सनातन धर्म के इतिहास में अद्वैत वेदांत के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान ‘आदि गुरु शंकराचार्य’ जी ने जहाँ एक ओर ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ का कठोर दार्शनिक ज्ञान दिया, वहीं जब बात जगदम्बा (माता) की आई, तो वे एक अबोध बालक की तरह उनके चरणों में रो पड़े। शंकराचार्य जी ने शिव, विष्णु, गणेश और देवी के अनेक स्तोत्र रचे, लेकिन जब उन्होंने माँ भवानी (पार्वती/दुर्गा) की स्तुति की, तो उसमें उनके हृदय का सारा वात्सल्य और समर्पण छलक उठा। आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित ऐसा ही एक अत्यंत चमत्कारिक, भावपूर्ण और ऊर्जावान स्तोत्र है— ‘श्री भवानी भुजङ्ग स्तुतिः’ (Shri Bhavani Bhujanga Stuti)।
जीवन में कई बार ऐसा समय आता है जब इंसान चारों तरफ से हार जाता है। न कोई अपना साथ देता है, न अपनी बुद्धि काम आती है और न ही कोई सांसारिक शक्ति रक्षा कर पाती है। ऐसे समय में जब एक भक्त पूर्ण समर्पण के साथ माँ भवानी को पुकारता है, तो ब्रह्मांड की सर्वोच्च सत्ता एक ‘माँ’ के रूप में उसकी रक्षा के लिए दौड़ी चली आती है। यह स्तुति उसी करुण पुकार और मातृ-कृपा का साक्षात स्वरूप है।
इस अत्यंत विस्तृत, आध्यात्मिक और दार्शनिक लेख में हम जानेंगे कि ‘भुजङ्ग’ छंद का रहस्य क्या है, माँ भवानी का यह स्वरूप इतना दयालु क्यों है, Shri Bhavani Bhujanga Stuti Lyrics in Sanskrit के पाठ का गहरा भाव क्या है, इसके नित्य पाठ से जीवन में कौन से अकल्पनीय लाभ प्राप्त होते हैं, और इस स्तुति को सिद्ध करने की प्रामाणिक विधि क्या है।
‘भुजङ्गप्रयात’ छंद का गहरा तांत्रिक और संगीतमय रहस्य
इस स्तुति की शक्ति को पूरी तरह समझने के लिए इसके नाम में छिपे ‘भुजङ्ग’ शब्द को समझना बहुत आवश्यक है। संस्कृत काव्यशास्त्र में छंदों (Meters) का बहुत महत्व है। यह स्तुति ‘भुजङ्गप्रयात’ (Bhujangaprayata) छंद में रची गई है।
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भुजङ्ग (Bhujanga): इसका अर्थ है— सर्प (सांप/Snake)।
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प्रयात (Prayata): इसका अर्थ है— चाल या गति (Movement)।
जिस प्रकार एक सर्प बलखाते हुए, एक विशेष लय और लहर (Serpentine motion) के साथ आगे बढ़ता है, ठीक उसी प्रकार इस छंद में रचे गए श्लोकों का उच्चारण जब किया जाता है, तो उसमें एक अद्भुत और सम्मोहक लय उत्पन्न होती है।
मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रभाव: जब साधक पूर्ण एकाग्रता से भुजङ्गप्रयात छंद में भवानी स्तुति का सस्वर पाठ करता है, तो इसकी ध्वनि तरंगें (Sound Vibrations) सीधे साधक की ‘सुषुम्ना नाड़ी’ (Spinal cord) और ‘कुंडलिनी शक्ति’ (जिसे स्वयं एक सर्पिणी माना गया है) पर प्रहार करती हैं। इसकी लयबद्ध ध्वनि मन के सारे भटकाव को तुरंत रोक देती है और साधक बड़ी आसानी से गहरे ध्यान (Trance) की अवस्था में पहुँच जाता है। यह छंद सीधे हमारे अवचेतन मन (Subconscious mind) को जाग्रत करता है।
श्री भवानी भुजङ्ग स्तुतिः (Shri Bhavani Bhujanga Stuti Lyrics in Sanskrit)
षडाधारपङ्केरुहान्तर्विराज-
-त्सुषुम्नान्तरालेऽतितेजोल्लसन्तीम् ।
सुधामण्डलं द्रावयन्तीं पिबन्तीं
सुधामूर्तिमीडे चिदानन्दरूपाम् ॥ १ ॥
