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Jagannath Rath Yatra 2026: कब निकलेगी भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा? जानें Date, Time & MuhuratIt takes 11 minutes... to read this article !

भारत त्योहारों और आस्था का देश है। यहाँ हर दिन कोई न कोई पर्व मनाया जाता है, लेकिन कुछ उत्सव ऐसे होते हैं जिनकी भव्यता और दिव्यता पूरी दुनिया को अपनी ओर खींच लेती है। ओडिशा के पुरी शहर में आयोजित होने वाली ‘भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा’ (Jagannath Rath Yatra) एक ऐसा ही अलौकिक और विश्व प्रसिद्ध महापर्व है।

हर साल आषाढ़ मास में, 12वीं शताब्दी के प्राचीन जगन्नाथ मंदिर के गर्भगृह से निकलकर ब्रह्मांड के स्वामी भगवान जगन्नाथ (श्री कृष्ण), उनके बड़े भाई बलभद्र (बलराम) और बहन देवी सुभद्रा नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं। रथयात्रा एकमात्र ऐसा हिंदू त्योहार है जहाँ भगवान स्वयं अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए मंदिर से बाहर सड़क पर आते हैं। यहाँ न कोई जाति का भेद होता है, न धर्म का और न ही अमीर-गरीब का; हर कोई बस ‘जय जगन्नाथ’ के उद्घोष के साथ भगवान के रथ की रस्सी खींचने के लिए आतुर रहता है।

साल 2026 में पुरी जाने की योजना बना रहे लाखों भक्तों के मन में यह सवाल है कि “Jagannath Rath Yatra 2026: कब निकलेगी भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा? जानें Date, Time & Muhurat”। इस विस्तृत लेख में, हम आपको साल 2026 की रथयात्रा की सटीक तारीख, शुभ मुहूर्त, तीनों भव्य रथों के रहस्य, इसके पीछे की पौराणिक कथा और यात्रा से जुड़े कड़े नियमों के बारे में गहराई से बताएंगे।

1. Jagannath Rath Yatra 2026: Date, Time & Tithi (तिथि और शुभ मुहूर्त)

हिंदू पंचांग की गणना के अनुसार, पुरी की रथयात्रा हर साल ‘आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि’ को निकाली जाती है।

साल 2026 में यह शुभ अवसर जुलाई के महीने में आ रहा है। आइए जानते हैं रथयात्रा का सटीक शेड्यूल:

  • रथयात्रा की तारीख (Main Date): 16 जुलाई 2026 (गुरुवार)

  • द्वितीया तिथि का आरंभ: 15 जुलाई 2026, सुबह 11:50 बजे से

  • द्वितीया तिथि का समापन: 16 जुलाई 2026, सुबह 08:52 बजे तक

  • रथयात्रा शुरू होने का समय: 16 जुलाई की सुबह लगभग 07:00 बजे से अनुष्ठान शुरू हो जाते हैं। ‘पहांडी’ (भगवान को रथ तक लाने की प्रक्रिया) के बाद, रथ खींचने का मुख्य कार्यक्रम दोपहर के आसपास शुरू होता है।

नोट: उदया तिथि के नियमानुसार, 16 जुलाई को ही रथयात्रा का मुख्य उत्सव मनाया जाएगा। गुरु पुष्य योग और गुरुवार का दिन भगवान विष्णु (जगन्नाथ) का अपना दिन माना जाता है, जिससे साल 2026 की इस रथयात्रा का आध्यात्मिक महत्व कई गुना बढ़ गया है।

2. रथयात्रा क्यों निकाली जाती है? (The History & Legend)

भगवान जगन्नाथ के मंदिर से बाहर निकलने की इस परंपरा के पीछे कई पौराणिक कथाएं हैं। सबसे प्रसिद्ध कथा राजा इंद्रद्युम्न और भगवान की ‘अधूरी मूर्तियों’ से जुड़ी है।

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मूर्तियों के निर्माण का रहस्य

स्कंद पुराण के अनुसार, मालवा के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के बहुत बड़े भक्त थे। वे पुरी में भगवान का एक भव्य मंदिर बनवाना चाहते थे। एक बार उन्हें समुद्र में तैरता हुआ एक विशाल और दिव्य लकड़ी का लट्ठा (दारु) मिला। उन्होंने इसी लकड़ी से भगवान की मूर्तियां बनवाने का निश्चय किया।

