरूप हैं जो अपने भक्तों को मनचाहा वरदान देती हैं। मुख्य रूप से यह पर्व दक्षिण भारत (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु) में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन अब उत्तर भारत और पूरे विश्व में बसे सनातनी इस व्रत को अत्यधिक श्रद्धा के साथ करते हैं। मान्यता है कि वरलक्ष्मी व्रत करने से अष्टलक्ष्मी (माता लक्ष्मी के आठों स्वरूप) की पूजा का फल एक साथ प्राप्त होता है।
यदि आप भी अपने परिवार में सुख-शांति, आर्थिक समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना रखते हैं, और जानना चाहते हैं कि वर्ष 2026 में वरलक्ष्मी व्रत कब है (Varalakshmi Vrat 2026 Date), इसका शुभ मुहूर्त क्या है, कलश स्थापना की सही पूजा विधि क्या होनी चाहिए और इस दिन की पौराणिक कथा क्या है, तो यह विस्तृत और शोधपरक लेख आपके लिए ही है।
1. वर्ष 2026 में वरलक्ष्मी व्रत कब है? (Varalakshmi Vrat 2026 Date & Muhurat)
हिंदू पंचांग के अनुसार, वरलक्ष्मी व्रत श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि (रक्षाबंधन) से ठीक पहले आने वाले शुक्रवार को मनाया जाता है।
वैदिक पंचांग की गणनाओं के अनुसार, वर्ष 2026 में श्रावण पूर्णिमा (रक्षाबंधन) 28 अगस्त (शुक्रवार) को है। नियमानुसार, पूर्णिमा से पहले आने वाला शुक्रवार वरलक्ष्मी व्रत का दिन होता है। अतः वर्ष 2026 में वरलक्ष्मी व्रत 21 अगस्त 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा।
वरलक्ष्मी व्रत 2026: पूजा के शुभ मुहूर्त की तालिका (Puja Muhurat Table)
वरलक्ष्मी पूजा हमेशा स्थिर लग्न में करना सबसे उत्तम माना जाता है, क्योंकि स्थिर लग्न में पूजा करने से माता लक्ष्मी घर में स्थायी रूप से वास करती हैं। 21 अगस्त 2026 के लिए पूजा के शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं:
| पूजा का समय (Lagna / Time) | मुहूर्त का समय (Muhurat Timings) | महत्व (Significance) |
| सिंह लग्न (प्रातःकाल पूजा) | सुबह 06:15 बजे से 08:30 बजे तक | यह समय सूर्योदय के बाद का अत्यंत शुभ और स्थिर लग्न होता है। |
| वृश्चिक लग्न (मध्याह्न पूजा) | दोपहर 12:45 बजे से 03:00 बजे तक | दोपहर के समय यह लग्न लक्ष्मी प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ माना गया है। |
| कुंभ लग्न (गोधूलि/संध्या पूजा) | शाम 06:50 बजे से रात 08:20 बजे तक | कामकाजी महिलाओं के लिए संध्या काल का यह स्थिर लग्न सर्वोत्तम है। |
| वृषभ लग्न (मध्यरात्रि पूजा) | रात 11:25 बजे से 01:20 बजे (अगले दिन) तक | इसे महानिशीथ काल कहा जाता है, जो तांत्रिक और गुप्त पूजा के लिए है। |
(नोट: अपने शहर की भौगोलिक स्थिति के अनुसार इन मुहूर्तों में 5-10 मिनट का अंतर आ सकता है। आप अपनी सुविधा और समय के अनुसार किसी भी एक स्थिर लग्न में पूजा कर सकते हैं।)
2. वरलक्ष्मी व्रत का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व (Significance of Varalakshmi Vrat)
वरलक्ष्मी व्रत केवल एक उपवास नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण साधना है। भविष्य पुराण और स्कंद पुराण में इस व्रत की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है।
अष्टलक्ष्मी की प्राप्ति (Blessings of Ashtalakshmi)
इस व्रत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वरलक्ष्मी की पूजा करने से माता लक्ष्मी के आठों स्वरूपों (अष्टलक्ष्मी) की पूजा का फल स्वतः ही मिल जाता है। ये आठ स्वरूप हैं:
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आदि लक्ष्मी: आध्यात्मिक शांति और मोक्ष देने वाली।
