Shri Uchchhishta Ganapati Ashtottara Shatanamavali (श्री उच्छिष्ट गणपति अष्टोत्तर शतनामावली): Lyrics in Sanskrit, 108 नामों की तांत्रिक महास्तुति, सिद्ध पाठ विधि और अकल्पनीय लाभIt takes 14 minutes... to read this article !

सनातन धर्म और विशेष रूप से तंत्र शास्त्र (Tantra Shastra) में भगवान श्री गणेश को केवल विघ्नहर्ता ही नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड की आदि शक्ति और तंत्र के अधिपति के रूप में पूजा जाता है। महर्षि वेदव्यास और मुद्गल पुराण के अनुसार, भगवान गणेश के कुल 32 प्रमुख स्वरूप हैं। इन 32 स्वरूपों में 8वां और सबसे रहस्यमयी, उग्र और तुरंत फल देने वाला स्वरूप ‘श्री उच्छिष्ट गणपति’ (Shri Uchchhishta Ganapati) का है।

जब जीवन में सब कुछ विपरीत हो जाए, दांपत्य जीवन (विवाह) टूटने के कगार पर हो, शत्रु हावी हो रहे हों, भयंकर कर्ज हो और तंत्र-मंत्र की बाधाओं ने जीवन को नर्क बना दिया हो, तब उच्छिष्ट गणपति की साधना एक अमोघ ब्रह्मास्त्र का कार्य करती है। भगवान गणेश का यह स्वरूप वाम मार्ग (तांत्रिक मार्ग) और दक्षिण मार्ग दोनों में पूजा जाता है।

इस अत्यंत उग्र और शीघ्र फलदायी देवता को प्रसन्न करने के लिए ‘श्री उच्छिष्ट गणपति अष्टोत्तर शतनामावली’ (Shri Uchchhishta Ganapati Ashtottara Shatanamavali) का पाठ किया जाता है। ‘अष्टोत्तर शतनामावली’ का अर्थ है भगवान के 108 अत्यंत सिद्ध, जाग्रत और पवित्र नामों का अर्चन।

इस विस्तृत और गूढ़ लेख में हम जानेंगे कि ‘उच्छिष्ट’ का तांत्रिक रहस्य क्या है, Uchchhishta Ganapati Ashtottara Shatanamavali Lyrics in Sanskrit की महिमा क्या है, इन 108 नामों का अर्चन करने से मिलने वाले चमत्कारी लाभ क्या हैं, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक तांत्रिक विधि क्या है।

श्री उच्छिष्ट गणपति: प्राकट्य, स्वरूप और ‘उच्छिष्ट’ का तांत्रिक रहस्य

सामान्यतः हिंदू धर्म में पूजा-पाठ के दौरान अत्यधिक पवित्रता (Purity) का ध्यान रखा जाता है। झूठे मुँह (बिना कुल्ला किए) या बिना नहाए भगवान का नाम लेना भी वर्जित माना जाता है। परंतु तंत्र शास्त्र के अनुसार, ईश्वर सर्वव्यापी है और उसके लिए ‘पवित्र’ और ‘अपवित्र’ (Dualities) का कोई भेद नहीं है।

‘उच्छिष्ट’ का अर्थ: संस्कृत में ‘उच्छिष्ट’ (Uchchhishta) का सामान्य अर्थ ‘जूठा’ (Leftover food/Tasted) होता है। तांत्रिक साधना में उच्छिष्ट गणपति की उपासना का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि इसमें साधक भगवान का नाम ‘जूठे मुँह’ (मुँह में पान, लौंग, इलायची या प्रसाद चबाते हुए) जपता है। यह इस बात का प्रतीक है कि साधक ने समाज के ‘द्वैत भाव’ (पवित्र-अपवित्र के भेद) को मिटा दिया है और वह सीधे परब्रह्म से जुड़ गया है।

अद्भुत और तांत्रिक स्वरूप: उच्छिष्ट गणपति का स्वरूप अत्यंत मनमोहक और तांत्रिक ऊर्जा से भरा हुआ है।

  • वर्ण (रंग): उनका वर्ण नीले (Blue) या श्याम रंग का है।

  • भुजाएं: उनके छह हाथ (Six hands) हैं।

  • आयुध (Weapons/Items): वे अपने हाथों में वीणा, अनार (Pomegranate), नीला कमल (Blue Lotus), धान की बाली (Paddy), रुद्राक्ष की माला और अपनी शक्ति (देवी) को धारण किए हुए हैं।

