Shri Veerabhadra Sahasranamavali (श्री वीरभद्र सहस्रनामावली): पाठ कैसे करें? जानें साधना विधि, नियम, लाभ, महत्व और सावधानियांIt takes 41 minutes... to read this article !

सनातन धर्म, शैव परंपरा और तंत्र-आगम शास्त्रों के अनंत आध्यात्मिक आकाश में, जब बात अजेय शत्रुओं के संहार, अकारण आने वाली विपत्तियों (अकाल मृत्यु) से रक्षा, तंत्र-मंत्र (काले जादू) के पूर्ण विनाश, और भक्तों के प्रति असीम रक्षक-वात्सल्य की आती है, तो भगवान शिव के रुद्रावतार भगवान श्री वीरभद्र (Lord Veerabhadra) का स्मरण सर्वोपरि है।

पौराणिक कथाओं (शिव महापुराण) के अनुसार, जब प्रजापति दक्ष ने अपने महायज्ञ में भगवान शिव का घोर अपमान किया और उस अपमान से व्यथित होकर माता सती ने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए, तब भगवान शिव का क्रोध अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया। उन्होंने अपनी एक जटा (बाल) उखाड़कर पर्वत पर पटकी, जिससे दो भयंकर शक्तियां उत्पन्न हुईं—एक महाकाली (भद्रकाली) और दूसरे भगवान वीरभद्र। वीरभद्र का स्वरूप अत्यंत विशाल, भयंकर, सहस्त्र भुजाओं वाला और प्रलयंकारी था। उन्होंने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया और अहंकार रूपी दक्ष का मस्तक धड़ से अलग कर दिया। भगवान वीरभद्र शिव के ‘क्रोध’ और ‘न्याय’ के साक्षात स्वरूप हैं।

मनुष्य का जीवन कई बार ऐसे अंधकारमय मोड़ पर आ खड़ा होता है जहाँ हर तरफ से निराशा, प्राणघातक शत्रु, अकारण मुकदमों (Court Cases) का जाल, भयंकर कर्ज, और नकारात्मक शक्तियों (Evil forces) की छाया मंडराने लगती है। जब बड़े-बड़े अनुष्ठान और उपाय काम नहीं करते, जब ऐसा लगे कि चारों ओर अन्याय हो रहा है और कोई रक्षक नहीं है, तब भगवान वीरभद्र की शरण में जाना साक्षात महाकाल को अपने पक्ष में कर लेने के समान है। भगवान वीरभद्र की इसी अजेय तांत्रिक ऊर्जा, उनके अनंत वात्सल्य, और उनकी त्वरित (Instant) रक्षा-शक्ति को अपने भीतर जाग्रत करने के लिए सिद्ध योगियों और शैव आगम ग्रंथों में उनके एक हज़ार (1000) परम पवित्र, जाग्रत और अत्यंत शक्तिशाली नामों का संकलन किया गया है, जिसे शास्त्रों में ‘श्री वीरभद्र सहस्रनामावली’ (Shri Veerabhadra Sahasranamavali) के नाम से जाना जाता है।

‘सहस्रनामावली’ का अर्थ है— एक हज़ार नामों की वह पवित्र श्रृंखला जिसका उपयोग भगवान के अर्चन (पूजा, बिल्वपत्र या पुष्प अर्पित करने) और नाम-जप के लिए किया जाता है (जिसमें प्रत्येक नाम के अंत में ‘नमः’ लगाया जाता है, जैसे- ॐ वीरभद्राय नमः, ॐ महाकालाय नमः)। यह कोई साधारण स्तुति नहीं है; यह एक ऐसा जाग्रत महामंत्र, एक ऐसा अभेद्य अग्नि-कवच है, जो जीवन के भयंकर से भयंकर संकटों, शत्रुओं के षड्यंत्रों और कर्म बंधनों को पल भर में भस्म कर देता है।

 श्री वीरभद्र सहस्रनामावलिः हिंदी | Shri Virabhadra Sahasranamavali

 श्री शिवाय गुरवे

श्री वीरभद्रसहस्रनामादि कदम्बं

श्री वीरभद्रसहस्रनामावलिः ।

॥ प्रारम्भः ॥

अस्य श्रीवीरभद्रसहस्रनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य नारायण ऋषिः ।
अनुष्टुप् छन्दः । श्रीवीरभद्रो देवता । श्रीं बीजम् । ह्रीं शक्तिः । रं कीलकम् ।

ममोपात्त दुरितक्षयार्धं चिन्तितफलावाप्त्यर्थं अनन्तकोटि
ब्रह्माण्डस्थित देवर्षि राक्षसोरग तिर्यङ्मनुष्यादि सर्वप्राणिकोटि
क्षेमस्थैर्य विजयायुरारोग्यैश्वर्याभिवृध्यर्थं कल्पयुग
मन्वन्तराद्यनेककाल स्थितानेकजन्मजन्मान्तरार्जित पापपञ्जर द्वारा
समागत-आगामिसञ्चितप्रारब्धकर्म वशात्सम्भवित ऋणरोगदारिद्र्यजार
चोर मारीभय, अग्निभय-अतिशीत वातो ष्णादि भय क्षाम डामर
युद्धशस्त्रमन्त्रयन्त्र तन्त्रादि सर्व भय निवारणार्थं कामक्रोधलोभ
मोहमद मात्सर्य राग द्वेषादर्पासूय, अहङ्कारादि, अन्तश्शतृ
विनाशनार्थं-कालत्रय कर्म त्रयावस्थात्रय बाधित षडूर्मि
सप्तव्यसनेन्द्रिय दुर्विकार दुर्गुण दुरहङ्कार दुर्भ्रम दुरालोचन –
दुष्कर्म दुरापेक्षा दुराचारादि सर्वदुर्गुण परिहारार्थं परदारगमन
परद्रव्यापहरण, अभक्ष्या भक्षण, जीवहिंसादि कायिकदोष –
अनुचितत्व – निष्ठुर ता पैशून्यादि वाचिकदोष-जनविरुद्द कार्यापेक्ष
अनिष्ट चिन्तन धनकाङ्क्षादि मानस दोष परिहारार्थं देहाभिमान मति
मान्द्य, जडभाव निद्रा निषिद्धकर्म, आलस्य-चपलत्व -कृतघ्नता,
विश्वास घातुकता पिशुनत्व, दुराशा, मात्सर्य, अप्रलाप, अनृत,
पारुष्य, वक्रत्व, मौर्ख्य, पण्डितमानित्व, दुर्मोहादि तामसगुणदोष
परिहारार्थं, अश्रेयो, दुर्मद, दुरभिमान, वैर, निर्दाक्षिण्य,
निष्कारुण्य, दुष्काम्य, कापट्य, कोप, शोक, डम्बादि रजोगुण दोष
निर्मूल नार्थं, जन्मजन्मान्त रार्जित महापात कोपपातक सङ्कीर्ण
पातक, मिश्रपातकादि समस्त पाप परिहारार्थं, देहप्राण मनो
बुद्धीन्द्रि यादि दुष्ट सङ्कल्प विकल्पनादि दुष्कर्मा चरणागत दुःख
नाशनार्थं, वृक्ष विष बीज विषफल विषसस्य विषपदार्थ,
विषजीवजन्तुविषबुध्यादि सर्वविष विनाशनार्थं सकलचराचर
वस्तुपदार्थजीवसङ्कल्प कर्मफलानुभव, श‍ृङ्गार सुगन्धामृत
भक्तिज्ञानानन्द वैभव प्राप्त्यर्थं, शुद्धसात्विकशरीर प्राणमनो
बुद्धीन्द्रिय, पिपीलिकादि ब्रह्म पर्यन्त, सर्वप्रकृति स्वाभाविक
विरति, विवेक, वितरण, विनय, दया, सौशील्य, मेधा प्रज्ञा
धृति, स्मृति, शुद्धि, सिद्धि, सुविद्या, सुतेजस्सुशक्ति,
सुलक्ष्मी, सुज्ञान, सुविचार, सुलक्षण, सुकर्म, सत्य, शौच,
शान्त, शम, दम, क्षमा, तितीक्ष, समाधान, उपरति, धर्म,
स्थैर्य, दान, आस्तिक, भक्तिश्रद्धा, विश्वास, प्रेम, तपो,
योग, सुचित्त, सुनिश्चयादि, सकल सम्पद्गुणा वाप्त्यर्थं, निरन्तर
सर्वकाल सर्वावस्थ, शिवाशिवचरणारविन्द पूजा भजन सेवासक्त
निश्चल भक्तिश्रद्धाभिवृध्यनुकूल चित्त प्राप्त्यर्थं, नित्य त्रिकाल
षट्काल गुरुलिङ्ग जङ्गम सेवारति षड्विध लिङ्गार्चनार्पणानुकूल सेवा
परतन्त्र सद्गुणयुक्त, सती सुत क्षेत्र विद्या बल यव्वन पूजोपकरण
भोगोपकरण सर्व पदार्थालनु कूलता प्राप्त्यर्थम् ।

श्रीमदनन्तकोटि ब्रह्माण्डस्थितानन्तकोटि महापुण्यतीर्थ क्षेत्रपर्वत पट्टणारण्य
ग्रामगृह देहनिवास, असं ख्याककोटि शिवलिङ्ग पूजाभोगनिमित्त
सेवानु कूल पिपीलिकादि ब्रह्म पर्यन्तस्थित सर्वप्राणिकोटि संरक्षणार्थं
भक्त संरक्षणार्थ मङ्गी कृतानन्दकल्याण गुणयुत, उपमानरहित,
अपरिमित सौन्दर्यदिव्यमङ्गल विग्रहस्वरूप श्री भद्रकाली सहित
श्रीवीरभद्रेश्वर प्रत्यक्ष लीलावतारचरणारविन्द यथार्थ
दर्शनार्थं श्रीवीरभद्रस्वामि प्रीत्यर्थं सकलविधफल पुरुषार्थ
सिद्ध्यर्थं श्रीवीरभद्रसहस्रनाममन्त्रजपं करिष्ये ।

अथ श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ शम्भवे नमः ।

ॐ शिवाय नमः ।

ॐ महादेवाय नमः ।

ॐ शितिकण्ठाय नमः ।

ॐ वृषध्वजाय नमः ।

ॐ दक्षाध्वरहराय नमः ।

ॐ दक्षाय नमः ।

ॐ क्रूरदानवभञ्जनाय नमः ।

ॐ कपर्दिने नमः ।

ॐ कालविध्वंसिने नमः । १० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ कपालिने नमः ।

ॐ करुणार्णवाय नमः ।

ॐ शरणागतरक्षैकनिपुणाय नमः ।

ॐ नीललोहिताय नमः ।

ॐ निरीशाय नमः ।

ॐ निर्भयाय नमः ।

ॐ नित्याय नमः ।

ॐ नित्यतृप्ताय नमः ।

ॐ निरामयाय नमः ।

ॐ गम्भीरनिनदाय नमः । २० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ भीमाय नमः ।