ज्वलत्कोटिबालार्कभासारुणाङ्गीं
सुलावण्यशृङ्गारशोभाभिरामाम् ।
महापद्मकिञ्जल्कमध्ये विराज-
-त्त्रिकोणे निषण्णां भजे श्रीभवानीम् ॥ २ ॥
क्वणत्किङ्किणीनूपुरोद्भासिरत्न-
-प्रभालीढलाक्षार्द्रपादाब्जयुग्मम् ।
अजेशाच्युताद्यैः सुरैः सेव्यमानं
महादेवि मन्मूर्ध्नि ते भावयामि ॥ ३ ॥
सुशोणाम्बराबद्धनीवीविराज-
-न्महारत्नकाञ्चीकलापं नितम्बम् ।
स्फुरद्दक्षिणावर्तनाभिं च तिस्रो
वलीरम्ब ते रोमराजिं भजेऽहम् ॥ ४ ॥
लसद्वृत्तमुत्तुङ्गमाणिक्यकुम्भो-
-पमश्रि स्तनद्वन्द्वमम्बाम्बुजाक्षि ।
भजे दुग्धपूर्णाभिरामं तवेदं
महाहारदीप्तं सदा प्रस्नुतास्यम् ॥ ५ ॥
शिरीषप्रसूनोल्लसद्बाहुदण्डै-
-र्ज्वलद्बाणकोदण्डपाशाङ्कुशैश्च ।
चलत्कङ्कणोदारकेयूरभूषो-
-ज्ज्वलद्भिर्लसन्तीं भजे श्रीभवानीम् ॥ ६ ॥
शरत्पूर्णचन्द्रप्रभापूर्णबिम्बा-
-धरस्मेरवक्त्रारविन्दां सुशान्ताम् ।
सुरत्नावलीहारताटङ्कशोभां
महासुप्रसन्नां भजे श्रीभवानीम् ॥ ७ ॥
सुनासापुटं सुन्दरभ्रूललाटं
तवौष्ठश्रियं दानदक्षं कटाक्षम् ।
ललाटे लसद्गन्धकस्तूरिभूषं
स्फुरच्छ्रीमुखाम्भोजमीडेऽहमम्ब ॥ ८ ॥
चलत्कुन्तलान्तर्भ्रमद्भृङ्गबृन्दं
घनस्निग्धधम्मिल्लभूषोज्ज्वलं ते ।
स्फुरन्मौलिमाणिक्यबद्धेन्दुरेखा-
-विलासोल्लसद्दिव्यमूर्धानमीडे ॥ ९ ॥
इति श्रीभवानि स्वरूपं तवेदं
प्रपञ्चात्परं चातिसूक्ष्मं प्रसन्नम् ।
स्फुरत्वम्ब डिम्भस्य मे हृत्सरोजे
सदा वाङ्मयं सर्वतेजोमयं च ॥ १० ॥
गणेशाभिमुख्याखिलैः शक्तिबृन्दै-
-र्वृतां वै स्फुरच्चक्रराजोल्लसन्तीम् ।
परां राजराजेश्वरि त्रैपुरि त्वां
शिवाङ्कोपरिस्थां शिवां भावयामि ॥ ११ ॥
त्वमर्कस्त्वमिन्दुस्त्वमग्निस्त्वमाप-
-स्त्वमाकाशभूवायवस्त्वं महत्त्वम् ।
त्वदन्यो न कश्चित् प्रपञ्चोऽस्ति सर्वं
सदानन्दसंवित्स्वरूपं भजेऽहम् ॥ १२ ॥
श्रुतीनामगम्ये सुवेदागमज्ञा
महिम्नो न जानन्ति पारं तवाम्ब ।
स्तुतिं कर्तुमिच्छामि ते त्वं भवानि
क्षमस्वेदमत्र प्रमुग्धः किलाहम् ॥ १३ ॥
गुरुस्त्वं शिवस्त्वं च शक्तिस्त्वमेव
त्वमेवासि माता पिता च त्वमेव ।
त्वमेवासि विद्या त्वमेवासि बन्धु-
-र्गतिर्मे मतिर्देवि सर्वं त्वमेव ॥ १४ ॥
शरण्ये वरेण्ये सुकारुण्यमूर्ते
हिरण्योदराद्यैरगण्ये सुपुण्ये ।
भवारण्यभीतेश्च मां पाहि भद्रे
नमस्ते नमस्ते नमस्ते भवानि ॥ १५ ॥
इतीमां महच्छ्रीभवानीभुजङ्गं
स्तुतिं यः पठेद्भक्तियुक्तश्च तस्मै ।
स्वकीयं पदं शाश्वतं वेदसारं
श्रियं चाष्टसिद्धिं भवानी ददाति ॥ १६ ॥
भवानी भवानी भवानी त्रिवारं
उदारं मुदा सर्वदा ये जपन्ति ।
न शोकं न मोहं न पापं न भीतिः
कदाचित्कथञ्चित्कुतश्चिज्जनानाम् ॥ १७ ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ भवानी भुजङ्गं सम्पूर्णम् ।
स्तुति का केंद्रीय भाव (The Core Message): श्री भवानी भुजङ्ग स्तुति ज्ञान या कर्मकांड का प्रदर्शन नहीं है; यह एक पूर्ण और शर्त-रहित ‘समर्पण’ (Absolute Surrender) है। इस स्तुति में आदि गुरु शंकराचार्य एक असहाय शिशु की तरह जगदम्बा भवानी के चरणों में गिरकर कहते हैं:
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“हे माँ भवानी! मुझे न तो कोई मंत्र आता है, न यंत्र आता है, न स्तोत्र का ज्ञान है और न ही मैं ध्यान करना जानता हूँ। मैं केवल आपका अनुसरण करना जानता हूँ।”
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“हे भवानी! इस भयंकर संसार रूपी सागर में मैं डूब रहा हूँ। मोह, माया, लालच और अहंकार ने मुझे जकड़ लिया है। मैं दिशाहीन हूँ। अब केवल आप ही मेरा एकमात्र आश्रय हैं। हे माँ, मेरी रक्षा करें!”
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इस स्तुति में माँ के अत्यंत सुंदर, कृपालु और तेजोमय स्वरूप का वर्णन है। शंकराचार्य जी कहते हैं कि माँ की एक कृपादृष्टि ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश को भी उनका पद प्रदान करने वाली है, तो मुझ जैसे तुच्छ जीव का उद्धार करना आपके लिए क्या कठिन है?
यह स्तुति इंसान के उस ‘अहंकार’ को तोड़ती है जो सोचता है कि “मैं अपने बल पर सब कुछ कर सकता हूँ।” जब तक अहंकार रहता है, ईश्वर दूर रहता है। जैसे ही भक्त इस स्तुति के माध्यम से अपना अहंकार छोड़ता है, माँ भवानी उसे अपनी गोद में उठा लेती हैं।
श्री भवानी भुजङ्ग स्तुति पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ (Benefits)
माँ भवानी का हृदय नवनीत (मक्खन) से भी अधिक कोमल है। जो साधक पूरी श्रद्धा, विश्वास और अश्रुपूरित नेत्रों से इस भवानी भुजङ्ग स्तुति का पाठ करता है, उसके जीवन में निम्नलिखित अकल्पनीय और चमत्कारिक परिवर्तन आते हैं:
1. मृत्यु के भय और अकारण चिंता (Anxiety) से पूर्ण मुक्ति
इंसान का सबसे बड़ा शत्रु उसका ‘भय’ (Fear) है। अनहोनी का डर, मृत्यु का डर, अपनों को खोने का डर—यह व्यक्ति को अंदर से खोखला कर देता है। इस स्तुति का पाठ करने से साधक के हृदय में यह अटूट विश्वास पैदा होता है कि “ब्रह्मांड की सबसे शक्तिशाली सत्ता मेरी माँ है, और जब माँ साथ है, तो मुझे किसका डर?” इस भाव के जाग्रत होते ही हर प्रकार का अज्ञात भय, चिंता और एंग्जायटी हमेशा के लिए नष्ट हो जाती है।
2. भयंकर भूलों और पापों की क्षमा
मनुष्य जन्म से ही गलतियों का पुतला है। अज्ञानतावश हम कई ऐसे कर्म कर बैठते हैं जिनका हमें बाद में पश्चाताप होता है और जिसके कारण हम आत्मग्लानि (Guilt) में जीते हैं। भवानी स्तुति क्षमा की परम पुकार है। शंकराचार्य जी कहते हैं कि “पुत्र कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं होती।” इसके सस्वर पाठ से माता साधक के बड़े से बड़े पापों को क्षमा कर देती हैं और उसका अंतःकरण गंगा जल की तरह पवित्र हो जाता है।
3. घोर संकटों और विपत्तियों का समूल नाश
जब कोई ऐसा संकट आ जाए जिसका कोई समाधान नजर न आ रहा हो (जैसे अचानक नौकरी चली जाना, व्यापार का डूब जाना, या कोई झूठा लांछन लग जाना), तब भवानी भुजङ्ग स्तुति का पाठ एक ब्रह्मास्त्र का कार्य करता है। माँ भवानी अपने भक्त पर आई विपत्ति को कभी सहन नहीं कर सकतीं। वे रातों-रात ऐसी परिस्थितियां बदलती हैं कि संकट के बादल स्वतः छंट जाते हैं।
4. विरोधियों और गुप्त शत्रुओं का स्तम्भन
माँ भवानी जहाँ ममता की मूरत हैं, वहीं वे दुष्टों के लिए साक्षात ‘चंडी’ और ‘काली’ भी हैं। जो भी साधक इस स्तुति का नित्य पाठ करता है, उसके चारों ओर एक ऐसा अदृश्य ‘सुरक्षा कवच’ (Aura of Protection) बन जाता है कि कोई भी शत्रु, तांत्रिक प्रयोग या बुरी नज़र उसका बाल भी बांका नहीं कर सकती। विरोधी स्वयं अपनी चालों में उलझ कर नष्ट हो जाते हैं।
5. असीम मानसिक शांति और डिप्रेशन से बाहर आना
जो लोग डिप्रेशन (अवसाद) का शिकार हैं, जिन्हें लगता है कि जीवन में कोई रस नहीं बचा और कोई उन्हें प्यार नहीं करता, उनके लिए यह स्तुति संजीवनी है। इस स्तुति के भुजंगप्रयात छंद की लय मस्तिष्क में ‘सेरोटोनिन’ (Serotonin – खुशी का हॉर्मोन) का स्राव बढ़ाती है। साधक को ऐसा महसूस होता है जैसे उसने अपना सिर माँ की गोद में रख दिया है, जिससे उसे अगाध शांति और प्रेम की अनुभूति होती है।
6. भौतिक और आध्यात्मिक ऐश्वर्य की प्राप्ति
माँ भवानी ‘अन्नपूर्णा’ भी हैं। जो भक्त उनसे कुछ नहीं मांगता, वे उसे दोनों हाथों से लुटाती हैं। इस स्तुति के प्रभाव से घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती, स्थिर लक्ष्मी का वास होता है, और अंततः साधक को आत्म-ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
श्री भवानी भुजङ्ग स्तुति की प्रामाणिक पाठ और अर्चन विधि (Authentic Puja Vidhi)
माँ भवानी को प्रसन्न करने के लिए किसी बहुत बड़े आडंबर या तांत्रिक विधि की आवश्यकता नहीं है; वे केवल सच्चे भाव की भूखी हैं। फिर भी, शास्त्रों के अनुसार पूर्ण फल प्राप्ति के लिए इस स्तुति का पाठ निम्नलिखित विधि से करना अत्यंत फलदायी होता है:
1. उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त (Best Time)
माँ भवानी की आराधना के लिए शुक्रवार (Friday), मंगलवार (Tuesday), अष्टमी तिथि, या नवरात्रि के दिन सबसे उत्तम और जाग्रत माने जाते हैं। पाठ का सबसे श्रेष्ठ समय प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या गोधूलि बेला (सूर्यास्त के समय) होता है। यदि आप घोर संकट में हैं, तो मध्य रात्रि में भी माता को पुकार सकते हैं।
2. दिशा, आसन और वस्त्र का विधान
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वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। देवी को लाल (Red) या पीला (Yellow) रंग अत्यंत प्रिय है। पाठ के समय लाल रंग के वस्त्र पहनना या कंधे पर लाल चुन्नी रखना शुभ होता है।
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दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर रखें।
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आसन: बैठने के लिए लाल रंग के ऊनी आसन या कुशा के आसन का प्रयोग करें।
3. माता की स्थापना और पूजन सामग्री
एक स्वच्छ चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माँ दुर्गा, भवानी या पार्वती जी का एक सुंदर चित्र स्थापित करें। माता के समक्ष गाय के शुद्ध घी का या तिल के तेल का एक दीपक प्रज्वलित करें। धूप और अगरबत्ती जलाएं। माता को लाल पुष्प (गुड़हल या गुलाब), सिंदूर, और लाल चुनरी अर्पित करें।
4. दृढ़ संकल्प (Sankalpa) और आत्म-समर्पण
दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, लाल अक्षत और एक लाल फूल लें। अपना नाम, गोत्र और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य (जैसे- “हे माँ भवानी, मैं अपने अमुक संकट के निवारण, मानसिक शांति और आपकी कृपा प्राप्ति के लिए आदि गुरु शंकराचार्य रचित भवानी भुजङ्ग स्तुति का पाठ करूँगा”) बोलें और जल ज़मीन पर छोड़ दें।
5. स्तोत्र का पाठ (Chanting Method)
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सर्वप्रथम ‘प्रथम पूज्य’ भगवान श्री गणेश का स्मरण करें (“ॐ गं गणपतये नमः”)।