  • शक्ति के साथ: भगवान उच्छिष्ट गणपति अकेले नहीं होते। उनके वाम (बाएं) भाग में उनकी शक्ति (देवी नीला सरस्वती या पुष्टि) नग्न या आलिंगन अवस्था में विराजमान होती हैं। यह शिव और शक्ति (चेतना और ऊर्जा) के परम मिलन का प्रतीक है।

अष्टोत्तर शतनामावली का महत्व: 108 नामों की तांत्रिक शक्ति

तंत्र में ‘108’ की संख्या का बहुत बड़ा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व है। ब्रह्मांड में 27 नक्षत्र हैं और प्रत्येक नक्षत्र के 4 चरण होते हैं (27 × 4 = 108)। जब हम भगवान के 108 नामों का उच्चारण करते हैं, तो हम ब्रह्मांड के कण-कण को स्पंदित कर रहे होते हैं।

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‘अष्टोत्तर शतनामावली’ में भगवान उच्छिष्ट गणपति के प्रत्येक नाम के आरंभ में ‘ॐ’ और अंत में ‘नमः’ लगा होता है। जब साधक इन 108 अलग-अलग स्वरूपों और तांत्रिक शक्तियों का संस्कृत में उच्चारण करते हुए उन्हें लाल पुष्प, दुर्वा या मोदक अर्पित करता है, तो उसके मूलाधार चक्र (Root Chakra) में बैठी कुण्डलिनी शक्ति प्रचंड वेग से जाग्रत होने लगती है।

Shri Uchchhishta Ganapati Ashtottara Shatanamavali | (श्री उच्छिष्ट गणपति अष्टोत्तर शतनामावली: 108 नामों का पवित्र संग्रह – Lyrics in Sanskrit)

(उच्छिष्ट गणपति की साधना अत्यंत गोपनीय है। यहाँ हम उनके 108 जाग्रत नामों का वह संग्रह दे रहे हैं, जिसका पाठ करने से भगवान गणेश तुरंत प्रसन्न होते हैं और साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। प्रत्येक नाम के साथ आप एक पुष्प या दुर्वा अर्पित कर सकते हैं।)

अर्चन से पूर्व का सिद्ध ध्यान मंत्र (Dhyana Sloka):

108 नामों का अर्चन शुरू करने से पूर्व आँखें बंद करके लाल पुष्प हाथ में लें और भगवान के इस स्वरूप का ध्यान करें:

नीलाब्जदाडिमीवीणाशालीगुञ्जाक्षसूत्रकम्। दधतमुच्छिष्टनामाग्यं गणेशं ध्यायेतमेकजम्॥

(अर्थ: जो अपने हाथों में नीला कमल, अनार, वीणा, धान की बाली, और रुद्राक्ष की माला धारण करते हैं, उन ‘उच्छिष्ट’ नामक अद्वितीय भगवान श्री गणेश का मैं ध्यान करता हूँ।)