ॐ भयङ्करस्वरूपधृते नमः ।

ॐ पुरन्दरादि गीर्वाणवन्द्यमानपदाम्बुजाय नमः ।

ॐ संसारवैद्याय नमः ।

ॐ सर्वज्ञाय नमः ।

ॐ सर्वभेषजभेषजाय नमः ।

ॐ मृत्युञ्जयाय नमः ।

ॐ कृत्तिवाससे नमः ।

ॐ त्र्यम्बकाय नमः ।

ॐ त्रिपुरान्तकाय नमः । ३० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ वृन्दारवृन्दमन्दाराय नमः ।

ॐ मन्दाराचलमण्डनाय नमः ।

ॐ कुन्देन्दुहारनीहारहारगौरसमप्रभाय नमः ।

ॐ राजराजसखाय नमः ।

ॐ श्रीमते नमः ।

ॐ राजीवायतलोचनाय नमः ।

ॐ महानटाय नमः ।

ॐ महाकालाय नमः ।

ॐ महासत्याय नमः ।

ॐ महेश्वराय नमः । ४० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ उत्पत्तिस्थितिसंहारकारणाय नमः ।

ॐ आनन्दकर्मकाय नमः ।

ॐ साराय नमः ।

ॐ शूराय नमः ।

ॐ महाधीराय नमः ।

ॐ वारिजासनपूजिताय नमः ।

ॐ वीरसिंहासनारूढाय नमः ।

ॐ वीरमौलिशिखामणये नमः ।

ॐ वीरप्रियाय नमः ।

ॐ वीररसाय नमः । ५० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ वीरभाषणतत्पराय नमः ।

ॐ वीरसङ्ग्रामविजयिने नमः ।

ॐ वीराराधनतोषिताय नमः ।

ॐ वीरव्रताय नमः ।

ॐ विराड्रूपाय नमः ।

ॐ विश्वचैतन्यरक्षकाय नमः ।

ॐ वीरखड्गाय नमः ।

ॐ भारशराय नमः ।

ॐ मेरुकोदण्डमण्डिताय नमः ।

ॐ वीरोत्तमाङ्गाय नमः । ६० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ श‍ृङ्गारफलकाय नमः ।

ॐ विविधायुधाय नमः ।

ॐ नानासनाय नमः ।

ॐ नतारातिमण्डलाय नमः ।

ॐ नागभूषणाय नमः ।

ॐ नारदस्तुतिसन्तुष्टाय नमः ।

ॐ नागलोकपितामहाय नमः ।

ॐ सुदर्शनाय नमः ।

ॐ सुधाकायाय नमः ।

ॐ सुरारातिविमर्दनाय नमः । ७० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ असहायाय नमः ।

ॐ परस्मै नमः ।

ॐ सर्वसहायाय नमः ।

ॐ साम्प्रदायकाय नमः ।

ॐ कामदाय नमः ।

ॐ विषभुजे नमः ।

ॐ योगिने नमः ।

ॐ भोगीन्द्राञ्चितकुण्डलाय नमः ।

ॐ उपाध्यायाय नमः ।

ॐ दक्षरिपवे नमः ।८० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ कैवल्यनिधये नमः ।

ॐ अच्युताय नमः ।

ॐ सत्त्वाय नमः ।

ॐ रजसे नमः ।

ॐ तमसे नमः ।

ॐ स्थूलाय नमः ।

ॐ सूक्ष्माय नमः ।

ॐ अन्तर्बहिरव्ययाय नमः ।

ॐ भुवे नमः ।

ॐ अद्भ्यः नमः । ९० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ ज्वलनाय नमः ।

ॐ वायवे नमः ।

ॐ गगनाय नमः ।

ॐ त्रिजगद्गुरवे नमः ।

ॐ निराधाराय नमः ।

ॐ निरालम्बाय नमः ।

ॐ सर्वाधाराय नमः ।

ॐ सदाशिवाय नमः ।

ॐ भास्वराय नमः ।

ॐ भगवते नमः । १०० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ भालनेत्राय नमः ।

ॐ भावजसंहराय नमः ।

ॐ व्यालबद्धजटाजूटाय नमः ।

ॐ बालचन्द्रशिखामणये नमः ।

ॐ अक्षय्याय नमः ।

ॐ एकाक्षराय नमः ।

ॐ दुष्टशिक्षकाय नमः ।

ॐ शिष्टरक्षिताय नमः ।

ॐ दक्षपक्षेषुबाहुल्यवनलीलागजाय नमः ।

ॐ ऋजवे नमः । ११० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ यज्ञाङ्गाय नमः ।

ॐ यज्ञभुजे नमः ।

ॐ यज्ञाय नमः ।

ॐ यज्ञेशाय नमः ।

ॐ यजनेश्वराय नमः ।

ॐ महायज्ञधराय नमः ।

ॐ दक्षसम्पूर्णाहूतिकौशलाय नमः ।

ॐ मायामयाय नमः ।

ॐ महाकायाय नमः ।

ॐ मायातीताय नमः । १२० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ मनोहराय नमः ।

ॐ मारदर्पहराय नमः ।

ॐ मञ्जवे नमः ।

ॐ महीसुतदिनप्रियाय नमः ।

ॐ सौम्याय नमः । (काम्यायः)

ॐ समाय नमः ।

ॐ असमाय नमः । (अनघाय)

ॐ अनन्ताय नमः ।

ॐ समानरहिताय नमः ।

ॐ हराय नमः । १३० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ सोमाय नमः ।

ॐ अनेककलाधाम्ने नमः ।

ॐ व्योमकेशाय नमः ।

ॐ निरञ्जनाय नमः ।

ॐ गुरवे नमः ।

ॐ सुरगुरवे नमः ।

ॐ गूढाय नमः ।

ॐ गुहाराधनतोषिताय नमः ।

ॐ गुरुमन्त्राक्षराय नमः ।

ॐ गुरवे नमः । १४० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ पराय नमः ।

ॐ परमकारणाय नमः ।

ॐ कलये नमः ।

ॐ कलाढ्याय नमः ।

ॐ नीतिज्ञाय नमः ।

ॐ करालासुरसेविताय नमः ।

ॐ कमनीयरविच्छायाय नमः ।

ॐ नन्दनानन्दवर्धनाय नमः । नमः ।

ॐ स्वभक्तपक्षाय नमः ।

ॐ प्रबलाय नमः । १५० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ स्वभक्तबलवर्धनाय नमः ।

ॐ स्वभक्तप्रतिवादिने नमः ।

ॐ इन्द्रमुखचन्द्रवितुन्तुदाय नमः ।

ॐ शेषभूषाय नमः ।

ॐ विशेषज्ञाय नमः ।

ॐ तोषिताय नमः ।

ॐ सुमनसे नमः ।

ॐ सुधिये नमः ।

ॐ दूषकाभिजनोद्धूतधूमकेतवे नमः ।

ॐ सनातनाय नमः । १६० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ दूरीकृताघपटलाय नमः ।

ॐ चोरीकृताय नमः ।

ॐ सुखप्रजाय नमः ।

ॐ पूरीकृतेषुकोदण्डाय नमः ।

ॐ निर्वैरीकृतसङ्गराय नमः ।

ॐ ब्रह्मविदे नमः ।

ॐ ब्राह्मणाय नमः ।

ॐ ब्रह्मणे नमः ।

ॐ ब्रह्मचारिणे नमः ।

ॐ जगत्पतये नमः । १७० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ ब्रह्मेश्वराय नमः ।

ॐ ब्रह्ममयाय नमः ।

ॐ परब्रह्मात्मकाय नमः ।

ॐ प्रभवे नमः ।

ॐ नादप्रियाय नमः ।

ॐ नादमयाय नमः ।

ॐ नादबिन्दवे नमः ।

ॐ नगेश्वराय नमः ।

ॐ आदिमध्यान्तरहिताय नमः ।

ॐ वेदाय नमः । १८० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ वेदविदां वराय नमः ।

ॐ इष्टाय नमः ।

ॐ विशिष्टाय नमः ।

ॐ तुष्टघ्नाय नमः ।

ॐ पुष्टिदाय नमः ।

ॐ पुष्टिवर्धनाय नमः ।

ॐ कष्टदारिद्र्यनिर्नाशाय नमः ।

ॐ दुष्टव्याधिहराय नमः ।

ॐ हराय नमः ।

ॐ पद्मासनाय नमः । १९० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ पद्मकराय नमः ।

ॐ नवपद्मासनार्चिताय नमः ।

ॐ नीलाम्बुजदलश्यामाय नमः ।

ॐ निर्मलाय नमः ।

ॐ भक्तवत्सलाय नमः ।

ॐ नीलजीमूतसङ्काशाय नमः ।

ॐ कालकन्धरबन्धुराय नमः ।

ॐ जपाकुसुमसन्तुष्टाय नमः ।

ॐ जपहोमार्च्चनप्रियाय नमः ।

ॐ जगदादये नमः । २०० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ अनादीशाय नमः ।

ॐ अजगवन्धरकौतुकाय नमः ।

ॐ पुरन्दरस्तुतानन्दाय नमः ।

ॐ पुलिन्दाय नमः ।

ॐ पुण्यपञ्जराय नमः ।

ॐ पौलस्त्यचलितोल्लोलपर्वताय नमः ।

ॐ प्रमदाकराय नमः ।

ॐ करणाय नमः ।

ॐ कारणाय नमः ।

ॐ कर्मकरणीयाग्रण्यै नमः ।२१० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ दृढाय नमः ।

ॐ करिदैत्येन्द्रवसनाय नमः ।

ॐ करुणापूरवारिधये नमः ।

ॐ कोलाहलप्रियाय नमः ।

ॐ प्रीताय नमः ।

ॐ शूलिने नमः ।

ॐ व्यालकपालभृते नमः ।

ॐ कालकूटगलाय नमः ।

ॐ क्रीडालीलाकृतजगत्त्रयाय नमः ।

ॐ दिगम्बराय नमः । २२० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ दिनेशेशाय नमः ।

ॐ धीमते नमः ।

ॐ धीराय नमः ।

ॐ धुरन्धराय नमः ।

ॐ दिक्कालाद्यनवच्छिन्नाय नमः ।

ॐ धूर्जटये नमः ।

ॐ धूतदुर्गतये नमः ।

ॐ कमनीयाय नमः ।

ॐ करालास्याय नमः ।

ॐ कलिकल्मषसूदनाय नमः । २३० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ करवीरारुणाम्भोजकल्हारकुसुमार्पिताय नमः ।

ॐ खराय नमः ।

ॐ मण्डितदोर्दण्डाय नमः ।

ॐ खरूपाय नमः ।

ॐ कालभञ्जनाय नमः ।

ॐ खरांशुमण्डलमुखाय नमः ।

ॐ खण्डितारातिमण्डलाय नमः ।

ॐ गणेशगणिताय नमः ।

ॐ अगण्याय नमः ।

ॐ पुण्यराशये नमः । २४० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ सुखोदयाय नमः ।

ॐ गणाधिपकुमारादिगणकैरवबान्धवाय नमः ।

ॐ घनघोषबृहन्नादघनीकृतसुनूपुराय नमः ।

ॐ घनचर्चितसिन्दूराय नमः ।

ॐ घण्टाभीषणभैरवाय नमः ।

ॐ परापराय नमः ।

ॐ बलाय नमः ।

ॐ अनन्ताय नमः ।

ॐ चतुराय नमः ।

ॐ चक्रबन्धकाय नमः । २५० ।

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श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ चतुर्मुखमुखाम्भोजचतुरस्तुतितोषणाय नमः ।

