सनातन धर्म और वैदिक वांग्मय में भगवान शिव को ‘परब्रह्म’, ‘महादेव’ और ‘देवाधिदेव’ कहा गया है। शिव वह अनंत शक्ति हैं, जिनका न कोई आदि है और न कोई अंत। वे संहारक भी हैं और परम कल्याणकारी भी। जब वे ध्यानमग्न होते हैं, तो वे संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने भीतर समेटे हुए एक परम योगी प्रतीत होते हैं, और जब वे प्रसन्न होते हैं, तो वे ‘भोलेनाथ’ बनकर अपने भक्तों को मनचाहा वरदान दे देते हैं। भगवान शिव की इसी अनंत महिमा, कृपा और परब्रह्म स्वरूप का गान करने के लिए शास्त्रों में ‘श्री शिव स्तुतिः (संस्कृत)’ का विधान है।
शिव स्तुति केवल कुछ शब्दों का जोड़ नहीं है; यह भक्त और भगवान के बीच का वह सीधा संवाद है, जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है। जब मनुष्य जीवन की आपाधापी, दुखों, बीमारियों, और असफलताओं से थक जाता है, तब शिव की स्तुति उसके लिए एक शीतल छांव का कार्य करती है।
(नोट: लेख के उद्देश्य और साधकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए, यहाँ हम श्री शिव स्तुति के मूल श्लोकों को नहीं दे रहे हैं। आप इस स्तुति का मूल संस्कृत पाठ किसी भी प्रामाणिक शिव पुराण, स्तोत्र संग्रह या नित्य कर्म पूजा प्रकाश से प्राप्त कर सकते हैं। इस लेख में हमारा ध्यान इसकी विधि और रहस्यों पर केंद्रित है।)
यदि आप जीवन में अकारण भय, मानसिक तनाव, रोगों या आर्थिक संकटों से घिरे हैं, तो श्री शिव स्तुति आपके जीवन की दिशा बदल सकती है। इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम गहराई से जानेंगे कि श्री शिव स्तुति का तात्विक महत्व क्या है, इसके नित्य पाठ से जीवन में कौन से अकल्पनीय चमत्कार होते हैं, और इसे सिद्ध करने की प्रामाणिक साधना विधि, नियम व सावधानियां क्या हैं।
श्री शिव स्तुतिः (संस्कृत) | Shri Shiva Stuti Lyrics in Sanskrit
स्फुटं स्फटिकसप्रभं स्फुटितहारकश्रीजटं
शशाङ्कदलशेखरं कपिलफुल्लनेत्रत्रयम् ।
तरक्षुवरकृत्तिमद्भुजगभूषणं भूतिम-
त्कदा नु शितिकण्ठ ते वपुरवेक्षते वीक्षणम् ॥ १ ॥
त्रिलोचन विलोचने लसति ते ललामायिते
स्मरो नियमघस्मरो नियमिनामभूद्भस्मसात् ।
स्वभक्तिलतया वशीकृतपती सतीयं सती
स्वभक्तवशतो भवानपि वशी प्रसीद प्रभो ॥ २ ॥
महेश महितोऽसि तत्पुरुष पूरुषाग्र्यो भवा-
नघोररिपुघोर तेऽनवम वामदेवाञ्जलिः ।
नमस्सपदि जात ते त्वमिति पञ्चरूपोचित-
प्रपञ्चचयपञ्चवृन्मम मनस्तमस्ताडय ॥ ३ ॥
रसाघनरसानलानिलवियद्विवस्वद्विधु-
प्रयष्टृषु निविष्टमित्यज भजामि मूर्त्यष्टकम् ।
प्रशान्तमुत भीषणं भुवनमोहनं चेत्यहो
वपूंषि गुणभूषितेहमहमात्मनोऽहं भिदे ॥ ४ ॥
विमुक्तिपरमाध्वनां तव षडध्वनामास्पदं
पदं निगमवेदिनो जगति वामदेवादयः ।
कथञ्चिदुपशिक्षिता भगवतैव संविद्रते
वयं तु विरलान्तराः कथमुमेश तन्मन्महे ॥ ५ ॥
कठोरितकुठारया ललितशूलया वाहया
रणड्डमरुणा स्फुरद्धरिणया सखट्वाङ्गया ।
चलाभिरचलाभिरप्यगणिताभिरुन्मृत्यत-
श्चतुर्दश जगन्ति ते जयजयेत्ययुर्विस्मयम् ॥ ६ ॥
पुरा त्रिपुररन्धनं विविधदैत्यविध्वंसनं
पराक्रमपरम्परा अपि परा न ते विस्मयः ।
अमर्षिबलहर्षितक्षुभितवृत्तनेत्रोज्ज्वल-
ज्ज्वलज्ज्वलनहेलया शलभितं हि लोकत्रयम् ॥ ७ ॥
सहस्रनयनो गुहस्सहसहस्ररश्मिर्विधुः
बृहस्पतिरुताप्पतिस्ससुरसिद्धविद्याधराः ।
भवत्पदपरायणाश्श्रियमिमां ययुः प्रार्थितां
भवान् सुरतरुर्भृशं शिव शिवां शिवावल्लभाम् ॥ ८ ॥
तव प्रियतमादतिप्रियतमं सदैवान्तरं
पयस्युपहितं घृतं स्वयमिव श्रियो वल्लभम् ।
विबुद्ध्य लघुबुद्धयस्स्वपरपक्षलक्ष्यायितं
पठन्ति हि लुठन्ति ते शठहृदश्शुचा शुण्ठिताः ॥ ९ ॥