श्रीउच्छिष्टगणनाथस्य अष्टोत्तरशतनामावलिः

ॐ वन्दारुजनमन्दारपादपाय नमो नमः ॐ । (1)
ॐ चन्द्रार्धशेखरप्राणतनयाय नमो नमः ॐ ।
ॐ शैलराजसुतोत्सङ्गमण्डनाय नमो नमः ॐ । वन्दनाय
ॐ वल्लीशवलयक्रीडाकुतुकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ श्रीनीलवाणीललितारसिकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ स्वानन्दभवनानन्दनिलयाय नमो नमः ॐ ।
ॐ चन्द्रमण्डलसन्दृष्यस्वरूपाय नमो नमः ॐ ।
ॐ क्षीराब्धिमध्यकल्पद्रुमूलस्थाय नमो नमः ॐ ।
ॐ सुरापगासिताम्भोजसंस्थिताय नमो नमः ॐ ।
ॐ सदनीकृतमार्ताण्डमण्डलाय नमो नमः ॐ । (10)
ॐ इक्षुसागरमध्यस्थमन्दिराय नमो नमः ॐ ।
ॐ चिन्तामणिपुराधीशसत्तमाय नमो नमः ॐ ।
ॐ जगत्सृष्टितिरोधानकारणाय नमो नमः ॐ ।
ॐ क्रीडार्थसृष्टभुवनत्रितयाय नमो नमः ॐ ।
ॐ शुण्डोद्धूतजलोद्भूतभुवनाय नमो नमः ॐ ।
ॐ चेतनाचेतनीभूतशरीराय नमो नमः ॐ ।
ॐ अणुमात्रशरीरान्तर्लसिताय नमो नमः ॐ ।
ॐ सर्ववश्यकरानन्तमन्त्रार्णाय नमो नमः ॐ ।
ॐ कुष्ठाद्यामयसन्दोहशमनाय नमो नमः ॐ ।
ॐ प्रतिवादिमुखस्तम्भकारकाय नमो नमः ॐ । 20
ॐ पराभिचारदुष्कर्मनाशकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ सकृन्मन्त्रजपध्यानमुक्तिदाय नमो नमः ॐ ।
ॐ निजभक्तविपद्रक्षादीक्षिताय नमो नमः ॐ ।
ॐ ध्यानामृतरसास्वाददायकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ गुह्यपूजारताभीष्टफलदाय नमो नमः ॐ । कुलीयपूजा
ॐ रूपौदार्यगुणाकृष्टत्रिलोकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ अष्टद्रव्यहविःप्रीतमानसाय नमो नमः ॐ ।
ॐ अवताराष्टकद्वन्द्वप्रदानाय नमो नमः ॐ । भवताराष्टक
ॐ भारतालेखनोद्भिन्नरदनाय नमो नमः ॐ ।
ॐ नारदोद्गीतरुचिरचरिताय नमो नमः ॐ । 30
ॐ निखिलाम्नायसङ्गुष्ठवैभवाय नमो नमः ॐ ।
ॐ बाणरावणचण्डीशपूजिताय नमो नमः ॐ ।
ॐ इन्द्रादिदेवतावृन्दरक्षकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ सप्तर्षिमानसालाननिश्चेष्टाय नमो नमः ॐ ।
ॐ आदित्यादिग्रहस्तोमदीपकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ मदनागमसत्तन्त्रपारगाय नमो नमः ॐ ।
ॐ उज्जीवितेशसन्दग्धमदनाय नमो नमः ॐ । कुञ्जीविते
ॐ शमीमहीरुहप्रीतमानसाय नमो नमः ॐ ।
ॐ जलतर्पणसम्प्रीतहृदयाय नमो नमः ॐ ।
ॐ कन्दुकीकृतकैलासशिखराय नमो नमः ॐ । 40
ॐ अथर्वशीर्षकारण्यमयूराय नमो नमः ॐ ।
ॐ कल्याणाचलश‍ृङ्गाग्रविहाराय नमो नमः ॐ ।
ॐ आतुनैन्द्रादिसामसंस्तुताय नमो नमः ॐ ।
ॐ ब्राह्म्यादिमातृनिवःपरीताय नमो नमः ॐ ।
ॐ चतुर्थावरणारक्षिदिगीशाय नमो नमः ॐ । रक्षिधीशाय
ॐ द्वाराविष्टनिधिद्वन्द्वशोभिताय नमो नमः ॐ ।
ॐ अनन्तपृथिवीकूर्मपीठाङ्गाय नमो नमः ॐ ।
ॐ तीव्रादियोगिनीवृन्दपीठस्थाय नमो नमः ॐ ।
ॐ जयादिनवपीठश्रीमण्डिताय नमो नमः ॐ ।
ॐ पञ्चावरणमध्यस्थसदनाय नमो नमः ॐ । 50
ॐ क्षेत्रपालगणेशादिद्वारपाय नमो नमः ॐ ।
ॐ महीरतीरमागौरीपार्श्वकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ मद्यप्रियादिविनयिविधेयाय नमो नमः ॐ ।
ॐ वाणीदुर्गांशभूतार्हकलत्राय नमो नमः ॐ । भूतार्ध
ॐ वरहस्तिपिशाचीहृन्नन्दनाय नमो नमः ॐ ।
ॐ योगिनीशचतुष्षष्टिसंयुताय नमो नमः ॐ ।
ॐ नवदुर्गाष्टवसुभिस्सेविताय नमो नमः ॐ ।
ॐ द्वात्रिंशद्भैरवव्यूहनायकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ ऐरावतादिदिग्दन्तिसंवृताय नमो नमः ॐ ।
ॐ कण्ठीरवमयूराखुवाहनाय नमो नमः ॐ । 60
ॐ मूषकाङ्कमहारक्तकेतनाय नमो नमः ॐ ।
ॐ कुम्भोदरकरन्यस्तपादाब्जाय नमो नमः ॐ ।
ॐ कान्ताकान्ततराङ्गस्थकराग्राय नमो नमः ॐ ।
ॐ अन्तस्थभुवनस्फीतजठराय नमो नमः ॐ ।
ॐ कर्पूरवीटिकासाररक्तोष्ठाय नमो नमः ॐ ।
ॐ श्वेतार्कमालासन्दीप्तकन्धराय नमो नमः ॐ ।
ॐ सोमसूर्यबृहद्भानुलोचनाय नमो नमः ॐ ।
ॐ सर्वसम्पत्प्रदामन्दकटाक्षाय नमो नमः ॐ ।
ॐ अतिवेलमदारक्तनयनाय नमो नमः ॐ ।
ॐ शशाङ्कार्धसमादीप्तमस्तकाय नमो नमः ॐ । 70
ॐ सर्पोपवीतहारादिभूषिताय नमो नमः ॐ ।
ॐ सिन्दूरितमहाकुम्भसुवेषाय नमो नमः ॐ ।
ॐ आशावसनतादृष्यसौन्दर्याय नमो नमः ॐ ।
ॐ कान्तालिङ्गनसञ्जातपुलकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ पाशाङ्कुशधनुर्बाणमण्डिताय नमो नमः ॐ ।
ॐ दिगन्तव्याप्तदानाम्बुसौरभाय नमो नमः ॐ ।
ॐ सायन्तनसहस्रांशुरक्ताङ्गाय नमो नमः ॐ ।
ॐ सम्पूर्णप्रणवाकारसुन्दराय नमो नमः ॐ ।
ॐ ब्रह्मादिकृतयज्ञाग्निसम्भूताय नमो नमः ॐ ।
ॐ सर्वामरप्रार्थनात्तविग्रहाय नमो नमः ॐ । 80
ॐ जनिमात्रसुरत्रासनाशकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ कलत्रीकृतमातङ्गकन्यकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ विद्यावदसुरप्राणनाशकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ सर्वमन्त्रसमाराध्यस्वरूपाय नमो नमः ॐ ।
ॐ षट्कोणयन्त्रपीठान्तर्लसिताय नमो नमः ॐ ।
ॐ चतुर्नवतिमन्त्रात्मविग्रहाय नमो नमः ॐ ।
ॐ हुङ्गङ्क्लाङ्ग्लाम्मुखानेकबीजार्णाय नमो नमः ॐ ।
ॐ बीजाक्षरत्रयान्तस्थशरीराय नमो नमः ॐ ।
ॐ हृल्लेखागुह्यमन्त्रान्तर्भाविताय नमो नमः ॐ । बीजमन्त्रान्तर्भाविताय
ॐ स्वाहान्तमातृकामालारूपाध्याय नमो नमः ॐ । 90
ॐ द्वात्रिंशदक्षरमयप्रतीकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ शोधनानर्थसन्मन्त्रविशेषाय नमो नमः ॐ ।
ॐ अष्टाङ्गयोगिनिर्वाणदायकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ प्राणेन्द्रियमनोबुद्धिप्रेरकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ मूलाधारवरक्षेत्रनायकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ चतुर्दलमहापद्मसंविष्टाय नमो नमः ॐ ।
ॐ मूलत्रिकोणसंशोभिपावकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ सुषुम्नारन्ध्रसञ्चारदेशिकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ षट्ग्रन्थिनिम्नतटिनीतारकाय नमो नमः ॐ ।
ॐ दहराकाशसंशोभिशशाङ्काय नमो नमः ॐ । 100
ॐ हिरण्मयपुराम्भोजनिलयाय नमो नमः ॐ ।
ॐ भ्रूमध्यकोमलारामकोकिलाय नमो नमः ॐ ।
ॐ षण्णवद्वादशान्तस्थमार्ताण्डाय नमो नमः ॐ ।
ॐ मनोन्मणीसुखावासनिर्वृताय नमो नमः ॐ ।
ॐ षोडशान्तमहापद्ममधुपाय नमो नमः ॐ ।
ॐ सहस्रारसुधासारसेचिताय नमो नमः ॐ ।
ॐ नादबिन्दुद्वयातीतस्वरूपाय नमो नमः ॐ ।
ॐ उच्छिष्टगणनाथाय महेशाय नमो नमः ॐ । 108

