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Navratri Calendar 2026: चैत्र और शारदीय नवरात्रि की तिथियां, कलश स्थापना मुहूर्त और पूजा विधिIt takes 15 minutes... to read this article !

भारत में नवरात्रि का पर्व हिंदू धर्म के सबसे पवित्र और बड़े त्योहारों में से एक माना जाता है। यह त्योहार मां दुर्गा (Maa Durga) की आराधना, शक्ति की उपासना और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। “नवरात्रि” संस्कृत का शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘नौ रातें’। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, भक्त मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों—जिन्हें नवदुर्गा कहा जाता है—की पूरे विधि-विधान के साथ पूजा करते हैं।

यदि आप भी साल 2026 में नवरात्रि (Navratri 2026) के व्रत और पूजा की तैयारियां कर रहे हैं, तो आपके लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि 2026 में चैत्र नवरात्रि (Chaitra Navratri 2026) और शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri 2026) कब से शुरू हो रही हैं। कलश स्थापना (Ghatasthapana) का शुभ मुहूर्त क्या है, और नौ दिनों तक माता की पूजा कैसे करनी चाहिए?

इस विस्तृत और ज्ञानवर्धक लेख में, हम Navratri Calendar 2026 से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी आपके साथ साझा करेंगे ताकि आपकी साधना में कोई कमी न रह जाए।

एक वर्ष में कितनी नवरात्रि होती हैं? (Types of Navratri in a Year)

आमतौर पर लोगों को सिर्फ दो ही नवरात्रि के बारे में पता होता है—चैत्र और शारदीय नवरात्रि। लेकिन हिंदू पंचांग के अनुसार, एक वर्ष में कुल चार नवरात्रि आती हैं। इनमें से दो गुप्त नवरात्रि होती हैं और दो प्रत्यक्ष नवरात्रि।

  1. चैत्र नवरात्रि (वसंत नवरात्रि): यह मार्च या अप्रैल के महीने में आती है। इसी दिन से हिंदू नववर्ष (नव संवत्सर) की शुरुआत होती है।

  2. शारदीय नवरात्रि (महा नवरात्रि): यह सितंबर या अक्टूबर के महीने में आती है। यह सबसे अधिक भव्य रूप से मनाई जाने वाली नवरात्रि है, जिसका समापन विजयदशमी (Dussehra) के दिन होता है।

  3. माघ गुप्त नवरात्रि: यह जनवरी या फरवरी में आती है। इसका महत्व तांत्रिक साधनाओं और देवी की गुप्त पूजा के लिए होता है। वर्ष 2026 में यह 19 जनवरी से 27 जनवरी तक मनाई जाएगी।

  4. आषाढ़ गुप्त नवरात्रि: यह जून या जुलाई में मनाई जाती है। यह भी तंत्र-मंत्र और विशेष सिद्धियों की प्राप्ति के लिए साधुओं और तांत्रिकों द्वारा मनाई जाती है। 2026 में यह 15 जुलाई से शुरू होगी।

पारिवारिक जीवन जीने वाले लोग मुख्य रूप से चैत्र और शारदीय नवरात्रि ही मनाते हैं। आइए इनके कलैंडर और मुहूर्त पर विस्तार से चर्चा करते हैं।

चैत्र नवरात्रि कलैंडर 2026 (Chaitra Navratri 2026 Dates & Timings)

साल 2026 में चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च 2026 (गुरुवार) से हो रही है। इसी दिन हिंदू नववर्ष विक्रम संवत 2083 का भी आरंभ होगा। चैत्र नवरात्रि का समापन 27 मार्च 2026 (शुक्रवार) को राम नवमी के साथ होगा।

कलश स्थापना (Ghatasthapana) का शुभ मुहूर्त 2026 (चैत्र नवरात्रि)

कलश स्थापना हमेशा प्रतिपदा तिथि (नवरात्रि के पहले दिन) के शुभ मुहूर्त में ही की जाती है।

  • घटस्थापना का मुख्य मुहूर्त: 19 मार्च 2026 को सुबह 06:52 बजे से 07:43 बजे तक।

  • अभिजित मुहूर्त (वैकल्पिक): 19 मार्च 2026 को दोपहर 12:05 बजे से 12:53 बजे तक।

चैत्र नवरात्रि 2026 की तिथियां (Day-wise Calendar)