निवासनिलयाचिता तव शिरस्ततिर्मालिका
कपालमपि ते करे त्वमशिवोऽस्यनन्तर्धियाम् ।
तथापि भवतः पदं शिवशिवेत्यदो जल्पता-
मकिञ्चन न किञ्चन वृजिनमस्ति भस्मी भवेत् ॥ १० ॥
त्वमेव किल कामधुक्सकलकाममापूरयन्
सदा त्रिनयनो भवान्वहसि चात्रिनेत्रोद्भवम् ।
विषं विषधरान्दधत्पिबसि तेन चानन्दवा-
न्निरुद्धचरितोचिता जगदधीश ते भिक्षुता ॥ ११ ॥
नमः शिवशिवा शिवाशिव शिवार्थ कृन्ताशिवं
नमो हरहरा हराहर हरान्तरीं मे दृशम् ।
नमो भवभवा भवप्रभवभूतये मे भवा-
न्नमो मृड नमो नमो नम उमेश तुभ्यं नमः ॥ १२ ॥
सतां श्रवणपद्धतिं सरतु सन्नतोक्तेत्यसौ
शिवस्य करुणाङ्कुरात्प्रतिकृतात्मदा सोचिता ।
इति प्रथितमानसो व्यथित नाम नारायणः
शिवस्तुतिमिमां शिवां लिकुचिसूरिसूनुस्सुधीः ॥ १३ ॥
इति श्रीलिकुचिसूरिसूनु नारायणाचार्यविरचिता श्री शिवस्तुतिः ।
1. श्री शिव स्तुति का दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व
भगवान शिव की स्तुति का महत्व केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका एक अत्यंत गहरा दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक आधार है।
नाद ब्रह्म और शिव का संबंध
भगवान शिव को ‘नाद ब्रह्म’ (ब्रह्मांडीय ध्वनि) का स्वामी माना जाता है। डमरू की ध्वनि से ही संस्कृत की वर्णमाला (माहेश्वर सूत्र) की उत्पत्ति हुई है। जब हम संस्कृत में श्री शिव स्तुति का गान करते हैं, तो उन श्लोकों से उत्पन्न होने वाले कंपन (Vibrations) सीधे हमारे शरीर के सातों चक्रों (Chakras) को प्रभावित करते हैं। यह ध्वनि हमारे आस-पास के वातावरण को शुद्ध करती है और नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करती है।
सगुण और निर्गुण का संगम
शिव निराकार (निर्गुण) भी हैं और साकार (सगुण) भी। शिवलिंग उनके निराकार स्वरूप का प्रतीक है, जबकि उनकी पंचमुखी या नीलकंठ वाली छवि सगुण स्वरूप है। शिव स्तुति इन दोनों स्वरूपों की वंदना करती है। यह स्तुति हमें यह सिखाती है कि हमारे भीतर जो ‘आत्मा’ है, वह उसी शिव का अंश है— “शिवोहम” (मैं ही शिव हूँ)। जब हम स्तुति करते हैं, तो हम वास्तव में अपने भीतर बैठे शिव तत्व को जाग्रत कर रहे होते हैं।
2. श्री शिव स्तुति पाठ के अकल्पनीय और चमत्कारिक लाभ
भगवान शिव ‘आशुतोष’ हैं, अर्थात् वे बहुत शीघ्र प्रसन्न होते हैं। जो साधक पूर्ण श्रद्धा, पवित्रता और अटूट विश्वास के साथ प्रतिदिन ‘श्री शिव स्तुति’ का सस्वर पाठ करता है, उसके जीवन में निम्नलिखित अमोघ और चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:
शारीरिक और स्वास्थ्य लाभ (Health Benefits)
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अकाल मृत्यु और दुर्घटनाओं से रक्षा: शिव मृत्युंजय हैं। शिव स्तुति का पाठ करने वाले साधक के आस-पास महाकाल का एक अभेद्य सुरक्षा चक्र बन जाता है। यह स्तुति अकाल मृत्यु, भयंकर दुर्घटनाओं और मारकेश ग्रह की दशाओं को टालने में अमोघ है।
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असाध्य रोगों से मुक्ति: शिव को ‘वैद्यनाथ’ (वैद्यों के नाथ) कहा गया है। जो लोग गंभीर या लंबी बीमारियों से पीड़ित हैं, उनके लिए शिव स्तुति का पाठ एक आध्यात्मिक औषधि का कार्य करता है। इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
मानसिक और मनोवैज्ञानिक लाभ (Mental Peace)
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भय और डिप्रेशन का नाश: आज के समय में हर व्यक्ति किसी न किसी डर (Phobia), एंग्जायटी (Anxiety) या डिप्रेशन से जूझ रहा है। शिव स्तुति का पाठ मन के भीतर से अज्ञात भय को जड़ से उखाड़ फेंकता है। साधक को अगाध मानसिक शांति प्राप्त होती है।