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(इन 108 नामों के अर्चन के बाद उच्छिष्ट गणपति के मूल मंत्र “ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा” का कम से कम 108 बार जाप करना चाहिए।)

श्री उच्छिष्ट गणपति अष्टोत्तर शतनामावली अर्चन के अचूक और अकल्पनीय लाभ (Benefits)

उच्छिष्ट गणपति की साधना को ‘कलियुग का कल्पवृक्ष’ कहा जाता है। जिस प्रकार एक हाथी पल भर में बड़े से बड़े पेड़ को उखाड़ फेंकता है, उसी प्रकार इस अष्टोत्तर शतनामावली का पाठ जीवन की हर समस्या को जड़ से उखाड़ देता है:

1. दांपत्य जीवन (विवाह) में चमत्कारिक प्रेम और वशीकरण (Vashikaran)

उच्छिष्ट गणपति की पूजा विशेष रूप से आकर्षण और वशीकरण के लिए की जाती है। यदि पति-पत्नी के बीच तलाक की नौबत आ गई हो, रोज़ झगड़े होते हों, या मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त करने में बाधा आ रही हो, तो इन 108 नामों का पाठ अकल्पनीय रूप से दोनों के बीच प्रेम और आकर्षण (Magnetic Attraction) भर देता है।

2. भयंकर शत्रुओं का पूर्ण रूप से संहार (Victory over Enemies)

“ॐ शत्रुनाशनाय नमः”। जब विरोधी आपके व्यापार, नौकरी या प्रतिष्ठा को नष्ट करने पर तुल जाएं, तो उच्छिष्ट गणपति का अर्चन शत्रुओं के अहंकार और उनकी बुद्धि का स्तम्भन (Paralyze) कर देता है। विरोधी स्वयं आपके सामने घुटने टेकने पर मजबूर हो जाते हैं।

3. काले जादू, तंत्र-मंत्र और बुरी नज़र का सर्वनाश

तांत्रिक भगवान होने के कारण उच्छिष्ट गणपति काले जादू, कृत्या, प्रेत बाधा और बुरी नज़र को पल भर में भस्म कर देते हैं। जिस घर में उच्छिष्ट गणपति के 108 नामों का गान होता है, वहाँ कोई भी मारण या उच्चाटन का तांत्रिक प्रयोग असर नहीं कर सकता।

4. मुकदमों (Court Cases) और कर्ज से त्वरित मुक्ति

जो लोग लंबे समय से कोर्ट-कचहरी के मामलों में फंसे हैं या जिन पर इतना भारी कर्जा हो गया है कि चुकाने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा, उन्हें रात्रि के समय इन 108 नामों से भगवान को लाल फूल अर्पित करने चाहिए। कुछ ही हफ्तों में कर्ज उतरने के नए मार्ग स्वतः खुलने लगते हैं।

5. धन, ऐश्वर्य और राजयोग की प्राप्ति

उच्छिष्ट गणपति भौतिक सुखों (भोग) के देवता हैं। वे यह नहीं कहते कि ईश्वर को पाने के लिए दरिद्र रहना आवश्यक है। उनकी उपासना से साधक को अपार धन, वाहन सुख, और समाज में उच्च पद (राजमान्य) की प्राप्ति होती है।

श्री उच्छिष्ट गणपति अष्टोत्तर शतनामावली की प्रामाणिक तांत्रिक पूजा विधि (Authentic Puja Vidhi)

उच्छिष्ट गणपति की साधना अन्य देवी-देवताओं से थोड़ी अलग और विशिष्ट होती है। इसे पूर्ण फलदायी बनाने के लिए इस विधि का पालन करें:

1. उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त (Best Time)

उच्छिष्ट गणपति की साधना के लिए चतुर्थी तिथि (विशेषकर संकष्टी चतुर्थी), मंगलवार (Tuesday) और शुक्रवार (Friday) का दिन सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। पूजा का समय हमेशा रात्रि काल (रात 9 बजे के बाद) होना चाहिए। तंत्र में निशा पूजा का विशेष महत्व है।

2. वस्त्र, दिशा और आसन का विधान

स्नान करके लाल या नीले/काले रंग के वस्त्र धारण करें। पूजा करते समय अपना मुख पश्चिम (West) या उत्तर (North) दिशा की ओर रखें। बैठने के लिए लाल रंग के ऊनी आसन का प्रयोग करें।

