श्री षण्मुख पञ्चरत्न स्तुतिः का संपूर्ण संस्कृत पाठ पढ़ें। भगवान षण्मुख (कार्तिकेय, स्कन्द, सुब्रह्मण्य) की महिमा का वर्णन करने वाले इस पवित्र पञ्चरत्न स्तोत्र के श्लोक यहां उपलब्ध हैं।
श्री षण्मुख पञ्चरत्न स्तुतिः भगवान षण्मुख, कार्तिकेय अथवा सुब्रह्मण्य स्वामी को समर्पित एक पवित्र स्तोत्र है। इस पञ्चरत्न स्तुति में भगवान के दिव्य स्वरूप, ज्ञान, शक्ति, वीरता एवं भक्तों पर उनकी कृपा का सुंदर वर्णन किया गया है। इस लेख में श्री षण्मुख पञ्चरत्न स्तुतिः का संपूर्ण संस्कृत पाठ प्रस्तुत किया गया है।
श्री षण्मुख पञ्चरत्न स्तुतिः
स्फुरद्विद्युद्वल्लीवलयितमगोत्सङ्गवसतिं
भवाप्पित्तप्लुष्टानमितकरुणाजीवनवशात् ।
अवन्तं भक्तानामुदयकरमम्भोधर इति
प्रमोदादावासं व्यतनुत मयूरोऽस्य सविधे ॥ १ ॥
सुब्रह्मण्यो यो भवेज्ज्ञानशक्त्या
सिद्धं तस्मिन्देवसेनापतित्वम् ।
इत्थं शक्तिं देवसेनापतित्वं
सुब्रह्मण्यो बिभ्रदेष व्यनक्ति ॥ २ ॥
पक्षोऽनिर्वचनीयो दक्षिण इति धियमशेषजनतायाः ।
जनयति बर्ही दक्षिणनिर्वचनायोग्यपक्षयुक्तोऽयम् ॥ ३ ॥
यः पक्षमनिर्वचनं याति समवलम्ब्य दृश्यते तेन ।
ब्रह्म परात्परममलं सुब्रह्मण्याभिधं परं ज्योतिः ॥ ४ ॥
षण्मुखं हसन्मुखं सुखाम्बुराशिखेलनं
सन्मुनीन्द्रसेव्यमानपादपङ्कजं सदा ।
मन्मथादिशत्रुवर्गनाशकं कृपाम्बुधिं
मन्महे मुदा हृदि प्रपन्नकल्पभूरुहम् ॥ ५ ॥
इति जगद्गुरु शृङ्गेरीपीठाधिप श्रीचन्द्रशेखरभारती श्रीपादैः विरचिता श्रीषण्मुखपञ्चरत्नस्तुतिः ।
इस प्रकार श्री षण्मुख पञ्चरत्न स्तुतिः भगवान षण्मुख की भक्ति और आराधना का एक उत्कृष्ट माध्यम है। श्रद्धा एवं भक्ति के साथ इसके पाठ द्वारा भक्त ज्ञान, साहस, सफलता तथा भगवान की कृपा प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं।