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Jagannath Rath Yatra 2026 Date: इस साल किस दिन शुरू होगी पुरी की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा?It takes 13 minutes... to read this article !

भारत की भूमि अनेक चमत्कारों, आस्थाओं और भव्य त्योहारों की जन्मस्थली है। यहां के कण-कण में देवताओं का वास माना जाता है। हिंदू धर्म के चार पवित्र धामों में से एक, ओडिशा के पुरी शहर में स्थित ‘श्री जगन्नाथ मंदिर’ पूरी दुनिया में अपनी एक अलग और रहस्यमयी पहचान रखता है। हर साल आषाढ़ मास में यहां एक ऐसा अलौकिक उत्सव होता है, जिसे देखने के लिए दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु उमड़ पड़ते हैं। इस उत्सव को हम ‘भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा’ के नाम से जानते हैं।

सनातन धर्म में यह एकमात्र ऐसा अवसर है जब ब्रह्मांड के स्वामी भगवान जगन्नाथ (श्री कृष्ण), उनके बड़े भाई भगवान बलभद्र (बलराम) और बहन देवी सुभद्रा अपने भव्य मंदिर के गर्भगृह से निकलकर आम जनमानस को दर्शन देने के लिए सड़क पर आते हैं। यह उत्सव समानता, भक्ति और प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक है, जहां राजा और रंक दोनों एक ही कतार में खड़े होकर भगवान के रथ की रस्सी खींचते हैं।

जैसे-जैसे आषाढ़ का महीना करीब आता है, भक्तों के मन में सबसे पहला सवाल यही उठता है कि “Jagannath Rath Yatra 2026 Date: इस साल किस दिन शुरू होगी पुरी की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा?”। इस लेख में, हम आपको साल 2026 की रथयात्रा की सटीक तारीख, शुभ मुहूर्त, रथों के निर्माण का रहस्य, और 9 दिनों तक चलने वाले इस महा-उत्सव की पूरी जानकारी विस्तार से देंगे।

1. Jagannath Rath Yatra 2026 Date: इस साल किस दिन शुरू होगी पुरी की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा? (तारीख और शुभ मुहूर्त)

हिंदू पंचांग की वैदिक गणना के अनुसार, पुरी की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा हर साल ‘आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि’ को भव्य रूप से निकाली जाती है।

साल 2026 में यह शुभ अवसर जुलाई के महीने में पड़ रहा है। यदि आप भी इस साल पुरी जाने की योजना बना रहे हैं, तो आपके लिए रथयात्रा का सटीक शेड्यूल जानना अत्यंत आवश्यक है:

  • रथयात्रा की मुख्य तारीख (Rath Yatra Date): 16 जुलाई 2026 (गुरुवार)

  • आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि का आरंभ: 15 जुलाई 2026, सुबह लगभग 11:50 बजे से

  • आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि का समापन: 16 जुलाई 2026, सुबह 08:52 बजे तक

  • रथ खींचने का समय: 16 जुलाई की सुबह ‘पहांडी’ अनुष्ठान के बाद दोपहर के समय (लगभग 2:00 बजे के आसपास) रथों को खींचने की पावन प्रक्रिया आरंभ होती है।

उदया तिथि के सर्वमान्य नियम के अनुसार, साल 2026 में 16 जुलाई को ही रथयात्रा का मुख्य उत्सव मनाया जाएगा। सबसे विशेष बात यह है कि 16 जुलाई को ‘गुरुवार’ का दिन है, जो साक्षात भगवान श्री हरि विष्णु (जगन्नाथ) को समर्पित होता है। इस शुभ संयोग के कारण 2026 की रथयात्रा का आध्यात्मिक फल कई गुना अधिक हो गया है।

2. भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा क्यों निकाली जाती है? (पौराणिक कथा)

रथयात्रा निकाले जाने के पीछे कई रहस्यमयी और रोचक कथाएं प्रचलित हैं। स्कंद पुराण में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है।

रानी गुंडिचा और अधूरी मूर्तियों का रहस्य

कथा के अनुसार, मालवा क्षेत्र के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे। वे पुरी में भगवान का एक विशाल मंदिर बनवाना चाहते थे। एक दिन उन्हें समुद्र के किनारे एक दिव्य और विशाल लकड़ी का लट्ठा (दारु) तैरता हुआ मिला। राजा ने उसी लकड़ी से भगवान की मूर्तियां बनवाने का फैसला किया।