3. पूजन सामग्री और स्थापना

एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान उच्छिष्ट गणपति का चित्र या सिद्ध ‘उच्छिष्ट गणपति यंत्र’ स्थापित करें। उनके सामने तिल के तेल या सरसों के तेल का एक दीपक जलाएं। अगरबत्ती या गुग्गुल की धूप जलाएं।

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4. दृढ़ संकल्प (Sankalpa)

दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, लाल अक्षत और एक फूल लेकर अपना नाम, गोत्र और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य (जैसे- दांपत्य सुख, वशीकरण या कर्ज मुक्ति) बोलें। फिर जल धरती पर छोड़ दें।

5. अर्चन की तांत्रिक विधि (108 पुष्पांजलि)

अपने पास 108 की संख्या में लाल पुष्प (जैसे गुड़हल/Hibiscus या गुलाब), दूर्वा (हरी घास), लौंग, या लाल कुमकुम रख लें। उच्छिष्ट साधना की एक विशेष ‘वाम मार्गी’ परंपरा यह है कि साधक अपने मुँह में एक लौंग, इलायची या पान का पत्ता (Tambul) रखकर उसे चबाते हुए भगवान के नामों का उच्चारण करता है (यही ‘उच्छिष्ट’ अवस्था है)। अब भगवान का एक नाम बोलें (जैसे- ॐ कामरूपिणे नमः) और एक लाल फूल या दूर्वा यंत्र/चित्र पर अर्पित करें। 108 नामों के साथ 108 बार अर्पण करें।

6. नैवेद्य (भोग) और आरती

अर्चन पूर्ण होने के बाद भगवान को मोदक, गुड़, तिल के लड्डू, या अनार (Pomegranate) का भोग लगाएं। अंत में कर्पूर से आरती करें और अनजाने में हुई भूल के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

साधना के अत्यंत कठोर नियम और सावधानियां (Strict Rules & Precautions)

यह एक उग्र तांत्रिक साधना है। इसकी ऊर्जा को संभालने के लिए इन नियमों का पालन अनिवार्य है:

  1. गुरु दीक्षा का महत्व: उच्छिष्ट गणपति की विशुद्ध तांत्रिक साधना (विशेषकर वाम मार्ग से) बिना किसी योग्य ‘गुरु’ के निर्देशन के नहीं करनी चाहिए। यदि आप एक गृहस्थ हैं, तो ‘दक्षिण मार्ग’ (सात्विक रूप से) सामान्य कुल्ला करके भी इस अष्टोत्तर का पाठ कर सकते हैं।

  2. सत्कर्म और नैतिकता: आकर्षण और वशीकरण की शक्ति प्राप्त होने के बाद इसका प्रयोग किसी भी स्त्री या पुरुष पर अनैतिक रूप से या उसे नुकसान पहुंचाने के लिए कभी न करें। भगवान गणेश बुद्धि के देवता हैं, यदि आपकी नीयत खराब होगी, तो यह साधना आपको ही नष्ट कर देगी।

  3. गोपनीयता (Secrecy): अपनी साधना, पूजा के समय और अपने संकल्प को पूरी तरह गुप्त रखें। किसी को यह न बताएं कि आप उच्छिष्ट गणपति की उपासना कर रहे हैं।

  4. स्त्री का सम्मान: तांत्रिक साधना में स्त्री को ‘शक्ति’ माना गया है। जो साधक अपनी पत्नी या अन्य स्त्रियों का अपमान करता है, उसकी उच्छिष्ट गणपति साधना तुरंत निष्फल हो जाती है।

Shri Uchchhishta Ganapati Ashtottara Shatanamavali केवल 108 संस्कृत के नामों का संग्रह नहीं है; यह तंत्र विज्ञान की वह कुँजी है जो मनुष्य को समाज की रूढ़ियों, डर और असफलताओं से बाहर निकालकर सर्वोच्च शिखर पर बैठा देती है। उच्छिष्ट गणपति हमें सिखाते हैं कि परमात्मा को प्राप्त करने के लिए किसी बाहरी दिखावे या कर्मकांड की आवश्यकता नहीं है; ईश्वर तो भाव का भूखा है। चाहे आप ‘जूठे’ हों या ‘पवित्र’, यदि आपका समर्पण सच्चा है, तो वे आपके हर संकट को हर लेंगे।

जब भी लगे कि आपके रिश्ते टूट रहे हैं, दुश्मन आप पर हावी हो रहे हैं या जीवन कर्ज के बोझ तले दब गया है, तो रात्रि के समय इन 108 नामों का ध्यान करते हुए गणपति जी का अर्चन करें। विघ्नहर्ता का यह तांत्रिक स्वरूप आपके जीवन की हर बाधा को चीर कर आपके लिए सुख, समृद्धि और प्रेम के द्वार खोल देगा। ॐ श्री उच्छिष्ट गणपतये नमः!