दिन तिथि और तारीख देवी का स्वरूप शुभ रंग भोग (प्रसाद)
पहला दिन प्रतिपदा (19 मार्च 2026) मां शैलपुत्री पीला (Yellow) शुद्ध गाय का घी
दूसरा दिन द्वितीया (20 मार्च 2026) मां ब्रह्मचारिणी हरा (Green) शक्कर (चीनी)
तीसरा दिन तृतीया (21 मार्च 2026) मां चंद्रघंटा स्लेटी (Grey) दूध की मिठाई या खीर
चौथा दिन चतुर्थी (22 मार्च 2026) मां कुष्मांडा नारंगी (Orange) मालपुआ
पांचवां दिन पंचमी (23 मार्च 2026) मां स्कंदमाता सफेद (White) केला
छठा दिन षष्ठी (24 मार्च 2026) मां कात्यायनी लाल (Red) शहद
सातवां दिन सप्तमी (25 मार्च 2026) मां कालरात्रि गहरा नीला (Royal Blue) गुड़
आठवां दिन अष्टमी (26 मार्च 2026) मां महागौरी गुलाबी (Pink) नारियल
नौवां दिन नवमी (27 मार्च 2026) मां सिद्धिदात्री (राम नवमी) बैंगनी (Purple) तिल और हलवा-चना

(नोट: नवमी के दिन राम नवमी का पावन पर्व भी मनाया जाएगा, और इसी दिन कन्या पूजन और व्रत पारण किया जाएगा।)

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शारदीय नवरात्रि कलैंडर 2026 (Shardiya Navratri 2026 Dates & Timings)

शारदीय नवरात्रि भारत के हर कोने में बहुत ही धूमधाम से मनाई जाती है। गुजरात में जहां गरबा की धूम होती है, वहीं बंगाल में दुर्गा पूजा के पंडाल सजते हैं। उत्तर भारत में जगह-जगह रामलीला का मंचन होता है। वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 11 अक्टूबर 2026 (रविवार) से होगी और इसका समापन 20 अक्टूबर 2026 (मंगलवार) को विजयादशमी (दशहरा) के साथ होगा।

कलश स्थापना मुहूर्त 2026 (शारदीय नवरात्रि)

  • घटस्थापना का मुख्य मुहूर्त: 11 अक्टूबर 2026 को सुबह 06:19 बजे से 10:12 बजे तक।

  • अभिजित मुहूर्त: 11 अक्टूबर 2026 को सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक।

शारदीय नवरात्रि 2026 की तिथियां (Day-wise Calendar)

दिन तिथि और तारीख देवी का स्वरूप और पूजा
पहला दिन 11 अक्टूबर 2026 घटस्थापना, मां शैलपुत्री पूजा
दूसरा दिन 12 अक्टूबर 2026 मां ब्रह्मचारिणी पूजा
तीसरा दिन 13 अक्टूबर 2026 मां चंद्रघंटा पूजा (सिंदूर तृतीया)
चौथा दिन 14 अक्टूबर 2026 मां कुष्मांडा पूजा (विनायक चतुर्थी)
पांचवां दिन 15 अक्टूबर 2026 मां स्कंदमाता पूजा (उपांग ललिता व्रत)
छठा दिन 16 अक्टूबर 2026 मां कात्यायनी पूजा (सरस्वती आवाहन)
सातवां दिन 17 अक्टूबर 2026 मां कालरात्रि पूजा (महा सप्तमी)
आठवां दिन 18 अक्टूबर 2026 कोई विशेष तिथि नहीं (सप्तमी का विस्तार)
नौवां दिन 19 अक्टूबर 2026 दुर्गा अष्टमी, महा नवमी, महानवमी, कन्या पूजन, महानवमी हवन
दसवां दिन 20 अक्टूबर 2026 नवरात्रि व्रत पारण, दुर्गा विसर्जन, विजयादशमी (दशहरा)

(नोट: हिंदू पंचांग में कभी-कभी तिथियों का घटना-बढ़ना लगा रहता है। इसलिए शारदीय नवरात्रि 2026 में 19 अक्टूबर को ही महाष्टमी और महानवमी की संधिवेला (Sandhi Puja) पड़ेगी।)