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धन लक्ष्मी: भौतिक धन और आर्थिक समृद्धि प्रदान करने वाली।
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धान्य लक्ष्मी: घर में अन्न के भंडार भरने वाली।
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गज लक्ष्मी: राजसत्ता, पशुधन और वाहन सुख देने वाली।
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संतान लक्ष्मी: योग्य और स्वस्थ संतान का आशीर्वाद देने वाली।
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वीर/धैर्य लक्ष्मी: संकटों से लड़ने का साहस देने वाली।
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विजय लक्ष्मी: जीवन के हर क्षेत्र (मुकदमे, परीक्षा) में विजय दिलाने वाली।
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विद्या लक्ष्मी: ज्ञान, कला और कौशल प्रदान करने वाली।
अखंड सौभाग्य और पारिवारिक शांति
सुहागिन महिलाएं यह व्रत मुख्य रूप से अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और घर में शांति बनाए रखने के लिए करती हैं। मान्यता है कि जिस घर में वरलक्ष्मी का व्रत होता है, वहां दरिद्रता, कलह और अकाल मृत्यु का कभी प्रवेश नहीं होता।
3. वरलक्ष्मी व्रत की पूजा सामग्री (Varalakshmi Puja Samagri List)
इस पूजा में माता लक्ष्मी का ‘कलश’ (Sacred Pot) तैयार किया जाता है, जिसके लिए कुछ विशेष सामग्रियों की आवश्यकता होती है। पूजा से एक दिन पहले (गुरुवार को) ही यह सामग्री एकत्रित कर लें:
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कलश के लिए: एक चांदी, तांबे या पीतल का कलश (लोहे या स्टील का न लें)।
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सजावट के लिए: माता वरलक्ष्मी का मुखौटा (Face of Goddess – चांदी, पीतल या मिट्टी का), आम या अशोक के 5 या 7 पत्ते, एक पानी वाला नारियल।
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पूजा की वस्तुएं: हल्दी, कुमकुम, रोली, अक्षत (बिना टूटे चावल), चंदन, कपूर, धूपबत्ती, और गाय का शुद्ध घी।
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श्रृंगार का सामान: माता के लिए नई लाल या गुलाबी चुनरी, चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर, और आभूषण।
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पवित्र धागा (नोनक/दोरक): पीले रंग का सूती धागा जिसमें 9 गांठें लगी हों (इसे सुहागिनें अपने दाहिने हाथ में बांधती हैं)।
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भोग (नैवेद्य): ताजे फल, केले, पान के पत्ते, सुपारी, कमलगट्टा, कौड़ियां, और विशेष रूप से घर की बनी खीर, पूरन पोली या मोदक।
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फूल: लाल कमल का फूल, गुलाब, और गेंदे के फूल।
4. वरलक्ष्मी व्रत की संपूर्ण पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)
वरलक्ष्मी व्रत की पूजा अत्यंत पवित्रता और भक्ति भाव से की जाती है। कलश स्थापना इस पूजा का सबसे मुख्य अंग है। नीचे दी गई शास्त्र-सम्मत विधि का पालन करें:
चरण 1: प्रातःकालीन स्नान और संकल्प
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व्रत वाले दिन (21 अगस्त 2026) सूर्योदय से पूर्व उठें। पूरे घर और विशेषकर पूजा स्थल (ईशान कोण) की अच्छी तरह सफाई करें।
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स्नान के जल में थोड़ा सा गंगाजल और हल्दी मिलाकर स्नान करें। स्वच्छ रेशमी या सूती वस्त्र (लाल, गुलाबी या पीले रंग के) धारण करें।
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हाथ में जल, अक्षत और एक पुष्प लेकर संकल्प लें: “हे माता वरलक्ष्मी! मैं (अपना नाम और गोत्र), अपने परिवार के कल्याण, अखंड सौभाग्य और सुख-समृद्धि के लिए आज वरलक्ष्मी व्रत का संकल्प लेती हूँ। कृपया मेरी पूजा स्वीकार करें।”
चरण 2: कलश स्थापना (Kalash Sthapana)
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एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला रेशमी कपड़ा बिछाएं। उस पर चावल (अक्षत) से एक अष्टदल कमल (आठ पंखुड़ियों वाला कमल) बनाएं।
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कलश को अच्छी तरह साफ करके उस पर हल्दी-कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं।
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कलश के अंदर शुद्ध जल, एक सिक्का, एक सुपारी, हल्दी की गांठ, दूर्वा और थोड़े से अक्षत डालें।
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कलश के मुख पर आम के 5 पत्ते (पल्लव) रखें।
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एक पानी वाले नारियल पर हल्दी का लेप लगाएं और उस पर माता वरलक्ष्मी का मुखौटा (Face) सजाएं। यदि मुखौटा नहीं है, तो नारियल पर कुमकुम से माता की आंखें और नाक बना सकते हैं।
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इस नारियल को कलश के ऊपर (आम के पत्तों के बीच) स्थापित कर दें। माता को चुनरी ओढ़ाएं और आभूषण पहनाएं।
चरण 3: प्रथम पूज्य गणेश जी की पूजा
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कलश के पास ही थोड़े से चावल रखकर भगवान गणेश की मूर्ति या सुपारी रूपी गणेश जी स्थापित करें।
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सबसे पहले विघ्नहर्ता भगवान गणेश का ध्यान करें। उन्हें जल, हल्दी, कुमकुम, दूर्वा, पुष्प और गुड़ का भोग लगाएं। “ॐ गं गणपतये नमः” का जाप करें।
चरण 4: माता वरलक्ष्मी का आवाहन और षोडशोपचार पूजा
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माता वरलक्ष्मी का आवाहन करें और प्रार्थना करें कि वे कलश में विराजमान हों।
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माता को जल, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से स्नान (प्रतीकात्मक) कराएं।
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उन्हें कुमकुम का तिलक लगाएं। कमल का फूल और गुलाब की माला पहनाएं।
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अक्षत (चावल) छोड़ते हुए माता के अष्ट स्वरूपों (आदि, धन, धान्य, गज, संतान, वीर, विजय, विद्या लक्ष्मी) का स्मरण करें।
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इसके बाद माता को धूप, दीप (गाय के घी का) दिखाएं।
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पवित्र धागा (दोरक/तोरण) की पूजा: पीले धागे को माता के चरणों में रखें, उसकी पूजा करें और फिर उसे अपने दाहिने हाथ की कलाई पर बांध लें। यह धागा रक्षा और सौभाग्य का प्रतीक है।
चरण 5: भोग (नैवेद्य) और आरती
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माता को खीर, पूरन पोली, ताजे फल, पान-सुपारी और नारियल का भोग लगाएं।
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पूजा स्थल पर बैठकर वरलक्ष्मी व्रत कथा का पाठ करें या सुनें।
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अंत में माता वरलक्ष्मी और भगवान विष्णु की कपूर से आरती करें।