ॐ छलवादिने नमः ।

ॐ छलाय नमः ।

ॐ शान्ताय नमः ।

ॐ छान्दसाय नमः ।

ॐ छान्दसप्रियाय नमः ।

ॐ छिन्नच्छलादिदुर्वादच्छिन्नषट्तन्त्रतान्त्रिकाय नमः ।

ॐ जडीकृतमहावज्राय नमः ।

ॐ जम्भारातये नमः ।

ॐ नतोन्नताय नमः । २६० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ जगदाधाराय नमः ।

ॐ भूतेशाय नमः ।

ॐ जगदन्ताय नमः ।

ॐ निरञ्जनाय नमः ।

ॐ झर्झरध्वनिसम्युक्तझङ्काररवभूषणाय नमः ।

ॐ झटिने नमः ।

ॐ विपक्षवृक्षौघझञ्झामारुतसन्निभाय नमः ।

ॐ प्रवर्णाञ्चितपत्राङ्काय नमः ।

ॐ प्रवर्णाद्यक्षरव्रजाय नमः ।

ॐ ट-वर्णबिन्दुसम्युक्ताय नमः । २७० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ टङ्कारहृतदिग्गजाय नमः ।

ॐ ठ-वर्णपूरद्विदळाय नमः ।

ॐ ठ-वर्णाग्रदळाक्षराय नमः ।

ॐ ठ-वर्णयुतसद्यन्त्राय नमः ।

ॐ ठज-जाक्षरपूरकाय नमः ।

ॐ डमरुध्वनिसम्रक्ताय नमः ।

ॐ डम्बरानन्दताण्डवाय नमः ।

ॐ डण्डण्ढघोषप्रमोदाडम्बराय नमः ।

ॐ गणताण्डवाय नमः ।

ॐ ढक्कापटहसुप्रीताय नमः । २८० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ ढक्कारववशानुगाय नमः ।

ॐ ढक्कादिताळसन्तुष्टाय नमः ।

ॐ तोडिबद्धस्तुतिप्रियाय नमः ।

ॐ तपस्विरूपाय नमः ।

ॐ तपनाय नमः । (तापसाय)

ॐ तप्तकाञ्चनसन्निभाय नमः ।

ॐ तपस्विवदनाम्भोजकारुण्यतरणिद्युतये नमः ।

ॐ ढगादिवादसौहार्दस्थिताय नमः ।

ॐ सम्यमिनां वराय नमः ।

ॐ स्थाणवे नमः । २९० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ तण्डुनुतिप्रीताय नमः ।

ॐ स्थितये नमः ।

ॐ स्थावराय नमः ।

ॐ जङ्गमाय नमः ।

ॐ दरहासाननाम्भोजदन्तहीरावळिद्युतये नमः ।

ॐ दर्वीकराङ्गतभुजाय नमः ।

ॐ दुर्वाराय नमः ।

ॐ दुःखदुर्गघ्ने नमः ।

ॐ धनाधिपसख्ये नमः ।

ॐ धीराय नमः ।३०० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ धर्माधर्मपरायणाय नमः ।

ॐ धर्मध्वजाय नमः ।

ॐ दानशौण्डाय नमः ।

ॐ धर्मकर्मफलप्रदाय नमः ।

ॐ पशुपाशहाराय नमः ।

ॐ शर्वाय नमः ।

ॐ परमात्मने नमः ।

ॐ सदाशिवाय नमः ।

ॐ परापराय नमः ।

ॐ परशुधृते नमः । ३१० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ पवित्राय नमः ।

ॐ सर्वपावनाय नमः ।

ॐ फल्गुनस्तुतिसन्तुष्टाय नमः ।

ॐ फल्गुनाग्रजवत्सलाय नमः ।

ॐ फल्गुनार्जितसङ्ग्रामफलपाशुपतप्रदाय नमः ।

ॐ बलाय नमः ।

ॐ बहुविलासाङ्गाय नमः ।

ॐ बहुलीलाधराय नमः ।

ॐ बहवे नमः ।

ॐ बर्हिर्मुखाय नमः । ३२० । 

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ सुराराध्याय नमः ।

ॐ बलिबन्धनबान्धवाय नमः ।

ॐ भयङ्कराय नमः ।

ॐ भवहराय नमः ।

ॐ भर्गाय नमः ।

ॐ भयहराय नमः ।

ॐ भवाय नमः ।

ॐ भालानलाय नमः ।

ॐ बहुभुजाय नमः ।

ॐ भास्वते नमः । ३३० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ सद्भक्तवत्सलाय नमः ।

ॐ मन्त्राय नमः ।

ॐ मन्त्रगणाय नमः ।

ॐ मन्त्रिणे नमः ।

ॐ मन्त्राराधनतोषिताय नमः ।

ॐ मन्त्रयज्ञाय नमः ।

ॐ मन्त्रवादिने नमः ।

ॐ मन्त्रबीजाय नमः ।

ॐ महन्महसे नमः । (महन्मानसे)

ॐ यन्त्राय नमः । ३४० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ यन्त्रमयाय नमः ।

ॐ यन्त्रिणे नमः ।

ॐ यन्त्रज्ञाय नमः ।

ॐ यन्त्रवत्सलाय नमः ।

ॐ यन्त्रपालाय नमः ।

ॐ यन्त्रहराय नमः ।

ॐ त्रिजगद्यन्त्रवाहकाय नमः ।

ॐ रजताद्रिसदावासाय नमः ।

ॐ रवीन्दुशिखिलोचनाय नमः ।

ॐ रतिश्रान्ताय नमः । ३५० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ जितश्रान्ताय नमः ।

ॐ रजनीकरशेखराय नमः ।

ॐ ललिताय नमः ।

ॐ लास्यसन्तुष्टाय नमः ।

ॐ लब्धोग्राय नमः ।

ॐ लघुसाहसाय नमः ।

ॐ लक्ष्मीनिजकराय नमः ।

ॐ लक्ष्यलक्षणज्ञाय नमः ।

ॐ लसन्मतये नमः ।

ॐ वरिष्ठाय नमः । ३६० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ वरदाय नमः ।

ॐ वन्द्याय नमः ।

ॐ वरदानपराय नमः । नमः ।

ॐ वशिने नमः ।

ॐ वैश्वानराञ्चितभुजाय नमः ।

ॐ वरेण्याय नमः ।

ॐ विश्वतोमुखाय नमः ।

ॐ शरणार्तिहराय नमः ।

ॐ शान्ताय नमः ।

ॐ शङ्कराय नमः । ३७० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ शशिशेखराय नमः ।

ॐ शरभाय नमः ।

ॐ शम्बरारातये नमः ।

ॐ भस्मोद्धूळितविग्रहाय नमः ।

ॐ षट्त्रिंशत्तत्त्वविद्रूपाय नमः ।

ॐ षण्मुखस्तुतितोषणाय नमः ।

ॐ षडक्षराय नमः ।

ॐ शक्तियुताय नमः ।

ॐ षट्पदाद्यर्थकोविदाय नमः ।

ॐ सर्वज्ञाय नमः । ३८० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ सर्वसर्वेशाय नमः ।

ॐ सर्वदाऽऽनन्दकारकाय नमः ।

ॐ सर्वविदे नमः ।

ॐ सर्वकृते नमः ।

ॐ सर्वस्मै नमः ।

ॐ सर्वदाय नमः ।

ॐ सर्वतोमुखाय नमः ।

ॐ हराय नमः ।

ॐ परमकल्याणाय नमः ।

ॐ हरिचर्मधराय नमः । ३९० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ परस्मैय नमः ।

ॐ हरिणार्धकराय नमः ।

ॐ हंसाय नमः ।

ॐ हरिकोटिसमप्रभाय नमः ।

ॐ देवदेवाय नमः ।

ॐ जगन्नाथाय नमः ।

ॐ देवेशाय नमः ।

ॐ देववल्लभाय नमः ।

ॐ देवमौलिशिखारत्नाय नमः ।

ॐ देवासुरसुतोषिताय नमः ।४०० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ सुरूपाय नमः ।

ॐ सुव्रताय नमः ।

ॐ शुद्धाय नमः ।

ॐ सुकर्मणे नमः ।

ॐ सुस्थिराय नमः ।

ॐ सुधिये नमः ।

ॐ सुरोत्तमाय नमः ।

ॐ सुफलदाय नमः ।

ॐ सुरचिन्तामणये नमः ।

ॐ शुभाय नमः । ४१० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ कुशलिने नमः ।

ॐ विक्रमाय नमः ।

ॐ तर्क्काय नमः ।

ॐ कुण्डलीकृतकुण्डलिने नमः ।

ॐ खण्डेन्दुकारकाय नमः ।

ॐ जटाजूटाय नमः ।

ॐ कालानलद्युतये नमः ।

ॐ व्याघ्रचर्माम्बरधराय नमः ।

ॐ व्याघ्रोग्रबहुसाहसाय नमः ।

ॐ व्याळोपवीतिने नमः ।४२० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ विलसच्छोणतामरसाम्बकाय नमः ।

