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Jagannath Rath Yatra 2026: कौन खींच सकता है महाप्रभु का रथ? जान लें ये बेहद कड़े नियम और इसके पीछे का रहस्यIt takes 15 minutes... to read this article !

सनातन धर्म में पुरी (ओडिशा) के श्री जगन्नाथ मंदिर का स्थान अत्यंत सर्वोच्च माना गया है। यह हिंदुओं के पवित्र चार धामों में से एक है। वैसे तो साल भर इस मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन आषाढ़ मास में यहाँ कुछ ऐसा घटित होता है जो पूरी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करता है। हम बात कर रहे हैं विश्व प्रसिद्ध पुरी जगन्नाथ रथ यात्रा (Jagannath Rath Yatra) की।

साल 2026 में भी यह महा-उत्सव अपनी पूरी दिव्यता और भव्यता के साथ आयोजित होने जा रहा है। जब 45 फीट ऊंचे विशालकाय लकड़ी के रथ पुरी की मुख्य सड़क ‘बड़ा दांडा’ (Grand Road) पर रेंगते हैं, तो लाखों भक्तों का हुजूम ‘जय जगन्नाथ’ के जयकारों से आसमान गुंजा देता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के इन भारी-भरकम रथों को खींचने का अधिकार किसे है? क्या इसके लिए कोई विशेष नियम हैं? क्या कोई भी आम इंसान इस रथ की रस्सी को हाथ लगा सकता है?

यदि आप भी साल 2026 में इस अद्भुत यात्रा का हिस्सा बनने जा रहे हैं या घर बैठे महाप्रभु की इस लीला को समझना चाहते हैं, तो यह विस्तृत लेख आपके लिए ही है। इस लेख में हम जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 की सही तारीखों, रथ खींचने के नियमों, रथों के आध्यात्मिक रहस्यों और इससे जुड़ी पौराणिक कथाओं का गहराई से विश्लेषण करेंगे।

Jagannath Rath Yatra 2026: मुख्य तिथियां और पूरा शेड्यूल (Dates & Schedule)

हिंदू चंद्र-सौर कैलेंडर (Lunisolar Calendar) के अनुसार, जगन्नाथ रथ यात्रा हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को शुरू होती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह समय आमतौर पर जून या जुलाई के महीने में आता है। वर्ष 2026 में मुख्य रथ यात्रा गुरुवार, 16 जुलाई 2026 को आयोजित की जाएगी।

यह उत्सव केवल एक दिन का नहीं होता, बल्कि पूरे 9 दिनों तक चलता है, जिसमें भगवान जगन्नाथ अपने भाई-बहन के साथ अपनी मौसी के घर यानी ‘गुंडिचा मंदिर’ (Gundicha Temple) जाते हैं और वहाँ विश्राम करने के बाद वापस मुख्य मंदिर लौटते हैं।

नीचे दी गई तालिका में वर्ष 2026 के इस पावन उत्सव का पूरा आधिकारिक शेड्यूल दिया गया है:

उत्सव/अनुष्ठान (Rituals & Events) तिथि (Dates 2026) धार्मिक महत्व (Significance)
स्नान पूर्णिमा (Snana Purnima) 29 जून 2026 (सोमवार) महाप्रभु को 108 घड़ों के सुगंधित जल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद भगवान बीमार पड़ जाते हैं।
अनासर काल (Anasara Period) 30 जून से 14 जुलाई 2026 भगवान 15 दिनों के लिए एकांतवास (क्वारंटाइन) में रहते हैं। इस दौरान भक्तों के लिए दर्शन बंद रहते हैं।
नेत्रोत्सव (Netrotsava) 15 जुलाई 2026 (बुधवार) स्वस्थ होने के बाद भगवान की आँखों को दोबारा रंगा जाता है और नवयौवन रूप के दर्शन होते हैं।
श्री जगन्नाथ रथ यात्रा (Rath Yatra) 16 जुलाई 2026 (गुरुवार) तीनों देवता रथों पर सवार होकर बड़ा दांडा से गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करते हैं।
हेरा पंचमी (Hera Panchami) 20 जुलाई 2026 (सोमवार) माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ को ढूंढते हुए गुंडिचा मंदिर आती हैं और गुस्से में रथ का एक हिस्सा तोड़ देती हैं।
बहुड़ा यात्रा (Bahuda Yatra) 24 जुलाई 2026 (शुक्रवार) नौ दिनों का प्रवास पूरा कर भगवान जगन्नाथ के रथों की मुख्य मंदिर की ओर वापसी यात्रा।
सुना बेशा (Suna Besha) 25 जुलाई 2026 (शनिवार) मुख्य मंदिर के बाहर रथों पर ही भगवान को सैकड़ों किलो सोने के आभूषणों से सजाया जाता है।
अधर पणा (Adhara Pana) 26 जुलाई 2026 (रविवार) रथों पर देवताओं को एक विशेष मीठा पेय (दूध, पनीर और गुड़ का मिश्रण) अर्पित किया जाता है।
नीलाद्रि बीजे (Niladri Bije) 27 जुलाई 2026 (सोमवार) भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी पुनः मुख्य मंदिर के गर्भगृह (रत्न सिंहासन) पर विराजमान होते हैं।
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कौन खींच सकता है जगन्नाथ जी का रथ? (Who Can Pull the Chariot?)

अब आते हैं उस मुख्य सवाल पर जो हर सनातनी और जिज्ञासु व्यक्ति के मन में उठता है— क्या जगन्नाथ जी के रथ की रस्सी खींचने के लिए किसी खास योग्यता, जाति, धर्म या वीआईपी स्टेटस की जरूरत होती है?

इसका उत्तर सनातन धर्म की उस महान और व्यापक सोच को दर्शाता है जो सबको एक समान मानती है।

1. पूर्ण समानता और सर्व-समावेशी परंपरा (Radical Inclusivity)

भगवान जगन्नाथ के रथ की रस्सियों को खींचने के लिए कोई प्रतिबंध नहीं है। दुनिया का कोई भी नागरिक, चाहे वह किसी भी जाति, पंथ, लिंग, आर्थिक स्थिति या राष्ट्रीयता का हो, वह रथ की रस्सी को छू सकता है और उसे खींच सकता है। यहाँ कोई टिकट नहीं बिकता, न ही कोई विशेष पास काम आता है। जब रथ आगे बढ़ता है, तो राजा से लेकर रंक (गरीब) तक, सब एक कतार में खड़े होकर कंधे से कंधा मिलाकर रस्सी खींचते हैं।

पतित पावन की अवधारणा: 12वीं शताब्दी के पुरी जगन्नाथ मंदिर के पारंपरिक नियमों के अनुसार, गैर-हिंदुओं या विदेशी नागरिकों का मुख्य मंदिर के अंदर प्रवेश वर्जित है। इतिहास में कई ऐसी परिस्थितियाँ बनीं जब कुछ महान भक्तों को मंदिर में प्रवेश नहीं मिला (जैसे भक्त सालबेग, जो एक मुस्लिम थे)। अपने ऐसे ही भक्तों पर कृपा करने के लिए भगवान स्वयं साल में एक बार मंदिर से बाहर आते हैं। जब वे रथ पर विराजमान होते हैं, तो उन्हें ‘पतित पावन’ (पतितों यानी गिरे हुए लोगों को पवित्र करने वाले) कहा जाता है। इसलिए रथ पर बैठे भगवान को देखने और उनके रथ को खींचने का अधिकार पूरी मानवता को है।

2. शास्त्रों में रथ खींचने का महापुण्य

स्कंद पुराण और अन्य ग्रंथों में साफ तौर पर लिखा गया है:

$$\text{रथे तु वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते।}$$

अर्थात, रथ पर विराजमान वामन रूप (भगवान जगन्नाथ) के दर्शन मात्र करने से या उनके रथ को खींचने में थोड़ा सा भी सहयोग करने से मनुष्य को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल जाती है और मोक्ष (Salvation) प्राप्त होता है। इसी विश्वास के कारण लाखों लोग बिना किसी डर के, चिलचिलाती गर्मी और उमस के बावजूद, उन रस्सियों को थामने के लिए दौड़ पड़ते हैं।