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हाथ जोड़कर अपनी भूल-चूक की क्षमा मांगें। शाम के समय (चंद्रोदय के बाद) या अगले दिन सुबह व्रत का पारण करें।
(नोट: अगले दिन कलश के जल को पूरे घर में छिड़क दें और नारियल को प्रसाद के रूप में परिवार में बांट दें या प्रवाहित कर दें।)
5. वरलक्ष्मी व्रत की पौराणिक कथा (The Vrat Katha)
किसी भी व्रत का पूर्ण फल उसकी कथा को सुने बिना प्राप्त नहीं होता। वरलक्ष्मी व्रत की यह प्राचीन कथा इस प्रकार है:
कथा (चारुमती की भक्ति):
पौराणिक काल में मगध देश में कौंडिन्यपुर (Kaundinyapura) नाम का एक अत्यंत सुंदर और समृद्ध नगर था। उस नगर में ‘चारुमती’ नाम की एक कुलीन, संस्कारी और पतिव्रता स्त्री रहती थी। चारुमती का हृदय अत्यंत पवित्र था। वह अपने पति, सास-ससुर की पूरे मन से सेवा करती थी और हमेशा ईश्वर की भक्ति में लीन रहती थी।
चारुमती के सद्गुणों और उसकी निस्वार्थ सेवा से माता लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न हुईं। एक रात जब चारुमती गहरी नींद में सो रही थी, तब माता वरलक्ष्मी ने उसके स्वप्न में दर्शन दिए। माता का स्वरूप अत्यंत अलौकिक था। उन्होंने चारुमती से कहा, “हे पुत्री! मैं तुम्हारी भक्ति और सेवा भाव से बहुत प्रसन्न हूँ। मैं वरलक्ष्मी हूँ। श्रावण मास की पूर्णिमा से पहले आने वाले शुक्रवार को तुम मेरा व्रत और पूजा करो। ऐसा करने से तुम्हें और तुम्हारे परिवार को मनचाहा वरदान मिलेगा और जीवन भर धन-धान्य की कभी कमी नहीं होगी।”
माता ने चारुमती को स्वप्न में ही पूजा की पूरी विधि भी बताई। अगले दिन सुबह चारुमती ने उठकर अपने पति और सास-ससुर को यह स्वप्न सुनाया। सभी ने इस शुभ स्वप्न को माता का आशीर्वाद माना। चारुमती ने अपनी सहेलियों और नगर की अन्य स्त्रियों को भी इस व्रत के बारे में बताया।
जब श्रावण पूर्णिमा से पहले वाला शुक्रवार आया, तो चारुमती ने नगर की सभी सुहागिन स्त्रियों के साथ मिलकर पूरे विधि-विधान से कलश स्थापित किया और माता वरलक्ष्मी की पूजा की। उन्होंने नौ गांठों वाला पवित्र धागा अपने हाथों में बांधा और माता को मीठे पकवानों का भोग लगाया।
पूजा समाप्त होते ही एक बहुत बड़ा चमत्कार हुआ। चारुमती और वहां उपस्थित सभी स्त्रियों के शरीर अचानक स्वर्ण और रत्नों के आभूषणों से सज गए। उनके घर धन, धान्य और सोने-चांदी से भर गए। नगर की दरिद्रता दूर हो गई।
इस चमत्कार को देखकर सभी स्त्रियां माता वरलक्ष्मी की जय-जयकार करने लगीं। उसी दिन से कौंडिन्यपुर से शुरू होकर यह वरलक्ष्मी व्रत पूरे ब्रह्मांड में प्रसिद्ध हो गया।
कथा सुनने के बाद कहें: “हे माता वरलक्ष्मी! जिस प्रकार आपने चारुमती और नगर की स्त्रियों पर कृपा की, उसी प्रकार इस कथा को कहने वाले, सुनने वाले और हुंकारा भरने वाले सभी भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखना।”
6. माता लक्ष्मी की असीम कृपा प्राप्त करने के अचूक उपाय (Special Remedies)
यदि आप आर्थिक तंगी, कर्ज या पारिवारिक क्लेश से गुजर रहे हैं, तो वरलक्ष्मी व्रत (21 अगस्त 2026) के दिन इन विशेष उपायों (Upay) को अवश्य आजमाएं:
I. कमल गट्टे और कौड़ी का उपाय (For Wealth Accumulation)
वरलक्ष्मी पूजा के दौरान माता लक्ष्मी के कलश के पास 11 कमल गट्टे (कमल के बीज) और 5 पीली कौड़ियां रखें। पूजा के बाद इन कौड़ियों और कमल गट्टों को एक लाल रेशमी कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी या धन रखने वाले स्थान (Cash Box) पर रख दें। यह उपाय घर में धन को बांधकर रखता है और फालतू खर्चों को रोकता है।
II. श्री सूक्तम का पाठ (For Eradicating Poverty)