ॐ द्युमणये नमः ।

ॐ तरणये नमः ।

ॐ वायवे नमः ।

ॐ सलिलाय नमः ।

ॐ व्योम्ने नमः ।

ॐ पावकाय नमः ।

ॐ सुधाकराय नमः ।

ॐ यज्ञपतये नमः ।

ॐ अष्टमूर्तये नमः । ४३० ।

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली

ॐ कृपानिधये नमः ।

ॐ चिद्रूपाय नमः ।

ॐ चिद्घनानन्दकन्दाय नमः ।

ॐ चिन्मयाय नमः ।

ॐ निष्कलाय नमः ।

ॐ निर्द्वन्द्वाय नमः ।

ॐ निष्प्रभाय नमः ।

ॐ नित्याय नमः ।

ॐ निर्गुणाय नमः ।

ॐ निर्गतामयाय नमः । ४४० ।

ॐ व्योमकेशाय नमः ।

ॐ विरूपाक्षाय नमः ।

ॐ वामदेवाय नमः ।

ॐ निरञ्जनाय नमः ।

ॐ नामरूपाय नमः ।

ॐ शमधुराय नमः ।

ॐ कामचारिणे नमः ।

ॐ कलाधराय नमः ।

ॐ जाम्बूनदप्रभाय नमः ।

ॐ जाग्रज्जन्मादिरहिताय नमः ।४५० ।

ॐ उज्ज्वलाय नमः ।

ॐ सर्वजन्तूनां जनकाय नमः ।

ॐ जन्मदुःखापनोदनाय नमः ।

ॐ पिनाकपाणये नमः ।

ॐ अक्रोधाय नमः ।

ॐ पिङ्गलायतलोचनाय नमः ।

ॐ परमात्मने नमः ।

ॐ पशुपतये नमः ।

ॐ पावनाय नमः ।

ॐ प्रमथाधिपाय नमः । ४६० ।

ॐ प्रणवाय नमः ।

ॐ कामदाय नमः ।

ॐ कान्ताय नमः ।

ॐ श्रीप्रदाय नमः ।

ॐ दिव्यलोचनाय नमः ।

ॐ प्रणतार्तिहराय नमः ।

ॐ प्राणाय नमः ।

ॐ परञ्ज्योतिषे नमः ।

ॐ परात्पराय नमः ।

ॐ तुष्टाय नमः । ४७० ।

ॐ तुहिनशैलाधिवासाय नमः ।

ॐ स्तोतृवरप्रदाय नमः ।

ॐ इष्टकाम्यार्थफलदाय नमः ।

ॐ सृष्टिकर्त्रे नमः ।

ॐ मरुत्पतये नमः ।

ॐ भृग्वत्रिकण्वजाबालिहृत्पद्माहिमदीधितये नमः ।

ॐ क्रतुध्वंसिने नमः ।

ॐ क्रतुमुखाय नमः ।

ॐ क्रतुकोटिफलप्रदाय नमः । ४८० ।

ॐ क्रतवे नमः ।

ॐ क्रतुमयाय नमः ।

ॐ क्रूरदर्पघ्नाय नमः ।

ॐ विक्रमाय नमः ।

ॐ विभवे नमः ।

ॐ दधीचिहृदयानन्दाय नमः ।

ॐ दधीच्यादिसुपालकाय नमः ।

ॐ दधीचिवाञ्छितसखाय नमः ।

ॐ दधीचिवरदाय नमः ।

ॐ अनघाय नमः । ४९० ।

ॐ सत्पथक्रमविन्यासाय नमः ।

ॐ जटामण्डलमण्डिताय नमः ।

ॐ साक्षित्रयीमयाय नमः ।

ॐ चारुकलाधरकपर्दभृते नमः ।

ॐ मार्कण्डेयमुनिप्रीताय नमः ।

ॐ मृडाय नमः ।

ॐ जितपरेतराजे नमः ।

ॐ महीरथाय नमः ।

ॐ वेदहयाय नमः ।

ॐ कमलासनसारथये नमः । ५०० ।

ॐ कौण्डिन्यवत्सवात्सल्याय नमः ।

ॐ काश्यपोदयदर्पणाय नमः ।

ॐ कण्वकौशिकदुर्वासाहृद्गुहान्तर्निधये नमः ।

ॐ निजाय नमः ।

ॐ कपिलाराधनप्रीताय नमः ।

ॐ कर्पूरधवलद्युतये नमः ।

ॐ करुणावरुणाय नमः ।

ॐ काळीनयनोत्सवसङ्गराय नमः ।

ॐ घृणैकनिलयाय नमः ।

ॐ गूढतनवे नमः । ५१० ।

ॐ मुरहरप्रियाय नमः ।

ॐ गणाधिपाय नमः ।

ॐ गुणनिधये नमः ।

ॐ गम्भीराञ्चितवाक्पतये नमः ।

ॐ विघ्ननाशाय नमः ।

ॐ विशालाक्षाय नमः ।

ॐ विघ्नराजाय नमः ।

ॐ विशेषविदे नमः ।

ॐ सप्तयज्ञयजाय नमः ।

ॐ सप्तजिह्वाय नमः ।५२० ।

ॐ जिह्वातिसंवराय नमः ।

ॐ अस्थिमालाऽऽविलशिरसे नमः ।

ॐ विस्तारितजगद्भुजाय नमः ।

ॐ न्यस्ताखिलस्रजस्तोकविभवाय नमः ।

ॐ प्रभवे नमः ।

ॐ ईश्वराय नमः ।

ॐ भूतेशाय नमः ।

ॐ भुवनाधाराय नमः ।

ॐ भूतिदाय नमः ।

ॐ भूतिभूषणाय नमः । ५३० ।

ॐ भूतात्मकात्मकाय नमः ।

ॐ भूर्भुवादि क्षेमकराय नमः ।

ॐ शिवाय नमः ।

ॐ अणोरणीयसे नमः ।

ॐ महतो महीयसे नमः ।

ॐ वागगोचराय नमः ।

ॐ अनेकवेदवेदान्ततत्त्वबीजाय नमः ।

ॐ तपोनिधये नमः ।

ॐ महावनविलासाय नमः ।

ॐ अतिपुण्यनाम्ने नमः । ५४० ।

ॐ सदाशुचये नमः ।

ॐ महिषासुरमर्दिन्याः नयनोत्सवसङ्गराय नमः ।

ॐ शितिकण्ठाय नमः ।

ॐ शिलादादि महर्षिनतिभाजनाय नमः ।

ॐ गिरीशाय नमः ।

ॐ गीष्पतये नमः ।

ॐ गीतवाद्यनृत्यस्तुतिप्रियाय नमः । नमः ।

ॐ सुकृतिभिः अङ्गीकृताय नमः ।

ॐ श‍ृङ्गाररसजन्मभुवे नमः ।

ॐ भृङ्गीताण्डवसन्तुष्ठाय नमः । ५५० ।

ॐ मङ्गलाय नमः ।

ॐ मङ्गलप्रदाय नमः ।

ॐ मुक्तेन्द्रनीलताटङ्काय नमः ।

ॐ मुक्ताहारविभूषिताय नमः ।

ॐ सक्तसज्जनसद्भावाय नमः ।

ॐ भुक्तिमुक्तिफलप्रदाय नमः ।

ॐ सुरूपाय नमः ।

ॐ सुन्दराय नमः ।

ॐ शुक्लाय नमः ।

ॐ धर्माय नमः । ५६० ।

ॐ सुकृतविग्रहाय नमः ।

ॐ जितामरद्रुमाय नमः ।

ॐ सर्वदेवराजाय नमः ।

ॐ असमेक्षणाय नमः ।

ॐ दिवस्पतिसहस्राक्षवीक्षणावळितोषकाय नमः ।

ॐ दिव्यनामामृतरसाय नमः ।

ॐ दिवाकरपतये नमः ।

ॐ प्रभवे नमः ।

ॐ पावकप्राणसन्मित्राय नमः ।

ॐ प्रख्यातोर्ध्वज्वलन्महसे नमः ।५७० ।

ॐ प्रकृष्टभानवे नमः ।

ॐ पुरुषाय नमः ।

ॐ पुरोडाशभुजे ईश्वराय नमः ।

ॐ समवर्तिने नमः ।

ॐ पितृपतये नमः ।

ॐ धर्मराट्शमनाय नमः ।

ॐ यमिने नमः ।

ॐ पितृकाननसन्तुष्टाय नमः ।

ॐ भूतनायकनायकाय नमः ।

ॐ नयान्विताय नमः । (नतानुयायिने) ५८० ।

ॐ सुरपतये नमः ।

ॐ नानापुण्यजनाश्रयाय नमः ।

ॐ नैरृत्यादि महाराक्षसेन्द्रस्तुतयशोऽम्बुधये नमः ।

ॐ प्रचेतसे नमः ।

ॐ जीवनपतये नमः ।

ॐ धृतपाशाय नमः ।

ॐ दिगीश्वराय नमः ।

ॐ धीरोदारगुणाम्भोधिकौस्तुभाय नमः ।

ॐ भुवनेश्वराय नमः ।

ॐ सदानुभोगसम्पूर्णसौहार्दाय नमः ।५९० ।

ॐ सुमनोज्ज्वलाय नमः ।

ॐ सदागतये नमः ।

ॐ साररसाय नमः ।

ॐ सजगत्प्राणजीवनाय नमः ।

ॐ राजराजाय नमः ।

ॐ किन्नरेशाय नमः ।

ॐ कैलासस्थाय नमः ।

ॐ धनप्रदाय नमः ।

ॐ यक्षेश्वरसखाय नमः ।

ॐ कुक्षिनिक्षिप्तानेकविस्मयाय नमः । ६०० ।

ॐ ईशानाय नमः ।

ॐ सर्वविद्यानामीश्वराय नमः ।

ॐ वृषलाञ्छनाय नमः ।

ॐ इन्द्रादिदेवविलसन्मौलिरम्यपदाम्बुजाय नमः ।

ॐ विश्वकर्माऽऽश्रयाय नमः ।

ॐ विश्वतोबाहवे नमः ।

ॐ विश्वतोमुखाय नमः ।

ॐ विश्वतः प्रमदाय नमः ।

ॐ विश्वनेत्राय नमः ।

ॐ विश्वेश्वराय नमः । ६१० ।

ॐ विभवे नमः ।

ॐ सिद्धान्ताय नमः ।

ॐ सिद्धसङ्कल्पाय नमः ।

ॐ सिद्धगन्धर्वसेविताय नमः ।

ॐ सिद्धिदाय नमः ।

ॐ शुद्धहृदयाय नमः ।

ॐ सद्योजाताननाय नमः ।

ॐ शिवाय नमः ।

ॐ श्रीमयाय नमः ।

ॐ श्रीकटाक्षाङ्गाय नमः । ६२० ।

ॐ श्रीनाम्ने नमः ।

ॐ श्रीगणेश्वराय नमः ।

ॐ श्रीदाय नमः ।

ॐ श्रीवामदेवास्याय नमः ।

ॐ श्रीकण्ठाय नमः ।

ॐ श्रीप्रियङ्कराय नमः ।

ॐ घोराघध्वान्तमार्ताण्डाय नमः ।

ॐ घोरेतरफलप्रदाय नमः ।

ॐ घोरघोरमहायन्त्रराजाय नमः ।

ॐ घोरमुखाम्बुजाय नमः । नमः ।६३० ।

ॐ सुषिरसुप्रीततत्त्वाद्यागमजन्मभुवे नमः ।

ॐ तत्त्वमस्यादि वाक्यार्थाय नमः ।

ॐ तत्पूर्वमुखमण्डिताय नमः ।

ॐ आशापाशविनिर्मुक्ताय नमः ।

ॐ शेषभूषणभूषिताय नमः ।

ॐ दोषाकरलसन्मौलये नमः ।

ॐ ईशानमुखनिर्मलाय नमः ।

ॐ पञ्चवक्त्राय नमः ।

ॐ दशभुजाय नमः ।

ॐ पञ्चाशद्वर्णनायकाय नमः । ६४० ।

ॐ पञ्चाक्षरयुताय नमः ।

ॐ पञ्चापञ्चसुलोचनाय नमः ।

ॐ वर्णाश्रमगुरवे नमः ।

ॐ सर्ववर्णाधाराय नमः ।

ॐ प्रियङ्कराय नमः ।

ॐ कर्णिकारार्कदुत्तूरपूर्णपूजाफलप्रदाय नमः ।

ॐ योगीन्द्रहृदयानन्दाय नमः ।

ॐ योगिने नमः ।

ॐ योगविदां वराय नमः ।

ॐ योगध्यानादिसन्तुष्टाय नमः । ६५० ।