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क्रोध पर नियंत्रण: शिव परम वैरागी और शांत हैं। इस स्तुति के प्रभाव से साधक का मन शांत होता है, उसका अनावश्यक क्रोध समाप्त होता है और निर्णय लेने की क्षमता (Clarity of thought) में वृद्धि होती है।
ज्योतिषीय और लौकिक लाभ (Astrological & Material Benefits)
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नवग्रह शांति (विशेषकर शनि, राहु-केतु): भगवान शिव नवग्रहों के नियंता हैं। जिन लोगों की कुंडली में शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या, राहु-केतु का दोष या कालसर्प दोष है, उनके लिए शिव स्तुति का पाठ सबसे बड़ा उपाय है। शिव की शरण में जाने से सभी ग्रह अनुकूल हो जाते हैं।
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धन, ऐश्वर्य और सफलता: भगवान शिव कुबेर के भी स्वामी हैं। यद्यपि शिव स्वयं भस्म रमाते हैं, लेकिन वे अपने भक्तों को कुबेर का खजाना दे सकते हैं। स्तुति के पाठ से व्यापार में वृद्धि, नौकरी में सफलता और घर में अन्न-धन की बरकत होती है।
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शत्रु शमन: जो शत्रु अकारण आपको परेशान कर रहे हैं, शिव स्तुति के प्रभाव से उनका हृदय परिवर्तन हो जाता है या वे आपके मार्ग से स्वतः ही हट जाते हैं।
आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth)
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मोक्ष की प्राप्ति: इस स्तुति का अंतिम और सर्वोच्च लाभ ‘मोक्ष’ है। इसका नित्य पाठ करने से साधक जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
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ध्यान और कुंडलिनी जागरण: जो साधक योग और ध्यान के मार्ग पर हैं, उन्हें ध्यान में बैठने से पूर्व शिव स्तुति का पाठ अवश्य करना चाहिए। इससे ‘आज्ञा चक्र’ (Third Eye) जाग्रत होता है और कुंडलिनी शक्ति ऊर्ध्वगामी होती है।
3. श्री शिव स्तुति की प्रामाणिक साधना और पाठ विधि (Sadhana Vidhi)
भगवान शिव की उपासना बहुत ही सरल है, लेकिन पूर्ण फल प्राप्ति के लिए शास्त्रों में बताई गई विधि का पालन करना आवश्यक है:
उत्तम दिन, तिथि और मुहूर्त
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दिन: भगवान शिव की आराधना के लिए सोमवार (Monday) का दिन सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।
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विशेष तिथियां: प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि, महाशिवरात्रि और श्रावण मास (सावन) के दिन इस स्तुति का पाठ करना हज़ारों गुणा फलदायी होता है।
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समय: पाठ का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल ‘ब्रह्म मुहूर्त’ या ‘प्रदोष काल’ (गोधूलि बेला – सूर्यास्त के समय) होता है। शिव पूजा प्रदोष काल में सर्वाधिक जाग्रत होती है।
दिशा, आसन और वस्त्र का विधान
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दिशा: पाठ करते समय अपना मुख सदैव पूर्व (East) या उत्तर (North – कैलाश की दिशा) दिशा की ओर रखें।
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आसन: बैठने के लिए सफेद ऊनी आसन या कुशा के आसन का प्रयोग करें।
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वस्त्र: स्नान करके पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाएं। शिव पूजा में सफेद (White), हल्के पीले या भस्म (Ash) के रंग के वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