रथ यात्रा से जुड़े कड़े और अटूट नियम (Strict Rules & Rituals of Rath Yatra)

भले ही रथ खींचने के लिए आम जनता पर कोई पाबंदी न हो, लेकिन इस पूरी यात्रा को संचालित करने के लिए पुरी के राजवंश और सेवादारों (Priests/Daitapatis) को कुछ बेहद कड़े और प्राचीन नियमों का पालन करना पड़ता है। इन नियमों में सदियों से एक इंच का भी बदलाव नहीं हुआ है।

नियम 1: छेरा पहरा (Chhera Pahanra) – राजा बनता है सेवक

रथ यात्रा शुरू होने से ठीक पहले पुरी के ‘गजपति महाराजा’ (तिलकरधारी राजा) एक पालकी में सवार होकर रथों के पास पहुँचते हैं। यहाँ एक अद्भुत अनुष्ठान होता है जिसे ‘छेरा पहरा’ कहा जाता है।

  • इस नियम के तहत, राजा अपने राजसी अहंकार को छोड़कर एक झाड़ू लगाने वाले (Sweeper) की भूमिका में आते हैं।

  • वे सोने की मूंठ वाली झाड़ू (Golden Broom) से तीनों रथों के चबूतरे को साफ करते हैं और उस पर सुगंधित चंदन का पानी छिड़कते हैं।

  • यह परंपरा पूरी दुनिया को यह संदेश देती है कि जगन्नाथ (सृष्टि के स्वामी) के सामने एक देश का राजा और एक साधारण सफाईकर्मी दोनों बिल्कुल बराबर हैं। जब तक राजा यह सफाई पूरी नहीं करते, रथ आगे नहीं बढ़ सकता।

नियम 2: पहंडी बिजे (Pahandi Bije) – देवताओं को रथ पर लाने का नियम

भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की मूर्तियां सामान्य मूर्तियां नहीं हैं; ये विशालकाय नीम की लकड़ी से बनी भारी मूर्तियां हैं जिनमें कोई पैर या पूर्ण हाथ नहीं दिखाई देते। इन्हें मंदिर के रत्न सिंहासन से उतारकर रथ तक लाने की प्रक्रिया को ‘पहांडी’ कहा जाता है।

  • इसके नियम बहुत कड़े हैं। केवल विशेष समुदाय के सेवादार, जिन्हें ‘दैतापति’ कहा जाता है, वही मूर्तियों को स्पर्श कर सकते हैं।

  • देवताओं को एक विशेष लयबद्ध, डोलते हुए अंदाज़ में धीरे-धीरे आगे बढ़ाया जाता है। भगवान जगन्नाथ को लाते समय उनके सिर पर रेशमी तकिए और विशाल छतरियां लगाई जाती हैं। इस दौरान शंख, नगाड़ों और झांझ की ध्वनि से पूरा माहौल गूंज उठता है।

नियम 3: रथ निर्माण के कड़े नियम (No Nails Rule)

रथ यात्रा के लिए हर साल तीन नए रथ शून्य से (From Scratch) बनाए जाते हैं। इन रथों को बनाने वाले बढ़ई (Carpenters) को ‘महशराना’ कहा जाता है, और यह हुनर पीढ़ी-दर-पीढ़ी ट्रांसफर होता है।

  • लोहे का उपयोग वर्जित: इन विशाल रथों को बनाने में एक भी लोहे की कील (Metal Nail) या क्लैंप का उपयोग नहीं किया जाता। पूरी संरचना पूरी तरह से प्राचीन लकड़ी की नक्काशी और खांचों (Wooden Joinery) के माध्यम से जोड़ी जाती है।

  • निर्धारित लकड़ी: रथों के लिए लकड़ी की पैमाइश और कटाई अक्षया तृतीया के दिन से शुरू होती है। यह लकड़ी केवल विशेष जंगलों से शाही अनुमति के बाद ही लाई जाती है। बढ़ई किसी आधुनिक इंची टेप का इस्तेमाल नहीं करते, वे अपनी उंगलियों और हाथों की पारंपरिक नाप (Hand-spans) से ही एकदम सटीक आकार दे देते हैं।