ॐ रागादिरहिताय नमः ।

ॐ रमाय नमः ।

ॐ भवाम्भोधिप्लवाय नमः ।

ॐ बन्धमोचकाय नमः ।

ॐ भद्रदायकाय नमः ।

ॐ भक्तानुरक्ताय नमः ।

ॐ भव्याय नमः ।

ॐ सद्भक्तिदाय नमः ।

ॐ भक्तिभावनाय नमः ।

ॐ अनादिनिधनाय नमः । ६६० ।

ॐ अभीष्टाय नमः ।

ॐ भीमकान्ताय नमः ।

ॐ अर्जुनाय नमः ।

ॐ बलाय नमः ।

ॐ अनिरुद्धाय नमः ।

ॐ सत्यवादिने नमः ।

ॐ सदानन्दाश्रयाय नमः ।

ॐ अनघाय नमः ।

ॐ सर्वविद्यानामालयाय नमः ।

ॐ सर्वकर्मणामाधाराय नमः ।६७० ।

ॐ सर्वलोकानामालोकाय नमः ।

ॐ महात्मनामाविर्भावाय नमः ।

ॐ इज्यापूर्तेष्टफलदाय नमः ।

ॐ इच्छाशक्त्यादिसंश्रयाय नमः ।

ॐ इनाय नमः ।

ॐ सर्वामराराध्याय नमः ।

ॐ ईश्वराय नमः ।

ॐ जगदीश्वराय नमः ।

ॐ रुण्डपिङ्गलमध्यस्थाय नमः ।

ॐ रुद्राक्षाञ्चितकन्धराय नमः ।६८० ।

ॐ रुण्डिताधारभक्त्यादिरीडिताय नमः ।

ॐ सवनाशनाय नमः ।

ॐ उरुविक्रमबाहुल्याय नमः ।

ॐ उर्व्याधाराय नमः ।

ॐ धुरन्धराय नमः ।

ॐ उत्तरोत्तरकल्याणाय नमः ।

ॐ उत्तमोत्तमनायकाय नमः ।

ॐ ऊरुजानुतडिद्वृन्दाय नमः ।

ॐ ऊर्ध्वरेतसे नमः । ६९० ।

ॐ मनोहराय नमः ।

ॐ ऊहितानेकविभवाय नमः ।

ॐ ऊहिताम्नायमण्डलाय नमः ।

ॐ ऋषीश्वरस्तुतिप्रीताय नमः ।

ॐ ऋषिवाक्यप्रतिष्ठिताय नमः ।

ॐ ॠगादिनिगमाधाराय नमः ।

ॐ ऋजुकर्मणे नमः ।

ॐ मनोजवाय नमः ।

ॐ रूपादिविषयाधाराय नमः ।

ॐ रूपातीताय नमः । ७०० ।

ॐ ऋषीश्वराय नमः ।

ॐ रूपलावण्यसम्युक्ताय नमः ।

ॐ रूपानन्दस्वरूपधृते नमः ।

ॐ लुलितानेकसङ्ग्रामाय नमः ।

ॐ लुप्यमानरिपुवज्राय नमः ।

ॐ लुप्तक्रूरान्धकहरायय नमः ।

ॐ लूकाराञ्चितयन्त्रधृते नमः ।

ॐ लूकारादिव्याधिहराय नमः ।

ॐ लूस्वराञ्चितयन्त्रयुजे नमः ।

ॐ लूशादि गिरिशाय नमः । ७१० ।

ॐ पक्षाय नमः ।

ॐ खलवाचामगोचराय नमः ।

ॐ एष्यमाणाय नमः ।

ॐ नतजन एकच्चिताय नमः ।

ॐ दृढव्रताय नमः ।

ॐ एकाक्षरमहाबीजाय नमः ।

ॐ एकरुद्राय नमः ।

ॐ अद्वितीयकाय नमः ।

ॐ ऐश्वर्यवर्णनामाङ्काय नमः ।

ॐ ऐश्वर्यप्रकरोज्ज्वलाय नमः । ७२० ।

ॐ ऐरावणादि लक्ष्मीशाय नमः ।

ॐ ऐहिकामुष्मिकप्रदात्रे नमः ।

ॐ ओषधीशशिखारत्नाय नमः ।

ॐ ओङ्काराक्षरसम्युताय नमः ।

ॐ सकलदेवानामोकसे नमः ।

ॐ ओजोराशये नमः ।

ॐ अजाद्यजाय नमः ।

ॐ औदार्यजीवनपराय नमः ।

ॐ औचित्यमणिजन्मभुवे नमः ।

ॐ उदासीनैकगिरिशाय नमः ।७३० ।

ॐ उत्सवोत्सवकारणाय नमः ।

ॐ अङ्गीकृतषडङ्गाङ्गाय नमः ।

ॐ अङ्गहारमहानटाय नमः ।

ॐ अङ्गजाङ्गजभस्माङ्गाय नमः ।

ॐ मङ्गलायतविग्रहाय नमः ।

ॐ कः किं त्वदनु देवेशाय नमः ।

ॐ कः किन्नु वरदप्रदाय नमः ।

ॐ कः किन्नु भक्तसन्तापहराय नमः ।

ॐ कारुण्यसागराय नमः ।

ॐ स्तोतुमिच्छूनां स्तोतव्याय नमः । ७४० ।

ॐ शरणार्थिनां मन्तव्याय नमः ।

ॐ ध्यानैकनिष्ठानां ध्येयाय नमः ।

ॐ धाम्नः परमपूरकाय नमः ।

ॐ भगनेत्रहराय नमः ।

ॐ पूताय नमः ।

ॐ साधुदूषकभीषणाय नमः ।

ॐ भद्रकाळीमनोराजाय नमः ।

ॐ हंसाय नमः ।

ॐ सत्कर्मसारथये नमः ।

ॐ सभ्याय नमः । ७५० ।

ॐ साधवे नमः ।

ॐ सभारत्नाय नमः ।

ॐ सौन्दर्यगिरिशेखराय नमः ।

ॐ सुकुमाराय नमः ।

ॐ सौख्यकराय नमः ।

ॐ सहिष्णवे नमः ।

ॐ साध्यसाधनाय नमः ।

ॐ निर्मत्सराय नमः ।

ॐ निष्प्रपञ्चाय नमः ।

ॐ निर्लोभाय नमः । ७६० ।

ॐ निर्गुणाय नमः ।

ॐ नयाय नमः ।

ॐ वीताभिमानाय नमः ।

ॐ निर्जाताय नमः ।

ॐ निरातङ्काय नमः ।

ॐ निरञ्जनाय नमः ।

ॐ कालत्रयाय नमः ।

ॐ कलिहराय नमः ।

ॐ नेत्रत्रयविराजिताय नमः ।

ॐ अग्नित्रयनिभाङ्गाय नमः । ७७० ।

ॐ भस्मीकृतपुरत्रयाय नमः ।

ॐ कृतकार्याय नमः ।

ॐ व्रतधराय नमः ।

ॐ व्रतनाशाय नमः ।

ॐ प्रतापवते नमः ।

ॐ निरस्तदुर्विधये नमः ।

ॐ निर्गताशाय नमः ।

ॐ निर्वाणनीरधये नमः ।

ॐ सर्वहेतूनां निदानाय नमः ।

ॐ निश्चितार्थेश्वरेश्वराय नमः । ७८० ।

ॐ अद्वैतशाम्भवमहसे नमः ।

ॐ सनिर्व्याजाय नमः ।

ॐ ऊर्ध्वलोचनाय नमः ।

ॐ अपूर्वपूर्वाय नमः ।

ॐ परमाय नमः ।

ॐ सपूर्वाय नमः ।

ॐ पूर्वपूर्वदिशे नमः ।

ॐ अतीन्द्रियाय नमः ।

ॐ सत्यनिधये नमः ।

ॐ अखण्डानन्दविग्रहाय नमः । ७९० ।

ॐ आदिदेवाय नमः ।

ॐ प्रसन्नात्मने नमः ।

ॐ आराधकजनेष्टदाय नमः ।

ॐ सर्वदेवमयाय नमः ।

ॐ सर्वस्मै नमः ।

ॐ जगद्व्यासाय नमः ।

ॐ सुलक्षणाय नमः ।

ॐ सर्वान्तरात्मने नमः ।

ॐ सदृशाय नमः ।

ॐ सर्वलोकैकपूजिताय नमः । ८०० ।

ॐ पुराणपुरुषाय नमः ।

ॐ पुण्याय नमः ।

ॐ पुण्यश्लोकाय नमः ।

ॐ सुधामयाय नमः ।

ॐ पूर्वापरज्ञाय नमः ।

ॐ पुरजिते नमः ।

ॐ पूर्वदेवामरार्चिताय नमः ।

ॐ प्रसन्नदर्शितमुखाय नमः ।

ॐ पन्नगावळिभूषणाय नमः ।

ॐ प्रसिद्धाय नमः । ८१० ।

ॐ प्रणताधाराय नमः ।

ॐ प्रलयोद्भूतकारणाय नमः ।

ॐ ज्योतिर्मयाय नमः ।

ॐ ज्वलद्दंष्ट्राय नमः ।

ॐ ज्योतिर्मालावळीवृताय नमः ।

ॐ जाज्ज्वल्यमानाय नमः ।

ॐ ज्वलननेत्राय नमः ।

ॐ जलधरद्युतये नमः ।

ॐ कृपाम्भोराशये नमः ।

ॐ अम्लानाय नमः । ८२० ।

ॐ वाक्यपुष्टाय नमः ।

ॐ अपराजिताय नमः ।

ॐ क्षपाकराय नमः ।

ॐ अर्ककोटिप्रभाकराय नमः ।

ॐ करुणाकराय नमः ।

ॐ एकमूर्तये नमः ।

ॐ त्रिधामूर्तये नमः ।

ॐ दिव्यमूर्तये नमः ।

ॐ अनाकुलाय नमः । नमः ।

ॐ अनन्तमूर्तये नमः । ८३० ।

ॐ अक्षोभ्याय नमः ।

ॐ कृपामूर्तये नमः ।

ॐ सुकीर्तिधृते नमः ।

ॐ अकल्पितामरतरवे नमः ।

ॐ अकामितसुकामदुहे नमः ।

ॐ अचिन्तितमहाचिन्तामणये नमः ।

ॐ देवशिखामणये नमः ।

ॐ अतीन्द्रियाय नमः ।

ॐ अजिताय नमः ।

ॐ प्रांशवे नमः । ८४० ।

ॐ ब्रह्मविष्ण्वादिवन्दिताय नमः ।

ॐ हंसाय नमः ।

ॐ मरीचये नमः ।

ॐ भीमाय नमः ।

ॐ रत्नसानुशरासनाय नमः ।

ॐ सम्भवाय नमः ।

ॐ अतीन्द्रियाय नमः ।

ॐ वैद्याय नमः ।

ॐ विश्वरूपिणे नमः ।

ॐ निरञ्जनाय नमः । ८५० ।

ॐ वसुदाय नमः ।

ॐ सुभुजाय नमः ।

ॐ नैकमायाय नमः ।

ॐ अव्ययाय नमः ।

ॐ प्रमादनाय नमः ।

ॐ अगदाय नमः ।

ॐ रोगहर्त्रे नमः ।

ॐ शरासनविशारदाय नमः ।

ॐ मायाविश्वादनाय नमः ।

ॐ व्यापिने नमः । ८६० ।

ॐ पिनाककरसम्भवाय नमः ।

ॐ मनोवेगाय नमः ।

ॐ मनोरुपिणे नमः ।

ॐ पूर्णाय नमः ।

ॐ पुरुषपुङ्गवाय नमः ।

ॐ शब्दादिगाय नमः ।

ॐ गभीरात्मने नमः ।

ॐ कोमलाङ्गाय नमः ।

ॐ प्रजागराय नमः ।

ॐ त्रिकालज्ञाय नमः । ८७० ।

ॐ मुनये नमः ।

ॐ साक्षिणे नमः ।

ॐ पापारये नमः ।

ॐ सेवकप्रियाय नमः ।

ॐ उत्तमाय नमः ।

ॐ सात्त्विकाय नमः ।

ॐ सत्याय नमः ।

ॐ सत्यसन्धाय नमः ।

ॐ निराकुलाय नमः ।

ॐ रसाय नमः । ८८० ।

ॐ रसज्ञाय नमः ।

ॐ सारज्ञाय नमः ।

ॐ लोकसाराय नमः ।

ॐ रसात्मकाय नमः ।

ॐ पूषादन्तभिदे नमः ।

ॐ अव्यग्राय नमः ।

ॐ दक्षयज्ञनिषूदनाय नमः ।

ॐ देवाग्रण्ये नमः ।

ॐ शिवध्यानतत्पराय नमः ।