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देवताओं के शिल्पी भगवान विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई (Carpenter) का वेश धारण करके राजा के पास पहुंचे। उन्होंने मूर्तियां बनाने का जिम्मा तो लिया, लेकिन एक कड़ी शर्त रखी— “मैं एक बंद कमरे में मूर्तियां बनाऊंगा और 21 दिनों तक कोई भी उस कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा। यदि किसी ने खोला, तो मैं काम वहीं छोड़ दूंगा।”

राजा ने शर्त मान ली। कई दिनों तक बंद कमरे से आरी और हथौड़े की आवाज आती रही। लेकिन 14वें दिन अचानक कमरे से आवाज आनी बंद हो गई। राजा की पत्नी, रानी गुंडिचा को घबराहट होने लगी कि कहीं उस वृद्ध बढ़ई को कुछ हो तो नहीं गया। रानी की हठ के कारण राजा ने कमरे का दरवाजा खोल दिया।

दरवाजा खुलते ही वृद्ध बढ़ई वहां से अंतर्धान (गायब) हो गए और कमरे में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की काठ (लकड़ी) की मूर्तियां थीं, जो अधूरी थीं। मूर्तियों के हाथ-पैर और पंजे स्पष्ट रूप से नहीं बने थे। राजा को अपनी गलती पर बहुत पछतावा हुआ और वे रोने लगे। तभी एक आकाशवाणी हुई कि— “हे राजा! शोक मत करो। भगवान इसी अधूरे स्वरूप में ही कलयुग में अपने भक्तों द्वारा पूजे जाना चाहते हैं।” तब से लेकर आज तक पुरी के मंदिर में भगवान इसी अद्वितीय स्वरूप में पूजे जाते हैं।

मौसी के घर जाने की परंपरा

एक अन्य मान्यता के अनुसार, देवी सुभद्रा ने एक बार अपने भाइयों (श्री कृष्ण और बलराम) से नगर का भ्रमण करने की इच्छा जताई थी। अपनी लाड़ली बहन की इच्छा का सम्मान करते हुए दोनों भाई उन्हें रथ में बिठाकर नगर दर्शन के लिए ले गए और वहां से वे अपनी मौसी ‘गुंडिचा’ के घर गए। उसी परंपरा को जीवित रखते हुए आज भी हर साल यह रथयात्रा निकाली जाती है, जिसमें तीनों भाई-बहन 9 दिनों के लिए अपनी मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) विश्राम करने जाते हैं।

3. तीनों भव्य रथों के रहस्य और उनकी विशेषताएं (The Three Chariots)

पुरी की रथयात्रा का सबसे प्रमुख आकर्षण भगवान के तीन विशाल और अलौकिक रथ होते हैं। ये रथ केवल लकड़ी के ढांचे नहीं हैं, बल्कि ये साक्षात चलते-फिरते मंदिर हैं।

सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि इन विशाल रथों के निर्माण में लोहे की एक भी कील (Nail) का उपयोग नहीं किया जाता है। लकड़ी के हिस्सों को आपस में फंसाकर (Interlocking) इन्हें तैयार किया जाता है। हर साल वसंत पंचमी के दिन से रथों के लिए नई लकड़ियां (मुख्यतः नीम और फासी की लकड़ी) काटी जाती हैं और अक्षय तृतीया से निर्माण कार्य शुरू होता है।

आइए जानते हैं तीनों रथों की अद्भुत विशेषताएं:

रथ की विशेषता भगवान जगन्नाथ का रथ भगवान बलभद्र का रथ देवी सुभद्रा का रथ
रथ का नाम नंदीघोष (Nandighosha) तालध्वज (Taladhwaja) दर्पदलन / देवदलन (Darpadalana)
रथ की ऊंचाई 45 फीट से अधिक 44 फीट के आसपास 43 फीट के आसपास
पहियों की संख्या 16 विशाल पहिए 14 विशाल पहिए 12 विशाल पहिए
कपड़े का रंग लाल और पीला (Red & Yellow) लाल और हरा (Red & Green) लाल और काला (Red & Black)
रक्षक देवता गरुड़ (Garuda) वासुदेव (Vasudeva) जयदुर्गा (Jayadurga)
रथ के सारथी दारुक (Daruka) मताली (Matali) अर्जुन (Arjuna)
रथ की रस्सी शंखचूड़ (Sankhachuda) वासुकी (Basuki) स्वर्णचूड़ा (Swarnachuda)