नवदुर्गा: मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का विस्तृत वर्णन, मंत्र और महत्व

नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों को समर्पित हैं। हर देवी की अपनी एक अलग कहानी, अलग ऊर्जा और अलग मंत्र है। आइए इन्हें विस्तार से समझते हैं:

दिन 1: मां शैलपुत्री (Maa Shailputri)

नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री का होता है। ‘शैल’ का अर्थ है पर्वत, और ‘पुत्री’ का अर्थ है बेटी। हिमालयराज की पुत्री होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा गया। इनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल का फूल है और इनकी सवारी नंदी (बैल) है।

  • महत्व: मां शैलपुत्री का संबंध मूलाधार चक्र (Root Chakra) से है। इनकी पूजा करने से जीवन में स्थिरता (Stability) और साहस आता है।

  • मंत्र: ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥

  • प्रार्थना: वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

दिन 2: मां ब्रह्मचारिणी (Maa Brahmacharini)

दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। ‘ब्रह्म’ का अर्थ है तपस्या और ‘चारिणी’ का अर्थ है आचरण करने वाली। इन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए हजारों वर्षों तक कठिन तपस्या की थी। इनके एक हाथ में कमंडल और दूसरे में जप माला होती है।

  • महत्व: यह देवी स्वाधिष्ठान चक्र को जाग्रत करती हैं। इनकी उपासना से वैराग्य, तप, त्याग, और सदाचार की वृद्धि होती है। जो लोग विद्यार्थी हैं, उन्हें इनकी पूजा जरूर करनी चाहिए।

  • मंत्र: ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥

दिन 3: मां चंद्रघंटा (Maa Chandraghanta)

तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की आराधना की जाती है। देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्रमा (अर्धचंद्र) सुशोभित है, इसलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। इनका वाहन सिंह (शेर) है और इनके दस हाथ हैं जिनमें विभिन्न अस्त्र-शस्त्र हैं।

  • महत्व: मां चंद्रघंटा की पूजा से नकारात्मक शक्तियां, भूत-प्रेत और डर दूर होते हैं। इनकी पूजा करने वाला व्यक्ति सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है।

  • मंत्र: ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥

दिन 4: मां कुष्मांडा (Maa Kushmanda)

चौथे दिन देवी कुष्मांडा की पूजा होती है। मान्यता है कि जब सृष्टि में चारों ओर अंधकार था, तब मां कुष्मांडा ने अपनी मंद मुस्कान से इस ब्रह्मांड (अंड) की रचना की थी। इन्हें ‘आदि शक्ति’ भी कहा जाता है। इनकी आठ भुजाएं हैं।

  • महत्व: मां कुष्मांडा सूर्य मंडल के भीतर लोक में निवास करती हैं। इनकी उपासना से रोग, शोक दूर होते हैं और आयु, यश, और आरोग्य की प्राप्ति होती है।

  • मंत्र: ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥

दिन 5: मां स्कंदमाता (Maa Skandamata)

पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है। भगवान कार्तिकेय का एक नाम ‘स्कंद’ है, अतः उनकी माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। इनकी गोद में बालरूप में भगवान स्कंद विराजमान रहते हैं।

  • महत्व: जो लोग संतान प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, उन्हें मां स्कंदमाता की पूजा करनी चाहिए। इनकी पूजा से मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त होता है।

  • मंत्र: ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥

दिन 6: मां कात्यायनी (Maa Katyayani)

महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया था, इसीलिए इन्हें कात्यायनी कहा जाता है। यह मां दुर्गा का अत्यंत उग्र और तेजस्वी रूप है। इन्होंने ही महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था।

  • महत्व: कुंवारी कन्याएं यदि मां कात्यायनी की पूजा करें, तो उनके विवाह में आ रही रुकावटें (जैसे मांगलिक दोष) दूर होती हैं और सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है।

  • मंत्र: ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥

दिन 7: मां कालरात्रि (Maa Kalaratri)

सातवां दिन मां कालरात्रि को समर्पित है। यह मां दुर्गा का सबसे भयंकर और रौद्र रूप है। इनका रंग काजल के समान काला है, बाल बिखरे हुए हैं, और गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है।