ॐ परमाय नमः । ८९० ।

ॐ शुभाय नमः ।

ॐ जयाय नमः ।

ॐ जयादये नमः ।

ॐ सर्वाघशमनाय नमः ।

ॐ भवभञ्जनाय नमः ।

ॐ अलङ्करिष्णवे नमः ।

ॐ अचलाय नमः ।

ॐ रोचिष्णवे नमः ।

ॐ विक्रमोत्तमाय नमः ।

ॐ शब्दगाय नमः । ९०० ।

ॐ प्रणवाय नमः ।

ॐ वायवे नमः ।

ॐ अंशुमते नमः ।

ॐ अनलतापहृते नमः ।

ॐ निरीशाय नमः ।

ॐ निर्विकल्पाय नमः ।

ॐ चिद्रूपाय नमः ।

ॐ जितसाध्वसाय नमः ।

ॐ उत्तारणाय नमः ।

ॐ दुष्कृतिघ्ने नमः । ९१० ।

ॐ दुर्धर्षाय नमः ।

ॐ दुस्सहाय नमः ।

ॐ अभयाय नमः ।

ॐ नक्षत्रमालिने नमः ।

ॐ नाकेशाय नमः ।

ॐ स्वाधिष्ठानषडाश्रयाय नमः ।

ॐ अकायाय नमः ।

ॐ भक्तकायस्थाय नमः ।

ॐ कालज्ञानिने नमः ।

ॐ महानटाय नमः । ९२० ।

ॐ अंशवे नमः ।

ॐ शब्दपतये नमः ।

ॐ योगिने नमः ।

ॐ पवनाय नमः ।

ॐ शिखिसारथये नमः ।

ॐ वसन्ताय नमः ।

ॐ माधवाय नमः ।

ॐ ग्रीष्माय नमः ।

ॐ पवनाय नमः ।

ॐ पावनाय नमः । ९३० ।

ॐ अमलाय नमः ।

ॐ वारवे नमः ।

ॐ विशल्यचतुराय नमः ।

ॐ शिवचत्वरसंस्थिताय नमः ।

ॐ आत्मयोगाय नमः ।

ॐ समाम्नायतीर्थदेहाय नमः ।

ॐ शिवालयाय नमः ।

ॐ मुण्डाय नमः ।

ॐ विरूपाय नमः ।

ॐ विकृतये नमः । ९४० ।

ॐ दण्डाय नमः ।

ॐ दान्ताय नमः ।

ॐ गुणोत्तमाय नमः ।

ॐ देवासुरगुरवे नमः ।

ॐ देवाय नमः ।

ॐ देवासुरनमस्कृताय नमः ।

ॐ देवासुरमहामन्त्राय नमः ।

ॐ देवासुरमहाश्रयाय नमः ।

ॐ दिव्याय नमः ।

ॐ अचिन्त्याय नमः । ९५० ।

ॐ देवताऽऽत्मने नमः ।

ॐ ईशाय नमः ।

ॐ अनीशाय नमः ।

ॐ नगाग्रगाय नमः ।

ॐ नन्दीश्वराय नमः ।

ॐ नन्दिसख्ये नमः ।

ॐ नन्दिस्तुतपराक्रमाय नमः ।

ॐ नग्नाय नमः ।

ॐ नगव्रतधराय नमः ।

ॐ प्रलयाकाररूपधृते नमः । ९६० ।

ॐ सेश्वराय नमः ।

ॐ स्वर्गदाय नमः ।

ॐ स्वर्गगाय नमः ।

ॐ स्वराय नमः ।

ॐ सर्वमयाय नमः ।

ॐ स्वनाय नमः ।

ॐ बीजाक्षराय नमः ।

ॐ बीजाध्यक्षाय नमः ।

ॐ बीजकर्त्रे नमः ।

ॐ धर्मकृते नमः । ९७० ।

ॐ धर्मवर्धनाय नमः ।

ॐ दक्षयज्ञमहाद्वेषिणे नमः ।

ॐ विष्णुकन्धरपातनाय नमः ।

ॐ धूर्जटये नमः ।

ॐ खण्डपरशवे नमः ।

ॐ सकलाय नमः ।

ॐ निष्कलाय नमः ।

ॐ असमाय नमः ।

ॐ मृडाय नमः ।

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ॐ नटाय नमः । ९८० ।

ॐ पूरयित्रे नमः ।

ॐ पुण्यक्रूराय नमः ।

ॐ मनोजवाय नमः ।

ॐ सद्भूताय नमः ।

ॐ सत्कृताय नमः ।

ॐ शान्ताय नमः ।

ॐ कालकूटाय नमः ।

ॐ महते नमः ।

ॐ अनघाय नमः ।

ॐ अर्थाय नमः । ९९० ।

ॐ अनर्थाय नमः ।

ॐ महाकायाय नमः ।

ॐ नैककर्मसमञ्जसाय नमः ।

ॐ भूशयाय नमः ।

ॐ भूषणाय नमः ।

ॐ भूतये नमः ।

ॐ भूषणाय नमः ।

ॐ भूतवाहनाय नमः ।

ॐ शिखण्डिने नमः ।

ॐ कवचिने नमः । १००० ।

ॐ शूलिने नमः ।

ॐ जटिने नमः ।

ॐ मुण्डिने नमः ।

ॐ कुण्डलिने नमः ।

ॐ मेखलिने नमः ।

ॐ मुसलिने नमः ।

ॐ खड्गिने नमः ।

ॐ कङ्कणीकृतवासुकये नमः । १००८ ।

॥ इति श्री वीरभद्र सहस्रनामावली सम्पूर्ण ॥

इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम गहराई से जानेंगे कि श्री वीरभद्र सहस्रनामावली का तात्विक और आध्यात्मिक महत्व क्या है, इसके नित्य पाठ या अर्चन से जीवन में कौन से अकल्पनीय चमत्कार होते हैं, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक तांत्रिक-वैदिक साधना विधि, नियम व सावधानियां क्या हैं।

1. श्री वीरभद्र सहस्रनामावली का दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व

इस महान सहस्रनामावली की प्रचंड ऊर्जा, इसके पीछे छिपे शैव दर्शन और ‘वीरभद्र-तत्व’ को समझने के लिए हमें दक्ष-वध के प्रतीकवाद, शिव के उग्र स्वरूप, और सहस्रनाम के नाद-विज्ञान को गहराई से समझना होगा।

‘वीर’ और ‘भद्र’ का तात्विक रहस्य (The Auspicious Warrior)

‘वीर’ का अर्थ है शूरवीर, योद्धा या पराक्रमी और ‘भद्र’ का अर्थ है कल्याणकारी या मंगलमय। वीरभद्र केवल विनाशक नहीं हैं; वे वह ‘कल्याणकारी योद्धा’ हैं जो दुष्टों का संहार करके सज्जनों के लिए मंगल (Bhadra) की स्थापना करते हैं। दार्शनिक दृष्टि से, ‘दक्ष’ का अर्थ है ‘कौशल’ (Skill) या बुद्धि। जब बुद्धि में अहंकार आ जाता है (जैसा प्रजापति दक्ष को आ गया था) और वह आत्मा (शिव) का तिरस्कार करने लगती है, तब मनुष्य का पतन निश्चित है। भगवान वीरभद्र उसी ‘बौद्धिक अहंकार’ का मस्तक काटते हैं। जब साधक ‘श्री वीरभद्र सहस्रनामावली’ के 1000 नामों का गान करता है, तो उसके भीतर का सारा झूठा अहंकार और अज्ञान भस्म हो जाता है, और वह निर्मल होकर शिव से जुड़ जाता है।

कुण्डलिनी और मूलाधार चक्र (The Root Chakra Fire)

तंत्र शास्त्र के अनुसार, भगवान वीरभद्र की ऊर्जा का सीधा संबंध हमारे ‘मूलाधार चक्र’ (Root Chakra) और ‘मणिपूर चक्र’ (Navel Chakra) से है। ये चक्र साहस, जीवन-शक्ति, और अग्नि के केंद्र हैं। 1000 नामों का प्रत्येक नाम एक अग्नि-बीज (Fire Seed) है। जब साधक पूर्ण लय के साथ इस नामावली का पाठ करता है, तो उसके शरीर की सुषुप्त अग्नि जाग्रत होती है। यह अग्नि उसे जीवन के संघर्षों से लड़ने का अदम्य साहस प्रदान करती है।

‘सहस्रनाम’ का नाद-विज्ञान (Sound Vibrations)

सनातन परंपरा में ‘1000’ की संख्या को पूर्णता और अनंतता का प्रतीक माना जाता है। भगवान वीरभद्र के ये हज़ार नाम वास्तव में 1000 प्रचंड ब्रह्मांडीय आवृत्तियां (Cosmic Frequencies) हैं। जब साधक पूर्ण नाद (ध्वनि) के साथ इनका उच्चारण करता है, तो उसके आभामंडल (Aura) में एक लाल और काले रंग का अभेद्य सुरक्षा-कवच बन जाता है। यह ध्वनि तरंगें मन के हर अज्ञात डर (Phobia) को नष्ट कर देती हैं और साधक को साक्षात एक निडर योद्धा बना देती हैं।

2. श्री वीरभद्र सहस्रनामावली पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ (Benefits)

भगवान श्री वीरभद्र साक्षात त्वरित न्याय, अमोघ रक्षा, निर्भयता और परम सिद्धियों के प्रदाता हैं। जो साधक पूर्ण निष्ठा, सात्विकता, पवित्रता, और शिव को गुरु मानकर इस नामावली का पाठ या अर्चन करता है, उसे जीवन के कुरुक्षेत्र में निम्नलिखित अमोघ और चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:

शत्रु-नाश, रक्षा और तांत्रिक बाधा निवारण (Ultimate Protection)

  • अजेय शत्रु विजय और मुकदमों में सफलता: जो शत्रु अकारण ही आपके प्राणों के प्यासे हों, आपको बर्बाद करना चाहते हों, या आपको झूठे मुकदमों (Court Cases) में फंसा रहे हों, उनका अहंकार इस पाठ से छिन्न-भिन्न हो जाता है। भगवान वीरभद्र न्याय के देवता हैं; वे अपने भक्त पर होने वाले अन्याय को कभी बर्दाश्त नहीं करते। अदालत में निर्णय साधक के पक्ष में आता है।