4. रथयात्रा 2026 के प्रमुख अनुष्ठान और रस्में (Key Rituals)

रथयात्रा कोई एक दिन का उत्सव नहीं है, बल्कि यह एक महीने तक चलने वाली पवित्र अनुष्ठानों की श्रृंखला है। जुलाई 2026 में होने वाले प्रमुख अनुष्ठान इस प्रकार हैं:

I. स्नान पूर्णिमा (Snana Purnima)

रथयात्रा से लगभग 35 दिन पहले, ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को गर्भगृह से बाहर ‘स्नान वेदी’ पर लाया जाता है। यहाँ उन्हें 108 पवित्र घड़ों के जल (जिसमें सुगंधित चंदन, इत्र और जड़ी-बूटियां मिली होती हैं) से महास्नान कराया जाता है।

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II. अणसर (Anasara) – भगवान का 15 दिन बीमार पड़ना

लगातार 108 घड़ों के जल से स्नान करने के कारण मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ बीमार (ज्वर/बुखार से पीड़ित) पड़ जाते हैं। इसके बाद 15 दिनों तक उन्हें एक विशेष एकांत कक्ष (अणसर घर) में रखा जाता है। इस दौरान मंदिर के पट (दरवाजे) आम भक्तों के लिए पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं। भगवान को छप्पन भोग के बजाय केवल आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों (काढ़ा) और ताजे फलों का भोग लगाया जाता है। वैद्य उनकी सेवा करते हैं।

III. नवयौवन दर्शन और नेत्रोत्सव

15 दिन के पूर्ण विश्राम और उपचार के बाद जब भगवान स्वस्थ होकर उठते हैं, तो वे एक नया और आकर्षक रूप धारण करते हैं, जिसे ‘नवयौवन’ कहा जाता है। रथयात्रा से ठीक एक दिन पहले भगवान के नेत्रों (आंखों) को रंगा जाता है। इस पवित्र रस्म को ‘नेत्रोत्सव’ कहा जाता है।

IV. पहांडी (Pahandi) – 16 जुलाई 2026

रथयात्रा के मुख्य दिन (16 जुलाई की सुबह), भगवान को मंदिर से बाहर उनके विशाल रथों तक लाया जाता है। इस प्रक्रिया को ‘पहांडी’ कहते हैं। इसमें सेवादार भगवान की भारी काठ की मूर्तियों को बड़े ही लाड़ और उत्साह के साथ झुलाते हुए (मटकी की तरह) रथ तक लाते हैं। सबसे पहले बड़े भाई बलभद्र जी, फिर बहन सुभद्रा जी और अंत में भगवान जगन्नाथ अपने ‘नंदीघोष’ रथ में विराजमान होते हैं।

5. ‘छैरा पहंरा’: जब राजा बनता है भगवान का सेवक

रथयात्रा का सबसे भावुक, अद्भुत और समानता का संदेश देने वाला अनुष्ठान ‘छैरा पहंरा’ (Chhera Pahara) है।

जब तीनों भगवान अपने-अपने रथों पर विराजमान हो जाते हैं, तब पुरी के ‘गजपति महाराज’ (King of Puri) एक सजी हुई पालकी में बैठकर वहां आते हैं। महाराज अपने सिर पर भगवान की पूजा की थाली रखते हैं और एक ‘सोने की झाड़ू’ (Golden Broom) लेकर स्वयं तीनों रथों के चबूतरे और रास्ते को बुहारते (झाड़ू लगाते) हैं। वे रथों पर चंदन का पवित्र जल छिड़कते हैं।

यह रस्म पूरी दुनिया को यह असीम संदेश देती है कि भगवान के सामने कोई राजा नहीं है, कोई बड़ा नहीं है। ब्रह्मांड के स्वामी के सामने एक चक्रवर्ती सम्राट भी एक साधारण सेवक (Sweeper) के समान है। इसी पवित्र अनुष्ठान के संपन्न होने के बाद, लाखों भक्त ‘जय जगन्नाथ’ का उद्घोष करते हुए रथों को खींचने की प्रक्रिया शुरू करते हैं।