देवताओं के शिल्पी भगवान विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई (Carpenter) का रूप धारण करके राजा के पास आए और कहा कि वह मूर्तियां बना देंगे, लेकिन उनकी एक शर्त है। शर्त यह थी कि वे एक बंद कमरे में मूर्तियां बनाएंगे और 21 दिनों तक कोई भी उस कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा। राजा ने शर्त मान ली।

कई दिनों तक अंदर से आरी और हथौड़े की आवाज आती रही, लेकिन 14वें दिन अचानक आवाजें आनी बंद हो गईं। राजा की पत्नी रानी गुंडिचा को चिंता हुई कि कहीं वृद्ध बढ़ई को कुछ हो तो नहीं गया। रानी की जिद पर राजा ने कमरे का दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खुलते ही वृद्ध बढ़ई (विश्वकर्मा) वहां से अंतर्धान (गायब) हो गए।

कमरे में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां थीं, लेकिन वे अधूरी थीं। उनके हाथ-पैर और पंजे पूरी तरह से नहीं बने थे। राजा बहुत दुखी हुए, लेकिन तभी आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी ‘अधूरे स्वरूप’ में ही कलयुग में पूजे जाना चाहते हैं। तब से आज तक पुरी के मंदिर में ये अद्वितीय मूर्तियां इसी रूप में विराजमान हैं।

मौसी के घर जाने की परंपरा

एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार देवी सुभद्रा ने अपने भाइयों (कृष्ण और बलराम) से नगर देखने की इच्छा व्यक्त की। अपनी बहन की इच्छा पूरी करने के लिए दोनों भाई उन्हें रथ में बिठाकर पुरी नगर का भ्रमण कराने ले गए और वहां से अपनी मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) गए। उसी परंपरा को निभाते हुए आज भी हर साल यह रथयात्रा निकाली जाती है, जिसमें तीनों भाई-बहन 9 दिनों के लिए अपनी मौसी के घर जाते हैं।

3. तीनों भव्य रथों के नाम और उनकी अद्भुत विशेषताएं (The Three Divine Chariots)

पुरी की रथयात्रा की सबसे बड़ी खासियत इसके रथ हैं। ये रथ कोई मामूली वाहन नहीं हैं, बल्कि ये चलते-फिरते विशाल मंदिर हैं। हर साल वसंत पंचमी के दिन से इन नए रथों के निर्माण के लिए लकड़ियां (मुख्यतः नीम और फासी की लकड़ी) काटी जाती हैं और अक्षय तृतीया से रथों का निर्माण शुरू होता है।

इन रथों को बनाने में एक भी लोहे की कील का इस्तेमाल नहीं होता। लकड़ी के टुकड़ों को आपस में फंसाकर ही इन्हें तैयार किया जाता है। आइए जानते हैं तीनों रथों के बारे में:

  • भगवान जगन्नाथ का रथ: रथ का नाम ‘नंदीघोष’ है। इसकी ऊंचाई लगभग 45 फीट होती है और इसमें 16 पहिए होते हैं। इसके कपड़े का रंग लाल और पीला (Red and Yellow) होता है। इसके रक्षक गरुड़ और सारथी दारुक हैं।

  • भगवान बलभद्र का रथ: रथ का नाम ‘तालध्वज’ है। इसकी ऊंचाई लगभग 44 फीट होती है और इसमें 14 पहिए होते हैं। इसके कपड़े का रंग लाल और हरा (Red and Green) होता है। इसके रक्षक वासुदेव और सारथी मताली हैं।

  • देवी सुभद्रा का रथ: रथ का नाम ‘दर्पदलन’ या ‘देवदलन’ है। इसकी ऊंचाई लगभग 43 फीट होती है और इसमें 12 पहिए होते हैं। इसके कपड़े का रंग लाल और काला (Red and Black) होता है। इसकी रक्षक जयदुर्गा और सारथी अर्जुन हैं।

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4. रथयात्रा 2026 के प्रमुख अनुष्ठान (Key Rituals of the Festival)

रथयात्रा कोई एक दिन का उत्सव नहीं है; यह कई हफ्तों तक चलने वाली एक जटिल और पवित्र प्रक्रिया है। जुलाई 2026 में होने वाले इसके मुख्य अनुष्ठान इस प्रकार हैं:

  1. स्नान पूर्णिमा (Snana Purnima) – 11 जून 2026: रथयात्रा से लगभग 35 दिन पहले भगवान को गर्भगृह से बाहर स्नान वेदी पर लाया जाता है। यहाँ उन्हें 108 घड़ों के पवित्र जल से स्नान कराया जाता है।