  • काले जादू और नकारात्मक ऊर्जा का तत्काल विध्वंस: यदि किसी ने साधक या उसके परिवार पर भयंकर से भयंकर तांत्रिक क्रिया (Black Magic), मूठ-करणी, या मारण प्रयोग किया है, तो श्री वीरभद्र के 1000 नाम उसे पल भर में भस्म कर पलट (Revert) देते हैं। जिस घर में यह पाठ होता है, वहां भूत-प्रेत या पिशाच प्रवेश नहीं कर सकते।

  • अकाल मृत्यु और दुर्घटनाओं से रक्षा: यह पाठ एक अभेद्य सुरक्षा कवच है। जिन लोगों को अकारण मृत्यु का भय रहता है, या कुंडली में गंभीर मारकेश की दशा चल रही हो, भगवान वीरभद्र साक्षात ढाल बनकर उनकी रक्षा करते हैं।

लौकिक, भौतिक और नवग्रह शांति के लाभ (Wealth & Astrological Remedies)

  • राहु, केतु, मंगल और शनि की पीड़ा का अचूक निवारण: शिव के उग्र रूप होने के कारण, भगवान वीरभद्र सभी क्रूर ग्रहों के नियंत्रक हैं। मंगल का अमंगल (मांगलिक दोष), शनि की साढ़ेसाती या राहु की भयंकर महादशा में जब व्यक्ति टूट जाता है, तब यह पाठ इन क्रूर ग्रहों को तुरंत शांत कर देता है।

  • रुके हुए कार्यों और धन की प्राप्ति: जो कार्य लंबे समय से शत्रुओं या दुर्भाग्य के कारण रुके हुए हैं, वीरभद्र की कृपा से वे अचानक गति पकड़ लेते हैं। यह पाठ जीवन की बाधाओं (Blockages) को तोड़कर आय के नए मार्ग खोलता है।

मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक लाभ (Mental Peace & Courage)

  • परम निर्भयता (Absolute Fearlessness) की प्राप्ति: जिन लोगों को रात में घबराहट होती है, अकारण डर सताता है, या आत्मविश्वास (Confidence) की भारी कमी है, वे इस पाठ से एक शूरवीर योद्धा के समान अदम्य साहसी बन जाते हैं। व्यक्ति डिप्रेशन (Depression) और एंग्जायटी से मुक्त हो जाता है।

  • आध्यात्मिक उन्नति और शिव-साक्षात्कार: यह पाठ मन को एकाग्र करता है और ध्यान (Meditation) में गहरे उतरने में सहायता करता है। जीवन के अंत में साधक को शिवलोक की प्राप्ति होती है।

3. श्री वीरभद्र सहस्रनामावली की प्रामाणिक साधना और पाठ विधि (Sadhana Vidhi)

भगवान वीरभद्र की उपासना यद्यपि उग्र (भैरव स्वरूप की तरह) है, परंतु एक गृहस्थ साधक को उनकी ‘दक्षिण मार्ग’ (सात्विक विधि) से ही पूजा करनी चाहिए। इस सिद्ध नामावली का पूर्ण और त्वरित फल प्राप्त करने के लिए आगम ग्रंथों में बताई गई इस प्रामाणिक विधि का पालन करना अत्यंत चमत्कारी होता है:

उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त

  • दिन: भगवान वीरभद्र की आराधना के लिए मंगलवार (Tuesday – शक्ति और पराक्रम का दिन) और सोमवार (Monday – शिव का दिन) सबसे श्रेष्ठ और सर्वाधिक जाग्रत माने जाते हैं।

  • विशेष तिथियां: मासिक शिवरात्रि, महाशिवरात्रि, प्रदोष व्रत, और किसी भी माह की अमावस्या या अष्टमी के दिन इस सहस्रनामावली का पाठ करना हज़ारों गुणा अधिक फलदायी होता है।

  • समय: उग्र शिव स्वरूप की साधना का सबसे उत्तम समय ‘गोधूलि बेला / प्रदोष काल’ (सूर्यास्त का समय) या ‘निशीथ काल’ (मध्यरात्रि 11:30 से 12:30 के बीच) होता है।

दिशा, आसन और वस्त्र का विधान

  • दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव दक्षिण (South – यम व शत्रुओं के नाश की दिशा) या पूर्व (East – शिव और ज्ञान की दिशा) की ओर रखें।

  • आसन: बैठने के लिए लाल (Red), काले (Black – केवल तांत्रिक प्रयोग हेतु), या कुशा के आसन का प्रयोग करें। गृहस्थों के लिए लाल रंग सर्वोत्तम है।

  • वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। पूजा के समय लाल रंग (या श्वेत रंग) के स्वच्छ वस्त्र धारण करना साधना की ऊर्जा को कई गुना बढ़ा देता है।

पीठ की स्थापना और पूजन सामग्री (Setup)

विधान / सामग्री शास्त्रीय नियम और विवरण
प्रतिमा / चित्र / यंत्र एक स्वच्छ लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान वीरभद्र (हाथ में खड्ग और त्रिशूल धारण किए हुए) का चित्र, या साक्षात शिवलिंग, या श्री वीरभद्र यंत्र स्थापित करें।
दीपक (सर्वाधिक महत्वपूर्ण) भगवान के सम्मुख सरसों के तेल (Mustard Oil) या तिल के तेल का एक बड़ा अखंड दीपक प्रज्वलित करें। गुग्गुल, लोहबान या भस्म की धूप जलाएं।
तिलक और भस्म भगवान वीरभद्र की पूजा में ‘भस्म’ (राख) और लाल चंदन (रक्त चंदन) का सबसे अधिक महत्व है। भगवान को त्रिपुंड लगाएं और स्वयं के मस्तक पर भी भस्म या लाल चंदन का तिलक धारण करें।
पुष्प और बिल्वपत्र उन्हें लाल पुष्प (गुड़हल/Hibiscus, लाल गुलाब, कनेर) अत्यंत प्रिय हैं। भगवान शिव का अंश होने के कारण बिल्वपत्र (Bel Patra) अनिवार्य रूप से चढ़ाएं।

दृढ़ संकल्प (Sankalpa)

पाठ आरंभ करने से पूर्व दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत (लाल रंगे हुए), और एक लाल पुष्प लें। अपना नाम, गोत्र, स्थान और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य बोलें (उदाहरण: “हे देवाधिदेव के उग्र स्वरूप श्री वीरभद्र, मैं अपने जीवन से समस्त बाधाओं, प्राणघातक शत्रुओं, तांत्रिक प्रयोगों के समूल नाश तथा आपकी अहैतुकी रक्षा-कृपा के लिए श्री वीरभद्र सहस्रनामावली का 21/41 दिन तक (या नित्य) पाठ/अर्चन करने का संकल्प लेता/लेती हूँ”), और फिर जल को ज़मीन पर छोड़ दें।

सहस्रनामावली का पाठ और बिल्वार्चन विधि (Chanting Method & Archana)

  • सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश और माता पार्वती (भद्रकाली) का मानसिक स्मरण कर उन्हें साष्टांग प्रणाम करें।

  • भगवान शिव (महाकाल) और अपने सद्गुरु को मानसिक रूप से प्रणाम करें।

  • भगवान वीरभद्र के बीज मंत्र “ॐ वीरभद्राय नमः” या “ॐ ह्रीं श्रीं वीरभद्राय फट्” की कम से कम 11 बार या एक माला (रुद्राक्ष की माला पर) अवश्य जपें।

  • अब पूर्ण एकाग्रता, रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर और भीतर एक अजेय योद्धा का अनुभव करते हुए ‘श्री वीरभद्र सहस्रनामावली’ का सस्वर पाठ आरंभ करें।

  • सहस्रार्चन / बिल्वार्चन विधि (अचूक और प्रचंड उपाय): अत्यंत शीघ्र फल प्राप्ति (विशेषकर शत्रु नाश, मुकदमों में विजय या मारकेश से रक्षा) के लिए, नामावली का प्रयोग करें। प्रत्येक नाम के उच्चारण (जैसे— ॐ वीरभद्राय नमः, ॐ महाकालाय नमः) के साथ शिवलिंग या भगवान के चित्र पर एक साबुत बिल्वपत्र (Bel Patra) जिस पर लाल चंदन लगा हो, या लाल पुष्प की पंखुड़ी अर्पित करें। यह 1000 नामों के साथ 1000 बार किया जाता है। घोर संकटों को नष्ट करने का यह अमोघ ब्रह्मास्त्र है।

क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग (Naivedya)

ध्यान दें: गृहस्थों को भगवान वीरभद्र को केवल सात्विक भोग ही लगाना चाहिए। भगवान को उड़द के वड़े, गुड़, चने, मालपुआ, पंचामृत, या गाय के दूध की खीर का भोग लगाएं। अंत में कर्पूर जलाकर भगवान की आरती (शिव आरती या वीरभद्र स्तुति) गाएं। पूजा के अंत में हाथ जोड़कर साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हुए पूजा-पाठ में हुई किसी भी अशुद्धि या उच्चारण की भूल के लिए क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।

4. साधना के अत्यंत संवेदनशील और अनिवार्य नियम (Strict Rules for Sadhana)

भगवान वीरभद्र की साधना अत्यंत जाग्रत और उग्र ऊर्जा वाली होती है। वे न्यायकारी योद्धा हैं, अतः अनुशासनहीनता बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करते। गृहस्थ साधकों को इस साधना का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इन नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है:

  1. पूर्ण सात्विक जीवन (Sattvic Lifestyle): गृहस्थ साधकों को पूर्ण सात्विक मार्ग ही अपनाना चाहिए। अनुष्ठान की अवधि (21/41 दिन) के दौरान साधक को स्वयं पूर्ण शाकाहारी (मांस-मदिरा, लहसुन-प्याज रहित) रहना चाहिए। तामसिक भोजन आध्यात्मिक ऊर्जा को नष्ट कर देता है और उग्र शक्तियों को असंतुलित कर सकता है।

  2. स्त्रियों और गुरु का सम्मान: भगवान वीरभद्र माता सती (स्त्री शक्ति) के सम्मान के लिए ही प्रकट हुए थे। जो व्यक्ति घर की महिलाओं का अपमान करता है, उन पर हाथ उठाता है, या अपने गुरुओं को अपशब्द कहता है, उस पर भगवान वीरभद्र का भयंकर कोप गिरता है।

  3. कठोर ब्रह्मचर्य का पालन (Celibacy): अनुष्ठान काल (विशेषकर 21 या 41 दिन के संकल्प) के दौरान मन, वचन और कर्म से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। ऊर्जा का ऊर्ध्वरेता होना अनिवार्य है।

  4. सत्य और धर्म का आचरण: भगवान वीरभद्र ने अन्याय (दक्ष के कृत्य) के खिलाफ युद्ध किया था। यदि आप स्वयं अन्याय, बेईमानी या छल-कपट करते हैं, और फिर भी यह पाठ करते हैं, तो भगवान आपकी पुकार कभी नहीं सुनेंगे। सत्य के मार्ग पर अडिग रहें।

  5. गोपनीयता (Secrecy): उग्र और रक्षक साधनाओं को हमेशा गुप्त रखना चाहिए। आप कोर्ट केस जीतने या शत्रु बाधा के लिए यह साधना कर रहे हैं, इसका दिखावा (Show-off) न करें।

5. उपासना में ध्यान रखने योग्य विशेष सावधानियां (Precautions)