ऋग्वेद में माता लक्ष्मी की स्तुति के लिए ‘श्री सूक्त’ (Sri Suktam) को सबसे शक्तिशाली माना गया है। वरलक्ष्मी व्रत की शाम (गोधूलि बेला) में घी का दीपक जलाकर श्री सूक्त का 11 बार पाठ करें। मान्यता है कि इसका पाठ करने से जन्म-जन्मांतर की दरिद्रता भी नष्ट हो जाती है।
III. दक्षिणावर्ती शंख से अभिषेक (For Career & Business Growth)
भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को दक्षिणावर्ती शंख अत्यंत प्रिय है। पूजा के समय एक दक्षिणावर्ती शंख में थोड़ा सा कच्चा दूध, केसर और गंगाजल मिलाकर कलश या श्री यंत्र पर अभिषेक करें। इससे व्यापार में आ रही रुकावटें दूर होती हैं और नौकरी में पदोन्नति (Promotion) के योग बनते हैं।
IV. खीर का भोग और कन्या पूजन (For Family Harmony)
माता लक्ष्मी को मखाने या चावल की खीर बहुत पसंद है (जिसमें केसर डला हो)। वरलक्ष्मी व्रत की शाम को माता को इस खीर का भोग लगाएं और उसके बाद आस-पास की छोटी कन्याओं (9 वर्ष से कम आयु) को यह खीर खिलाएं और उन्हें श्रद्धानुसार कुछ दक्षिणा या लाल वस्त्र भेंट करें। इससे घर के क्लेश समाप्त होते हैं और दांपत्य जीवन मधुर बनता है।
7. वरलक्ष्मी व्रत के कड़े नियम और सावधानियां (Strict Rules of the Vrat)
व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए कुछ नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है:
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सात्विकता (Purity): व्रत के दिन (और एक दिन पूर्व से ही) घर में मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज का प्रयोग पूर्णतः वर्जित है।
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क्रोध का त्याग: माता लक्ष्मी वहां कभी नहीं ठहरतीं जहां कलह, चीख-पुकार या महिलाओं का अपमान होता है। व्रत के दिन घर का माहौल पूर्णतः शांत, सकारात्मक और भक्तिमय होना चाहिए।
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उपवास का नियम: यह व्रत सुबह से लेकर शाम की पूजा तक निर्जला या फलाहारी रखा जाता है। बीमार, गर्भवती या बुजुर्ग महिलाएं दूध, फल और साबूदाना ग्रहण कर सकती हैं।
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काले वस्त्रों का निषेध: पूजा के समय या व्रत के दिन काले, गहरे नीले या भूरे रंग के वस्त्र न पहनें। माता की पूजा में सुहाग के रंगों (लाल, हरा, पीला) का ही प्रयोग करें।
Varalakshmi Vrat 2026 केवल एक उपवास नहीं है, बल्कि यह माता लक्ष्मी के प्रति हमारे अटूट समर्पण और कृतज्ञता को व्यक्त करने का एक महापर्व है। 21 अगस्त 2026 को आने वाला यह पावन दिन हमें अवसर देता है कि हम अपने जीवन की दरिद्रता, नकारात्मकता और दुखों को दूर कर अष्टलक्ष्मी की शक्तियों को अपने घर में आमंत्रित करें।
जिस प्रकार माता वरलक्ष्मी ने चारुमती की भक्ति से प्रसन्न होकर उसके जीवन को स्वर्ण से भर दिया था, उसी प्रकार यदि आप भी पूर्ण पवित्रता, श्रद्धा और निष्काम भाव से यह व्रत करेंगे, तो आपके जीवन में कभी धन, सुख और शांति की कमी नहीं रहेगी।
इस वर्ष वरलक्ष्मी व्रत पर कलश स्थापना करें, पवित्र धागा बांधें और पूरे विश्वास के साथ माता को पुकारें। माता लक्ष्मी आपके घर को ऐश्वर्य और आपके परिवार को अखंड सौभाग्य से भर दें, यही हमारी मंगल कामना है।
“ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्।”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs on Varalakshmi Vrat 2026)
प्रश्न 1: वर्ष 2026 में वरलक्ष्मी व्रत (Varalakshmi Vrat) किस तारीख को है?
उत्तर: हिंदू पंचांग के नियमानुसार, वरलक्ष्मी व्रत श्रावण मास की पूर्णिमा (रक्षाबंधन) से ठीक पहले आने वाले शुक्रवार को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में रक्षाबंधन 28 अगस्त को है, अतः वरलक्ष्मी व्रत 21 अगस्त 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा।
प्रश्न 2: वरलक्ष्मी व्रत कौन कर सकता है? क्या कुंवारी कन्याएं यह व्रत रख सकती हैं?
उत्तर: मुख्य रूप से यह व्रत सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु और पारिवारिक सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है। लेकिन कुंवारी कन्याएं भी अच्छे वर (योग्य जीवनसाथी) की प्राप्ति और विद्या/करियर में सफलता के लिए यह व्रत पूरे विधि-विधान से रख सकती हैं। पुरुष भी अपनी पत्नी के साथ इस पूजा में सम्मिलित हो सकते हैं।
प्रश्न 3: वरलक्ष्मी व्रत के दिन कलाई पर बांटे जाने वाले पवित्र धागे (दोरक) का क्या महत्व है?
उत्तर: पूजा के दौरान माता के चरणों में पीले रंग का एक सूती धागा रखा जाता है जिसमें 9 गांठें लगी होती हैं (ये 9 गांठें माता के विभिन्न स्वरूपों का प्रतीक हैं)। पूजा के बाद महिलाएं इसे अपने दाहिने हाथ की कलाई पर बांधती हैं। यह धागा (दोरक) एक रक्षा-कवच का काम करता है, जो बुरी नजर, रोगों और संकटों से बचाता है।
प्रश्न 4: यदि किसी कारणवश श्रावण के इस शुक्रवार को व्रत न कर पाएं, तो क्या करें?
उत्तर: यदि आप मासिक धर्म (Periods), सूतक-पातक या किसी बीमारी के कारण श्रावण पूर्णिमा से पहले वाले शुक्रवार को यह व्रत नहीं कर पाती हैं, तो आप श्रावण मास के ही किसी अन्य शुक्रवार को, या फिर नवरात्रि के शुक्रवार को माता वरलक्ष्मी के नाम का संकल्प लेकर यह व्रत और पूजा कर सकती हैं।
प्रश्न 5: वरलक्ष्मी पूजा में कलश (Kalash) के ऊपर नारियल रखना क्यों आवश्यक है?
उत्तर: कलश को ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है, जिसमें मौजूद जल समुद्र (क्षीरसागर) का प्रतीक है (जहां से माता लक्ष्मी उत्पन्न हुई थीं)। कलश के ऊपर रखा गया पानी वाला नारियल माता लक्ष्मी के सिर (मस्तिष्क) का प्रतीक है, और आम के पत्ते उनके हाथ-पैर माने जाते हैं। इसलिए कलश और नारियल की स्थापना के बिना वरलक्ष्मी की यह साकार पूजा अधूरी मानी जाती है।