6. गुंडिचा मंदिर: मौसी के घर 9 दिन का प्रवास (The Gundicha Temple Stay)

रथयात्रा का अंतिम गंतव्य ‘गुंडिचा मंदिर’ है, जो मुख्य श्री जगन्नाथ मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। लाखों भक्त तपती धूप या बारिश की परवाह किए बिना रथ की रस्सियों को खींचते हुए 16 जुलाई 2026 को यहाँ पहुंचेंगे। रथ की रस्सी को एक बार छूना भी कई जन्मों के पापों को धोने वाला माना जाता है।

  • गुंडिचा रानी (राजा इंद्रद्युम्न की पत्नी) को भगवान जगन्नाथ अपनी ‘मौसी’ मानते हैं। गुंडिचा मंदिर पहुंचने के बाद भगवान वहीं 9 दिनों तक विश्राम करते हैं।

  • इस दौरान भगवान को उनके पसंदीदा व्यंजन, विशेषकर ‘पोड़ा पीठा’ (Poda Pitha) (एक प्रकार का पारंपरिक बेक किया हुआ मीठा पैनकेक) का भोग लगाया जाता है।

  • यहाँ भगवान जगन्नाथ को दर्शन देना अधिक सुलभ होता है, जिसे ‘आड़प दर्शन’ कहा जाता है।

हेरा पंचमी (Hera Panchami) – 20 जुलाई 2026: रथयात्रा के पांचवें दिन एक बहुत ही रोचक और मान-मनौव्वल की घटना होती है। भगवान जगन्नाथ अपनी पत्नी माता लक्ष्मी को मुख्य मंदिर में ही छोड़कर भाई-बहन के साथ मौसी के घर आ जाते हैं। इससे माता लक्ष्मी क्रोधित हो जाती हैं। वे भगवान को ढूंढते हुए गुंडिचा मंदिर आती हैं और गुस्से में भगवान जगन्नाथ के रथ (नंदीघोष) का एक हिस्सा या पहिया तोड़ देती हैं और वापस लौट जाती हैं। इस मधुर रस्म को ‘हेरा पंचमी’ कहते हैं।

7. बाहुड़ा यात्रा और सुना बेश (The Return Journey)

9 दिन अपनी मौसी के घर प्रेम और सत्कार पाने के बाद भगवान की वापसी की यात्रा शुरू होती है।

  • बाहुड़ा यात्रा (Bahuda Yatra) – 24 जुलाई 2026: इस दिन तीनों देवता अपने रथों पर बैठकर वापस मुख्य जगन्नाथ मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। इसे ‘रिटर्न जर्नी’ कहा जाता है। रास्ते में भगवान जगन्नाथ ‘मौसी मां मंदिर’ में थोड़ी देर रुककर अपना पसंदीदा ‘पोड़ा पीठा’ ग्रहण करते हैं।

  • सुना बेश (Suna Besha): मुख्य मंदिर के सिंहद्वार (Lion Gate) पर पहुंचने के बाद, एकादशी के पावन दिन रथों पर ही भगवान को सोने के भारी आभूषणों से सजाया जाता है। भगवान पर लगभग 208 किलो शुद्ध सोने के आभूषण पहनाए जाते हैं। इस अलौकिक और स्वर्णिम रूप को ‘सुना बेश’ या ‘राजधिराज बेश’ कहा जाता है। इसे देखने के लिए लाखों की भीड़ उमड़ती है।

  • नीलाद्रि बिजे (Niladri Bijay): अंत में भगवान वापस अपने गर्भगृह (रत्न सिंहासन) पर विराजमान हो जाते हैं, जिसे ‘नीलाद्रि बिजे’ कहा जाता है। इसी के साथ इस एक महीने लंबे महापर्व का पूर्णतः समापन होता है।

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8. पुरी रथयात्रा 2026 में शामिल होने के लिए महत्वपूर्ण टिप्स (Travel Tips)

यदि आप 16 जुलाई 2026 को इस महाकुंभ का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो आपको अभी से अपनी यात्रा की योजना बनानी चाहिए:

  1. एडवांस बुकिंग (Advance Booking): रथयात्रा के दौरान पुरी के सभी होटल, धर्मशालाएं और गेस्ट हाउस महीनों पहले फुल हो जाते हैं। इसलिए अपनी ट्रेन/फ्लाइट और होटल की बुकिंग कम से कम 4-5 महीने पहले (फरवरी-मार्च 2026 तक) अवश्य कर लें।