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली एक अत्यंत प्रचंड स्तोत्र है, अतः इसकी साधना करते समय कुछ विशेष सावधानियां बरतनी आवश्यक हैं:

  • सकाम या प्रतिशोध की भावना का निषेध (No Revenge Motive on Innocents): यह सबसे महत्वपूर्ण चेतावनी है। यह सहस्रनामावली आपकी आत्मरक्षा (Self-defense), न्याय और संकट-मुक्ति के लिए है। किसी निर्दोष व्यक्ति का अकारण अहित करने, तंत्र प्रयोग करने या अपना व्यक्तिगत ‘अहंकारी बदला’ लेने की नीयत से इसका पाठ भूलकर भी न करें। भगवान वीरभद्र न्याय के देवता हैं; गलत मंशा से किया गया पाठ साधक का ही सर्वनाश कर देगा।

  • भयभीत न हों (Do not Fear): उग्र साधना के दिनों में साधक को स्वप्न में अग्नि, त्रिशूल, श्मशान, या भयंकर योद्धा की आकृतियां दिख सकती हैं, या शरीर में अत्यधिक गर्मी (Heat) महसूस हो सकती है। इससे घबराएं नहीं, यह इस बात का संकेत है कि भगवान वीरभद्र आपके अवचेतन मन की अशुद्धियों और बाहरी शत्रुओं का संहार कर रहे हैं।

  • शारीरिक अपवित्रता का ध्यान: बिना स्नान किए, गंदे वस्त्र पहनकर, जूठे मुंह, या अशुद्ध अवस्था (सूतक, पातक) में सहस्रनामावली की पुस्तक, भस्म या यंत्र का स्पर्श सर्वथा वर्जित है। महिलाओं को अपने मासिक धर्म (Menstruation) के दिनों में इस पाठ और पूजा कक्ष से पूर्णतः दूर रहना चाहिए। वे उन दिनों केवल ‘ॐ नमः शिवाय’ का मानसिक जप कर सकती हैं।

6. आधुनिक युग में श्री वीरभद्र सहस्रनामावली की असीम प्रासंगिकता (Relevance in Modern Era)

आज का आधुनिक युग एक ‘अदृश्य कुरुक्षेत्र’ बन चुका है। लोग ‘अहंकार’ (Ego), ‘स्वार्थ’ और ‘गलाकाट प्रतिस्पर्धा’ (Cut-throat competition) की दुनिया में जी रहे हैं। आज के समय में दक्ष प्रजापति जैसे अज्ञानी और अहंकारी लोग हथियारों से नहीं लड़ते; वे पीठ पीछे कॉर्पोरेट राजनीति (Corporate Politics), भयंकर ईर्ष्या, झूठे मुकदमों (False Legal Cases), साइबर बुलिंग और षड्यंत्रों के रूप में प्रहार करते हैं।

इसके साथ ही, जीवन की गति इतनी तेज़ है कि अचानक क्या विपत्ति आ जाए, कोई नहीं जानता। दुर्घटनाएं, अचानक बीमारियां, नौकरी का जाना या व्यापार में घाटा—यह सब आधुनिक मनुष्य को डिप्रेशन (Depression) और एंग्जायटी (Anxiety) का मरीज बना रहा है।

‘श्री वीरभद्र सहस्रनामावली’ आधुनिक इंसान के इन्हीं मानसिक, सामाजिक, और ऊर्जा संकटों का सबसे शक्तिशाली तांत्रिक और मनोवैज्ञानिक उपचार (Psychological Healing) है:

  1. लीडरशिप और अदम्य साहस (Leadership & Courage): आधुनिक जीवन में सफलता के लिए निर्णय लेने की क्षमता (Decision making) और निडरता चाहिए। भगवान वीरभद्र का ध्यान मस्तिष्क के डर, ओवरथिंकिंग (Overthinking) और सेल्फ-डाउट (Self-doubt) को मिटाकर आपके भीतर एक योद्धा (Warrior) का गुण पैदा करता है। आप जीवन की चुनौतियों से भागते नहीं, उनका डटकर सामना करते हैं।

  2. टॉक्सिक (Toxic) लोगों और षड्यंत्रों से सुरक्षा: यह पाठ साधक के आभामंडल (Aura) को एक ‘अग्नि कवच’ से ढक देता है। कार्यालय (Office) या समाज की नकारात्मक राजनीति और ईर्ष्यालु लोग आपका मानसिक संतुलन नहीं बिगाड़ पाते। जो आपके खिलाफ साजिश रचते हैं, वे खुद ही हार मान लेते हैं या उनके षड्यंत्र उन पर ही भारी पड़ते हैं।

  3. डिप्रेशन और मानसिक ‘बर्नआउट’ का इलाज: जब जीवन में चारों ओर अंधकार हो, शत्रु हावी हो रहे हों, और कुछ समझ न आए, तब 1000 नामों का यह नाद आपके अवचेतन मन (Subconscious) में एक गजब की प्राण-ऊर्जा (Life Force) भर देता है। यह आधुनिक तनाव (Stress) और पैनिक अटैक्स (Panic Attacks) का सबसे बड़ा एंटीडोट है। आप हर परिस्थिति में शांत और मजबूत (Grounded) बने रहते हैं।

Shri Veerabhadra Sahasranamavali (श्री वीरभद्र सहस्रनामावली) केवल 1000 संस्कृत शब्दों का एक काव्यात्मक संकलन नहीं है; यह उस ब्रह्मांडीय योद्धा, शिव के उग्र न्याय, और अमोघ रक्षक का साक्षात आवाहन है, जिसके खड्ग की एक चमक मात्र से साक्षात यमराज, अज्ञान, दरिद्रता, क्रूर ग्रहों की पीड़ा और भयंकर तांत्रिक शक्तियां भी थर-थर कांप उठती हैं। जब एक साधक अपने सारे लौकिक ज्ञान और अहंकार को त्यागकर, पूर्ण शरणागति के साथ इस नामावली को भगवान के चरणों में (बिल्वपत्र के माध्यम से) समर्पित करता है, तो भगवान वीरभद्र अपनी त्रिशूल के साथ उसकी रक्षा के लिए तुरंत दौड़े चले आते हैं।

भगवान वीरभद्र बाहर से भले ही उग्र और भयंकर संहारक दिखाई दें, परंतु वे भीतर से अपने निश्छल भक्तों के लिए परम दयामयी, वात्सल्यपूर्ण और संकटों को हरने वाले साक्षात शिव (कल्याणकारी) हैं। जब भी आपको लगे कि आप जीवन के भौतिक या कानूनी संघर्षों में पूरी तरह टूट चुके हैं, भयंकर शत्रुओं ने आपको घेर लिया है, कोर्ट केस में हार सामने दिख रही है, अकारण मृत्यु का भय सता रहा है, या आपका साहस खत्म हो रहा है, तो मंगलवार या सोमवार की रात लाल आसन पर बैठें, सरसों के तेल का दीपक प्रज्वलित करें, और शिव को गुरु मानकर पूर्ण निर्भयता के साथ, लाल पुष्प व बिल्वपत्र अर्पित करते हुए इस सहस्रनामावली का गान करें।

आप स्वयं अनुभव करेंगे कि भगवान वीरभद्र ने आपके जीवन की सारी बाधाओं, झूठे आरोपों, शत्रुओं और भयों को भस्म कर दिया है, और साक्षात महाकाल ने आपके जीवन को अपार विजय, अदम्य साहस, और अजेय सुरक्षा के दिव्य प्रकाश से आलोकित कर दिया है। ॐ वीरभद्राय नमः! हर हर महादेव!

श्री वीरभद्र सहस्रनामावलीः अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. श्री वीरभद्र सहस्रनामावली क्या है और इसका क्या महत्व है?

श्री वीरभद्र सहस्रनामावली भगवान शिव के उग्र और रक्षक रुद्रावतार, भगवान वीरभद्र के 1000 परम पवित्र, जाग्रत और अत्यंत शक्तिशाली नामों का एक सिद्ध तांत्रिक/शैव संकलन है (जिसमें प्रत्येक नाम के अंत में ‘नमः’ लगता है)। इसका महत्व इसलिए सर्वोपरि है क्योंकि यह नामावली अजेय शत्रुओं का नाश करने, कोर्ट-कचहरी (मुकदमों) में विजय दिलाने, भयंकर तांत्रिक बाधाओं (काले जादू) को काटने, और अकाल मृत्यु से रक्षा करने का सबसे तीव्र और अमोघ उपाय है।

2. इस सहस्रनामावली का पाठ या ‘बिल्वार्चन’ करने से जीवन में कौन सा सबसे बड़ा चमत्कारी लाभ मिलता है?

इस नामावली का सबसे प्रत्यक्ष और त्वरित लाभ ‘प्राणघातक शत्रुओं व षड्यंत्रों का समूल नाश’, ‘मुकदमों में अचूक विजय’, और ‘तंत्र-मंत्र (Black Magic) की बाधाओं का तत्काल विध्वंस’ है। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक नाम के साथ बिल्वपत्र (Bel Patra) अर्पित करने से व्यक्ति का अकारण डर (Phobia) और मानसिक अवसाद (Depression) समाप्त हो जाता है, और उसे अदम्य साहस प्राप्त होता है।

3. क्या एक सामान्य गृहस्थ व्यक्ति (परिवार वाला) भगवान वीरभद्र की साधना कर सकता है?

जी हाँ, बिल्कुल! एक गृहस्थ व्यक्ति भगवान वीरभद्र की साधना पूर्ण रूप से कर सकता है, परंतु उसे केवल ‘दक्षिण मार्ग’ (सात्विक विधि) का ही पालन करना चाहिए। गृहस्थों को तामसिक वस्तुओं (मांस, मदिरा) के प्रयोग से सर्वथा बचना चाहिए। भगवान को सात्विक भोग अर्पित करने और भस्म/लाल चंदन चढ़ाने से वे अत्यंत शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

4. भगवान वीरभद्र की आराधना के लिए सप्ताह का कौन सा दिन और समय सर्वोत्तम माना गया है?

भगवान वीरभद्र की आराधना के लिए ‘मंगलवार’ (Tuesday – शक्ति/पराक्रम का दिन) और ‘सोमवार’ (Monday – शिव का दिन) सबसे श्रेष्ठ और जाग्रत माने जाते हैं। मासिक शिवरात्रि, प्रदोष व्रत और किसी भी अमावस्या के दिन इसका पाठ अनंत फलदायी होता है। इनका पाठ करने का सबसे उत्तम समय ‘गोधूलि बेला / प्रदोष काल’ (सूर्यास्त के समय) या ‘निशीथ काल’ (मध्यरात्रि) होता है।

5. भगवान वीरभद्र की इस उग्र साधना को करते समय सबसे बड़ी सावधानी और नियम क्या है?

इस साधना का सबसे बड़ा और अनिवार्य नियम यह है कि इसका प्रयोग कभी भी किसी निर्दोष व्यक्ति से बदला लेने (सकाम प्रतिशोध) की भावना से नहीं करना चाहिए। भगवान वीरभद्र न्याय के देवता हैं; गलत नीयत से किया गया पाठ साधक का ही नुकसान करता है। इसके अतिरिक्त, साधना काल में पूर्ण सात्विकता (मांस-मदिरा का त्याग), महिलाओं का सम्मान, और शारीरिक पवित्रता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।

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