श्री नृसिंह स्तुति (शनैश्चर कृतम्) (संस्कृत) | Shri Narasimha Stuti (Shanaishchara Kritam) Lyrics in SanskritIt takes 3 minutes... to read this article !

श्री नृसिंह स्तुति (शनैश्चर कृतम्) का संपूर्ण संस्कृत पाठ पढ़ें। शनिदेव द्वारा भगवान नृसिंह की स्तुति में रचित इस पवित्र स्तोत्र के श्लोक यहां उपलब्ध हैं। जानें भगवान नृसिंह की कृपा और शनि दोष से संबंधित इस दिव्य स्तुति का महत्व।

श्री नृसिंह स्तुति (शनैश्चर कृतम्) भगवान नृसिंह की महिमा का वर्णन करने वाला एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है, जिसे शनिदेव द्वारा रचित माना जाता है। इस स्तुति में भगवान नृसिंह के उग्र एवं करुणामय स्वरूप, भक्तों की रक्षा करने वाली शक्ति तथा समस्त भय और कष्टों का नाश करने वाली महिमा का गुणगान किया गया है। इस लेख में श्री नृसिंह स्तुति (शनैश्चर कृतम्) का संपूर्ण संस्कृत पाठ प्रस्तुत किया गया है।

श्री नृसिंह स्तुति (शनैश्चर कृतम्)

श्री कृष्ण उवाच ।
सुलभो भक्तियुक्तानां दुर्दर्शो दुष्टचेतसाम् ।
अनन्यगतिकानां च प्रभुर्भक्तैकवत्सलः ॥ १

शनैश्चरस्तत्र नृसिंहदेव
स्तुतिं चकारामल चित्तवृतिः ।
प्रणम्य साष्टाङ्गमशेषलोक
किरीट नीराजित पादपद्मम् ॥ २ ॥

श्री शनिरुवाच ।
यत्पादपङ्कजरजः परमादरेण
संसेवितं सकलकल्मषराशिनाशम् ।
कल्याणकारकमशेषनिजानुगानां
स त्वं नृसिंह मयि देहि कृपावलोकम् ॥ ३ ॥

सर्वत्र चञ्चलतया स्थितया हि लक्ष्म्या
ब्रह्मादिवन्द्यपदया स्थिरयान्यसेवी ।
पादारविन्दयुगलं परमादरेण
स त्वं नृसिंह मयि देहि कृपावलोकम् ॥ ४ ॥

यद्रूपमागमशिरः प्रतिपाद्यमाद्यं
आध्यात्मिकादि परितापहरं विचिन्त्यम् ।
योगीश्वरैरपगताऽखिलदोषसङ्घैः
स त्वं नृसिंह मयि देहि कृपावलोकम् ॥ ५ ॥

प्रह्लादभक्तवचसा हरिराविरासीत्
स्तम्भे हिरण्यकशिपुं य उदारभावः ।
ऊर्वो निधाय उदरं नखरैर्ददार
स त्वं नृसिंह मयि देहि कृपावलोकम् ॥ ६ ॥

यो नैजभक्तमनलाम्बुधि भूधरोग्र-
-शृङ्गप्रपात विषदन्तसरीसृपेभ्यः ।
सर्वात्मकः परमकारुणिको ररक्ष
स त्वं नृसिंह मयि देहि कृपावलोकम् ॥ ७ ॥

यन्निर्विकार पररूप विचिन्तनेन
योगीश्वरा विषयवीत समस्तरागाः ।
विश्रान्तिमापुर विनाशवतीं पराख्यां
स त्वं नृसिंह मयि देहि कृपावलोकम् ॥ ८ ॥

यद्रूपमुग्रमरिमर्दन भावशाली
सञ्चिन्तनेन सकलाभवभीतिहारी । [अघविनाशकारि]
भूत ज्वर ग्रह समुद्भव भीतिनाशं
स त्वं नृसिंह मयि देहि कृपावलोकम् ॥ ९ ॥

यस्योत्तमं यश उमापतिमग्रजन्म
शक्रादि दैवत सभासु समस्तगीतम् ।
श्रुत्वैक सर्वशमलप्रशमेकदक्षं [शक्त्यैव]
स त्वं नृसिंह मयि देहि कृपावलोकम् ॥ १० ॥

श्रीकृष्ण उवाच ।
इत्थं श्रुत्वा स्तुतिं देवः शनिना कल्पितां हरिः ।
उवाच ब्रह्म वृन्दस्थं शनिं तं भक्तवत्सलः ॥ ११ ॥

श्रीनृसिंह उवाच ।
प्रसन्नोऽहं शने तुभ्यं वरं वरय शोभनम् ।
यं वाञ्छसि तमेव त्वं सर्वलोक हितावहम् ॥ १२ ॥

श्री शनिरुवाच ।
नृसिंह त्वं मयि कृपां कुरु देव दयानिधे ।
मद्वासरस्तव प्रीतिकरः स्याद्देवतापते ॥ १३ ॥

मत्कृतं त्वत्परं स्तोत्रं शृण्वन्ति च पठन्ति च ।
सर्वान् कामन् पूरयेथाः तेषां त्वं लोकभावन ॥ १४ ॥

श्री नृसिंह उवाच ।
तथैवास्तु शनेऽहं वै रक्षो भुवनसंस्थितः ।
भक्त कामान् पूरयिष्ये त्वं ममैकं वचः शृणु ॥ १५ ॥

त्वत्कृतं मत्परं स्तोत्रं यः पठेच्छृणुयाच्च यः ।
द्वादशाष्टम जन्मस्थात् त्वद्भयं मास्तु तस्य वै ॥ १६ ॥

शनिर्नरहरिं देवं तथेति प्रत्युवाच ह ।
ततः परमसन्तुष्टो जयेति मुनयोवदन् ॥ १७ ॥

श्री कृष्ण उवाच ।
इदं शनैश्चरस्याथ नृसिंह देव
संवादमेतत् स्तवनं च मानवः ।
शृणोति यः श्रावयते च भक्त्या
सर्वाण्यभीष्टानि च विन्दते ध्रुवम् ॥ १८ ॥

इति श्री भविष्योत्तरपुराणे श्री शनैश्चर कृत श्री नृसिंह स्तुतिः ।

इस प्रकार श्री नृसिंह स्तुति (शनैश्चर कृतम्) भगवान नृसिंह की कृपा और संरक्षण का स्मरण कराने वाला दिव्य स्तोत्र है। श्रद्धा एवं भक्ति के साथ इसके पाठ से भय, बाधाओं और नकारात्मक प्रभावों से रक्षा की प्रार्थना की जाती है तथा आध्यात्मिक बल की प्राप्ति होती है।

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