  • महत्व: मां कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली हैं। इनकी पूजा से तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, और अकाल मृत्यु का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। इन्हें ‘शुभंकरी’ भी कहते हैं क्योंकि यह हमेशा शुभ फल ही देती हैं।

  • मंत्र: ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥

दिन 8: मां महागौरी (Maa Mahagauri)

आठवें दिन मां महागौरी की पूजा होती है। भगवान शिव की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या करने के कारण इनका शरीर काला पड़ गया था, तब शिव जी ने गंगाजल से इन्हें धोया, जिससे इनका शरीर गौर (सफेद) और कांतिमय हो गया।

  • महत्व: मां महागौरी की पूजा से पाप नष्ट होते हैं, और व्यक्ति का मन पवित्र हो जाता है। यह दिन सुख, शांति और सौभाग्य का प्रतीक है।

  • मंत्र: ॐ देवी महागौर्यै नमः॥

दिन 9: मां सिद्धिदात्री (Maa Siddhidatri)

नवरात्रि के अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है—यह सभी प्रकार की सिद्धियां प्रदान करने वाली देवी हैं। भगवान शिव ने भी सिद्धियां प्राप्त करने के लिए इनकी ही उपासना की थी।

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  • महत्व: इनकी आराधना से लौकिक और पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाएं पूर्ण होती हैं। इस दिन नवरात्रि का समापन और कन्या पूजन किया जाता है।

  • मंत्र: ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥

नवरात्रि की कलश स्थापना (Ghatasthapana) की पूर्ण विधि

कलश स्थापना या घटस्थापना नवरात्रि की सबसे महत्वपूर्ण रस्म है। इसे हमेशा शुभ मुहूर्त में ही करना चाहिए। अगर कलश स्थापना गलत समय या गलत दिशा में की जाए, तो इसका पूर्ण फल नहीं मिलता।

आवश्यक सामग्री:

मिट्टी का पात्र, जौ, साफ मिट्टी, कलश (सोने, चांदी, तांबे या मिट्टी का), गंगाजल, लाल धागा (कलावा), साबुत सुपारी, सिक्के, आम या अशोक के पांच पत्ते, और जटा वाला एक नारियल।

स्थापना की प्रक्रिया (Step-by-step Video/Guide):

  1. दिशा का चयन: घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) को पूजा के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। वहां एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं।

  2. मिट्टी और जौ बोना: मिट्टी के एक चौड़े बर्तन में थोड़ी सी साफ मिट्टी डालें और उसमें जौ (Barley) बो दें। इसके ऊपर कलश रखें।

  3. कलश तैयार करना: कलश में शुद्ध जल और थोड़ा गंगाजल भरें। इसमें एक सुपारी, एक सिक्का, हल्दी की गांठ और दूर्वा डालें। कलश के गले में लाल कलावा बांधें।

  4. पल्लव और नारियल: कलश के मुख पर आम या अशोक के 5 पत्ते (पल्लव) रखें। अब एक जटा वाले नारियल को लाल कपड़े और कलावे से लपेट कर कलश के ऊपर (पत्तों के बीच में) स्थापित करें। नारियल का मुख हमेशा आपकी ओर (पूजा करने वाले की ओर) होना चाहिए।

  5. आवाहन और मंत्र जाप: अब दोनों हाथ जोड़कर मां दुर्गा का आवाहन करें। कलश को भगवान गणेश और सभी देवी-देवताओं का प्रतीक मानकर पूजा शुरू करें। इसके बाद नौ दिनों तक इसी कलश के सामने अखंड ज्योत (यदि संभव हो) जलाएं और दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।

नवरात्रि व्रत के नियम (Fasting Rules during Navratri)

नवरात्रि के नौ दिनों का व्रत केवल शरीर की शुद्धि के लिए नहीं, बल्कि मन और आत्मा की शुद्धि के लिए भी रखा जाता है। अगर आप 2026 में नवरात्रि का व्रत रख रहे हैं, तो इन नियमों का पालन अवश्य करें:

क्या खाएं (Allowed Foods):