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तीनों रथों की अनोखी विशेषताएं (Features of the Three Chariots)

भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा, तीनों के रथों के नाम, रंग, पहियों की संख्या और रक्षक देवता अलग-अलग होते हैं। इनके पीछे गहरा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व छुपा है।

1. नंदिघोष (Nandighosha) – भगवान जगन्नाथ का रथ

यह तीनों रथों में सबसे ऊंचा और भव्य होता है। भगवान श्रीकृष्ण (जगन्नाथ) इसी रथ पर सवार होकर निकलते हैं।

  • ऊंचाई: लगभग 45 फीट।

  • रंग: इसे सजाने के लिए पीले और लाल रंग के कपड़ों का उपयोग किया जाता है (पीला रंग भगवान विष्णु/कृष्ण के पीतांबर का प्रतीक है)।

  • पहियों की संख्या: इसमें कुल 18 पहिये होते हैं। मान्यता है कि ये 18 पहिये श्रीमद्भगवद्गीता के 18 अध्यायों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

  • रथ के रक्षक: दारुका (सारथी) और भगवान हनुमान तथा गरुड़ इस रथ के रक्षक माने जाते हैं।

  • रस्सी का नाम: इस रथ को खींचने वाली रस्सी को ‘शंखचूड़’ कहा जाता है।

2. तालध्वज (Taladhwaja) – भगवान बलभद्र का रथ

यह रथ भगवान जगन्नाथ के बड़े भाई और शक्ति के प्रतीक भगवान बलराम (बलभद्र) का होता है।

  • ऊंचाई: लगभग 44 फीट।

  • रंग: इसे हरे और लाल रंग के कपड़ों से ढका जाता है।

  • पहियों की संख्या: इसमें 16 पहिये होते हैं। ये पहिये मनुष्य की 16 कलाओं और चंद्रमा के 16 चरणों (Moon Phases) को दर्शाते हैं।

  • रथ के रक्षक: मातली (सारथी) और भगवान वासुदेव इसके रक्षक हैं।

  • रस्सी का नाम: इस रथ की रस्सी को ‘वासुकी’ कहा जाता है।

3. दर्पदलन या देवदलन (Darpadalana) – देवी सुभद्रा का रथ

यह रथ भगवान जगन्नाथ की लाडली बहन माता सुभद्रा का होता है, जो दोनों भाइयों के रथों के बीच में चलता है।

  • ऊंचाई: लगभग 43 फीट।

  • रंग: इसे काले और लाल रंग के वस्त्रों से सजाया जाता है (काला और लाल रंग शक्ति और देवी का प्रतीक माना गया है)।

  • पहियों की संख्या: इस रथ में 14 पहिये होते हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, ये 14 पहिये ब्रह्मांड के 14 भुवनों (Lokas) का प्रतीक हैं।

  • रथ के रक्षक: अर्जुन (सारथी) और देवी दुर्गा (जयदुर्गा) इसकी रक्षक मानी जाती हैं।

  • रस्सी का नाम: इस रथ की रस्सी को ‘स्वर्णचूड़’ कहा जाता है।

रथ यात्रा के पीछे की दो सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथाएं (Mythological Stories)

उड़ीसा की लोक परंपराओं और पुराणों में इस बात के दो अलग-अलग संदर्भ मिलते हैं कि यह रथ यात्रा क्यों शुरू हुई और भगवान के रूप ऐसे क्यों हैं।

कथा 1: अधूरी मूर्तियों का रहस्य (King Indradyumna & Vishwakarma)

पौराणिक कथा के अनुसार, मालवा के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उन्हें स्वप्न में निर्देश मिला कि समुद्र तट पर बहकर आई एक दिव्य नीम की लकड़ी (दारु) से वे भगवान की मूर्ति का निर्माण करवाएं। राजा ने शिल्पकारों की खोज की, तब स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई के रूप में प्रकट हुए।