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इसके बाद अपने गुरु और आदि शंकराचार्य जी को प्रणाम करें।
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अब पूर्ण एकाग्रता और एक शिशु के समान भक्ति भाव से ‘श्री भवानी भुजङ्ग स्तुति’ का पाठ आरंभ करें।
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चूँकि यह स्तुति भुजंगप्रयात छंद में है, इसलिए इसे एक विशिष्ट लय (Rhythm) में गाकर पढ़ने का प्रयास करें। यदि आप संस्कृत पढ़ने में सहज नहीं हैं, तो किसी अच्छे ऑडियो को सुनकर आँखें बंद करके माता के चरणों का ध्यान करें।
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नित्य 1, 3 या 11 बार इसका पाठ अपनी संकल्पित अवधि (जैसे 21 या 41 दिन) तक करें।
6. क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग (नैवेद्य)
पाठ पूर्ण होने के बाद माता को सात्विक भोग लगाएं (जैसे- बताशे, मिश्री, खीर, हलवा या ताजे फल)। अंत में माँ भवानी की आरती करें और पूजा-पाठ में हुई किसी भी भूल-चूक के लिए दोनों हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर क्षमा प्रार्थना करें। प्रसाद स्वयं ग्रहण करें और परिवार में बांटें।
साधना के महत्वपूर्ण नियम और सावधानियां (Strict Rules for Sadhana)
जब आप जगदम्बा की आराधना कर रहे हों, तो कुछ नियमों का पालन अत्यंत आवश्यक है, जिससे साधना की ऊर्जा नष्ट न हो:
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पूर्ण सात्विकता: संकल्प के दिनों में (और हो सके तो जीवन भर) मांस, मदिरा, अंडे, लहसुन और प्याज का पूर्णतः त्याग कर दें। तामसिक भोजन शरीर और मन की ऊर्जा को अशुद्ध कर देता है।
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स्त्रियों का सर्वोच्च सम्मान: भवानी स्तुति का सबसे बड़ा नियम यह है कि आप अपने घर की और बाहर की सभी स्त्रियों का सम्मान करें। जो व्यक्ति अपनी पत्नी, माँ या बहन का अपमान करता है, उसकी कोई भी देवी स्तुति कभी स्वीकार नहीं होती।
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ब्रह्मचर्य: जितने दिनों का आपने अनुष्ठान का संकल्प लिया है, उस अवधि में शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य का पालन करें।
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अहंकार शून्यता: पाठ करते समय यह भाव रखें कि “मैं कुछ नहीं हूँ, जो कुछ है, वह सब मेरी माँ की कृपा है।” अहंकार इस स्तुति का सबसे बड़ा दुश्मन है।
आधुनिक युग में भवानी भुजङ्ग स्तुति की आवश्यकता
आज का मनुष्य ‘सूचना’ (Information) से तो भरा है, लेकिन उसके पास ‘शांति’ (Peace) नहीं है। वह हर चीज़ को अपने कंट्रोल में रखना चाहता है। लेकिन जब जीवन में बीमारियाँ, आर्थिक मंदी या प्राकृतिक आपदाएं आती हैं, तो इंसान का यह भ्रम टूट जाता है कि वह सब कुछ कंट्रोल कर सकता है।
यहीं पर भवानी भुजङ्ग स्तुति आधुनिक इंसान के काम आती है। यह हमें ‘सरेंडर’ (Surrender) करना सिखाती है। जब आप अपनी सारी चिंताएं, अपने सारे टेंशन एक सर्वोच्च सत्ता के चरणों में यह कहकर रख देते हैं कि “गतिमस्त्वमेका भवानि” (हे भवानी, तुम ही मेरी एकमात्र गति हो), तो आपके कंधों से दुनिया का सबसे बड़ा बोझ उतर जाता है। यह मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) का सबसे प्राचीन और सबसे सशक्त ‘थेरेपी’ है।