  2. अणसर (Anasara) – भगवान का बीमार पड़ना: लगातार स्नान करने के कारण मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ बीमार पड़ जाते हैं। इसके बाद 15 दिनों तक उन्हें एक विशेष एकांत कक्ष में रखा जाता है। इस दौरान केवल काढ़ा और फल का भोग लगता है।

  3. नवयौवन दर्शन और नेत्रोत्सव: 15 दिन के विश्राम के बाद जब भगवान स्वस्थ होते हैं, तो रथयात्रा से ठीक एक दिन पहले भगवान के नेत्रों को रंगा जाता है, जिसे ‘नेत्रोत्सव’ कहा जाता है।

  4. पहांडी (Pahandi) – 16 जुलाई 2026: रथयात्रा के दिन सुबह भगवान को मंदिर से बाहर रथों तक लाया जाता है। सेवादार भगवान की मूर्तियों को बड़े ही लाड़-प्यार से झुलाते हुए रथ तक लाते हैं।

5. ‘छैरा पहंरा’ (Chhera Pahara): राजा भी हैं भगवान के सेवक

रथयात्रा का सबसे भावुक और अद्भुत अनुष्ठान ‘छैरा पहंरा’ है। जब तीनों भगवान अपने-अपने रथों पर विराजमान हो जाते हैं, तब पुरी के गजपति महाराज (King of Puri) पालकी में बैठकर आते हैं।

महाराज अपने सिर पर भगवान की पूजा की थाली रखते हैं और एक ‘सोने की झाड़ू’ (Golden Broom) से तीनों रथों के चबूतरे और रास्ते को बुहारते हैं। वे रथों पर चंदन का पवित्र जल छिड़कते हैं। यह रस्म दुनिया को यह संदेश देती है कि भगवान के सामने कोई राजा नहीं है, कोई रंक नहीं है। ब्रह्मांड के स्वामी के सामने एक चक्रवर्ती सम्राट भी एक साधारण सेवक (Sweeper) के समान है। इसी अनुष्ठान के बाद रथों को खींचने की प्रक्रिया शुरू होती है।

6. गुंडिचा मंदिर: मौसी के घर 9 दिन का प्रवास (The Gundicha Temple Stay)

रथयात्रा का गंतव्य ‘गुंडिचा मंदिर’ है, जो मुख्य जगन्नाथ मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर दूर है।

  • गुंडिचा मंदिर पहुंचने के बाद भगवान वहीं 9 दिनों तक विश्राम करते हैं।

  • इस दौरान भगवान को उनके पसंदीदा व्यंजन, विशेषकर ‘पोड़ा पीठा’ (Poda Pitha) का भोग लगाया जाता है।

  • यहाँ भगवान जगन्नाथ को दर्शन देना अधिक सुलभ होता है, जिसे ‘आड़प दर्शन’ कहा जाता है।

हेरा पंचमी (Hera Panchami) – 20 जुलाई 2026: रथयात्रा के पांचवें दिन भगवान जगन्नाथ अपनी पत्नी माता लक्ष्मी को मुख्य मंदिर में ही छोड़कर भाई-बहन के साथ मौसी के घर आ जाते हैं। इससे माता लक्ष्मी क्रोधित होकर गुंडिचा मंदिर आती हैं और गुस्से में भगवान जगन्नाथ के रथ का एक पहिया तोड़ देती हैं और वापस लौट जाती हैं। इसे ‘हेरा पंचमी’ कहते हैं।

7. बाहुड़ा यात्रा और सुना बेश (The Return Journey & Gold Attire)

9 दिन मौसी के घर रहने के बाद भगवान की वापसी की यात्रा शुरू होती है।

  • बाहुड़ा यात्रा (Bahuda Yatra) – 24 जुलाई 2026: इस दिन तीनों देवता अपने रथों पर बैठकर वापस मुख्य जगन्नाथ मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। रास्ते में भगवान ‘मौसी मां मंदिर’ में रुककर अपना पसंदीदा ‘पोड़ा पीठा’ खाते हैं।

  • सुना बेश (Suna Besha): मुख्य मंदिर के सिंहद्वार पर पहुंचने के बाद, एकादशी के दिन रथों पर ही भगवान को सोने के भारी आभूषणों (लगभग 208 किलो सोना) से सजाया जाता है। इस अलौकिक रूप को ‘सुना बेश’ कहा जाता है।