शिवलिंग की स्थापना और पूजन सामग्री
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एक स्वच्छ लकड़ी की चौकी पर सफेद कपड़ा बिछाएं।
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उस पर नर्मदेश्वर शिवलिंग, पारद शिवलिंग या भगवान शिव का सपरिवार (माता पार्वती, गणेश, कार्तिकेय सहित) चित्र स्थापित करें।
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भगवान के समक्ष गाय के शुद्ध घी का या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें। धूप और चंदन की अगरबत्ती जलाएं।
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पूजन सामग्री: भगवान शिव को त्रिपुंड (चंदन या भस्म) लगाएं। उन्हें अक्षत (बिना टूटे हुए चावल), बिल्वपत्र (Bel Patra – तीन पत्तियों वाले), सफेद आंकड़े का फूल, धतूरा और भांग अत्यंत प्रिय हैं।
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रुद्राक्ष और भस्म का महत्व: पाठ से पूर्व अपने मस्तक, गले और भुजाओं पर ‘भस्म’ का त्रिपुंड अवश्य लगाएं और गले में रुद्राक्ष की माला धारण करें। इससे शिव तत्व तुरंत जाग्रत होता है।
दृढ़ संकल्प (Sankalpa)
पाठ से पूर्व दाएँ हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत और एक सफेद फूल लें। अपना नाम, गोत्र और पाठ का स्पष्ट उद्देश्य (जैसे- “हे देवाधिदेव महादेव, मैं अपने अमुक रोग की शांति, मृत्यु भय से मुक्ति, नौकरी में सफलता और आत्म-कल्याण के लिए श्री शिव स्तुति का 21/41 दिन तक नित्य पाठ करूँगा”) बोलें और जल ज़मीन पर छोड़ दें।
स्तोत्र का पाठ (Chanting Method)
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सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश और माता पार्वती का स्मरण करें (“ॐ गं गणपतये नमः”)।
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इसके बाद अपने गुरुदेव और नंदी महाराज का ध्यान करें।
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भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र “ॐ नमः शिवाय” की कम से कम 11 बार या एक माला (108 बार) रुद्राक्ष की माला पर जप करें।
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अब पूर्ण एकाग्रता, असीम विश्वास और एक अबोध बालक के भाव से ‘श्री शिव स्तुति’ का सस्वर पाठ आरंभ करें।
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संस्कृत में इसका स्पष्ट, गंभीर और लयबद्ध उच्चारण सर्वाधिक ऊर्जा उत्पन्न करता है।
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नित्य 1, 3, 5 या 11 बार इसका पाठ अपनी संकल्पित अवधि तक करें।
क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग (नैवेद्य)
पाठ पूर्ण होने के बाद भगवान शिव को खीर, सफेद मिठाई (बर्फी/पेड़ा), मिश्री, या ऋतुफल का भोग लगाएं। अंत में शिव जी की आरती (जय शिव ओंकारा) गाएं और साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हुए पूजा-पाठ में हुई किसी भी अशुद्धि या उच्चारण की भूल के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
4. साधना के अत्यंत संवेदनशील और अनिवार्य नियम (Strict Rules for Sadhana)
भगवान शिव जितने भोले हैं, उनके नियम उतने ही सात्विक हैं। यदि आप श्री शिव स्तुति का पूर्ण फल चाहते हैं, तो इन नियमों का कड़ाई से पालन करें:
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पूर्ण सात्विकता (Sattvic Diet): अनुष्ठान के दौरान घर में और अपने आहार में मांस, मदिरा, अंडे, लहसुन, और प्याज का पूर्णतः त्याग कर दें। शिव परम योगी हैं, तामसिक भोजन उनकी ऊर्जा को नष्ट करता है।
