श्री प्रत्यङ्गिरा आपन्निवारण स्तुतिः का संपूर्ण संस्कृत पाठ पढ़ें। देवी प्रत्यङ्गिरा की कृपा से संकट, भय और बाधाओं के निवारण हेतु इस पवित्र स्तुति के श्लोक यहां उपलब्ध हैं।
श्री प्रत्यङ्गिरा आपन्निवारण स्तुतिः देवी प्रत्यङ्गिरा को समर्पित एक अत्यंत पवित्र स्तुति है। यह स्तुति संकटों, भय, बाधाओं एवं नकारात्मक शक्तियों से रक्षा की प्रार्थना के रूप में प्रसिद्ध है। इस लेख में श्री प्रत्यङ्गिरा आपन्निवारण स्तुतिः का संपूर्ण संस्कृत पाठ प्रस्तुत किया गया है।
श्री प्रत्यङ्गिरा आपन्निवारण स्तुतिः मूल पाठ
प्रत्यङ्गिरे महाकृत्ये दुस्तरापन्निवारिणि ।
सकलापन्निवृत्तिं मे सर्वदा कुरु सर्वदे ॥ १ ॥
प्रत्यङ्गिरे जगन्मातर्जयश्री परमेश्वरि ।
तीव्रदारिद्र्यदुःखं मे क्षिप्रमेव हराम्बिके ॥ २ ॥
प्रत्यङ्गिरे महामाये भीमे भीमपराक्रमे ।
मम शत्रूनशेषांस्त्वं दुष्टान्नाशय नाशय ॥ ३ ॥
प्रत्यङ्गिरे महदेवि ज्वालामालोज्ज्वलानने ।
क्रूरग्रहानशेषान् त्वं दह खादाग्निलोचने ॥ ४ ॥
प्रत्यङ्गिरे महाघोरे परमन्त्रांश्च कृत्रिमान् ।
परकृत्या यन्त्र तन्त्रजालं छेदय छेदय ॥ ५ ॥
प्रत्यङ्गिरे विशालाक्षि परात्परतरे शिवे ।
देहि मे पुत्रपौत्रादि पारम्पर्योछ्छ्रितां श्रियम् ॥ ६ ॥
प्रत्यङ्गिरे महादुर्गे भोगमोक्षफलप्रदे ।
सकलाभीष्टसिद्धिं मे देहि सर्वेश्वरेश्वरि ॥ ७ ॥
प्रत्यङ्गिरे महादेवि महादेवमनःप्रिये ।
मङ्गलं मे प्रयच्छाशु मनसा त्वां नमाम्यहम् ॥ ८ ॥
इति श्री प्रत्यङ्गिरा आपन्निवारण स्तुतिः ।
इस प्रकार श्री प्रत्यङ्गिरा आपन्निवारण स्तुतिः देवी प्रत्यङ्गिरा की आराधना का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। श्रद्धा एवं भक्ति के साथ इसके पाठ द्वारा साधक देवी की कृपा, संरक्षण, संकटों से मुक्ति एवं आध्यात्मिक बल की प्रार्थना करते हैं।