  • नीलाद्रि बिजे (Niladri Bijay): अंत में भगवान वापस अपने गर्भगृह (रत्न सिंहासन) पर विराजमान हो जाते हैं। इसी के साथ इस महापर्व का समापन होता है।

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8. रथयात्रा का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व (Spiritual Significance)

जगन्नाथ रथयात्रा केवल एक धार्मिक जुलूस नहीं है; यह जीवन के सबसे बड़े फलसफे को दर्शाता है:

  1. समानता का प्रतीक: भगवान साल में एक बार अपना गर्भगृह छोड़कर उन भक्तों (बीमार, वृद्ध और अन्य धर्मों के लोग) से मिलने सड़क पर आते हैं, जो मंदिर के अंदर नहीं आ सकते।

  2. जीवन रथ का प्रतीक: कठोपनिषद में शरीर को एक रथ और आत्मा को उसका रथी (मालिक) कहा गया है। भगवान का रथ खींचना इस बात का प्रतीक है कि हम अपने जीवन की बागडोर ईश्वर के हाथों में सौंप रहे हैं।

  3. मन का शुद्धिकरण: जब लाखों लोग एक साथ तपती धूप में भगवान का रथ खींचते हैं, तो उनके भीतर का अहंकार टूट जाता है और वे परम सत्य से जुड़ जाते हैं।

9. 2026 में पुरी रथयात्रा में शामिल होने के लिए Travel Tips

यदि आप 16 जुलाई 2026 को इस महाकुंभ का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो आपको अभी से योजना बनानी चाहिए:

  • बुकिंग पहले करें: होटल और गेस्ट हाउस महीनों पहले फुल हो जाते हैं। इसलिए अपनी बुकिंग कम से कम 4-5 महीने पहले कर लें।

  • मौसम (Weather): जुलाई के महीने में बारिश और उमस होती है। इसलिए सूती कपड़े, रेनकोट और छाता साथ जरूर रखें।

  • कैसे पहुंचे: निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर है, जो पुरी से लगभग 60 किमी दूर है। पुरी रेलवे स्टेशन देश के सभी प्रमुख शहरों से सीधे जुड़ा हुआ है।

“Jagannath Rath Yatra 2026: कब निकलेगी भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा? जानें Date, Time & Muhurat” — इस लेख के माध्यम से अब यह स्पष्ट है कि 16 जुलाई 2026 को निकलने वाली यह रथयात्रा केवल काठ (लकड़ी) के रथों का सफर नहीं है, बल्कि यह प्रेम, समानता और भक्ति का एक जीवंत समुद्र है।

जब आप जगन्नाथ मंदिर के सामने खड़े होकर ‘नंदीघोष’ रथ को आगे बढ़ते हुए देखेंगे और लाखों लोगों के मुख से एक साथ “जय जगन्नाथ” का जयकारा सुनेंगे, तो आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। यदि जीवन में अवसर मिले, तो रथ की रस्सी को एक बार छूने का प्रयास अवश्य करें।

जय जगन्नाथ!

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. 2026 में जगन्नाथ रथ यात्रा किस तारीख को है?

साल 2026 में भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा 16 जुलाई (गुरुवार) को निकाली जाएगी।

2. जगन्नाथ रथ यात्रा कहाँ से कहाँ तक जाती है?

यह रथयात्रा पुरी के मुख्य ‘श्री जगन्नाथ मंदिर’ से शुरू होकर ग्रैंड रोड (बड़ा डंडा) होते हुए लगभग 3 किलोमीटर दूर ‘गुंडिचा मंदिर’ तक जाती है।

3. क्या गैर-हिंदू लोग रथयात्रा में शामिल हो सकते हैं?

हाँ, बिल्कुल। पुरी के मुख्य मंदिर के अंदर गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है, लेकिन रथयात्रा का आयोजन ही इसलिए होता है ताकि हर धर्म, जाति का व्यक्ति भगवान का रथ खींच सके।

4. भगवान जगन्नाथ के रथ को क्या कहा जाता है?

भगवान जगन्नाथ के रथ को ‘नंदीघोष’ कहा जाता है। यह सबसे ऊंचा (45 फीट) होता है और इसके कपड़े का रंग लाल और पीला होता है।

5. बाहुड़ा यात्रा (Bahuda Yatra) 2026 में कब है?

गुंडिचा मंदिर से भगवान की वापसी की यात्रा को बाहुड़ा यात्रा कहते हैं। साल 2026 में यह 24 जुलाई (शुक्रवार) को होगी।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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