  • कुट्टू का आटा (Buckwheat flour), सिंघाड़े का आटा, और राजगिरा का आटा।

  • साबूदाना (Sabudana), समा के चावल (Barnyard millet)।

  • सभी प्रकार के ताजे फल और मेवे (Dry fruits)।

  • दूध, दही, पनीर, छाछ, और शुद्ध घी।

  • सेंधा नमक (Rock salt) का ही प्रयोग करें।

क्या न खाएं (Strictly Avoid):

  • गेहूं, चावल, सूजी, बेसन या कोई भी सामान्य अनाज।

  • प्याज और लहसुन (नवरात्रि में तामसिक भोजन पूरी तरह वर्जित है, चाहे आपने व्रत रखा हो या नहीं)।

  • मांस, मदिरा (Alcohol), और अंडे का सेवन बिल्कुल न करें।

  • हल्दी, हींग, गरम मसाला, और राई का प्रयोग व्रत के खाने में नहीं किया जाता है। जीरा और काली मिर्च का प्रयोग किया जा सकता है।

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आचरण संबंधी नियम (Lifestyle Rules):

  1. ब्रह्मचर्य का पालन: नौ दिनों तक पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है।

  2. साफ-सफाई: घर को साफ रखें। गंदे कपड़े न पहनें और स्नान किए बिना रसोई घर में प्रवेश न करें।

  3. क्रोध न करें: व्रत के दौरान किसी की चुगली करना, अपशब्द बोलना या गुस्सा करना व्रत को खंडित कर सकता है। मन को शांत रखें।

  4. बाल और नाखून काटना: नवरात्रि के नौ दिनों में बाल काटना, शेविंग करना और नाखून काटना वर्जित माना जाता है।

नवरात्रि उपवास का वैज्ञानिक महत्व (Scientific Significance of Navratri Fasting)

ऋषि-मुनियों ने त्योहारों को ऋतुओं के बदलाव के साथ जोड़ा है। अगर आप ध्यान दें, तो चैत्र नवरात्रि सर्दियों के जाने और गर्मियों के आने के समय आती है (मार्च-अप्रैल)। वहीं शारदीय नवरात्रि मानसून के जाने और सर्दियों के आगमन (अक्टूबर) के समय आती है।

मौसम के इस बदलाव (Transition period) के दौरान हमारी इम्युनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) काफी कमजोर हो जाती है। हवा में बैक्टीरिया और वायरस का प्रकोप बढ़ जाता है। ऐसे समय में भारी अनाज, मांसाहार, और तामसिक भोजन पचाना शरीर के लिए मुश्किल होता है।

नौ दिनों तक सात्विक भोजन, फलों और फलाहार पर रहने से हमारे पाचन तंत्र (Digestive system) को आराम मिलता है। इससे शरीर डिटॉक्स (Detox) होता है, और आने वाले नए मौसम के लिए हमारा शरीर खुद को तैयार कर लेता है। इसलिए नवरात्रि का व्रत केवल धार्मिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि मेडिकल साइंस के नजरिए से भी बहुत लाभदायक है।

कन्या पूजन (Kanya Pujan Vidhi)

नवरात्रि का अनुष्ठान बिना कन्या पूजन के अधूरा माना जाता है। कई लोग अष्टमी के दिन और कई लोग नवमी के दिन कन्याओं का पूजन करते हैं। इन छोटी कन्याओं को देवी का साक्षात स्वरूप माना जाता है।

कन्या पूजन के नियम:

  1. दो वर्ष से लेकर दस वर्ष तक की कन्याओं को आमंत्रित करना सबसे उत्तम है। कम से कम 9 कन्याएं और एक बालक (जिसे बटुक भैरव का स्वरूप माना जाता है) को भोजन के लिए बुलाएं।

  2. कन्याओं के घर आने पर सबसे पहले उनके चरण धोएं और उन्हें एक साफ आसन पर बैठाएं।

  3. उनके माथे पर रोली और कुमकुम का तिलक लगाएं।

  4. माता के प्रसाद के रूप में पूरी, काले चने, और हलवा खाने के लिए परोसें। (याद रहे, भोजन में लहसुन-प्याज का प्रयोग न हो)।