श्री उच्छिष्ट गणपति अष्टोत्तर शतनामावली: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. श्री उच्छिष्ट गणपति कौन हैं और उन्हें ‘उच्छिष्ट’ क्यों कहा जाता है?

श्री उच्छिष्ट गणपति भगवान गणेश के 32 स्वरूपों में से 8वें और अत्यंत शक्तिशाली तांत्रिक स्वरूप हैं। ‘उच्छिष्ट’ का अर्थ होता है ‘जूठा’ या ‘बचा हुआ’। तंत्र शास्त्र में साधक मुँह में पान, लौंग या प्रसाद चबाते हुए (जूठे मुँह) इनकी साधना करते हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि ईश्वर के लिए पवित्र-अपवित्र का कोई भेद नहीं है।

2. क्या कोई सामान्य गृहस्थ व्यक्ति उच्छिष्ट गणपति की पूजा कर सकता है?

जी हाँ, सामान्य गृहस्थ व्यक्ति भी अपनी मनोकामना पूर्ति (जैसे दांपत्य सुख, कर्ज मुक्ति) के लिए उच्छिष्ट गणपति के 108 नामों का पाठ कर सकता है। गृहस्थों को ‘वाम मार्ग’ (जूठे मुँह) की बजाय ‘दक्षिण मार्ग’ (सात्विक रूप से शुद्ध होकर) से उनकी पूजा करनी चाहिए।

3. अष्टोत्तर शतनामावली का पाठ करने का सबसे शुभ समय कौन सा है?

उच्छिष्ट गणपति की साधना तंत्रोक्त होने के कारण रात्रि के समय (निशीथ काल – रात 9 बजे से मध्य रात्रि के बीच) सबसे अधिक फलदायी होती है। इसे चतुर्थी तिथि (विशेषकर संकष्टी चतुर्थी), मंगलवार या शुक्रवार से आरंभ करना शुभ होता है।

4. 108 नामों का अर्चन करते समय भगवान को क्या अर्पित करना चाहिए?

अर्चन करते समय प्रत्येक नाम के उच्चारण के साथ भगवान उच्छिष्ट गणपति को लाल पुष्प (गुड़हल/गुलाब), दूर्वा (हरी घास), कुमकुम, या लौंग अर्पित करना सबसे अधिक चमत्कारी और फलदायी माना जाता है। भोग में उन्हें अनार और मोदक अत्यंत प्रिय हैं।

5. क्या उच्छिष्ट गणपति की साधना से वशीकरण (Attraction) होता है?

जी हाँ। उच्छिष्ट गणपति को वशीकरण और आकर्षण का प्रमुख देवता माना गया है। इनके अष्टोत्तर शतनामावली के पाठ से पति-पत्नी के बीच टूटे हुए रिश्ते जुड़ जाते हैं और साधक के व्यक्तित्व में एक असीम सम्मोहन (Magnetic Aura) आ जाता है। परंतु इसका अनैतिक प्रयोग सर्वथा वर्जित है।

"नमस्कार! मैं अमित तिवारी हूँ, और आप मुझे एक 'साधक' के रूप में जान सकते हैं। बचपन से ही सनातन धर्म, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं ने मुझे अपनी ओर गहराई से आकर्षित किया है। वर्षों के निरंतर अध्ययन, गुरु-कृपा और अपने व्यक्तिगत साधना-अनुभवों से मैंने जो कुछ भी सीखा है, उसे मैं sadhnas.in के माध्यम से आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मेरा मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैले भ्रम को दूर करके प्रामाणिक, सत्य और शास्त्र-सम्मत जानकारी को बेहद सरल भाषा में आप तक पहुँचाना है। मैं कोई गुरु या उपदेशक नहीं हूँ, बल्कि आप ही की तरह ईश्वर की खोज में निकला एक राही हूँ। मेरी यही कोशिश है कि मेरे अनुभवों और लेखनी से आपकी आध्यात्मिक यात्रा और भी सुगम व सफल हो सके।"

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