विश्वकर्मा जी ने एक शर्त रखी: “मैं 21 दिनों तक एक बंद कमरे में मूर्ति बनाऊंगा। यदि उस दौरान किसी ने दरवाजा खोला, तो मैं काम वहीं छोड़ दूंगा।” 15 दिन बीत जाने के बाद, कमरे के अंदर से कोई आवाज नहीं आई। राजा की रानी (गुंडिचा) घबरा गईं कि कहीं वृद्ध बढ़ई भूख-प्यास से मर तो नहीं गया। उनके आग्रह पर राजा ने कमरा खोल दिया। कमरा खुलते ही विश्वकर्मा अंतर्ध्यान हो गए। कमरे में तीन अधूरी मूर्तियां पड़ी थीं— जिनके न तो पूरे हाथ थे, न पैर, और आंखें बड़ी-बड़ी थीं। राजा अपनी गलती पर रोने लगे, तब आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी रूप में धरती पर पूजे जाना चाहते हैं। राजा ने उसी याद में गुंडिचा मंदिर (रानी के नाम पर) बनवाया, जहाँ भगवान हर साल मिलने जाते हैं।

कथा 2: भाई-बहन के प्रेम की कहानी (The Listening Siblings)

दूसरी कथा के अनुसार, एक बार द्वारका में भगवान कृष्ण की रानियों ने माता रोहिणी से अनुरोध किया कि वे कृष्ण की वृंदावन की रासलीला और गोपियों के प्रेम की कथा सुनाएं। रोहिणी माता ने कहा कि कथा अत्यंत गोपनीय है, इसलिए सुभद्रा को दरवाजे पर पहरा देने के लिए खड़ा कर दिया गया ताकि कृष्ण और बलराम अंदर न आ सकें।

जैसे ही माता रोहिणी ने कथा शुरू की, सुभद्रा उसे सुनने में इतनी मग्न हो गईं कि उन्हें सुध-बुध न रही। इसी बीच कृष्ण और बलराम भी वहां आ गए और सुभद्रा के अगल-बगल खड़े होकर कथा सुनने लगे। वृंदावन के प्रेम रस को सुनकर तीनों भाई-बहन के भाव इतने गहरे हो गए कि उनके शरीर पिघलने लगे, आँखें बड़ी हो गईं और हाथ-पैर संकुचित हो गए। इसी समय वहां से देवर्षि नारद गुजरे। उन्होंने भगवान के इस भावमय रूप के दर्शन किए और प्रार्थना की कि प्रभु, आप कलयुग में इसी रूप में भक्तों को दर्शन दें। भगवान ने उनकी बात मान ली और तब से इस रूप की रथ यात्रा निकाली जाती है।

2026 में पुरी यात्रा पर जाने वाले भक्तों के लिए ज़रूरी गाइडलाइन (Safety & Travel Guide)

यदि आप जुलाई 2026 में पुरी जाने का मन बना रहे हैं, तो याद रखें कि उस समय पुरी में 10 लाख से अधिक लोगों की भीड़ होती है। ऐसे में बिना तैयारी के जाना बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकता है।

  • एडवांस बुकिंग (6 महीने पहले): पुरी में ग्रैंड रोड या समुद्र तट के पास के होटल रथ यात्रा के समय 6 महीने पहले ही बुक हो जाते हैं। 2026 की शुरुआत में ही अपनी बुकिंग पक्की कर लें।

  • मौसम और हाइड्रेशन: जुलाई के महीने में तटीय ओडिशा (Coastal Odisha) में अत्यधिक उमस (Humidity) और गर्मी होती है, साथ ही मानसून की भारी बारिश की भी पूरी संभावना रहती है। अपने साथ ओआरएस (ORS) के पैकेट, ग्लूकोज, सूती कपड़े और एक अच्छा रेनकोट या छाता जरूर रखें।

  • भीड़ प्रबंधन (Crowd Alert): रथ की रस्सियों को खींचने की होड़ में कभी-कभी भगदड़ जैसी स्थिति बन जाती है। यदि आपके साथ बुजुर्ग या बच्चे हैं, तो उन्हें रथ के बिल्कुल करीब न ले जाएं। आप किसी ऊंचे भवन की छत या बालकनी (जिसकी बुकिंग पहले से होती है) से भी दर्शन कर सकते हैं।