  5. भोजन कराने के बाद उन्हें दक्षिणा, लाल चुनरी, या कोई भी उपहार भेंट करें।

  6. अंत में कन्याओं और भैरव (बालक) के पैर छूकर आशीर्वाद लें और उन्हें सम्मान पूर्वक विदा करें।

दुर्गा सप्तशती का पाठ (Importance of Durga Saptashati)

नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती (Durga Saptashati) का पाठ करना सबसे ज्यादा फलदायी माना जाता है। इसमें 700 श्लोक हैं जो मार्कण्डेय पुराण से लिए गए हैं। इसमें मां दुर्गा द्वारा महिषासुर, शुंभ-निशुंभ, चंड-मुंड और रक्तबीज जैसे असुरों के वध की कथाओं का वर्णन है।

अगर आप संस्कृत में पाठ नहीं कर सकते, तो आप हिंदी अनुवाद पढ़ सकते हैं। यदि आपके पास पूरा पाठ करने का समय नहीं है, तो कम से कम:

  • देवी कवच (Devi Kavacham)

  • अर्गला स्तोत्र (Argala Stotram)

  • कीलकम (Keelakam)

  • और सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ अवश्य करें। सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के पाठ से ही पूरी दुर्गा सप्तशती के पाठ का फल प्राप्त हो जाता है।

नवरात्रि केवल कर्मकांडों का त्योहार नहीं है; यह आत्म-निरीक्षण (Self-realization) और अपनी आंतरिक शक्ति (Inner Shakti) को जाग्रत करने का समय है। साल 2026 की नवरात्रि आपके लिए एक सुनहरा अवसर है कि आप भौतिक भागदौड़ से थोड़ा समय निकालें और अपने मन की शांति पर ध्यान केंद्रित करें।

चाहे आप चैत्र नवरात्रि 2026 (19 मार्च से 27 मार्च) में उपवास करें या शारदीय नवरात्रि 2026 (11 अक्टूबर से 20 अक्टूबर) में, सच्ची श्रद्धा और भक्ति ही सबसे अधिक मायने रखती है। माता रानी किसी महंगे चढ़ावे की भूखी नहीं हैं, वे केवल आपके निर्मल मन और सच्चे भाव को देखती हैं। आशा है कि Navratri Calendar 2026 की यह विस्तृत जानकारी आपके काम आएगी और आपकी नवरात्रि मंगलमय होगी।

जय माता दी!

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. वर्ष 2026 में चैत्र नवरात्रि कब से शुरू हो रही है?

चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च 2026 (गुरुवार) से हो रही है। इसका समापन 27 मार्च 2026 को राम नवमी के साथ होगा।

2. शारदीय नवरात्रि 2026 में कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त क्या है?

शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर 2026 से शुरू होगी। इस दिन कलश स्थापना (घटस्थापना) का सबसे उत्तम मुहूर्त सुबह 06:19 बजे से 10:12 बजे तक रहेगा। आप अभिजित मुहूर्त में भी (11:44 AM से 12:31 PM तक) कलश स्थापित कर सकते हैं।

3. क्या नवरात्रि के दौरान पानी पी सकते हैं?

जी हां, ‘निराहार’ व्रत का संकल्प लिए बिना पानी पीना पूरी तरह से मान्य है। वास्तव में, शरीर को हाइड्रेट रखने के लिए आपको पानी, नारियल पानी, नींबू पानी और ताजे फलों का जूस पीते रहना चाहिए।

4. नवरात्रि व्रत पारण (Fast Breaking) कब किया जाना चाहिए?

व्रत का पारण हमेशा नवमी तिथि की समाप्ति के बाद या दशमी के दिन सुबह किया जाता है। कन्या पूजन करने के बाद माता का प्रसाद (हलवा-चना) खाकर आप अपना व्रत खोल सकते हैं।

5. अगर कलश स्थापना न कर पाएं, तो क्या हम नवरात्रि का व्रत रख सकते हैं?

बिलकुल! कलश स्थापना अनिवार्य नहीं है। अगर आप कामकाजी हैं या आपके पास समय/सामग्री का अभाव है, तो आप केवल माता की तस्वीर के सामने धूप-दीप जलाकर और सात्विक नियमों का पालन करते हुए भी पूरी श्रद्धा के साथ नौ दिनों का व्रत रख सकते हैं।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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