  2. मौसम की तैयारी (Weather Check): जुलाई के महीने में ओडिशा में मानसून पूरी तरह सक्रिय रहता है। तेज बारिश और उमस (Humidity) हो सकती है। इसलिए आरामदायक सूती कपड़े, अच्छी ग्रिप वाले जूते, रेनकोट और छाता साथ जरूर रखें।

  3. स्वास्थ्य और हाइड्रेशन: लाखों की भीड़ और उमस में डिहाइड्रेशन या चक्कर आने का खतरा रहता है। अपने साथ हमेशा पानी की बोतल, ग्लूकोज (ORS) और जरूरी दवाइयां रखें।

  4. कैसे पहुंचे (How to Reach):

    • फ्लाइट से: सबसे नजदीकी हवाई अड्डा भुवनेश्वर (Biju Patnaik International Airport) है, जो पुरी से लगभग 60 किलोमीटर दूर है। वहां से आप टैक्सी या एसी बस लेकर आसानी से पुरी पहुंच सकते हैं।

    • ट्रेन से: पुरी रेलवे स्टेशन (Puri Railway Station) भारत के सभी प्रमुख शहरों से सीधे जुड़ा हुआ है।

सनातन परंपरा में “Jagannath Rath Yatra 2026 Date: इस साल किस दिन शुरू होगी पुरी की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा?” यह केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि यह करोड़ों भक्तों के हृदय के स्पंदन का दिन है।

16 जुलाई 2026 को निकलने वाली यह रथयात्रा इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर अपने भक्तों से कितना प्रेम करते हैं। जब आप पुरी के ग्रैंड रोड (बड़ा डंडा) पर खड़े होकर भगवान जगन्नाथ के ‘नंदीघोष’ रथ को आगे बढ़ते हुए देखेंगे और लाखों लोगों के मुख से एक साथ “जय जगन्नाथ” का जयकारा सुनेंगे, तो आपके भीतर का सारा अहंकार नष्ट हो जाएगा। वह अलौकिक अनुभव शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। यदि जीवन में अवसर मिले, तो भगवान के रथ की रस्सी को एक बार छूने का प्रयास अवश्य करें, यह आपके जीवन के सभी दुखों को हर लेगा और आपको मोक्ष के मार्ग पर ले जाएगा।

जय जगन्नाथ!

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. साल 2026 में पुरी की जगन्नाथ रथयात्रा किस तारीख को है?

साल 2026 में भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा 16 जुलाई (गुरुवार) को पूरे हर्षोल्लास के साथ निकाली जाएगी।

2. जगन्नाथ रथयात्रा कहाँ से शुरू होकर कहाँ तक जाती है?

यह पवित्र रथयात्रा पुरी के मुख्य ‘श्री जगन्नाथ मंदिर’ से शुरू होकर ग्रैंड रोड (बड़ा डंडा) होते हुए लगभग 3 किलोमीटर दूर स्थित ‘गुंडिचा मंदिर’ तक जाती है।

3. क्या गैर-हिंदू लोग रथयात्रा में शामिल हो सकते हैं?

हाँ, बिल्कुल। पुरी के मुख्य मंदिर के अंदर गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है, लेकिन रथयात्रा का आयोजन ही इसलिए होता है ताकि हर धर्म, जाति और देश का व्यक्ति भगवान के दर्शन कर सके और समानता के साथ उनका रथ खींच सके।

4. रथयात्रा समाप्त होने के बाद पुराने रथों का क्या किया जाता है?

रथयात्रा समाप्त होने के बाद तीनों विशाल रथों को खोल (तोड़) दिया जाता है। उनकी पवित्र लकड़ी का उपयोग जगन्नाथ मंदिर की रसोई में भगवान का महाप्रसाद बनाने के लिए ईंधन (Firewood) के रूप में किया जाता है।

5. बाहुड़ा यात्रा (Bahuda Yatra) 2026 में कब निकाली जाएगी?

गुंडिचा मंदिर से 9 दिन के प्रवास के बाद भगवान की वापसी की यात्रा को बाहुड़ा यात्रा कहते हैं। साल 2026 में यह रिटर्न जर्नी 24 जुलाई (शुक्रवार) को होगी।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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