Shri Bhavani Bhujanga Stuti केवल कुछ संस्कृत शब्दों का जोड़ नहीं है; यह एक टूटे हुए हृदय की वह पुकार है जो सीधे परमात्मा के हृदय को बेध देती है। आदि गुरु शंकराचार्य ने इस स्तुति के माध्यम से हमें यह बताया है कि ज्ञान मार्ग चाहे कितना भी कठोर क्यों न हो, जब भक्त थक जाता है, तो उसे अंततः भक्ति की शीतल छांव में ही आना पड़ता है।
जब भी आपको लगे कि जीवन की उलझनें सुलझने का नाम नहीं ले रही हैं, आप पूरी तरह से अकेले पड़ गए हैं, और कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है, तो एक लाल आसन बिछाएं, दीपक जलाएं और इस भवानी भुजङ्ग स्तुति का गान करें। आप स्वयं अनुभव करेंगे कि एक असीम शांति ने आपको घेर लिया है और साक्षात जगदम्बा भवानी आपके आँसू पोंछने के लिए आपके पास खड़ी हैं। जय माँ भवानी! जय जगदम्बे!
श्री भवानी भुजङ्ग स्तुतिः अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. श्री भवानी भुजङ्ग स्तुति की रचना किसने की थी और इसका क्या महत्व है?
श्री भवानी भुजङ्ग स्तुति की रचना अद्वैत वेदांत के महान आचार्य ‘आदि गुरु शंकराचार्य’ जी ने की थी। यह माता भवानी (पार्वती/दुर्गा) को समर्पित एक अत्यंत करुण और भावपूर्ण स्तुति है। इसका महत्व इस बात में है कि यह ज्ञान या कर्मकांड का नहीं, बल्कि पूर्ण आत्म-समर्पण (Absolute Surrender) और मातृ-कृपा का स्तोत्र है।
2. इस स्तुति के नाम में ‘भुजङ्ग’ शब्द का क्या अर्थ है?
संस्कृत काव्यशास्त्र में ‘भुजङ्गप्रयात’ एक विशिष्ट छंद (Meter) है। ‘भुजङ्ग’ का अर्थ है सर्प (सांप) और ‘प्रयात’ का अर्थ है गति या चाल। जिस प्रकार सर्प एक विशेष लहर और लय के साथ आगे बढ़ता है, उसी प्रकार इस छंद में गाए गए श्लोकों में एक अद्भुत संगीतमय लय होती है, जो मन को तुरंत शांत कर ध्यान की गहराई में ले जाती है।
3. भवानी भुजङ्ग स्तुति का पाठ करने का सबसे शुभ समय कौन सा है?
माता भवानी की आराधना के लिए शुक्रवार, मंगलवार, अष्टमी तिथि और नवरात्रि के दिन सबसे उत्तम माने जाते हैं। इस स्तुति का पाठ प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या सूर्यास्त के समय (गोधूलि बेला) लाल वस्त्र धारण करके और पूर्व दिशा की ओर मुख करके करना सबसे अधिक फलदायी होता है।
4. इस स्तुति के पाठ से जीवन में मुख्य रूप से कौन से लाभ प्राप्त होते हैं?
इस स्तुति के सस्वर पाठ से हर प्रकार का अज्ञात भय, चिंता (Anxiety) और मृत्यु का भय नष्ट हो जाता है। माता बड़े से बड़े पापों को क्षमा कर देती हैं, घोर संकटों और शत्रुओं का नाश होता है, और साधक को जीवन में असीम मानसिक शांति, मातृ-प्रेम और भौतिक व आध्यात्मिक ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
5. क्या सामान्य गृहस्थ व्यक्ति भी इस स्तुति का पाठ कर सकता है?
जी हाँ, बिल्कुल! यह स्तुति विशेष रूप से गृहस्थों और उन लोगों के लिए ही है जो संसार की मोह-माया और संकटों में फंसे हुए हैं। कोई भी गृहस्थ व्यक्ति पूर्ण सात्विकता, पवित्रता और श्रद्धा के साथ इसका पाठ कर सकता है। यह स्तुति मनुष्य के अहंकार को तोड़कर उसे ईश्वर के प्रति विनम्र और समर्पित बनाती है।