  • कीमती सामान से बचें: जेबकतरों और चोरी से बचने के लिए सोने के आभूषण या भारी मात्रा में कैश लेकर भीड़ में न जाएं। डिजिटल पेमेंट का उपयोग करें, हालांकि नेटवर्क जैम होने की स्थिति के लिए कुछ कैश सुरक्षित पॉकेट में रखें।

पुरी की Jagannath Rath Yatra 2026 सिर्फ एक धार्मिक जुलूस नहीं है, बल्कि यह इंसानी आत्मा की परमात्मा से मिलने की एक तड़प है। जहाँ दुनिया के अन्य मंदिरों में भगवान तक पहुँचने के लिए इंसान को सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं, कड़े नियमों से गुजरना पड़ता है, वहीं रथ यात्रा के दिन स्वयं ब्रह्मांड के नायक (जगन्नाथ) अपने ऊंचे सिंहासन को छोड़कर धूल और कीचड़ से भरी सड़कों पर आ जाते हैं ताकि समाज के सबसे आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी गले लगा सकें।

रथ की जो मोटी coir (जूट) की रस्सियाँ हैं, वे वास्तव में सिर्फ जूट के धागे नहीं हैं; वे विश्वास की वो डोर हैं जो भक्त को भगवान से बांधती हैं। इस यात्रा में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता, कोई ऊंच-नीच नहीं होती। तो इस साल 16 जुलाई 2026 को जब महाप्रभु का रथ आगे बढ़े, तो दूर से ही सही, मन में ‘जय जगन्नाथ’ का स्मरण जरूर कीजिएगा, क्योंकि महाप्रभु भाव के भूखे हैं, भौतिक दूरी के नहीं।

Jagannath Rath Yatra 2026 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. साल 2026 में जगन्नाथ रथ यात्रा किस तारीख को शुरू हो रही है?

साल 2026 में जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई 2026 (गुरुवार) को शुरू होगी। यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को प्रारंभ होती है। इसकी वापसी यात्रा (बहुड़ा यात्रा) 24 जुलाई 2026 को होगी।

2. क्या महिलाएं भी भगवान जगन्नाथ का रथ खींच सकती हैं?

जी हाँ, बिल्कुल। जगन्नाथ रथ यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता ही यही है कि इसमें लिंग, जाति या धर्म का कोई भेद नहीं होता। महिलाएं भी पुरुषों के साथ मिलकर पूरी श्रद्धा से रथ की रस्सियों को खींच सकती हैं।

3. भगवान जगन्नाथ के रथ का क्या नाम है और उसमें कितने पहिये होते हैं?

भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम ‘नंदिघोष’ है। यह पीले और लाल रंग के कपड़ों से सजाया जाता है और इसकी ऊंचाई लगभग 45 फीट होती है। इस रथ में कुल 18 पहिये होते हैं जो गीता के 18 अध्यायों का प्रतीक माने जाते हैं।

4. रथ यात्रा से पहले भगवान 15 दिन बीमार क्यों रहते हैं?

ज्येष्ठ पूर्णिमा (स्नान पूर्णिमा) के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी को 108 घड़ों के ठंडे कुएं के जल से स्नान कराया जाता है। अत्यधिक स्नान के कारण मान्यताओं के अनुसार भगवान को बुखार आ जाता है। इस 15 दिन की अवधि को ‘अनासर काल’ या एकांतवास कहा जाता है, जिसमें वैद्य भगवान को जड़ी-बूटियों का काढ़ा और सादा भोग लगाते हैं। इस दौरान मंदिर के कपाट बंद रहते हैं।

5. ‘सुना बेशा’ (Suna Besha) अनुष्ठान क्या है और यह कब होगा?

‘सुना बेशा’ का अर्थ है सोने का शृंगार। जब भगवान मौसी के घर से लौटकर वापस मुख्य मंदिर के बाहर पहुँचते हैं, तो उन्हें रथों पर ही लगभग 200 से 300 किलो शुद्ध सोने के पारंपरिक आभूषणों से सजाया जाता है। साल 2026 में यह अद्भुत अनुष्ठान 25 जुलाई 2026 (शनिवार) को आयोजित किया जाएगा, जिसे देखने के लिए सबसे ज्यादा भीड़ उमड़ती है।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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