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ब्रह्मचर्य का कठोर पालन (Celibacy): जितने दिनों का आपने संकल्प लिया है, उस अवधि में शारीरिक और मानसिक रूप से ब्रह्मचर्य का कठोरता से पालन करें।
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अहिंसा और करुणा (Non-Violence): शिव पशुओं के नाथ (पशुपति) हैं। किसी भी जीव, पशु-पक्षी या मनुष्य को कष्ट न पहुँचाएं। सभी के प्रति दया भाव रखें।
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क्रोध और निंदा से बचाव: शिव साधना में क्रोध करना सबसे बड़ा बाधक है। बात-बात पर गुस्सा करने से संचित ऊर्जा नष्ट हो जाती है। किसी की चुगली या निंदा न करें।
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सत्य वचन: हमेशा सत्य बोलें और अपने आचरण को शुद्ध रखें।
5. शिव उपासना में ध्यान रखने योग्य विशेष सावधानियां (Precautions)
भगवान शिव की पूजा में कुछ ऐसी वस्तुएं और कार्य हैं जो सर्वथा वर्जित (Prohibited) हैं। साधक को इनका विशेष ध्यान रखना चाहिए:
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तुलसी दल वर्जित: भगवान शिव की पूजा में तुलसी (Tulsi) के पत्तों का प्रयोग भूलकर भी नहीं करना चाहिए।
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कुमकुम (सिंदूर) का निषेध: शिवलिंग पर कभी भी कुमकुम या सिंदूर नहीं चढ़ाया जाता है। शिव वैरागी हैं और सिंदूर सौभाग्य का प्रतीक है (जो केवल माता पार्वती को चढ़ता है)। शिव को केवल भस्म, पीला या सफेद चंदन ही लगाएं।
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केतकी का फूल वर्जित: शिव जी की पूजा में केतकी (Ketaki) और चंपा के फूलों का प्रयोग नहीं किया जाता। सफेद रंग के फूल (आक, धतूरा, चमेली) श्रेष्ठ हैं।
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हल्दी का निषेध: शिवलिंग पर हल्दी भी नहीं चढ़ाई जाती, क्योंकि हल्दी का संबंध सौंदर्य और स्त्रियों से है।
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जलाधारी को न लांघें: शिव मंदिर में परिक्रमा करते समय ध्यान रखें कि शिवलिंग से जो जल बहकर बाहर आता है (जलहरी/जलाधारी), उसे कभी लांघना (Cross) नहीं चाहिए। परिक्रमा हमेशा आधी ही की जाती है।
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शंख से जल वर्जित: शिवलिंग पर जल या दूध कभी भी शंख से नहीं चढ़ाना चाहिए। हमेशा तांबे या पीतल के लोटे का ही प्रयोग करें (दूध के लिए पीतल या चांदी का लोटा उत्तम है, तांबे के लोटे में दूध विष बन जाता है)।
6. आधुनिक युग में श्री शिव स्तुति की असीम प्रासंगिकता (Relevance in Modern Era)
आज का आधुनिक युग ‘हाइपर-कनेक्टेड’ (Hyper-connected) है। हम मोबाइल, सोशल मीडिया और इंटरनेट के ज़रिए पूरी दुनिया से जुड़े हैं, लेकिन स्वयं अपने आप से कट चुके हैं। हर व्यक्ति एक ‘रेट रेस’ (Rat Race) में भाग रहा है, जहाँ उसे और पैसा, और सफलता, और मान्यता चाहिए। इस अंधी दौड़ का परिणाम क्या है? भयानक स्ट्रेस (Stress), नींद न आना (Insomnia), हाई ब्लड प्रेशर और मानसिक खोखलापन।
श्री शिव स्तुति आधुनिक इंसान के इस मनोवैज्ञानिक भटकाव की सबसे बड़ी आध्यात्मिक औषधि है। भगवान शिव ‘वैराग्य’ के प्रतीक हैं। वैराग्य का अर्थ सब कुछ छोड़कर जंगल में जाना नहीं है, बल्कि संसार में रहते हुए भी मानसिक रूप से मुक्त रहना है।
जब आप सुबह या शाम को एकांत में बैठकर संस्कृत के इन ओजस्वी श्लोकों का गान करते हैं, तो आपके मस्तिष्क की ‘अल्फा’ (Alpha) तरंगें जाग्रत होती हैं। यह स्तुति आपके दिमाग के उस ‘कचरे’ (Clutter) को साफ कर देती है जो व्यर्थ की चिंताओं ने भर रखा है। आपको यह अहसास होता है कि जीवन का अंतिम सत्य शिव ही हैं। जब यह अहसास पक्का हो जाता है, तो बॉस का प्रेशर, व्यापार का घाटा या रिश्तों का तनाव आपको डिप्रेशन में नहीं धकेल सकता। आप एक ‘स्थिर-प्रज्ञ’ (Emotionally stable) इंसान बन जाते हैं।
Shri Shiva Stuti (श्री शिव स्तुतिः (संस्कृत)) केवल कुछ श्लोकों का संग्रह नहीं है; यह उस परब्रह्म महादेव का साक्षात शब्द-शरीर (Sound Body) है। जब ये संस्कृत के मंत्र आपके होठों से गूंजते हैं, तो ब्रह्मांड की समस्त सकारात्मक शक्तियां आपकी रक्षा के लिए तत्पर हो जाती हैं। भगवान शिव अत्यंत भोले हैं; वे केवल यह देखते हैं कि भक्त के हृदय में प्रेम कितना गहरा है।
जब भी आपको लगे कि आप जीवन के संघर्षों से हार रहे हैं, बीमारियां शरीर को तोड़ रही हैं, और आपके मन का सुकून छिन गया है, तो सोमवार की शाम को सफेद आसन पर बैठें, शिवलिंग पर जल अर्पित करें, भस्म लगाएं, और पूर्ण हृदय से इस स्तोत्र का गान करते हुए अपने ‘महाकाल’ को पुकारें। आप स्वयं अनुभव करेंगे कि शिव के त्रिशूल ने आपके सारे दुखों और बीमारियों को काट दिया है, और साक्षात भोलेनाथ ने आपके मस्तिष्क को अपने ज्ञान और शांति के प्रकाश से भर दिया है। हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय!
श्री शिव स्तुतिः अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. श्री शिव स्तुति का मुख्य उद्देश्य क्या है?
श्री शिव स्तुति का मुख्य उद्देश्य भगवान शिव के परब्रह्म, संहारक और कल्याणकारी स्वरूप की वंदना करना है। इसका पाठ जीवन से अज्ञान के अंधकार, मृत्यु भय, असाध्य रोगों और मानसिक क्लेश को मिटाकर असीम शांति, ऐश्वर्य और अंततः मोक्ष (शिव-सायुज्य) की प्राप्ति के लिए किया जाता है।
2. शिव स्तुति का पाठ करने का सबसे सही समय कौन सा है?
भगवान शिव की स्तुति के लिए प्रातःकाल ‘ब्रह्म मुहूर्त’ (सूर्योदय से पूर्व) और सांध्यकाल ‘प्रदोष बेला’ (सूर्यास्त का समय) सबसे उत्तम माना जाता है। शिव पूजा विशेष रूप से प्रदोष काल में सर्वाधिक जाग्रत और फलदायी होती है। सोमवार का दिन शिव जी को समर्पित है।
3. क्या शिव पूजा में तुलसी दल और कुमकुम चढ़ाना चाहिए?
नहीं, शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव की पूजा में ‘तुलसी दल’ (तुलसी के पत्ते), ‘कुमकुम’ (सिंदूर), ‘हल्दी’ और ‘केतकी के फूल’ चढ़ाना सर्वथा वर्जित है। शिव जी को बिल्वपत्र (बेलपत्र), भस्म, सफेद/पीला चंदन, धतूरा और सफेद आंकड़े के फूल अर्पित करने चाहिए।
4. शिव स्तुति का पाठ करते समय किस दिशा में मुख होना चाहिए और कैसा वस्त्र पहनना चाहिए?
शिव स्तुति का पाठ करते समय साधक का मुख हमेशा ‘पूर्व’ (East) या ‘उत्तर’ (North – कैलाश पर्वत की दिशा) की ओर होना चाहिए। शिव साधना में सफेद (White) या हल्के पीले रंग के वस्त्र धारण करना अत्यंत सात्विक और चमत्कारिक माना जाता है।
5. क्या महिलाएं भी संस्कृत में श्री शिव स्तुति का पाठ कर सकती हैं?
जी हाँ, बिल्कुल! महिलाएं भी पूर्ण श्रद्धा, सात्विकता और पवित्रता के साथ श्री शिव स्तुति का सस्वर पाठ कर सकती हैं। शिव जी के लिए नर और नारी में कोई भेद नहीं है (वे अर्धनारीश्वर हैं)। केवल मासिक धर्म (Periods) के दौरान मूर्ति को स्पर्श करने या धार्मिक ग्रंथों का पाठ करने से बचना चाहिए, उस समय केवल मानसिक जप (ॐ नमः शिवाय) करना सर्वोत्तम है।